Adhyaya 4
Anushasana ParvaAdhyaya 465 Verses

Adhyaya 4

Viśvāmitra-janma: Ṛcīka–Satyavatī–Gādhi and the Charu Exchange (विश्वामित्र-जन्म: ऋचीक–सत्यवती–गाधि वृत्तान्तः)

Upa-parva: Viśvāmitra-janma-vṛttānta (Genealogy and Birth-Account of Viśvāmitra)

Bhīṣma begins by proposing a principled account of how Viśvāmitra attained brāhmaṇa status and brahmarṣi standing. He traces a Bharata-line genealogy culminating in Kuśika and his son Gādhi, who—while dwelling in a forest—has a daughter Satyavatī. The sage Ṛcīka (Cyavana’s son) seeks her hand; Gādhi refuses, judging him poor, and demands as bride-price a thousand swift horses of moonlike radiance with dark ears. Ṛcīka petitions Varuṇa, and the horses arise from the Gaṅgā at a site remembered as Aśvatīrtha; Gādhi, astonished and wary of curse, gives Satyavatī in marriage. Ṛcīka offers boons and prepares two mantra-purified charu portions and prescribes distinct tree-embrace rites for Satyavatī and her mother to produce a brāhmaṇa-ideal son and a kṣatriya-ideal son respectively. Due to maternal request, Satyavatī exchanges the charu and the tree-protocol, prompting Ṛcīka to explain the now-inverted outcomes: Satyavatī will bear a formidable kṣatriya son; her mother will bear a brāhmaṇa- श्रेष्ठ son. Satyavatī petitions that the kṣatriya ferocity shift to her grandson, and Ṛcīka assents; thus Satyavatī bears Jamadagni, while Gādhi’s wife bears Viśvāmitra, later attaining brahmarṣi status. The chapter closes by listing Viśvāmitra’s many descendants and reaffirming that his brahminhood is established through Ṛcīka’s brahmanic infusion and subsequent realization, with Bhīṣma inviting further questions to resolve doubts.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे विश्वामित्र के ब्राह्मणत्व-प्राप्ति और ब्रह्मर्षित्व के यथार्थ प्रसंग को क्रम से सुनें—एक क्षत्रिय का ऋषि-शिखर तक उठना स्वयं कथा का आकर्षण बन जाता है। → वंश-परंपरा और जन्म-कथा के साथ ऋचीक (भृगुवंशी) का प्रसंग उभरता है—वरुण से दिव्य अश्वों का वरदान, गंगा-जल से चन्द्रकान्ति वाले घोड़ों का प्रकट होना, और फिर विश्वामित्र के पुत्रों/वंशजों के नामों का विस्तार; यह सब संकेत देता है कि तप, मन्त्र-बल और दैवी अनुग्रह मिलकर ‘जन्म’ को भी अर्थ देते हैं। → ऋचीक द्वारा ‘परम ब्रह्मतेज’ का आधान—यह निर्णायक बिन्दु है जहाँ कथा स्पष्ट करती है कि विश्वामित्र का तेज केवल राजवंशीय नहीं, बल्कि सोम-सूर्य-अग्नि-सदृश आध्यात्मिक प्रभा से संयुक्त है; यहीं क्षत्रिय-देह में ब्रह्मर्षि-सम्भावना का शिखर उद्घाटित होता है। → भीष्म विश्वामित्र के जन्म-वृत्तान्त को समेटते हुए उनके पुत्रों को ‘ब्रह्मवादिन’ मुनि बताते हैं और वंश-परंपरा को स्थिर करते हैं—कथा का निष्कर्ष यह कि तप, संस्कार और ब्रह्मतेज मनुष्य की पहचान को रूपान्तरित कर सकते हैं। → विश्वामित्र-परंपरा के आगे के उपाख्यानों और उनके वंश में धर्म-आचरण/व्रत-परम्परा के विस्तृत फलितार्थ की ओर संकेत।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल बछ। जि चतुथों5 ध्याय: आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम भीष्म उवाच श्रूयतां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा । ब्राह्मणत्वं गतस्तात ब्रद्यूर्षित्वं तथैव च

Bhishma berkata: “Dengarkanlah, wahai Partha, dengan sebenar-benarnya bagaimana pada masa silam Vishvamitra mencapai kedudukan sebagai Brahmana, dan demikian pula derajat sebagai Brahmarshi.”

Verse 2

भीष्मजीने कहा--तात! कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने जिस प्रकार ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया, वह प्रसंग यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ।। भरतस्यान्वये चैवाजमीढो नाम पार्थिव: । बभूव भरतश्रेष्ठ यज्वा धर्मभूतां वर:,भरतवंशमें अजमीढ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ) वे राजा अजमीढ यज्ञकर्ता एवं धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे

Bhishma berkata: “Wahai putra Kunti, akan kuceritakan dengan urutan yang tepat dan sebenar-benarnya peristiwa bagaimana pada masa silam Vishvamitra meraih kedudukan Brahmana dan kemudian derajat Brahmarshi—dengarkan. Dalam garis keturunan Bharata lahirlah seorang raja bernama Ajmida; wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, ia pelaksana yajña dan yang terdepan di antara orang-orang saleh.”

