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Sukta 8.23
Agni (Jātavedas)
This hymn is an extended kindling and praise of Agni as Jātavedas—the all-knowing fire who receives offerings, protects the rite, and carries prayers to the gods. It repeatedly asks Agni for abundance (vasu), strength, and a well-ordered sacrifice, presenting him as the unseizable flame whose smoke rises as a visible sign of effective worship. The closing movement emphasizes Agni as the glory of the work and the summoner of Mitra and Varuṇa, aligning the ritual with Ṛta (cosmic order).
Mantra 1
ईळिष्वा हि प्रतीव्यं यजस्व जातवेदसम् । चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम् ॥
अग्नि भगवान को पूजा करो, वो सब सुनता है और जवाब देता है। जातवेदस नाम से उसे बुलाते हैं, वो सब जन्मों का जाननेवाला है। अग्नि का धुआँ ऊपर जाता है, उसकी आग कभी बुझती नहीं। वो अंदर की रोशनी है जो हमेशा जलती रहती है।
Mantra 2
दामानं विश्वचर्षणेऽग्निं विश्वमनो गिरा । उत स्तुषे विष्पर्धसो रथानाम् ॥
अग्नि सबको देता है, इसलिए मैं उसे पूरे दिल से बोल के प्रेज़ करता हूँ। मैं उसकी जय जय करता हूँ जो सबके लिए चीज़ें बाँटता है। और मैं उन रथों की भी प्रेज़ करता हूँ जो लड़ाई में तेज़ी से चलते हैं। यह रथ भगवान की शक्ति ले के आते हैं और रोशनी की लड़ाई में मदद करते हैं।
Mantra 3
येषामाबाध ऋग्मिय इषः पृक्षश्च निग्रभे । उपविदा वह्निर्विन्दते वसु ॥
जब रिशियों के गाने रास्ता बनाते हैं और आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है, तब असली धन मिलता है। जो लोग सच्चे बोल और सच्चे भाव से भगवान को याद करते हैं, उनको वो धन मिलता है। यह धन पैसा नहीं, यह अंदर की खुशी और शक्ति है। अग्नि जो हवन लेता है वो असली धन ढूँध के देता है।
Mantra 4
उदस्य शोचिरस्थाद्दीदियुषो व्यजरम् । तपुर्जम्भस्य सुद्युतो गणश्रियः ॥
अग्नि की ज्वाला ऊपर उठी और चमकने लगी। उसकी रोशनी कभी नहीं बुढ्ढी, वो हमेशा चमकती है। चमकते हुए देवता एक टीम की तरह आते हैं। यह सब मिल के उस ताकत की चमक हैं जो बुरी चीज़ों को तोड़ देती है और रास्ता साफ करती है।
Mantra 5
उदु तिष्ठ स्वध्वर स्तवानो देव्या कृपा । अभिख्या भासा बृहता शुशुक्वनिः ॥
अग्नि, ऊपर आ जा। यह अच्छा यज्ञ है, इसमें भगवान की कृपा से शक्ति बढ़ती है। तू चमक के आ, बड़ी रोशनी ले के आ। तेरी आवाज़ गूँजती है और सबको जगा देती है। सब लोग तुझे देख के जाग उठेंगे।
Mantra 6
अग्ने याहि सुशस्तिभिर्हव्या जुह्वान आनुषक् । यथा दूतो बभूथ हव्यवाहनः ॥
अग्नि, अच्छे बोल के साथ आ। हम हवन दे रहे हैं, एक के बाद एक। तू हमारा मैसेज ले के भगवान के पास जा। तू हमारी इच्छा और भाव ले के ऊपर जाता है और भगवान की शक्ति ले के वापस आता है। तू हमारा दूता है।
Mantra 7
अग्निं वः पूर्व्यं हुवे होतारं चर्षणीनाम् । तमया वाचा गृणे तमु वः स्तुषे ॥
मैं तुम सबके लिए पुराना अग्नि को बुलाता हूँ। वो सब लोगों का पुजारी है। मैं अपनी बात से उसका नाम लेता हूँ और उसकी तारीफ करता हूँ। वो हमारे अंदर बैठ के पूजा कराता है।
Mantra 8
यज्ञेभिरद्भुतक्रतुं यं कृपा सूदयन्त इत् । मित्रं न जने सुधितमृतावनि ॥
यह अग्नि ऐसा है जो पूजा से जाग उठता है। उसकी किरपा से वो चमकता है। वो दोस्त की तरह लोगों में रहता है। वो सच्चाई को बचाता है और लोगों को सही रास्ता दिखाता है।
Mantra 9
ऋतावानमृतायवो यज्ञस्य साधनं गिरा । उपो एनं जुजुषुर्नमसस्पदे ॥
