Opening the text

Sukta 8.2
Medhyātithi Kāṇva (traditional for RV 8.2)
Indra (addressed as Vasu; Soma-drinking context strongly Indraic)
Gāyatrī (probable for RV 8.2 opening; requires metrical verification)
RV 8.2 is a Soma-offering hymn that repeatedly invites Indra—addressed also as Vasu—to drink the freshly pressed juice and, in return, to pour out fearless abundance, strength, and victory to the singers. The Kaṇva seers praise Indra as the unrivaled “hundred-helper,” intensifying the libation and eulogy until the hymn broadens into a celebration of nourishing increase and renewed becoming (janitva).
Mantra 1
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥
वसु, यह नया रस पियो। अपना पेट भरा रखो। हम डर नहीं रखते। हम तुम्हे देंगे और तुम्हारा खुशाली हमारे पास रहेगा।
Mantra 2
नृभिर्धूतः सुतो अश्नैरव्यो वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥
लोगों ने इस रस को निचोड़ा और पत्थर से साफ किया। ऊन से छानकर साफ किया। जैसे नदी में घोड़ा धोता है, वैसे यह भी साफ हो गया।
Mantra 3
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः । इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे ॥
हमने तुम्हारे लिए यह मीठा किया है। जैसे जौ और गाई का दूध मिलाते हैं, वैसे ही रस मिलाया। इंद्र, तुम हमारे साथ खुशी में रहो।
Mantra 4
इन्द्र इत्सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः । अन्तर्देवान्मर्त्याँश्च ॥
इंद्र वोह एक है जो सोम पीता है। वोह अच्छी तरह निचोड़े हुए रस को पीता है और उसमे पूरी जान है। वोह भगवान और इंसान के बीच खड़ा रहता है। दोनों तरफ का काम चलाता है।
Mantra 5
न यं शुक्रो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम् । अपस्पृण्वते सुहार्दम् ॥
इंद्र इतना बड़ा है कि कोई उससे हटा नहीं सकता। न चमकदार ताकत, न बुरा सोचने वाला, न खुश रहने वाला, कोई भी उसे दूर नहीं कर सकता। वोह दिल से अच्छा है और सच्चे रास्ते पर चलता है।
Mantra 6
गोभिर्यदीमन्ये अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते । अभित्सरन्ति धेनुभिः ॥
जब लोग इंद्र को पकड़ना चाहते हैं जैसे शिकारी जानवर को ढूंढते हैं। वो अपनी ताकत के साथ आगे बढ़ते हैं। पर यह ताकत सिर्फ गाय-बैल नहीं है, यह रोशनी की ताकत है जो उससे पाने की कोशिश करती है।
Mantra 7
त्रय इन्द्रस्य सोमाः सुतासः सन्तु देवस्य । स्वे क्षये सुतपाव्नः ॥
तीन बार सोम का रस निकल कर इंद्र के लिए रखा जाए। यह भगवान के लिए है जो अपने घर में बैठ कर उस रस को पीता है। उससे हमारी जान साफ होती है और ताकत आती है।
Mantra 8
त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्वः सुपूर्णाः । समाने अधि भार्मन् ॥
तीन बर्तन से रस टपकता है। तीन प्याले पूरी भर के रखी हैं एक जगह पर। इससे एक ही खुशी मिलती है पर सब को सही नाप-तोल के साथ मिलती है।