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें विशज्वामित्रका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,तस्य पुत्रो महानासीज्जह्लुर्नाम नरेश्वर: । दुहितृत्वमनुप्राप्ता गड़ा यस्य महात्मन: उनके पुत्र महाराज जह्लु हुए, जिन महात्मा नरेशके समीप जाकर गंगाजी पुत्रीभावको प्राप्त हुई थीं

Putranya adalah raja agung bernama Jahnu. Kepada raja mulia itu, sungai Gangga memperoleh kedudukan sebagai putri—yakni dipandang sebagai anak perempuannya.

Verse 4

तस्यात्मजस्तुल्यगुण: सिन्धुद्वीपो महायशा: । सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिबलाकाश्वो महाबल:,जह्के पुत्रका नाम सिन्धुद्वीप था, जो पिताके समान ही गुणवान्‌ और महायशस्वी थे। सिन्धुद्वीपसे महाबली राजा बलाकाश्वका जन्म हुआ था इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने चतुर्थोडध्याय:

Putranya ialah Sindhudvipa, termasyhur dan berbudi setara dengan ayahnya. Dari Sindhudvipa lahirlah rajarshi Balakashva, seorang raja yang sangat perkasa.

Verse 5

वल्लभस्तस्य तनय: साक्षाद्धर्म इवापर: | कुशिकस्तस्य तनय: सहस्राक्षसमद्युति:,बलाकाश्च॒का पुत्र वललभनामसे प्रसिद्ध हुआ, जो साक्षात्‌ दूसरे धर्मके समान था। वल्लभके पुत्र कुशिक हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे

Putranya ialah Vallabha, seakan Dharma sendiri menjelma dalam wujud lain. Putra Vallabha ialah Kushika, bercahaya laksana Indra yang bermata seribu.

Verse 6

कुशिकस्यात्मज: श्रीमान्‌ गाधिनाम जनेश्वर: । अपुत्र: प्रसवेनार्थी वनवासमुपावसत्‌,कुशिकके पुत्र महाराज गाधि हुए, जो दीर्घकालतक पुत्रहीन रह गये। तब संतानकी इच्छासे पुण्यकर्म करनेके लिये वे वनमें रहने लगे

Bhīṣma berkata: Ada seorang raja cemerlang bernama Gādhi, putra termasyhur Kuśika. Lama tanpa keturunan dan mendambakan anak, ia menempuh hidup di hutan, menjalankan tapa dan laku kebajikan demi memperoleh seorang putra.

Verse 7

कन्या जज्ञे सुतात्‌ तस्य वने निवसत: सतः । नाम्ना सत्यवती नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि,वहाँ रहते समय सोमयाग करनेसे राजाके एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था। भूतलपर कहीं भी उसके रूप और सौन्दर्यकी तुलना नहीं थी

Bhīṣma berkata: Ketika sang raja tinggal di hutan, lahirlah seorang putri baginya. Namanya Satyavatī; di bumi tiada bandingan bagi keelokan rupanya.

Verse 8

गीताप्रेस, गोरखपुर गा $/॥६८-0: ५4 शिव-पार्वती बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा उत्तराके मृत ह-ल-. हा पार्ववीजी भगवान्‌ शडकरको शरीरधारिणी समस्त नदियोंका परिचय दे रही हैं | । / 8) ञ्क शा ५ गीताप्रेस, गोरखपुर युधिछ्ठिरका अपने आश्रित कुत्तेके लिये त्याग पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु तां वच्रे भार्गव: श्रीमांक्ष्यवनस्यथात्मसम्भव: । ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थित:,उन दिनों च्यवनके पुत्र भृगुवंशी श्रीमान्‌ ऋचीक विख्यात तपस्वी थे और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न रहते थे। उन्होंने राजा गाधिसे उस कन्याको माँगा

Bhīṣma berkata: Pada masa itu ada resi Bhārgava yang mulia, Ṛcīka namanya—putra Cyavana sendiri—termashyur dan teguh dalam tapa yang luas. Ia meminang sang gadis, memohon kepada Raja Gādhi.

Verse 9

सतां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय महात्मने । दरिद्र इति मत्वा वै गाधि: शत्रुनिबर्हण:,शत्रुसूदन_ गाधिने महात्मा ऋचीकको दरिद्र समझकर उन्हें अपनी कन्या नहीं दी

Bhīṣma berkata: Gādhi, penumpas musuh, mengira resi agung Ṛcīka miskin; karena sangkaan itu ia tidak menyerahkan putrinya kepada orang suci tersebut.

Verse 10

प्रत्याख्याय पुनर्यातमब्रवीद्‌ राजसत्तम: । शुल्कं॑ प्रदीयतां महां ततो वत्स्यसि मे सुताम्‌,उनके इनकार कर देनेपर जब महर्षि लौटने लगे तब नृपश्रेष्ठ गाधिने उनसे कहा --'महर्षे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्रीको विवाहद्वारा प्राप्त कर सकेंगे”

Bhīṣma berkata: Setelah menolak, ketika sang maharsi hendak pergi kembali, Gādhi—yang utama di antara raja—berkata, “Berikanlah bride-price yang besar; barulah engkau akan memperoleh putriku melalui pernikahan.”

