
अन्नदान-प्रशंसा (Praise of the Gift of Food) | Annadāna-Praśaṃsā
Upa-parva: Dāna-dharma Anuśāsana (Food-Gift Discourse Unit)
Yudhiṣṭhira asks which gifts a king intent on giving should offer to highly qualified brāhmaṇas, how such recipients are pleased, and what fruits arise in this world and beyond. Bhīṣma replies that Nārada had earlier addressed this question and relays Nārada’s doctrine: food (anna) is praised by devas and ṛṣis as the foundation of ritual (yajña), social order, and life itself. The chapter repeatedly asserts annadāna’s unsurpassed status—no gift equals it—because prāṇa and worldly functioning rest on nourishment. Norms of giving include honoring the weary traveler and the elderly guest, abandoning anger and envy, and not despising any petitioner; the merit of a gift does not perish even if given to socially marginal figures. The text recommends giving without interrogating a brāhmaṇa’s lineage or learning when he begs for food, and it frames annadāna as producing both immediate goodwill and long-range merit (including described heavenly abodes). A cosmological account links rain, crops, bodily vitality, and procreation to food, concluding that the wise should give food across the three worlds’ moral economy.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का कौतूहल जाग उठता है—‘वह कौन-सा दान है जो दाता का अनुगमन करता है?’ और वे भीष्म से दान-धर्म का रहस्य स्पष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। → भीष्म दान की सूक्ष्म कसौटियाँ रखते हैं: भय-निवारण, संकट में अनुग्रह, याचक की तृषा/आवश्यकता के अनुसार इच्छित वस्तु देना, और ऐसा दान जो देकर भी ‘मैंने दिया’ का अहं न जगाए। साथ ही वे ब्राह्मणों के सत्कार की अनिवार्यता बताते हैं—क्षत्रिय का तेज और तप भी ब्राह्मण-तपस्या के सामने शान्त हो जाता है; और क्रुद्ध ब्राह्मण ‘आशीविष’ समान हो सकते हैं। → भीष्म सत्य-प्रतिज्ञा के स्वर में घोषणा करते हैं कि ब्राह्मणों के प्रति किए गए उपकारों पर उन्हें कोई पश्चात्ताप नहीं—उसी सत्य के बल पर वे शान्तनु के लोकों की ओर गमन की कामना करते हैं; दान का सर्वोच्च रूप वही है जो दाता के साथ चलता है और दाता के भीतर ‘दत्तं मन्येत’—देकर भी न देने का भाव—उत्पन्न कर दे। → अध्याय दान-धर्म का निष्कर्ष देता है: श्रेष्ठ दान वह है जो अभय, करुणा, याचक-हित और अहं-शून्यता से युक्त हो; और समाज-धर्म की धुरी ब्राह्मण-सत्कार तथा उनके प्रति सावधानी/मर्यादा है। → भीष्म संकेत करते हैं कि आगे वे ‘सनातन धार्मिक व्यवहार’ और वर्ण-व्यवहार की परंपरागत मर्यादाओं का विस्तार से निरूपण करेंगे।
Verse 1
ऑपनआक्ाा बछ। आर: 2 एकोनषशष्टितमो< ध्याय: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश युधिछिर उवाच यानीमानि बहिर्वेद्यां दानानि परिचक्षते | तेभ्यो विशिष्ट कि दानं मतं ते कुरुपुंगव,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुश्रेष्ठी! वेदीके बाहर जो ये दान बताये जाते हैं, उन सबकी अपेक्षा आपके मतमें कौन दान श्रेष्ठ है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang termulia di antara para Kuru, orang-orang menyebut berbagai dana yang diberikan di luar altar yajña. Di antara semuanya itu, menurutmu dana manakah yang paling unggul?”
Verse 2
कौतूहलं हि परम तत्र मे विद्यते प्रभो । दातारं दत्तमन्वेति यद् दान॑ तत् प्रचक्ष्व मे,प्रभो! इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है; अतः जिस दानका पुण्य दाताका अनुसरण करता हो, वह मुझे बताइये
Wahai tuanku, tentang hal ini timbul rasa ingin tahu yang sangat besar dalam diriku. Maka jelaskan kepadaku: dana apakah yang pahalanya mengikuti sang pemberi—sehingga buah pemberian itu menyertai dirinya?
Verse 3
भीष्म उवाच अभयं सर्वभूतेभ्यो व्यसने चाप्यनुग्रह: । यच्चाभिलषितं दद्यात् तृषितायाभियाचते
Bhīṣma berkata: Hendaknya seseorang menganugerahkan rasa aman kepada semua makhluk dan menunjukkan belas kasih bahkan di masa kesusahan. Dan bila seorang yang kehausan datang memohon, berikanlah—sesuai kemampuan—apa yang diinginkannya, agar dahaganya sungguh terpuaskan.