Mantra 9
शुचिरसि पुरुनिष्ठाः क्षीरैर्मध्यत आशीर्तः । दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य ॥
यह सोम रस बिल्कुल साफ है और कई जगह काम आता है। इसमें दूध मिलाया जाता है और बीच में अच्छे से मिला दिया जाता है। फिर दही से यह और भी मज़ेदार बन जाता है। यह इंद्र के लिए तैयार किया जाता है ताकि वो जीत सके।
Mantra 10
इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः । शुक्रा आशिरं याचन्ते ॥
इंद्र, यह सोम रस तुम्हारे लिए है। हमने इसे निचोड़ा है और यह बिल्कुल तेज़ है। यह चमक रहा है और माँग रहा है कि इसमें और चीज़ें मिलाई जाएँ। ताकि यह और अच्छे से काम करे।
Mantra 11
ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि । रेवन्तं हि त्वा शृणोमि ॥
इंद्र के लिए इस सोम रस में और चीज़ें मिलाओ और एक स्पेशल रोटी भी चढ़ाओ। मैं सुनता हूँ कि तुम वो हो जो लोगों को खुश रखता है। जब भी लोग सही तरीके से पूजा करते हैं, तुम उनका भला करते हो।
Mantra 12
हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् । ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥
लोगों के दिल में जो शक्ति आती है, वो ऐसे लड़ती है जैसे नशेमें लोग लड़ते हैं। जैसे कोई शराब पी के गलत काम करे। यह शक्ति साफ हो के निकल जाती है, जैसे किसी गाय का खाली था। इसलिए इंद्र की शक्ति ही सही है, जो सही रास्ते पे ले चलती है।
Mantra 13
रेवाँ इद्रेवतः स्तोता स्यात्त्वावतो मघोनः । प्रेदु हरिवः श्रुतस्य ॥
जो रिशि गाके इंद्र की पूजा करता है, वो अमीर हो। क्योंकि इंद्र उसे सपोर्ट करता है और देता भी बहुत है। और जो लोग सुनते हैं वो बात फैलती रहे। इंद्र घोड़े वाला है और उसकी बात सब सुनते हैं।
Mantra 14
उक्थं चन शस्यमानमगोररिरा चिकेत । न गायत्रं गीयमानम् ॥
जब यह मंतर पढ़ा जा रहा है, दुश्मन उसे समझ नहीं पाता। जब गायत्री गाई जा रही है, बुरी ताकत उसे पकड़ नहीं पाती। यह सच्चा गाना दुश्मन की नज़र से बच जाता है।
Mantra 15
मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः । शिक्षा शचीवः शचीभिः ॥
हे इंद्र, हमें उसके हाथ मत दे जो हमें थका दे। हमें जबरदस्त लोगों के पास मत भेज। तू अपनी ताकत से हमें सिखा दे। तेरी चमक हमें रास्ता दिखाए।
Mantra 16
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः । कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते ॥
हम तेरे पास आए हैं इंद्र, एक काम के लिए। हम तेरे दोस्त बन के ढूँढ़ते हैं। कण्व रिशि लोग तेरे लिए मंतर बोलते हैं और तुझ में बड़े होते हैं।
Mantra 17
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ । तवेदु स्तोमं चिकेत ॥
हे वज्र वाले इंद्र, कोई और ताकत इतना नया काम नहीं कर सकती। सिर्फ तेरा गाना सच में काम करता है। लोग उसे जानते हैं और मानते हैं।
Mantra 18
इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति । यन्ति प्रमादमतन्द्राः ॥