Verse 11

ऋचीक उवाच कि प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नूप । दुहितुर्ब्रहयासंसक्तो माभूत्‌ तत्र विचारणा,ऋचीकने पूछा--राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्रीके लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्संकोच होकर बताइये। नरेश्वर! इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

Ṛcīka berkata, “Wahai raja terbaik, untuk putrimu, mas kawin apakah yang harus kuberikan kepadamu, wahai penguasa? Ucapkanlah tanpa ragu; jangan ada sangsi atau pikiran lain hanya karena aku teguh dalam laku brahman (tapa dan disiplin suci).”

Verse 12

गाधिरुवाच चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हयानां वातरंहसाम्‌ | एकतः: श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव,गाधिने कहा--भूगुनन्दन! आप मुझे शुल्करूपमें एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ और वायुके समान वेगवान्‌ हों तथा जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो

Gādhi berkata, “Wahai keturunan Bhṛgu, sebagai mas kawin berikanlah kepadaku seribu ekor kuda: bercahaya laksana sinar bulan, secepat angin, dan masing-masing bertanda satu telinga berwarna gelap (śyāma).”

Verse 13

भीष्म उवाच ततः स भृगुशार्दूलक्ष्यवनस्यात्मज: प्रभु: । अब्रवीद्‌ वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तब भृगुश्रेष्ठ च्यवनपुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीकने जलके स्वामी अदितिनन्दन वरुणदेवके पास जाकर कहा--

Bhīṣma berkata, “Kemudian Ṛcīka—sang resi perkasa, putra Cyavana, harimau di antara kaum Bhṛgu—mendatangi Varuṇa, Āditya ilahi, penguasa segala perairan, lalu menyapanya.”

Verse 14

एकत: श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम्‌ । सहसतरं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम,“देवशिरोमणे! मैं आपसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ तथा वायुके समान वेगवान्‌ एक हजार ऐसे घोड़ोंकी भिक्षा माँगता हूँ जिनका एक ओरका कान श्याम रंगका हो”

“Wahai yang terbaik di antara para dewa, aku memohon kepadamu seribu ekor kuda—bercahaya seperti bulan dan secepat angin—masing-masing bertanda satu telinga berwarna gelap (śyāma).”

Verse 15

तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम्‌ | उवाच यत्र ते छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिन:,तब अदितिनन्दन वरुणदेवने उन भृगुश्रेष्ठ ऋच्चीकसे कहा--बहुत अच्छा, जहाँ आपकी इच्छा होगी, वहींसे इस तरहके घोड़े प्रकट हो जायँगे”

Varuṇa, Āditya ilahi, berkata kepada Ṛcīka yang terbaik di antara kaum Bhṛgu, “Jadilah demikian. Ke mana pun kehendakmu tertuju, dari tempat itulah kuda-kuda itu akan muncul.”

Verse 16

ध्यातमात्रमचीकेन हयानां चन्द्रवर्चसाम्‌ | गड्ाजलात्‌ समुत्तस्थी सहस्नं विपुलौजसाम्‌,तदनन्तर ऋचीकके चिन्तन करते ही गंगाजीके जलसे चन्द्रमाके समान कान्तिवाले एक हजार तेजस्वी घोड़े प्रकट हो गये

Begitu Ṛcīka sekadar merenungkannya, dari air Sungai Gaṅgā bangkit seribu kuda—bercahaya laksana bulan dan berdaya besar.

Verse 17

अदूरे कान्यकुब्जस्य गज्जायास्तीरमुत्तमम्‌ । अश्वतीर्थ तदद्यापि मानवै: परिचक्ष्यते,कन्नौजके पास ही गंगाजीका वह उत्तम तट आज भी मानवोंद्वारा अश्वतीर्थ कहलाता है

Tidak jauh dari Kanyakubja terdapat tepi Sungai Gaṅgā yang amat mulia; hingga kini orang-orang menunjukkannya dan menyebutnya “Aśvatīrtha”, Titian Kuda.

Verse 18

ततो वै गाधये तात सहस्र॑ं वाजिनां शुभम्‌ | ऋचीक: प्रददौ प्रीत: शुल्कार्थ तपतां वर:,तात! तब तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ऋचीक मुनिने प्रसन्न होकर शुल्कके लिये राजा गाधिको वे एक हजार सुन्दर घोड़े दे दिये

Kemudian, wahai anakku, Ṛcīka—yang utama di antara para pertapa—dengan hati gembira memberikan kepada Raja Gādhi seribu kuda yang elok sebagai mas kawin.

Verse 19

ततः स विस्मितो राजा गाधि: शापभयेन च । ददौ तां समलंकृत्य कन्यां भगुसुताय वै,तब आश्चर्यवचकित हुए राजा गाधिने शापके भयसे डरकर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके भूगुनन्दन ऋचीकको दे दिया

Maka Raja Gādhi pun tercengang dan juga gentar akan kutuk; ia menghias putrinya dengan busana dan perhiasan, lalu menyerahkannya kepada Ṛcīka, putra Bhṛgu.