जो लोग सच्चाई ढूंढते हैं वो अग्नि को मानते हैं। वो सच्चे धरम को जानता है। पूजा को सही करता है। लोग उसके पास आते हैं और उसका सम्मान करते हैं।
Mantra 10
अच्छा नो अङ्गिरस्तमं यज्ञासो यन्तु संयतः । होता यो अस्ति विक्ष्वा यशस्तमः ॥
हमारी पूजा एक जगह होनी चाहिए। वो अग्नि सबसे बड़ा है। वो सब लोगों का पुजारी है। सबसे ज़्यादा बड़ाई उसकी है। वो हमारे पास आए और हमारे काम सही करे।
Mantra 11
अग्ने तव त्ये अजरेन्धानासो बृहद्भाः । अश्वा इव वृषणस्तविषीयवः ॥
अग्नि, तेरे जो भक्त हैं वो कभी बूढ़े नहीं होते। वो तुझे जलाते हैं और चमकते हैं। जैसे ताकतवर घोड़े दौड़ते हैं, वैसे ही वो ताकत से भरे हैं।
Mantra 12
स त्वं न ऊर्जां पते रयिं रास्व सुवीर्यम् । प्राव नस्तोके तनये समत्स्वा ॥
अग्नि, तुम हमारे लिए पूरा करते हो। हमसे ऐसा माँगते हैं, हमे इतना दो कि हम में ताकत आए। हमे आगे बढ़ने दो, हमारे बच्चों को रक्षा करो, और जब भी लड़ाई आए हमारे साथ रहो।
Mantra 13
यद्वा उ विश्पतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशि । विश्वेदग्निः प्रति रक्षांसि सेधति ॥
जब अग्नि लोगों के बीच खुश रहता है, वो सब दुश्मन ताकतों को पीछे धकेल देता है। वो सब बुरी चीज़ें जो अंधेरा लाती हैं, उनको दूर कर देता है।
Mantra 14
श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विश्पते । नि मायिनस्तपुषा रक्षसो दह ॥
अग्नि, मेरी नई प्रेयर सुन। तू है तोह हीरो, लोगों का रक्षक। अपनी गर्मी से उन रखसों को जला दे जो धोखा देते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं।
Mantra 15
न तस्य मायया चन रिपुरीशीत मर्त्यः । यो अग्नये ददाश हव्यदातिभिः ॥
जो इंसान अग्नि को सही तरह से पूजा करता है, उसको कोई दुश्मन कभी धोखे से भी नहीं हरा सकता। अग्नि उसकी रक्षा करता है।
Mantra 16
व्यश्वस्त्वा वसुविदमुक्षण्युरप्रीणादृषिः । महो राये तमु त्वा समिधीमहि ॥
रिशि व्यश्व ने अग्नि को खुश किया क्योंकि वो चाहते थे कि उनका काम बढ़े। उन्होंने कहा, तुम हमे बड़ा धन दिला सकते हो। इसलिए हम तुम्हे अपने दिल में जगाते हैं।
Mantra 17
उशना काव्यस्त्वा नि होतारमसादयत् । आयजिं त्वा मनवे जातवेदसम् ॥
उशना काव्य ने तुम्हे पुकारने वाला पंडित बनाया। उन्होंने तुम्हे मनु के लिए सच्चा यज्ञ करने वाला बनाया, जातवेदस। तुम सबकी जनम की बात जानते हो। इससे इंसान सही रास्ते पे चल पाता है।
Mantra 18
विश्वे हि त्वा सजोषसो देवासो दूतमक्रत । श्रुष्टी देव प्रथमो यज्ञियो भुवः ॥
सब देवता मिलकर तुम्हे अपना दूत बनाया। सुनो भगवान, तुम पहले बनो। तुम यज्ञ का मुख्य शक्ति बनो। तुम हमारे ऊपर चढ़ने में सबसे आगे रहो।
Mantra 19
इमं घा वीरो अमृतं दूतं कृण्वीत मर्त्यः । पावकं कृष्णवर्तनिं विहायसम् ॥
मरता इंसान इस अमर दूत को अपना पैगाम बना ले। यह अग्नि है जो साफ करता है। यह अंधेरे रास्ते से गुज़रता है और आसमान में उड़ता है। यह अंधेरे से निकल के खुले आसमान तक ले जाता है।
Mantra 20
तं हुवेम यतस्रुचः सुभासं शुक्रशोचिषम् । विशामग्निमजरं प्रत्नमीड्यम् ॥
हम उसे पुकारते हैं, चमक वाला अग्नि। जिसका चमक चमकता है और ज्योति उज्ज्वल है। यह सब लोगों का अग्नि है जो कभी बुद्धा नहीं होता। यह पुराना है और हमेशा पूजा वाला है। यह हमारे अंदर पुरानी व्यवस्था वापस लाता है।
Mantra 21
यो अस्मै हव्यदातिभिराहुतिं मर्तोऽविधत् । भूरि पोषं स धत्ते वीरवद्यशः ॥
जो इंसान उसके लिए सही तरह से आहुति देता है, वो बड़ा फायदा पाता है। उसकी बड़ाई होती है, उसकी शक्ति बढ़ती है, और उसका नाम रोशन होता है।
Mantra 22