Verse 4
दत्तं मन्येत यद् दत्त्वा तद् दान श्रेष्ठमुच्यते । दत्तं दातारमन्वेति यद् दानं भरतर्षभ
Bhishma berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, sedekah yang disebut paling utama ialah yang setelah diberikan membuat si pemberi merasa, ‘Sungguh telah kuberikan sepenuhnya.’ Dan itulah sedekah yang, setelah diberikan, tetap mengikuti sang pemberi—pahala dan akibatnya menyertai dirinya.”
Verse 5
भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! सम्पूर्ण प्राणियोंकों अभयदान देना, संकटके समय उनपर अनुग्रह करना, याचकको उसकी अभीष्ट वस्तु देना तथा प्याससे पीड़ित होकर पानी माँगनेवालेको पानी पिलाना उत्तम दान है और जिसे देकर दिया हुआ मान लिया जाय अर्थात् जिसमें कहीं भी ममताकी गन्ध न रह जाय, वह दान श्रेष्ठ कहलाता है। भरतश्रेष्ठ! वही दान दाताका अनुसरण करता है ।। हिरण्यदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च । एतानि वै पवित्राणि तारयन्त्यपि दुष्कृतम्,सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान--ये तीन पवित्र दान हैं, जो पापीको भी तार देते हैं
Bhishma berkata: “Yudhishthira, sedekah yang paling mulia ialah menganugerahkan rasa aman kepada semua makhluk—menaruh belas kasih pada mereka saat kesusahan, memberi pemohon apa yang ia minta, dan menyuguhkan air kepada orang yang tersiksa dahaga ketika ia memintanya. Dan sedekah disebut sungguh unggul bila, setelah diberikan, ia dipandang benar-benar telah lepas—tanpa sisa rasa memiliki sedikit pun. Wahai yang terbaik di antara Bharata, sedekah demikian mengikuti sang pemberi. Lagi pula, sedekah emas, sedekah sapi, dan sedekah tanah—tiga inilah sedekah yang menyucikan; bahkan pelaku keburukan pun dapat diseberangkan dari akibat perbuatan jahat.”
Verse 6
एतानि पुरुषव्याप्र साधुभ्यो देहि नित्यदा | दानानि हि नरं पापान्मोक्षयन्ति न संशय:,पुरुषसिंह! तुम श्रेष्ठ पुरुषोंको ही सदा उपर्युक्त पवित्र वस्तुओंका दान किया करो। ये दान मनुष्यको पापसे मुक्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं है
“Wahai harimau di antara manusia, berikanlah (anugerah-anugerah) ini senantiasa kepada orang-orang saleh. Sebab sedekah membebaskan manusia dari dosa—tanpa keraguan.”
Verse 7
यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता,संसारमें जो-जो पदार्थ अत्यन्त प्रिय माना जाता है तथा अपने घरमें भी जो प्रिय वस्तु मौजूद हो, वही-वही वस्तु गुणवान् पुरुषको देनी चाहिये। जो अपने दानको अक्षय बनाना चाहता हो, उसके लिये ऐसा करना आवश्यक है
Bhishma berkata: “Apa pun yang paling dicintai di dunia, dan apa pun yang paling disayangi di rumah sendiri—itulah yang patut diberikan kepada orang yang berbudi. Bagi dia yang menghendaki buah sedekahnya tak binasa, demikianlah jalan yang semestinya.”
Verse 8
प्रियाणि लभते नित्यं प्रियद: प्रियकृत् तथा । प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च,जो दूसरोंको प्रिय वस्तुका दान देता है और उनका प्रिय कार्य ही करता है, वह सदा प्रिय वस्तुओंको ही पाता है तथा इहलोक और परलोकमें भी वह समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है
Bhishma berkata: “Orang yang memberi apa yang dicintai orang lain dan senantiasa melakukan hal yang menyenangkan mereka, akan terus-menerus memperoleh hal-hal yang dicintainya pula. Ia menjadi terkasih bagi semua makhluk—di dunia ini maupun di dunia seberang.”
Verse 9
याचमानमभीमानादनासक्तमकिंचनम् । यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर,युधिष्ठि!! जो आसक्तिरहित अकिंचन याचकका अहंकारवश अपनी शक्तिके अनुसार सत्कार नहीं करता है, वह मनुष्य निर्दयी है
Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, siapa pun yang karena kesombongan tidak memuliakan seorang pemohon yang tak terikat dan tak berharta sesuai kemampuannya, orang itu kejam.”