Verse 20

जग्राह विधिवत्‌ पार्णिं तस्या ब्रह्मूर्षिसत्तम: | सा च त॑ं पतिमासाद्य पर हर्षमवाप ह,ब्रह्मर्षिशिरेमणि ऋचीकने उसका विधिवत्‌ पाणिग्रहण किया। वैसे तेजस्वी पतिको पाकर उस कन्याको भी बड़ा हर्ष हुआ

Sang Brahmarṣi yang utama itu mengambil tangannya menurut tata upacara. Dan ia pun, setelah memperoleh beliau sebagai suami, merasakan sukacita yang amat besar.

Verse 21

स तुतोष च ब्रद्यार्षिस्तस्या वृत्तेन भारत । छन्‍्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम्‌,भरतनन्दन! अपनी पत्नीके सद्व्यवहारसे ब्रह्मर्षि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उस परम सुन्दरी पत्नीको मनोवांछित वर देनेकी इच्छा प्रकट की

Wahai Bhārata, sang brahmarṣi sangat berkenan oleh keluhuran perilakunya. Dengan hati bersukacita ia menyatakan kehendaknya untuk menganugerahkan kepada perempuan yang amat elok itu sebuah anugerah sesuai pilihannya.

Verse 22

मात्रे तत्‌ सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तम | अथ तामब्रवीन्माता सुतां किंचिदवाड्मुखी,नृपश्रेष्ठ तब उस राजकन्याने अपनी मातासे मुनिकी कही हुई सब बातें बतायीं। वह सुनकर उसकी माताने संकोचसे सिर नीचे करके पुत्रीसे कहा--

Wahai raja terbaik, sang putri raja menyampaikan kepada ibunya seluruh perkataan sang resi. Mendengarnya, sang ibu—agak malu dan menundukkan wajah—lalu berbicara kepada putrinya.

Verse 23

ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमरहति । अपत्यस्य प्रदानेन समर्थश्न महातपा:,“बेटी! तुम्हारे पतिको पुत्र प्रदान करनेके लिये मुझपर भी कृपा करनी चाहिये, क्योंकि वे महान्‌ तपस्वी और समर्थ हैं!

“Anakku, suamimu pun patut berkenan kepadaku; sebab aku juga mampu menganugerahkan keturunan. Aku seorang pertapa besar dan memiliki daya untuk memberi seorang anak.”

Verse 24

ततः सा त्वरितं गत्वा तत्‌ सर्व प्रत्यवेदयत्‌ । मातुश्चिकीर्षितं राजन्चीकस्तामथाब्रवीत्‌,राजन! तदनन्तर सत्यवतीने तुरंत जाकर माताकी वह सारी इच्छा ऋचीकसे निवेदन की। तब ऋचीकने उससे कहा--

Lalu ia segera pergi dan melaporkan semuanya dengan lengkap. Ia menyampaikan kepada Ṛcīka, wahai raja, apa yang dikehendaki ibunya. Maka Ṛcīka pun berkata kepadanya.

Verse 25

गुणवन्तमपत्यं सा अचिराज्जनयिष्यति । मम प्रसादात्‌ कल्याणि माभूत्‌ ते प्रणयोडन्यूथा,“कल्याणि! मेरे प्रसादसे तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान्‌ पुत्रको जन्म देगी। तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा

“Wahai yang berbudi, berkat anugerahku ibumu akan segera melahirkan seorang putra yang berbajik. Jangan khawatir—permohonanmu yang penuh kasih tidak akan sia-sia.”

Verse 26

तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते महान्‌ अस्मद्वंशकर: श्रीमान्‌ सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,“तुम्हारे गर्भसे भी एक अत्यन्त गुणवान्‌ और महान्‌ तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो हमारी वंशपरम्पराको चलायेगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ

Dari rahimmu pun akan lahir seorang putra yang amat berbudi luhur—agung, bercahaya, dan makmur—yang akan meneruskan garis keturunan kita. Ini kukatakan kepadamu sebagai kebenaran.

Verse 27

ऋतुस्नाता च साशथ्रत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्बरम्‌ । परिष्वजेथा: कल्याणि तत एवमवाप्स्यथ:,“कल्याणि! तुम्हारी माता ऋतुस्नानके पश्चात्‌ पीपलके वृक्षका आलिंगन करे और तुम गूलरके वृक्षका। इससे तुम दोनोंको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति होगी

Wahai wanita yang membawa keberkahan, setelah ibumu selesai mandi suci seusai haid, biarlah ia memeluk pohon aśvattha (pipal), dan engkau memeluk pohon udumbara (ara bergerombol). Dengan demikian kalian berdua akan memperoleh putra yang diidamkan.

Verse 28

चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते । त्वंच सा चोपभुज्जीतं ततः पुत्राववाप्स्थथ:,“पवित्र मुसकानवाली देवि! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं। इनमेंसे एकको तुम खा लो और दूसरेको तुम्हारी माता। इससे तुम दोनोंको पुत्र प्राप्त होंगे!

Wahai wanita bertutur senyum suci, dua bagian caru ini telah kupersiapkan dan kusucikan dengan mantra. Engkau dan ibumu hendaknya memakannya; kemudian kalian berdua akan memperoleh putra-putra.

