Adhyaya 192
Vana ParvaAdhyaya 19242 Verses

Adhyaya 192

उत्तङ्कोपाख्यानप्रारम्भः — Uttanka’s Tapas, Viṣṇu-stuti, and the Dhundhumāra Prophecy (Opening)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Uttanka–Dhundhumāra Ākhyāna (embedded exemplum within Āraṇyaka-parva)

Vaiśaṃpāyana reports Yudhiṣṭhira’s inquiry to the sage Mārkaṇḍeya, praising his comprehensive knowledge of divine, demonic, royal, and ṛṣi lineages. Yudhiṣṭhira requests an accurate account of how the Ikṣvāku king Kuvalāśva came to be known as Dhundhumāra. Mārkaṇḍeya begins the dharmic exemplum: he introduces the renowned ṛṣi Uttanka dwelling in Marudhanva forests, performing severe tapas to propitiate Viṣṇu. Viṣṇu grants direct दर्शन (vision), and Uttanka offers a structured cosmic hymn identifying the deity as creator and as the immanent support of the universe. When invited to choose a boon, Uttanka declares the vision itself sufficient, yet is pressed to ask; he requests enduring orientation to dharma, truth, restraint, and constant devotional practice. Viṣṇu grants these and adds a prophetic commission: an asura named Dhundhu performs fierce austerities to afflict the worlds; in a future royal line, King Bṛhadaśva’s son Kuvalāśva will, empowered by yoga and under Uttanka’s directive, become Dhundhumāra—thus setting the narrative trajectory for the asura’s neutralization. The chapter closes with Viṣṇu’s disappearance after delivering this linkage.

Chapter Arc: वनवास के धूसर वर्तमान में एक दिव्य भविष्य-दर्शन खुलता है—भगवान् कल्कि के द्वारा सत्ययुग की पुनर्स्थापना और स्वयम्भुव (ब्रह्मा) द्वारा निर्धारित शुभ मर्यादाओं का पुनर्जागरण। → युधिष्ठिर के भीतर राजा-धर्म का भय और संशय उभरता है: प्रजा-रक्षा करते हुए मैं स्वधर्म से कैसे न च्यवूँ? प्रमाद से यदि किसी के प्रति अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसका प्रायश्चित्त क्या? काल का दबाव, राजकुल की प्रतिष्ठा, और धर्म-लोप की आशंका—सब एक साथ कसते हैं। → ऋषि का निर्णायक उपदेश: ‘कर्म, मन और वाणी—तीनों से धर्माचरण करो’; प्रमादजन्य दोष को ‘सम्यक् दान’ से जीतो; और यह जानो कि प्राज्ञ पुरुष काल से पीड़ित होकर भी मोह में नहीं पड़ते—यह काल तो देवों तक को दबाता है। साथ ही कल्कि-युग का आदर्श चित्र उभरता है—लोग शील का अनुकरण करेंगे, वर्ण-कर्तव्य अपने-अपने कर्म में स्थिर होंगे, और ‘कृते युगे’ क्षेम होगा। → उपदेश का भार युधिष्ठिर के भीतर स्थिरता बनकर उतरता है। वह स्वीकार करता है कि यह वचन कानों को मधुर और मन को प्रिय लगा; और वह प्रतिज्ञा करता है कि जो कुछ कहा गया है, उसे वह आचरण में उतारेगा। → धर्म का आदर्श तो स्पष्ट हुआ, पर वनवास की कठोर वास्तविकता में—जहाँ अपमान, अभाव और आगामी संघर्ष छाया है—युधिष्ठिर इस उपदेश को कितनी दूर तक निभा पाएँगे?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ *लोक मिलाकर कुल ९७३ श्लोक हैं) #५+ ०० ()) अपन आस एकनवरत्याधिकशततमो< ध्याय: भगवान्‌ कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठटिरके लिये धर्मोपदेश मार्कण्डेय उदाच ततपश्नोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्य: पृथिवीमिमाम्‌ । वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत्‌ कल्पयिष्यति,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठि!| उस समय चोर-डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान्‌ कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणको दे डालेंगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Kemudian, setelah membinasakan para pencuri, perampok, dan mleccha, ia akan menegakkan perlindungan bagi rakyat. Lalu ia akan menyelenggarakan mahayajña Aśvamedha menurut tata-ritus, dan dalam upacara itu ia akan menganugerahkan seluruh bumi ini kepada para brahmana.”