Verse 10
अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् | व्यसने यो<नुगृह्नाति स वै पुरुषसत्तम:,शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है
Bhīṣma berkata: “Sekalipun musuh datang dalam keadaan papa dan mencari perlindungan, orang yang menaruh belas kasih kepadanya pada saat bencana, dialah yang terbaik di antara manusia.”
Verse 11
कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते | अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुष: सम:,विद्वान होनेपर भी जिसकी आजीविका क्षीण हो गयी है तथा जो दीन, दुर्बल और दुखी है, ऐसे मनुष्यकी जो भूख मिटा देता है उस पुरुषके समान पुण्यात्मा कोई नहीं है
Bhīṣma berkata: “Bila ada orang yang kurus—meski berilmu—yang penghidupannya merosot dan tenggelam dalam kesusahan, siapa yang melenyapkan laparnya, tiada orang saleh yang menyamainya.”
Verse 12
क्रियानियमितान् साधुन् पुत्रदारैश्व॒ कर्शितान् अयाचमानान् कौन्तेय सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत्,कुन्तीनन्दन! जो स्त्री-पुत्रोंक॒ पालनमें असमर्थ होनेके कारण विशेष कष्ट उठाते हैं; परंतु किसीसे याचना नहीं करते और सदा सत्कर्मोमें ही संलग्न रहते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंको प्रत्येक उपायसे सहायता देनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये
Bhīṣma berkata: “Wahai putra Kuntī, orang-orang saleh yang tertib dalam laku benar, yang letih oleh beban menafkahi anak dan istri namun tidak meminta-minta, hendaknya dengan segala cara diundang dan ditopang.”
Verse 13
आशिषं ये न देवेषु न च मर्त्येषु कुर्वते । अर्लन्तो नित्यसंतुष्टास्तथा लब्धोपजीविन:,युधिष्ठिर! जो देवताओं और मनुष्योंसे किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, सदा संतुष्ट रहते और जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते हैं, ऐसे पूज्य द्विजवरोंका दूतोंद्वारा पता लगाओ और उन्हें निमन्त्रित करो। भारत! वे दुखी होनेपर विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं; अतः उनसे अपनी रक्षा करो। कुरुनन्दन! सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेके कारण सुखद गृह निवेदन करके उनका नित्यप्रति पूर्ण सत्कार करो
Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, carilah—melalui para utusanmu—para dwija yang mulia, yang tidak memohon apa pun kepada dewa maupun manusia, yang berkeinginan sedikit, senantiasa puas, dan hidup dari apa yang datang. Wahai Bhārata, bila mereka terhimpit derita, mereka dapat menjadi mengerikan laksana ular berbisa; maka lindungilah dirimu dengan memuliakan mereka. Wahai keturunan Kuru, undanglah mereka ke rumah yang menyenangkan, lengkap dengan pelayan dan keperluan, dan berikanlah jamuan serta penghormatan yang sempurna setiap hari.”
Verse 14
आशीविषसमेभ्यश्ष तेभ्यो रक्षस्व भारत । तान् युक्तैरुपजिज्ञास्यस्तथा द्विजवरोत्तमान्,युधिष्ठिर! जो देवताओं और मनुष्योंसे किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, सदा संतुष्ट रहते और जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते हैं, ऐसे पूज्य द्विजवरोंका दूतोंद्वारा पता लगाओ और उन्हें निमन्त्रित करो। भारत! वे दुखी होनेपर विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं; अतः उनसे अपनी रक्षा करो। कुरुनन्दन! सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेके कारण सुखद गृह निवेदन करके उनका नित्यप्रति पूर्ण सत्कार करो
Bhishma berkata: “Wahai Bharata (Yudhishthira), lindungilah dirimu dari orang-orang semacam itu, yang laksana ular berbisa. Dengan utusan yang cakap, selidikilah dengan saksama dan kenalilah para resi brahmana terkemuka—mereka yang tidak menginginkan apa pun dari para dewa maupun manusia, yang senantiasa puas, dan yang hidup dari apa saja yang datang tanpa diminta. Setelah ditemukan, undanglah mereka dan hormatilah setiap hari dengan jamuan serta penyambutan yang sempurna; sebab bila para pertapa mulia itu disusahkan, mereka dapat menjadi mengerikan seperti ular pembawa racun. Karena itu, persembahkan kepada mereka tempat tinggal yang menyenangkan, lengkap dengan pelayan dan keperluan, yang menghadirkan segala kenyamanan yang patut, dan muliakanlah mereka setiap hari.”