Verse 29

ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत । यदूचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्भधयम्‌,तब सत्यवतीने हर्षमग्न होकर ऋचीकने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माताको बताया और दोनोंके लिये तैयार किये हुए पृथक्‌ू-पृथक्‌ चरुओंकी भी चर्चा की

Kemudian Satyavatī, dipenuhi sukacita, berbicara kepada ibunya. Ia menyampaikan seluruh yang dikatakan Ṛcīka, serta memberitahukan tentang dua bagian caru yang telah disiapkan terpisah bagi mereka berdua.

Verse 30

तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा । पुत्रि पूर्वोपपन्नाया: कुरुष्व वचनं मम,उस समय माताने अपनी पुत्री सत्यवतीसे कहा--“बेटी! माता होनेके कारण पहलेसे मेरा तुमपर अधिकार है; अतः तुम मेरी बात मानो”

Lalu sang ibu berkata kepada putrinya, Satyavatī: “Anakku, karena aku ibumu, aku memiliki hak yang lebih dahulu atas dirimu; maka penuhilah permintaanku.”

Verse 31

भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरु्मन्त्रपुरस्कृत: । एनं प्रयच्छ महां त्वं मदीयं त्वं गृहाण च,“तुम्हारे पतिने जो मन्त्रपूत चरु तुम्हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो

Bhishma berkata: “Wahai Dewi, caru yang telah disucikan oleh mantra dan diberikan suamimu kepadamu—serahkanlah itu kepadaku. Dan sebagai gantinya, terimalah caru milikku.”

Verse 32

व्यत्यासं वृक्षयोश्वापि करवाव शुचिस्मिते । यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते,“पवित्र हास्यवाली मेरी अच्छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो हमलोग वृक्षोंमें भी अदल-बदल कर लें"

Bhishma berkata: “Wahai yang tersenyum suci, yang tak bercela, marilah kita menukar tempat bahkan di antara dua pohon itu. Jika engkau menganggap ucapan ibuku sebagai bukti yang patut diterima, maka biarlah demikian.”

Verse 33

स्वमपत्यं विशिष्ट हि सर्व इच्छत्यनाविलम्‌ । व्यक्त भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति,“प्रायः सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्रकी इच्छा करते हैं। अवश्य ही भगवान्‌ ऋचीकने भी चरु निर्माण करते समय ऐसा तारतम्य रखा होगा

Bhishma berkata: “Sesungguhnya setiap orang menginginkan bagi dirinya seorang anak yang unggul—murni dan tanpa cela. Maka jelaslah bahwa dalam perkara ini Bhagawan Rucika pun telah mengatur sedemikian rupa sehingga hasil yang dimaksud pasti terjadi.”

Verse 34

ततो मे त्वच्चरी भाव: पादपे च सुमध्यमे । कथं विशिष्टो भ्राता मे भवेदित्येव चिन्तय,'सुमध्यमे! इसीलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्षमें मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो”

Bhishma berkata: “Karena itulah, wahai wanita berpinggang elok, kasihku tertambat pada caru yang ditetapkan bagimu dan pada pohon itu pula. Renungkanlah satu hal ini saja: ‘Bagaimana saudaraku dapat menjadi unggul, berhias sifat-sifat luhur?’”

Verse 35

तथा च कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा । अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिछ्ठिर,युधिष्ठिररे इस तरह सलाह करके सत्यवती और उसकी माताने उसी तरह उन दोनों वस्तुओंका अदल-बदलकर उपयोग किया। फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं

Bhishma berkata: “Wahai Yudhisthira, kemudian ibumu dan Satyavati itu melakukan tepat seperti yang dianjurkan. Maka, pada waktunya, keduanya pun mengandung.”

Verse 36

दृष्टवा गर्भगनुप्राप्तां भार्या स च महानृषि: । उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तम:

Melihat istrinya, Satyavatī, telah mengandung, resi agung itu—yang utama di antara kaum Bhṛgu—berkata kepadanya dengan hati yang gundah.

Verse 37

अपनी पत्नी सत्यवतीको गर्भवती अवस्थामें देखकर भृगुश्रेष्ठ महर्षि ऋचीकका मन खिन्न हो गया ।। व्यत्यासेनोपयुक्तस्ते चरुव्यक्त भविष्यति । व्यत्यास: पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृत: शुभे,उन्होंने कहा--'शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरुका उपयोग किया है। इसी तरह तुमलोगोंने वृक्षोंके आलिंगनमें भी उलट-फेर कर दिया है--ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है

Melihat Satyavatī, istrinya, mengandung, Maharsi Ṛcīka—yang utama di antara kaum Bhṛgu—menjadi gundah. Ia berkata, “Wahai wanita yang membawa keberkahan, jelas engkau telah memakai caru (bubur persembahan yajña) secara terbalik. Demikian pula dalam hal memeluk pepohonan, pertukaran itu pun nyata telah kalian lakukan.”