देवी लोग उसको चाहते हैं जो सोम बनाता है। वो नींद नहीं माँगते। वो थकते नहीं, जागते रहते हैं। बिल्कुल सही काम की तरफ जाते हैं, आराम नहीं करते।
Mantra 19
ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्यस्मान् । महाँ इव युवजानिः ॥
हे, आगे आ जाओ और पूरा ज़ोर लगा के हमारे पास आओ। हमसे मुँह मत मोड़ना। बड़े आदमी की तरह, जवानी की रफ़्तार से आओ और नया जोर लेकर आओ।
Mantra 20
मो ष्वद्य दुर्हणावान्त्सायं करदारे अस्मत् । अश्रीर इव जामाता ॥
आज कोई बुरा ताकत हमसे दूर न कर दे शाम तक। जैसे कोई दामाद घर में खुश नहीं रहता, वैसे मत होना। हमें पास रखना और भाग्य वाला रखो।
Mantra 21
विद्मा ह्यस्य वीरस्य भूरिदावरीं सुमतिम् । त्रिषु जातस्य मनांसि ॥
हम जानते हैं इस वीर की अच्छी सोच। वो बहुत देता है और खुला हाथ रखता है। यह तीन दुनिया में पैदा हुआ है और उसका दिल सब जगह है।
Mantra 22
आ तू षिञ्च कण्वमन्तं न घा विद्म शवसानात् । यशस्तरं शतमूतेः ॥
अब पूरा डालो, कण्व ऋषि की तरह। इतने बड़े बलवान से हमने ज़्यादा कोई नहीं देखा। वो और बड़ा है, सौ लोगों का काम करता है।
Mantra 23
ज्येष्ठेन सोतरिन्द्राय सोमं वीराय शक्राय । भरा पिबन्नर्याय ॥
सबसे बड़े ज़ोर से सोम का रस निकाल के इंद्र के लिए लाओ। यह वीर और ताकत वाला है। उसे पिला दो, वो अच्छा बनाता है और आगे ले के जाता है।
Mantra 24
यो वेदिष्ठो अव्यथिष्वश्वावन्तं जरितृभ्यः । वाजं स्तोतृभ्यो गोमन्तम् ॥
वो जो सबसे ज्ञानी है, वो हमेशा स्थित रहता है। वो गाने वाले लोगों को घोड़े देता है, ताकि उनमे ताकत आए। और जो लोग उसकी तारीफ करते हैं, उन्हे गाय मिलते हैं। यह दोनों चीज़ें आगे बढ़ने की ताकत देती हैं।
Mantra 25
पन्यम्पन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥
हे सोम निकालने वाले, इधर आओ। सोम रस लाओ, जो बहुत अच्छा है। यह रस उस शक्तिशाली वीर के लिए है, जो अंदर की ताकत जगाता है। इससे नया जोश आता है।
Mantra 26
पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत् । नि यमते शतमूतिः ॥
वो बड़ा दुश्मन मारने वाला है, वो सोम पी के यहाँ आए। हमारे पास आए, दूर न जाए। जब वो आता है, तो सौ तरह की मदद हमारे काम आती है।
Mantra 27
एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम् । गीर्भिः श्रुतं गिर्वणसम् ॥
इधर आओ, दोनों पीले घोड़े। जो शब्द से जुड़ के आए हैं, वो अपने दोस्त को लाओ। वो शक्तिशाली है, हमारे गानों से उसकी आवाज़ सुनाई देती है। वो इंद्र है, जो हमारी प्रार्थना सुनता है।
Mantra 28
स्वादवः सोमा आ याहि श्रीताः सोमा आ याहि । शिप्रिन्नृषीवः शचीवो नायमच्छा सधमादम् ॥
इंद्र, इधर आओ। यह मीठा सोम रस तुम्हारे लिए है। यह चमकता हुआ रस है। तुम्हारा चेहरा ताकत से भरा है, तुम ज्ञानी हो, तुम्हारी शक्ति असली है। हमारे खुशी के सम्मेलन में आओ।
Mantra 29
स्तुतश्च यास्त्वा वर्धन्ति महे राधसे नृम्णाय । इन्द्र कारिणं वृधन्तः ॥