Verse 15
कृतैरावस थेैरननित्य॑ संप्रेष्यै: सपरिच्छदै: । निमन्त्रयेथा: कौरव्य सर्वकामसुखावहै:,युधिष्ठिर! जो देवताओं और मनुष्योंसे किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, सदा संतुष्ट रहते और जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते हैं, ऐसे पूज्य द्विजवरोंका दूतोंद्वारा पता लगाओ और उन्हें निमन्त्रित करो। भारत! वे दुखी होनेपर विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं; अतः उनसे अपनी रक्षा करो। कुरुनन्दन! सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेके कारण सुखद गृह निवेदन करके उनका नित्यप्रति पूर्ण सत्कार करो
Bhishma berkata: “Wahai Kauravya (Yudhishthira), melalui para utusan carilah para resi brahmana yang patut dimuliakan—mereka yang tidak menginginkan apa pun dari dewa maupun manusia, yang senantiasa puas, dan yang hidup dari apa saja yang datang tanpa diminta. Undanglah mereka ke tempat tinggal yang telah dipersiapkan, lengkap dengan perlengkapan, pelayan, dan segala keperluan—persembahan yang menghadirkan setiap kenyamanan yang layak. Muliakanlah mereka setiap hari; sebab bila mereka disusahkan, mereka dapat menjadi mengerikan seperti ular berbisa. Karena itu, lindungilah dirimu dengan menghormati mereka.”
Verse 16
यदि ते प्रतिगृह्नीयु: श्रद्धापूतं युधिष्ठिर । कार्यमित्येव मन्वाना धार्मिका: पुण्यकर्मिण:,युधिष्ठिर! यदि तुम्हारा दान श्रद्धासे पवित्र और कर्तव्य-बुद्धिसे ही किया हुआ होगा तो पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले वे धर्मात्मा पुरुष उसे उत्तम मानकर स्वीकार कर लेंगे
Wahai Yudhishthira, bila sedekahmu disucikan oleh श्रद्धा (ketulusan-iman) dan diberikan semata-mata karena rasa kewajiban, maka para insan dharmika yang menegakkan kebajikan itu akan menerimanya sebagai ‘tugas yang patut dilakukan’.
Verse 17
विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्य जीविन: । गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणा: संशितव्रता:,युद्धविजयी युधिष्ठिर! विद्वान, व्रतका पालन करनेवाले, किसी धनीका आश्रय लिये बिना ही जीवन निर्वाह करनेवाले, अपने स्वाध्याय और तपको गुप्त रखनेवाले तथा कठोर व्रतके पालनमें तत्पर जो ब्राह्मण हैं, जो शुद्ध, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेवाले हैं, उनके लिये तुम जो कुछ करोगे वह जगतमें तुम्हारे लिये कल्याणकारी होगा
Bhishma berkata: “Wahai Yudhishthira, ada para Brahmana yang disucikan oleh ilmu dan oleh laku tapa-janji; yang menafkahi hidup tanpa bergantung pada orang kaya; yang menyembunyikan swadhyaya (kajian suci) dan tapa mereka; serta teguh dalam disiplin yang keras. Apa pun dukungan dan penghormatan yang engkau berikan kepada orang-orang yang murni, menaklukkan indria, dan puas dengan istri sah mereka sendiri, akan menjadi sumber kesejahteraan bagimu di dunia ini.”
Verse 18
तेषु शुद्धेषु दान्तेषु स्वदारपरितोषिषु । यत् करिष्यसि कल्याण तत् ते लोके युधाम्पते,युद्धविजयी युधिष्ठिर! विद्वान, व्रतका पालन करनेवाले, किसी धनीका आश्रय लिये बिना ही जीवन निर्वाह करनेवाले, अपने स्वाध्याय और तपको गुप्त रखनेवाले तथा कठोर व्रतके पालनमें तत्पर जो ब्राह्मण हैं, जो शुद्ध, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेवाले हैं, उनके लिये तुम जो कुछ करोगे वह जगतमें तुम्हारे लिये कल्याणकारी होगा
Bhishma berkata: “Wahai tuan para kesatria, terhadap para Brahmana yang murni, menahan diri, dan puas dengan istri sah mereka sendiri—kebajikan apa pun yang engkau lakukan bagi mereka akan menjadi sebab kesejahteraan bagimu di dunia ini.”