Verse 38

मया हि विश्व यद्ब्रह्मा त्वच्चरौ संनिवेशितम्‌ । क्षत्रवीर्य च सकल॑ चरौ तस्या निवेशितम्‌,“मैंने तुम्हारे चरुमें सम्पूर्ण ब्रह्मतजका संनिवेश किया था और तुम्हारी माताके चसरुमें समस्त क्षत्रियोचित शक्तिकी स्थापना की थी”

“Sesungguhnya telah kutanamkan seluruh daya rohani Brahmana ke dalam caru milikmu, dan ke dalam caru milik ibumu kutegakkan sepenuhnya keberanian serta tenaga Kṣatriya.”

Verse 39

त्रैलोक्यविख्यातगुएणं त्वं विप्रं जनयिष्यसि । साच क्षत्रं विशिष्ट वै तत एतत्‌ कृतं मया,“मैंने सोचा था कि तुम त्रिभुवनमें विख्यात गुणवाले ब्राह्मणको जन्म दोगी और तुम्हारी माता सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकी जननी होगी। इसीलिये मैंने दो तरहके चरुओंका निर्माण किया था

“Aku mengira engkau akan melahirkan seorang Brāhmaṇa yang kebajikannya termasyhur di tiga dunia, dan ibumu akan melahirkan seorang Kṣatriya yang unggul; karena itulah semua ini kuatur.”

Verse 40

व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात्‌ त्वया मात्रा च ते शुभे । तस्मात्‌ सा ब्राह्मण श्रेष्ठ माता ते जनयिष्यति,'शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भटद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी। भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया”

“Wahai wanita yang membawa keberkahan, karena pertukaran itu telah dilakukan olehmu dan oleh ibumu, maka ibumu akan melahirkan seorang Brāhmaṇa yang utama; sedangkan engkau akan menjadi ibu bagi putra bersifat Kṣatriya, yang kelak menempuh laku-laku yang keras.”

Verse 41

क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि । नहि ते तत्‌ कृतं साधु मातृस्नेहेन भाविनि,'शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भटद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी। भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया”

Bhishma berkata: “Wahai wanita yang berbudi dan membawa keberuntungan, engkau akan melahirkan seorang Ksatria yang berbuat dengan keganasan. Wahai calon ibu, karena terikat oleh kasih sayang seorang ibu, apa yang kau lakukan tidaklah terpuji. Oleh pertukaran yang kau lakukan dengan ibumu, ibumu akan melahirkan putra unggul yang ditakdirkan bagi golongan Brahmana, sedangkan engkau akan menjadi ibu seorang kesatria yang tindakannya mengerikan.”

Verse 42

सा श्रुत्वा शोकसंतप्ता पपात वरवर्णिनी । भूमौ सत्यवती राजन्‌ छिन्नेव रुचिरा लता,राजन्‌! पतिकी यह बात सुनकर सुन्दरी सत्यवती शोकसे संतप्त हो वृक्षसे कटी हुई मनोहर लताके समान मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी

Mendengar kata-kata itu, Satyavatī yang elok dan bercahaya hangus oleh duka. Wahai Raja, ia roboh ke tanah, laksana sulur indah yang terpotong dari penopangnya.

Verse 43

प्रतिलभ्य च सा संज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च | उवाच भार्या भर्तरें गाधेयी भार्गवर्षभम्‌,थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृूगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली--'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा-प्रसादकी भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो

Setelah sadar kembali, ia menundukkan kepala dan bersujud hormat. Lalu Gādheyī, putri Gādhi, berkata kepada suaminya Ṛcīka—yang utama di antara keturunan Bhṛgu.

Verse 44

प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदां वर । प्रसादं कुरु विप्र्॒ें न मे स्यात्‌ क्षत्रिय: सुत:,थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृूगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली--'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा-प्रसादकी भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो

Wahai yang terbaik di antara para pengenal Brahman, ketika istrimu memohon anugerah di hadapanmu, berilah aku rahmatmu, wahai resi Brahmana: semoga dari rahimku tidak lahir seorang putra dari golongan Ksatria.

Verse 45

काम ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति । नतु मे स्यात्‌ सुतो ब्रद्म॒न्नेष मे दीयतां वर:,“मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रियस्वभावका हो जाय; परंतु मेरा पुत्र वैसा न हो। ब्रह्मन! मुझे यही वर दीजिये”

Wahai Brahmana, jika memang harus demikian, biarlah cucuku kelak menjadi seorang yang berbuat dengan keganasan; tetapi janganlah putraku sendiri menjadi seperti itu. Anugerahkan kepadaku karunia ini.

Verse 46

एवमस्त्विति होवाच स्वां भार्या सुमहातपा: । ततः सा जनयामास जगदरग्निं सुतं शुभम्‌,तब उन महातपस्वी ऋषिने अपनी पत्नीसे कहा, “अच्छा, ऐसा ही हो”। तदनन्तर सत्यवतीने जमदग्निनामक शुभगुणसम्पन्न पुत्रको जन्म दिया

"Demikianlah," ujar sang resi agung kepada istrinya. Sesudah itu, sang istri melahirkan seorang putra berbudi luhur bernama Jamadagni.

Verse 47

विश्वामित्रं चाजनयद्‌ गाधिभार्या यशस्विनी । ऋषे: प्रसादाद्‌ राजेन्द्र ब्रद्मर्षेब्रह्मयवादिनम्‌

Wahai raja terbaik, istri Gadhi yang termasyhur melahirkan Vishvamitra. Berkat anugerah seorang resi, ia menjadi brahmarṣi dan penutur sejati tentang Brahman.