Verse 2

स्थापयित्वा च मर्यादा: स्वयम्भुविहिता: शुभा: । वन॑ पुण्ययश:कर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति,उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन होंगे। वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मंगलमयी मर्यादाओंकी स्थापना करके (तपस्याके लिये) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे

Setelah menegakkan batas-batas luhur tata laku yang ditetapkan oleh Svayambhū (Brahmā)—ia yang kemasyhuran dan perbuatannya sepenuhnya menyucikan—akan memasuki hutan yang elok.

Verse 3

तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिन: । विप्रैश्नोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति,फिर इस जगत्‌के निवासी मनुष्य उनके शील-स्वभावका अनुकरण करेंगे। इस प्रकार सत्ययुगमें ब्राह्मणोंद्वारा दस्युदलका विनाश हो जानेपर संसारका मंगल होगा

Orang-orang yang tinggal di dunia ini akan meneladani perilaku dan watak itu. Maka pada zaman Kṛta (Satya), ketika gerombolan perampok dimusnahkan dan para Brahmana dilindungi, dunia akan menjadi tenteram dan penuh berkah.

Verse 4

कृष्णाजिनानि शक्तीश्न त्रिशूलान्यायुधानि च । स्थापयन्‌ द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च,द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वागा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे

Sang Kalkī, harimau di antara para Brahmana, akan berkelana di negeri-negeri yang telah ditaklukkannya, sambil menegakkan kulit kijang hitam, tombak, trisula, dan senjata-senjata lainnya di wilayah-wilayah itu.

Verse 5

संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैमानयानो द्विजोत्तमान्‌ | कलल्‍की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रत:,द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वागा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे

Dipuja oleh para Brahmana terkemuka dan sambil menghormati yang terbaik di antara kaum dwija, Kalkī akan menjelajahi bumi, senantiasa tekun memusnahkan para dasyu yang melanggar dharma.

Verse 6

हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाच: सुदारुणा: । विक्रोशमानान्‌ सुभृशं दस्यून्‌ नेष्यति संक्षयम्‌,उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें “हाय मैया”, “हाय बप्पा” और “हाय बेटा' इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान्‌ कल्‍की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे

Sambil meratap keras dengan kata-kata yang memilukan—“Aduh, ibu! Aduh, ayah! Aduh, anakku!”—para dasyu akan meraung; dan kemudian (Sang Bhagavān) Kalkī akan menyeret para perampok itu menuju kebinasaan.

Verse 7

ततो<धर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्व भारत । भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्व जनस्तथा,उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें “हाय मैया”, “हाय बप्पा” और “हाय बेटा' इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान्‌ कल्‍की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे

Kemudian, wahai Bhārata, adharma sungguh akan dimusnahkan dan dharma akan bertambah. Ketika zaman Kṛta (Satya) tiba, manusia pun akan menjadi tekun dalam perbuatan benar.

Verse 8

आरामाश्चैव चैत्याश्ष॒ तटाकावसथास्तथा । पुष्करिण्यश्व विविधा देवतायतनानि च,उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायाँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Pada zaman itu, taman-taman kesenangan dan kebun-kebun baru akan ditata; caitya—tempat suci—serta pohon-pohon keramat akan ditegakkan. Telaga dan rumah peristirahatan akan dibangun, dan berbagai kolam teratai akan disiapkan. Kuil-kuil bagi para dewa pun akan bermunculan.”

Verse 9

यज्ञक्रियाश्व विविधा भविष्यन्ति कृते युगे । ब्राह्मणा: साधवश्चैव मुनयश्न तपस्विन:,उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायाँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे

Pada Kṛta Yuga, beragam upacara yajña akan dilaksanakan. Para brāhmaṇa akan berbudi luhur dan berperilaku baik, dan para muni—para pertapa—akan teguh menekuni tapas.

Verse 10

आश्रमा हतपाखण्डा: स्थिता: सत्यरता: प्रजा: । जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह,आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी। खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे

Pertapaan-pertapaan akan bebas dari kepalsuan dan ajaran menyesatkan, dan rakyat akan teguh berpegang pada kebenaran. Segala benih yang ditabur di ladang akan tumbuh dengan baik dan subur.

Verse 11

सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्व सस्यं भविष्यति । नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च,राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे। सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे

Wahai raja, pada setiap musim segala jenis biji-bijian akan tumbuh subur. Orang-orang akan tekun dalam kedermawanan, serta mantap menjalankan vrata dan disiplin niyama.

Verse 12

जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युता: । पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम्‌,ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी। क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे

Para vipra akan bersukacita, tekun dalam japa-yajña, dan menginginkan dharma semata. Para raja akan memelihara bumi ini menurut dharma, melindunginya dengan pemerintahan yang benar.