Verse 19
यथान्निहोत्रं सुहुतं सायंप्रातर्द्धिजातिना । तथा दत्तं द्विजातिभ्यो भवत्यथ यतात्मसु,द्विजके द्वारा सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक किया हुआ अग्निहोत्र जो फल प्रदान करता है, वही फल संयमी ब्राह्मणोंको दान देनेसे मिलता है
Bhishma berkata: sebagaimana Agnihotra yang dipersembahkan dengan benar oleh seorang dwija pada senja dan fajar menghasilkan pahala yang semestinya, demikian pula dana yang diberikan kepada para dwija yang berpengendalian diri melahirkan kebajikan yang sama.
Verse 20
एष ते विततो यज्ञ: श्रद्धापूत: सदक्षिण: । विशिष्ट: सर्वयज्ञेभ्यो ददतस्तात वर्तताम्,तात! तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला विशाल दान-यज्ञ श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणासे युक्त है। वह सब यज्ञोंसे बढ़कर है। तुझ दाताका वह यज्ञ सदा चालू रहे
Bhishma berkata: “Wahai anakku, yajña berupa dana yang kau bentangkan luas ini disucikan oleh śraddhā dan dilengkapi dakṣiṇā yang semestinya. Ia melampaui semua yajña. Wahai yang kukasihi, selama engkau terus memberi, semoga persembahanmu ini senantiasa berlangsung.”
Verse 21
निवापदानसलिलस्तादृशेषु युधिष्ठिर । निवसन् पूजयंश्लैव तेष्वानृण्यं नियच्छति,युधिष्ठिर! पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको पितरोंके लिये किये जानेवाले तर्पणकी भाँति दानरूपी जलसे तृप्त करके उन्हें निवास और आदर देते रहो। ऐसा करनेवाला पुरुष देवता आदिके ऋणसे मुक्त हो जाता है
Bhishma berkata: “Wahai Yudhishthira, siapa yang menyenangkan orang-orang seperti itu dengan ‘air’ berupa dana—laksana tarpaṇa—serta memberi mereka tempat tinggal sambil memuliakan mereka, ia memperoleh kebebasan dari hutang (kepada para dewa dan lainnya). Karena itu, puaskanlah para Brahmana yang telah disebutkan dengan air kedermawanan; berikan tempat tinggal dan penghormatan.”
Verse 22
य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि । त एव नः पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिन:,जो ब्राह्मण कभी क्रोध नहीं करते, जिनके मनमें एक तिनके भरका लोभ नहीं होता तथा जो प्रिय वचन बोलनेवाले हैं, वे ही हमलोगोंके परम पूज्य हैं
Bhishma berkata: mereka yang sama sekali tidak dikuasai amarah, yang tidak tergoda oleh ketamakan bahkan untuk sesuatu yang remeh seperti sehelai rumput, dan yang bertutur kata manis serta menenteramkan—merekalah, bagi kami, yang paling layak dihormati.
Verse 23
एते न बहु मन्यन्ते न प्रवर्तन्ति चापरे । पुत्रवत् परिपाल्यास्ते नमस्तेभ्यस्तथाभयम्,उपर्युक्त ब्राह्मण निःस्पृह होनेके कारण दाताके प्रति विशेष आदर नहीं प्रकट करते। इनमेंसे तो कितने ही धनोपार्जनके कार्यमें तो प्रवृत्त ही नहीं होते हैं। ऐसे ब्राह्मणोंका पुत्रवत् पालन करना चाहिये। उन्हें बारंबार नमस्कार है। उनकी ओरसे हमें कोई भय न हो
Bhishma berkata: “Mereka ini tidak memandang besar keuntungan duniawi; bahkan sebagian dari mereka tidak menekuni usaha pengumpulan harta. Brahmana seperti itu patut dipelihara dan dilindungi laksana putra sendiri. Salam hormat kepada mereka berulang-ulang; dari pihak mereka semoga tiada ketakutan bagi kita.”
Verse 24
ऋ्विक्पुरोहिताचार्या मृदुब्रह्म॒धरा हि ते । क्षात्रेणापि हि संसृष्टं तेज: शाम्यति वै द्विजे,ऋत्विक, पुरोहित और आचार्य--ये प्रायः कोमल स्वभाववाले और वेदोंको धारण करनेवाले होते हैं। क्षत्रियका तेज ब्राह्मणके पास जाते ही शान्त हो जाता है
Ritvik (pendeta kurban), purohita (pendeta istana), dan acharya (guru) umumnya berwatak lembut dan memikul kebijaksanaan Weda. Bahkan daya menyala seorang kshatriya pun, ketika bersentuhan dengan seorang brahmana, menjadi reda.