Verse 48

राजेन्द्र! उन्हीं ब्रह्मर्षिकि कृपा-प्रसादसे गाधिकी यशस्विनी पत्नीने ब्रह्मवादी विश्वामित्रको उत्पन्न किया ।। ततो ब्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपा: | क्षत्रिय: सोडप्यथ तथा ब्रह्म॒ुवंशस्य कारक:,इसीलिये महातपस्वी विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो ब्राह्मणवंशके प्रवर्तक हुए

Wahai raja agung, oleh anugerah para brahmarṣi, istri Gadhi yang termasyhur melahirkan Vishvamitra, sang pengucap ajaran Brahman. Kemudian Vishvamitra yang bertapa besar—meski terlahir sebagai kṣatriya—mencapai kedudukan brahmana dan menjadi perintis suatu garis keturunan brahmana.

Verse 49

तस्य पुत्रा महात्मानो ब्रह्मुवंशविवर्धना: । तपस्विनो ब्रह्म॒विदो गोत्रकर्तार एव च,उन ब्रह्मवेत्ता तपस्वीके महामनस्वी पुत्र भी ब्राह्मणवंशकी वृद्धि करनेवाले और गोत्रकर्ता हुए

Putra-putranya adalah insan agung—para pertapa dan pengenal Brahman—yang memperbesar garis brahmana dan juga menjadi pendiri gotra.

Verse 50

मधुच्छन्दश्व भगवान्‌ देवरातश्न वीर्यवान्‌ | अक्षीणश्न शकुन्तश्न बश्रु: कालपथस्तथा,विश्वामित्रात्मजा: सर्वे मुनयो ब्रह्म॒वादिन: । भगवान्‌ मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्ु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान्‌ वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आड्ूप्रिक, नैकदृकू, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्‍्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्‌ु, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतत्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी--ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मयगादी ऋषि थे

Bhagavan Madhucchandas, Devarata yang perkasa, Akshina, Shakunta, Babhru, dan Kalapatha—semuanya adalah putra-putra Vishvamitra, para muni yang mengajarkan Brahman.

Verse 51

याज्ञवल्क्यश्नल विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रत: । उलूको यमदूतश्न तथर्षि: सैन्धवायन:

Bhīṣma bersabda: “Yājñavalkyaśnala termasyhur; demikian pula Sthūṇa, penegak laku-ikrar agung. Juga Ulūka, pemakan para utusan Yama; serta resi Saindhavāyana.”

Verse 52

वल्गुजड्घश्न भगवान्‌ गालवश्व महानृषि: । ऋषिर्वज़्स्तथा ख्यात: सालंकायन एव च

Bhīṣma bersabda: “Ada resi mulia Valgujaḍghaśna, dan maharsi bernama Gālavaśva. Seorang resi lain termasyhur dengan nama Vajra; demikian pula Sālaṅkāyana.”

Verse 53

लीलाढ्यो नारदश्वैव तथा कूर्चामुख: स्मृत: । वादुलिमुसलश्नैव वक्षोग्रीवस्तथैव च

Bhīṣma bersabda: “Juga dikenang nama Līlāḍhya dan Nārada, demikian pula Kūrcāmukha; serta Vāduli-musala, dan Vakṣogrīva.”

Verse 54

आंध्रिको नैकदृक्‌ चैव शिलायूप: शित: शुचि: । चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नो5थाश्वलायन:

Bhīṣma melanjutkan: “(Ada pula) Āndhrika, Naikadṛk, Śilāyūpa, Śita, Śuci; Cakraka, Mārutantavya, Vātaghna, dan Aśvalāyana.”

Verse 55

श्यामायनो<थ गार्ग्यश्व॒ जाबालि: सुश्रुतस्तथा । कारीषिरथ संभश्रुत्य: परपौरवतन्तव:

Bhīṣma bersabda: “Kemudian ada Śyāmāyana, Gārgyāśva, Jābāli, dan Suśruta; juga Kārīṣiratha, Saṃbhaśrutya, serta mereka yang terkait dengan garis Parapaurava.”

Verse 56

महानृषिश्व कपिलस्तथर्षिस्ताडकायन: । तथैव चोपगहनस्तथर्षिश्वासुरायण:

Bhīṣma bersabda: “Ada mahāṛṣi Kapila; demikian pula ṛṣi Tāḍakāyana; juga Upagahana; serta ṛṣi Asurāyaṇa.”

Verse 57

मार्दमर्षिररिरिण्याक्षो जड़ारिबाश्रिवायणि: | भूतिर्विभूति: सूतश्न सुरकृत्‌ तु तथैव च

Bhīṣma bersabda: “(Ia dikenal dengan nama-nama ini:) Mārdamarṣi, Aririṇyākṣa, Jaḍāribāśrivāyaṇi, Bhūti, Vibhūti, Sūtaśna, dan demikian pula Surakṛt.”

Verse 58

अरालिननचिकश्रैव चाम्पेयोज्जयनौ तथा । नवतनन्‍्तुर्बकनख: सेयनो यतिरेव च

Bhīṣma bersabda: “Demikian pula Arālinan, Acikśra; juga Cāmpeya dan Ujjayana; serta Navatanantu, Bakanakha, Seyana, dan pertapa Yati.”