Verse 13

व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे । षट्कर्मनिरता वित्रा: क्षत्रिया विक्रमे रता:

Mārkaṇḍeya berkata: “Pada Yuga Kṛta, kaum Vaiśya akan tekun pada transaksi yang adil dan perdagangan yang tertib; para Brāhmaṇa akan bersungguh-sungguh menjalankan enam kewajiban yang ditetapkan; dan para Kṣatriya akan bergembira dalam keberanian, kepahlawanan, serta usaha-usiaha gagah.”

Verse 14

शुश्रूषायां रता: शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च । सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे। ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह--इन छः कर्माँमें तत्पर रहेंगे। क्षत्रिय बल-पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोकी सेवामें लगे रहेंगे || १३ ई ।। एष धर्म: कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा,धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है

Mārkaṇḍeya berkata: “Pada Yuga Kṛta (Satya), para Śūdra tekun dalam pengabdian; demikian pula tiga varṇa yang lebih tinggi teguh dalam dharma masing-masing. Inilah rupa dharma pada Yuga Kṛta; dan pada Yuga Tretā serta Dvāpara pun dharma dibicarakan menurut keadaannya. Keadaan dharma pada Yuga Kali telah lebih dahulu kujelaskan kepadamu. Wahai putra Pāṇḍu, engkau pun telah mengetahui perhitungan yuga yang diakui di seluruh dunia.”

Verse 15

पश्चिमे युगकाले च य: स ते सम्प्रकीर्तित: । सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव,धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है

Mārkaṇḍeya berkata: “Dia yang muncul pada penghujung zaman yuga itu pun telah kuuraikan kepadamu dengan semestinya. Wahai Pāṇḍava, engkau juga telah mengetahui perhitungan yuga yang dikenal di seluruh dunia.”

Verse 16

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा । वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम्‌,राजन! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत-भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है

Mārkaṇḍeya berkata: “Semua ini telah kuceritakan kepadamu—yang telah berlalu dan yang akan datang. Dengan mengingat kisah Purāṇa kuno yang dipuji para ṛṣi dan diproklamasikan oleh Vāyu, wahai Raja, aku telah menuturkan seluruh riwayat ini kepadamu.”

Verse 17

एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना । दृष्टाश्वैवानुभूताश्व तांस्ते कथितवानहम्‌,इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है

Markandeya berkata: “Demikianlah, karena usiaku yang panjang, aku telah berkali-kali menyaksikan dan mengalami sendiri berbagai jalan serta arus kehidupan duniawi; dan semuanya itu kini telah kuceritakan kepadamu.”

Verse 18

इदं चैवापरं भूय: सह भ्रातृभिरच्युत । धर्मसंशयमोक्षार्थ निबोध वचनं मम,धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira yang tak pernah menyimpang dari batas dharma, bersama saudara-saudaramu dengarkan lagi satu perkataanku. Simaklah dengan saksama ucapanku ini, sebab dimaksudkan untuk melenyapkan keraguanmu tentang dharma.”

Verse 19

धर्मे त्वया55त्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभूतां वर । धर्मात्मा हि सुखं राजन प्रेत्य चेह च नन्दति,धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने-आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, yang terbaik di antara para penegak dharma, engkau harus senantiasa menautkan dirimu pada dharma. Sebab, wahai raja, orang yang hakikatnya adalah dharma hidup berbahagia—di dunia ini dan, setelah wafat, di alam seberang.”

Verse 20

निबोध च शुभां वाणी यां प्रवक्ष्यामि तेडनघ । न ब्राह्मणे परिभव: कर्तव्यस्ते कदाचन

Mārkaṇḍeya berkata: “Dengarkanlah dengan saksama kata-kata yang membawa berkah ini yang akan kusampaikan kepadamu, wahai yang tak bercela. Jangan sekali-kali engkau menghina atau merendahkan seorang brāhmaṇa.”

Verse 21

वैशम्पायन उवाच मार्कण्डेयवच: श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृप:

Vaiśampāyana berkata: Setelah mendengar kata-kata Mārkaṇḍeya, sang raja—yang utama di antara para Kuru—(menjawab/bertindak sebagaimana mestinya).

Verse 22

कस्मिन्‌ धर्मे मया स्थेयं प्रजा: संरक्षता मुने

Sang raja berkata: “Wahai resi, ketika aku memikul tugas melindungi rakyat, dalam dharma yang manakah aku harus berdiri teguh?”