Verse 25
अस्ति मे बलवानस्मि राजास्मीति युधिष्ठिर । ब्राह्मणान् मा च पर्यश्रीवसोभिरशनेन च,युधिष्ठिर! “मेरे पास धन है, मैं बलवान् हूँ और राजा हूँ ऐसा समझते हुए तुम ब्राह्मणोंकी उपेक्षा करके स्वयं ही अन्न और वस्त्रका उपभोग न करना
Wahai Yudhisthira, jangan biarkan timbul pikiran: “Aku punya harta, aku kuat, aku raja.” Karena kesombongan itu, jangan meremehkan para brahmana lalu menikmati makanan dan pakaian hanya untuk dirimu sendiri.
Verse 26
यच्छो भार्थ बलार्थ वा वित्तमस्ति तवानघ । तेन ते ब्राह्मणा: पूज्या: स्वधर्ममनुतिष्ठता,अनघ! तुम्हारे पास शरीर और घरकी शोभा बढ़ाने अथवा बलकी वृद्धि करनेके लिये जो धन है, उनके द्वारा स्वधर्मका अनुष्ठान करते हुए तुम्हें ब्राह्यणोंकी पूजा करनी चाहिये
Wahai yang tanpa cela, apa pun harta yang kau miliki—untuk menambah wibawa tubuh dan rumah tangga atau untuk menambah kekuatan—dengan harta itu, sambil teguh menjalankan dharmamu sendiri, hormatilah dan topanglah para brahmana.
Verse 27
नमस्कार्यास्तिथा विप्रा वर्तमाना यथातथम् । यथासुखं यथोत्साहं ललन्तु त्वयि पुत्रवत्,इतना ही नहीं, तुम्हें उन ब्राह्मणोंको सदा नमस्कार करना चाहिये। वे अपनी रुचिके अनुसार जैसे चाहें रहें। तुम्हारे पास पुत्रकी भाँति उन्हें स्नेह प्राप्त होना चाहिये तथा वे सुख और उत्साहके साथ आनन्दपूर्वक रहें, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये
Para brahmana itu senantiasa layak menerima salam hormatmu. Biarkan mereka hidup sebagaimana mereka kehendaki, menurut kecenderungan mereka. Perlakukan mereka dengan kasih sayang seperti kepada putra, agar dalam lindunganmu mereka tinggal dengan gembira—penuh kenyamanan dan semangat.
Verse 28
को ह्ाक्षयप्रसादानां सुहृदामल्पतोषिणाम् । वृत्तिम् त्यवक्षेप्तुं त्ववन्य: कुरुसत्तम,कुरुश्रेष्ठ! जिनकी कृपा अक्षय है, जो अकारण ही सबका हित करनेवाले और थोड़ेमें ही संतुष्ट रहनेवाले हैं, उन ब्राह्मणोंको तुम्हारे सिवा दूसरा कौन जीविका दे सकता है
Wahai yang terbaik di antara kaum Kuru, siapa selain engkau yang dapat menyediakan penghidupan bagi para brahmana semacam itu—yang anugerahnya tak habis-habis, yang secara alami menjadi sahabat bagi semua, dan yang puas dengan sedikit?
Verse 29
यथा पत्याश्रयो धर्म: स्त्रीणां लोके सनातन: । सदैव सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातय:,जैसे इस संसारमें स्त्रियोंका सनातन धर्म सदा पतिकी सेवापर ही अवलम्बित है, उसी प्रकार ब्राह्मण ही सदैव हमारे आश्रय हैं। हमलोगोंके लिये उनके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है
Bhīṣma berkata: “Sebagaimana di dunia ini dharma abadi para perempuan bertumpu pada suami sebagai sandaran, demikian pula bagi kami, kaum dwija senantiasa menjadi perlindungan. Selain mereka, tiada tempat berlindung bagi kami.”
Verse 30
यदि नो ब्राह्मणास्तात संत्यजेयुरपूजिता: । पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिये स्थितम्
Bhīṣma berkata: “Wahai anakku, bila para brāhmaṇa kami—karena dibiarkan tanpa penghormatan—melihat tindakan keras yang terus-menerus melekat pada jalan kṣatriya lalu meninggalkan kami, maka (tatanan dan kesejahteraan kami akan terancam).”
Verse 31
अवेदानामयज्ञानामलोकानामवर्तिनाम् | कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना ब्राह्मणाश्रयम्
Bhīṣma berkata: “Bagi mereka yang tanpa Veda, tanpa yajña, dan tidak hidup dalam tatanan dharma, apa guna kehidupan itu sendiri—terlebih ketika mereka tanpa engkau, wahai sandaran bagi para brāhmaṇa?”