Verse 59

अम्भोरुहश्चारुमत्स्य: शिरीषी चाथ गार्दभि: । ऊर्जयोनिरुदापेक्षी नारदी च महानृषि:

Bhīṣma bersabda: “Ambhoruha, Cārumatsya, Śirīṣī, dan juga Gārdabhī; serta Ūrjayoni, Rudāpekṣī, dan Nāradi—mereka semua adalah mahāṛṣi.”

Verse 60

तथैव क्षत्रियो राजन्‌ विश्वामित्रो महातपा:

Bhīṣma bersabda: “Demikian pula, wahai Raja, Viśvāmitra yang mahā-tapa—meski terlahir sebagai kṣatriya—(mencapai kedudukan rohani tertinggi).”

Verse 61

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं तत्त्वेन भरतर्षभ

Bhīṣma berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, semuanya ini telah kujelaskan kepadamu sepenuhnya, sesuai dengan kebenaran.”

Verse 62

यत्र यत्र च संदेहो भूयस्ते राजसत्तम । तत्र तत्र च मां ब्रूहि च्छेत्तास्मि तव संशयम्‌,नृपश्रेष्ठट अब फिर तुम्हें जहाँ-जहाँ संदेह हो उस-उस विषयकी बात मुझसे पूछो। मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा

Bhīṣma berkata: “Wahai raja terbaik, kapan pun dan di mana pun keraguan timbul dalam dirimu, tanyakanlah kepadaku perkara itu juga; akulah yang akan memotong tuntas kebimbanganmu.”

Verse 593

विश्वामित्रात्मजा: सर्वे मुनयो ब्रह्म॒वादिन: । भगवान्‌ मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्ु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान्‌ वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आड्ूप्रिक, नैकदृकू, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्‍्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्‌ु, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतत्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी--ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मयगादी ऋषि थे

Bhīṣma berkata: Semua resi ini adalah putra-putra Viśvāmitra dan para brahmavādin (pengajar Brahman): Madhucchandā yang mulia, Devarāta yang perkasa, Akṣīṇa, Śakunta, Babhu, Kālapatha, Yājñavalkya yang termasyhur, Sthūṇa yang berkaul agung, Ulūka, Yamadūta, resi Saindhavāyana, Valgujaṅgha yang dihormati, maharṣi Gālava, Vajramuni, Sālaṅkāyana yang terkenal, Līlāḍhya, Nārada, Kūrcāmukha, Vāduli, Musala, Vakṣogrīva, Āḍūprika, Naikadṛkū, Śilāyūpa, Śita, Śuci, Cakraka, Mārutantavya, Vātaghna, Āśvalāyana, Śyāmāyana, Gārgya, Jābāli, Suśruta, Kārīṣi, Saṃśrutya, Para, Paurava, Tantu, maharṣi Kapila, muni utama Tāḍakāyana, Upagahana, resi Āsurāyaṇa, Mārdamarṣi, Hiraṇyākṣa, Jaṅgāri, Bābhravāyaṇi, Bhūti, Vibhūti, Sūta, Surakṛtu, Arāli, Nācika, Cāmpeya, Ujjayana, Navatattu, Bakanakha, Seyana, Yati, Ambhoruha, Cārumatsya, Śirīṣī, Gārdabhi, Ūrjayoni, Udāpekṣī, serta maharṣi Nāradī.

Verse 603

ऋषचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद्‌ युधिष्ठिर । राजा युधिष्ठिर! महातपस्वी विश्वामित्र यद्यपि क्षत्रिय थे तथापि ऋचीक मुनिने उनमें परम उत्कृष्ट ब्रह्मतजका आधान किया था

Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, inilah daya brahmanik tertinggi—Brahman—yang ditanamkan oleh resi Ṛcīka. Raja Yudhiṣṭhira, meskipun Viśvāmitra yang bertapa agung terlahir sebagai seorang kṣatriya, resi Ṛcīka tetap menegakkan dalam dirinya sinar tertinggi dari kekuatan rohani Brahman.”

Verse 616

विश्वामित्रस्थ वै जन्म सोमसूर्याग्नितेजस: । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सोम, सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विश्वामित्रके जन्मका सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताया है

Bhīṣma berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, demikianlah telah kuceritakan kepadamu dengan benar dan sepenuhnya seluruh riwayat kelahiran Viśvāmitra—yang cahayanya laksana Soma, Sūrya, dan Agni.”

Frequently Asked Questions

The tension lies between prescribed ritual procedure (mantra-pūta charu and designated rites) and familial attachment (a mother’s request), showing how deviations—though compassionate—carry consequential reallocation of intended outcomes.

The chapter presents dharma as causally precise in matters of intention and rite, while also allowing mitigation through confession, supplication, and negotiated reallocation of consequences—without erasing that actions remain efficacious.

Yes: Bhīṣma explicitly claims a “tattvena” account of Viśvāmitra’s status and ends by inviting Yudhiṣṭhira to raise further doubts, marking the episode as an authoritative clarification within the instructional architecture.