Verse 23

मार्कण्डेय उदाच दयावान्‌ सर्वभूतेषु हितो रक्तोडनसूयक:,मार्कण्डेयजीने कहा--राजन्‌! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषदृष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, berbelas kasihlah kepada semua makhluk. Tetaplah mengabdi pada kesejahteraan semua dan bebas dari kebiasaan mencari-cari cela. Peliharalah sikap kasih kepada setiap orang; jangan memandang aib orang lain. Berkatalah benar, berwatak lembut, kendalikan indria, dan tekunlah melindungi rakyat—demikianlah jalankan dharma. Jauhilah adharma dari jauh, dan teruslah memuja para dewa serta menghormati para leluhur (pitṛ).”

Verse 24

सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रत: । चर धर्म त्यजाधर्म पितृन्‌ देवांश्व पूजय,मार्कण्डेयजीने कहा--राजन्‌! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषदृष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो

Jadilah penutur kebenaran, lembut perangai, mampu mengekang indria, dan tekun melindungi rakyat. Jalankan dharma; tinggalkan adharma. Teruslah memuja para leluhur (pitṛ) dan para dewa.

Verse 25

प्रमादाद्‌ यत्‌ कृतं ते5भूत्‌ सम्यग्‌ दानेन तज्जय । अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान्‌ भव,यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो। मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो। तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो

Bila karena kelengahanmu terjadi suatu kesalahan, taklukkanlah itu dengan pemberian yang patut hingga pihak lain menjadi puas. Jangan bersandar pada kesombongan—jangan biarkan ia mendekat. Pandanglah dirimu selalu sebagai pihak yang terikat kewajiban dan harus bertanggung jawab, bukan sebagai tuan yang mutlak.

Verse 26

विजित्य पृथिवीं सर्वा मोदमान: सुखी भव । एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरित:,सारी पृथ्वीको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः: इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो

Setelah menaklukkan seluruh bumi, tetaplah bersukacita dan tenteram. Inilah dharma yang telah dinyatakan kepadamu—yang telah dijalankan pada masa lampau dan patut dijalankan pula pada masa mendatang.

Verse 27

न ते<स्त्यविदितं किज्चिदतीतानागतं भुवि | तस्मादिमं परिक्‍लेशं त्वं तात हृदि मा कृथा:,सारी पृथ्वीको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः: इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो

Di bumi ini, tiada sesuatu pun—baik yang telah lampau maupun yang akan datang—yang tidak engkau ketahui. Maka, wahai anak terkasih, jangan biarkan derita yang kini menimpa itu menetap di dalam hati.

Verse 28

प्राज्ञास्तात न मुहान्ति कालेनापि प्रपीडिता: । एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम्‌,तात! विद्वान्‌ पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते। महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang terkasih, orang yang sungguh bijaksana tidak jatuh ke dalam delusi meski dihimpit oleh Waktu. Wahai yang berlengan perkasa, Waktu ini menampakkan kuasanya bahkan atas semua penghuni surga.”

Verse 29

मुहान्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिता: । मा च तत्र विशड्काभूद्‌ यन्मयोक्ते तवानघ,युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है। अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang terkasih, manusia memang menjadi delusi ketika Waktu sendiri mendorongnya. Maka, wahai Yudhiṣṭhira yang tanpa cela, jangan ada keraguan dalam dirimu tentang apa yang telah kukatakan.”

Verse 30

आशड्कय मद्वचो होतद्‌ धर्मलोपो भवेत्‌ तव | जातोऊसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ

Agar engkau meragukan ucapanku, dharmamu bisa tergelincir—karena takut akan hal itu aku berkata demikian. Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, engkau terlahir dalam wangsa Kuru yang termasyhur.

Verse 31

युधिछिर उवाच यत्‌ त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम्‌,करिष्यामि हि तत्‌ सर्वमुक्त यत्‌ ते मयि प्रभो | युधिष्ठिरने कहा--द्विजश्रेष्ठ] आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ। मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai brahmana terbaik, kata-kata yang engkau ucapkan indah didengar dan menenteramkan batin. Wahai tuan, segala yang engkau perintahkan kepadaku akan kulaksanakan.”

Verse 32

तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासन विभो । न मे लोभोस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सर:

Wahai yang mulia, sesuai perintahmu akan kulakukan itu dengan sungguh-sungguh. Wahai brahmana utama, dalam diriku tidak ada keserakahan, tidak ada ketakutan, dan tidak pula iri hati.