Verse 32
तात! यदि ब्राह्मण क्षत्रियोंके द्वारा सम्मानित न हों तथा क्षत्रियमें सदा रहनेवाले निष्ठर कर्मको देखकर ब्राह्मण भी उनका परित्याग कर दें तो वे क्षत्रिय वेद, यज्ञ, उत्तम लोक और आजीविकासे भी भ्रष्ट हो जायेँ। उस दशामें ब्राह्मणोंका आश्रय लेनेवाले तुम्हारे सिवा उन दूसरे क्षत्रियोंक जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ।। अन्न ते वर्तयिष्यामि यथा धर्म सनातनम् | राजन्यो ब्राह्मणान् राजन् पुरा परिचचार ह
Bhīṣma berkata: “Wahai anakku, bila para brāhmaṇa tidak dihormati oleh para kṣatriya, dan bila—melihat kekerasan tindakan yang terus melekat pada watak kṣatriya—para brāhmaṇa pun meninggalkan mereka, maka para kṣatriya itu akan jatuh dari Veda, dari yajña, dari alam-alam tertinggi, bahkan dari penghidupan mereka. Dalam keadaan demikian, apa guna hidup kṣatriya lain—selain engkau—yang berlindung pada para brāhmaṇa? Aku akan memeliharamu dengan pangan sesuai Dharma yang abadi; sebab pada masa silam, wahai raja, kaum kṣatriya melayani para brāhmaṇa.”
Verse 33
दूराच्छूद्रेणोपचर्यो ब्राह्मणो5ग्निरिव ज्वलन्
Bhīṣma berkata: “Seorang brāhmaṇa yang menyala bagaikan api hendaknya dilayani oleh seorang śūdra dari kejauhan.”
Verse 34
संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रियेण च । ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी हैं; अतः शूद्रको दूरसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये। उनके शरीरके स्पर्शपूर्वक सेवा करनेका अधिकार केवल क्षत्रिय और वैश्यको ही है ।। ३३ ई || मृदुभावान् सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालकान्
Bhīṣma berkata— Pelayanan yang melibatkan sentuhan tubuh hanya diperkenankan bagi seorang Kṣatriya dan seorang Vaiśya. Karena para Brāhmaṇa dipandang memiliki cahaya laksana api, seorang Śūdra hendaknya melayani mereka dari kejauhan. Hak untuk melayani dengan menyentuh tubuh mereka hanya milik Kṣatriya dan Vaiśya. (Mereka) lembut perangainya, benar dalam laku, dan teguh memelihara dharma kebenaran.
Verse 35
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्षापि ये परे,छोटे-बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं
Bhīṣma berkata— entah mereka yang kecil, yang besar, atau yang lebih besar daripada yang besar—para Kṣatriya yang menyala oleh keperkasaan dan kekuatan mereka sendiri, ketika memasuki hadirat dan lingkup para Brāhmaṇa, maka padamlah nyala daya dan reda panas tapa mereka.
Verse 36
क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च | ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च तपांसि च,छोटे-बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं
Tegas dan tapa para Kṣatriya yang menyala oleh wibawa dan kekuatan, mereda ketika mereka berada di hadirat para Brāhmaṇa.
Verse 37
न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रिय: । न मे पितु: पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम्
Bagiku tak seorang pun lebih kucintai daripada ayahku; dan engkau pun, wahai anak, demikian pula kucintai. Namun, O Raja, bahkan ayah dari ayahku, bahkan diriku sendiri, bahkan hidupku—tidaklah lebih kucintai daripada (dharma) yang kupegang.
Verse 38
तात! मुझे ब्राह्मण जितने प्रिय हैं, उतने मेरे पिता, तुम, पितामह, यह शरीर और जीवन भी प्रिय नहीं हैं ।। त्वत्तश्न मे प्रियतर: पृथिव्यां नास्ति कश्नन | त्वत्तोडपि मे प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर तुमसे अधिक प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं है; परंतु ब्राह्मण तुमसे भी बढ़कर प्रिय हैं
Wahai anak! Sebagaimana para Brāhmaṇa begitu kucintai, demikian pula ayahku, engkau, kakekku, bahkan tubuh dan hidup ini—tidaklah sebanding cintanya. O yang terbaik di antara Bharata! Di bumi ini tiada seorang pun lebih kucintai daripada engkau; namun para Brāhmaṇa lebih kucintai bahkan daripada engkau.