प्रथमं जातवेदसमग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम् । प्रति स्रुगेति नमसा हविष्मती ॥
सबसे पहले यज्ञ में अग्नि का नाम लिया जाता है। अग्नि को जातवेदस कहते हैं क्योंकि वो सब जानता है। जब हवन करते हैं, तो चम्मच घी लेकर अग्नि की तरफ जाती है। वो चम्मच जैसे ही अग्नि के पास जाती है, उससे नमस्ते करती है। उसमें घी और सामग्री होती है जो अग्नि को चढ़ाई जाती है।
Mantra 23
आभिर्विधेमाग्नये ज्येष्ठाभिर्व्यश्ववत् । मंहिष्ठाभिर्मतिभिः शुक्रशोचिषे ॥
अग्नि के लिए हम अपनी भक्ति को ऐसे तैयार करते हैं जैसे वो डिज़र्व करता है। हम अपने सबसे बड़े और सबसे पावरफुल ख्यालात से उसे पुकारते हैं। अग्नि की आग चमकती है और वो बहुत तेज़ होती है। हम अपने दिल से उसे अपनी सबसे अच्छी भावनाएं दिखाते हैं।
Mantra 24
नूनमर्च विहायसे स्तोमेभिः स्थूरयूपवत् । ऋषे वैयश्व दम्यायाग्नये ॥
अब अग्नि के लिए गाना गाओ। अग्नि बहुत दूर तक फैलता है, इसलिए उसे विहयस कहते हैं। रिशि वैयश्व कह रहे हैं कि गाना इतना मज़बूत होना चाहिए जैसे कोई बड़ा खंभा। यह गाना अग्नि के लिए है जो घर में सबसे मेन है और सबको संभालता है।
Mantra 25
अतिथिं मानुषाणां सूनुं वनस्पतीनाम् । विप्रा अग्निमवसे प्रत्नमीळते ॥
रिशि लोग अग्नि की पूजा करते हैं और उसे मदद के लिए पुकारते हैं। अग्नि इंसान का मेहमान है, जब भी कोई हवन करता है वो आता है। उसे वनस्पति का बेटा भी कहते हैं क्योंकि लकड़ी से आग बनती है। वो बहुत पुराना है और लोग उसपे भरोसा करते हैं।
Mantra 26
महो विश्वाँ अभि षतोऽभि हव्यानि मानुषा । अग्ने नि षत्सि नमसाधि बर्हिषि ॥
अग्नि, तुम बहुत बड़े हो और सब जगह हो। तुम इंसान के दिए हुए सब सामग्री को अपने पास ले लेते हो। अब यहाँ बैठो इस पवित्र जगह पर। यह वो आसन है जहाँ हम तुम्हे समर्पित करते हैं। तुम्हारा काम है यह सब स्वीकार करना।
Mantra 27
वंस्वा नो वार्या पुरु वंस्व रायः पुरुस्पृहः । सुवीर्यस्य प्रजावतो यशस्वतः ॥
भगवान, हमें बहुत सारी ताकत दे जो हम चाहते हैं। ऐसी दौलत दे जिसका कोई इंतज़ार न हो। वो दौलत जिससे हम में बहादुरी आए, औलाद बढ़े, और नाम रोशन हो।
Mantra 28
त्वं वरो सुषाम्णेऽग्ने जनाय चोदय । सदा वसो रातिं यविष्ठ शश्वते ॥
अग्नि, तुम एक ऐसा वरदान हो जो ताकत को सही कर दे। तुम लोगों को आगे बढ़ाओ। चमकते हुए भगवान, तुम नए-नए तोहफे देते रहते हो जो हमेशा के लिए संभाल के रखे।
Mantra 29
त्वं हि सुप्रतूरसि त्वं नो गोमतीरिषः । महो रायः सातिमग्ने अपा वृधि ॥
तुम हर मुश्किल को पार करने वाले हो। तुम हमें ऐसी ताकत के रास्ते दिखाते हो जिसमे रोशनी हो। अग्नि, बड़े माल और सम्पन्नता को पाने में हमें बड़ा दो।
Mantra 30
अग्ने त्वं यशा अस्या मित्रावरुणा वह । ऋतावाना सम्राजा पूतदक्षसा ॥
अग्नि, इस काम की शान तुम हो। मित्र और वरुण को यहाँ लाओ। दोनों राजा हैं जो सच्चाई के साथ चलते हैं और जिनकी ताकत साफ है। सच्चाई का नियम हमारे अंदर का भेद संभाले।
Agni, especially as Jātavedas—the fire who knows all births and carries offerings and prayers to the gods.
For a well-established sacrifice, protection of the rite, and increase in prosperity and strength—often expressed as wealth (vasu) and growth (ukṣaṇyu).
They are invited through Agni to bring Ṛta (truth-order) into the ritual, so the sacrifice is completed with purified action, harmony, and rightful governance.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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