Verse 33

वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमत:ः,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! उन परम बुद्धिमान्‌ मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, setelah mendengar sabda Mārkaṇḍeya yang maha-bijaksana, kelima Pāṇḍava bersama Śrī Kṛṣṇa pun dipenuhi sukacita. Para brāhmaṇa utama yang hadir di sana juga semuanya sangat bergembira.”

Verse 34

संहृष्टा: पाण्डवा राजन्‌ सहिता: शार्ज्र्धन्वना । विप्रर्षभाश्न ते सर्वे ये तत्रासन्‌ समागता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! उन परम बुद्धिमान्‌ मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, para Pāṇḍava bersukacita bersama Śrī Kṛṣṇa, pemegang busur Śārṅga; dan semua brāhmaṇa terkemuka yang berkumpul di sana pun turut sangat bergembira.”

Verse 35

तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्यथ धीमत: । विस्मिता: समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात्‌,बुद्धिमान्‌ मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए

Setelah mendengar kisah yang membawa berkah itu dari mulut Mārkaṇḍeya yang bijaksana, semua yang hadir diliputi rasa takjub; dan melalui pemaparan kisah Purāṇik yang kuno itu, mereka memperoleh pemahaman serta kegembiraan yang mendalam.

Verse 190

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें भविष्यवर्णनणविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-192 dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian Markandeya-Samāsya, yang membahas uraian tentang hal-hal yang akan datang.

Verse 191

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने एकनवत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपववके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें युधिष्ठिरके लिये उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—di subbagian Markandeya-Samāsya—bab ke-191, yang berisi ajaran (anuśāsana) bagi Yudhiṣṭhira.

Verse 206

ब्राह्मण: कुपितो हन्यादपि लोकानू्‌ प्रतिज्ञया । निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ। युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिए; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है

Mārkaṇḍeya berkata: “Seorang Brahmana, bila murka, dapat dengan kekuatan sumpahnya menjatuhkan bahkan dunia-dunia. Wahai raja tanpa noda, pahamilah nasihat yang membawa berkah ini yang hendak kusampaikan kepadamu. Yudhiṣṭhira, jangan sekali-kali engkau menghina seorang Brahmana; sebab bila seorang Brahmana tersulut amarah dan mengikat diri dengan suatu janji, maka sesuai sumpah itu ia sanggup mendatangkan kebinasaan atas seluruh dunia.”

Verse 216

उवाच वचन धीमान्‌ परमं परमद्युति: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा--

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Setelah mendengar ucapan resi Mārkaṇḍeya itu, Raja Yudhiṣṭhira—permata wangsa Kuru, yang amat bercahaya dan bijaksana—mengucapkan kata-kata yang luhur ini.”

Verse 226

कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मत: । “मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये। मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ?”

“Dan ketika aku menjalani hidup di dunia, bagaimana agar aku tidak pernah menyimpang dari svadharmaku? Wahai resi, saat melindungi rakyat, dalam dharma apakah aku harus teguh berdiri, dan bagaimana seharusnya laku serta perilakuku agar aku tidak menyimpang dari kewajiban yang benar?”

Verse 303

कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत्‌ समाचर । मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण। तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो

Vaiśampāyana berkata: “Laksanakan semuanya ini dengan perbuatan, pikiran, dan ucapan. Jika engkau meragukan kata-kataku, dharmamu akan berkurang. Wahai perhiasan wangsa Bharata, engkau terlahir dalam klan Kaurava yang termasyhur; maka tegakkan semua ajaran ini dengan hati, kata, dan tindakan.”

Verse 323

करिष्यामि हि तत्‌ सर्वमुक्त यत्‌ ते मयि प्रभो | युधिष्ठिरने कहा--द्विजश्रेष्ठ] आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ। मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang terbaik di antara para dvija, ajaran yang engkau berikan terasa manis di telingaku dan berkenan di hatiku. Wahai tuan, dengan sungguh-sungguh akan kuturuti perintahmu. Wahai Brahmana utama, dalam batinku tiada loba, tiada takut, tiada iri. Wahai junjungan, segala yang engkau ucapkan demi kebaikanku akan kulaksanakan sepenuhnya.”

Frequently Asked Questions

The ethical choice is Uttanka’s prioritization of inner moral orientation (dharma, truth, restraint, steady devotion) over external rewards when offered a boon after divine vision.

The chapter teaches that transformative agency arises from disciplined practice and ethical clarity; devotion is framed as a stabilizing epistemic and moral force that equips one for consequential, world-oriented duties.

No explicit phalaśruti is stated in this excerpt; the meta-function is achieved through prophetic framing—linking devotional virtue to future loka-saṃgraha (world-protective action) via the Dhundhumāra narrative arc.