Verse 39
ब्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र च शान्तनु:,पाण्डुनन्दन! मैं यह सच्ची बात कह रहा हूँ और चाहता हूँ कि इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं लोकोंमें जाऊँ जहाँ मेरे पिता शान्तनु गये हैं
Wahai putra Pāṇḍu, aku mengucapkan ini sebagai kebenaran apa adanya. Dengan daya kebenaran itu, semoga aku mencapai alam-alam tempat ayahku Śāntanu telah pergi.
Verse 40
पश्येयं च सतां लोकान् शुचीन् ब्रह्मपुरस्कृतान् | तत्र मे तात गन्तव्यमहद्बाय च चिराय च,इस सत्यके प्रभावसे ही मैं सत्पुरुषोंके उन पवित्र लोकोंका दर्शन कर रहा हूँ जहाँ ब्राह्मणों और ब्रह्माजीकी प्रधानता है। तात! मुझे शीघ्र ही चिरकालके लिये उन लोकोंमें जाना है
Dengan daya kebenaran ini aku menyaksikan alam-alam suci para orang saleh, yang dimuliakan oleh para Brahmana dan dipimpin oleh Brahmā. Wahai anakku, segera aku harus pergi ke sana untuk selama-lamanya.
Verse 41
सो5हमेतादृशाल्लॉकान् दृष्टवा भरतसत्तम | यन्मे कृतं ब्राह्मणेषु न तप्ये तेन पार्थिव,भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंके लिये मैंने जो कुछ किया है, उसके फलस्वरूप ऐसे पुण्यलोकोंका दर्शन करके मुझे संतोष हो गया है। अब मैं इस बातके लिये संतप्त नहीं हूँ कि दूसरा कोई पुण्य क्यों नहीं किया?
Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, wahai raja! Setelah menyaksikan alam-alam kebajikan seperti ini sebagai buah dari apa yang telah kulakukan bagi para Brahmana, hatiku menjadi puas. Karena itu, wahai raja, aku tidak berduka, dan tidak pula terbakar penyesalan memikirkan, “Mengapa aku tidak melakukan kebajikan yang lain?”
Verse 58
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बगीचा लगाने और तालाब बनानेका वर्णन नामक जअद्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab kelima puluh delapan dari Anuśāsana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada bagian Dāna-dharma, berjudul “Uraian tentang Menanam Taman dan Membangun Kolam.”
Verse 59
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनषष्टितमो5ध्याय:
Demikianlah bab keenam puluh satu dalam bagian Dāna-dharma dari Anuśāsana Parva pada Mahābhārata yang mulia.
Verse 346
आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानुपाचरत द्विजान् | ब्राह्मण स्वभावत: कोमल, सत्यवादी और सत्य-धर्मका पालन करनेवाले होते हैं, परंतु जब वे कुपित होते हैं तब विषैले सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं। अतः तुम सदा ब्राह्मणोंकी सेवा करते रहो
Bhishma berkata: “Layani para Brahmana dwija itu—terutama ketika mereka murka—sebagaimana orang memperlakukan ular berbisa yang sedang mengamuk: dengan kewaspadaan dan hormat. Secara kodrati Brahmana itu lembut, berpegang pada kebenaran, dan teguh dalam dharma yang benar; namun bila tersulut amarah, mereka menjadi mengerikan laksana ular beracun. Karena itu, teruslah senantiasa berbakti dan bersikap hormat kepada para Brahmana.”
Verse 3236
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुति: । राजन! अब मैं तुम्हें सनातन कालका धार्मिक व्यवहार कैसा है, यह बताऊँगा। हमने सुना है पूर्वकालनमें क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी, वैश्य क्षत्रियोंकी और शूद्र वैश्योंकी सेवा किया करते थे
Bhishma berkata: “Tradisi suci menyatakan: ‘Waisya melayani Ksatria, dan Sudra melayani Waisya.’ Wahai Raja, kini akan kujelaskan kepadamu bagaimana tata laku sosial yang benar menurut dharma dalam tatanan kuno yang dihormati sejak dahulu. Kami mendengar bahwa pada masa lampau para Ksatria melayani para Brahmana, para Waisya melayani para Ksatria, dan para Sudra melayani para Waisya.”
Yudhiṣṭhira seeks a ranked guidance on giving: which dānas should be offered to qualified recipients and what measurable outcomes (immediate and posthumous) follow from such gifts.
Food-giving is presented as the most consequential form of charity because it sustains life, supports ritual and society, and should be practiced with humility—without contempt, anger, or invasive questioning of petitioners.
Yes: it repeatedly attributes concrete results to annadāna—prosperity, strength, reputation, and favorable posthumous states—culminating in descriptions of luminous heavenly abodes associated with food-givers.