जब लोग इंद्र की तारीफ करते हैं, वो उसको बड़ा देते हैं। यह तारीफ उसमें ताकत भरती है। इंद्र बड़ा काम करने वाला बन जाता है। वो सब कुछ पूरा करता है।
Mantra 30
गिरश्च यास्ते गिर्वाह उक्था च तुभ्यं तानि । सत्रा दधिरे शवांसि ॥
इंद्र के लिए गाने और स्तुति हैं। वो सब उसकी ताकत को पक्का करते हैं। एक साथ वो शक्ति को स्थिर कर देते हैं। यह शक्ति जीत लाती है।
Mantra 31
एवेदेष तुविकूर्मिर्वाजाँ एको वज्रहस्तः । सनादमृक्तो दयते ॥
यह इंद्र बहुत दूर तक फैलता है। वो वज्र हाथ में लेके एक है। वो बड़ी ताकत देता है। कभी से वो बिना छोटे के देनेवाला है।
Mantra 32
हन्ता वृत्रं दक्षिणेनेन्द्रः पुरू पुरुहूतः । महान्महीभिः शचीभिः ॥
इंद्र को बहुत लोग पुकारते हैं। वो वृत्र को अपने सही हाथ से मारता है। वो बड़ा है और उसकी बड़ी शक्तियाँ हैं। इनसे वो सच्चाई की जीत करवाता है।
Mantra 33
यस्मिन्विश्वाश्चर्षणय उत च्यौत्ना ज्रयांसि च । अनु घेन्मन्दी मघोनः ॥
जिस इंद्र में सब लोग और सब शक्तियाँ शांत होके चलती हैं। वो खुश होके देने वाला बन जाता है। वो बड़ा देनेवाला है।
Mantra 34
एष एतानि चकारेन्द्रो विश्वा योऽति शृण्वे । वाजदावा मघोनाम् ॥
इंद्र ने यह सब काम किए हैं। वो ऐसे सुनता है जो दूसरे नहीं सुन सकते। वो देता है ताकत और खुशाली सबको।
Mantra 35
प्रभर्ता रथं गव्यन्तमपाकाच्चिद्यमवति । इनो वसु स हि वोळ्हा ॥
वो रथ को आगे लाता है जो रोशनी ढूँढ़ता है। दूर से भी जिसे चाहता है उसकी रक्षा करता है। वो खज़ाना है जो हमें उठा के ले चलता है।
Mantra 36
सनिता विप्रो अर्वद्भिर्हन्ता वृत्रं नृभिः शूरः । सत्योऽविता विधन्तम् ॥
वो जीतता है और ज्ञान वाला है। घोड़ों और वीरों के साथ दुश्मन को मारता है। सच्चा है, जो सही पूजा करता है उसकी रक्षा करता है।
Mantra 37
यजध्वैनं प्रियमेधा इन्द्रं सत्राचा मनसा । यो भूत्सोमैः सत्यमद्वा ॥
इंद्र को पूजा करो जो सच्चा ज्ञान चाहते हैं। वो हमेशा आगे बढ़ने वाला है। सोम रस से भगवान सच्चाई में मगन हो जाते हैं।
Mantra 38
गाथश्रवसं सत्पतिं श्रवस्कामं पुरुत्मानम् । कण्वासो गात वाजिनम् ॥
कण्व रिशियों के बेटा, गाओ उसकी महिमा जो गाथों में गाया जाता है। वो सच्चा मालिक है, बड़ाई चाहता है, बड़ा है। ताकत देने वाले भगवान को गाओ।
Mantra 39
य ऋते चिद्गास्पदेभ्यो दात्सखा नृभ्यः शचीवान् । ये अस्मिन्काममश्रियन् ॥
वो भगवान बिना किसी सहारे के भी रोशनी देता है। वो देने वाला और सच्चा दोस्त है। जैसे वीर लोगों का साथी है। जो लोग उसकी इच्छा में लगे हैं, उनको वो अपना बनाता है।
Mantra 40
इत्था धीवन्तमद्रिवः काण्वं मेध्यातिथिम् । मेषो भूतोऽभि यन्नयः ॥
इंद्र, तू मुसल तोड़ने वाला है। तू कण्व ऋषि को अपनी तरफ खींचा है। वो सोचने वाला और अच्छा मेहमान है। तू एक मेढ़ बन के उसको अपने पास लाया है।
Mantra 41
शिक्षा विभिन्दो अस्मै चत्वार्ययुता ददत् । अष्टा परः सहस्रा ॥
यह बात सीख लो। विभिंदु ने उसको बहुत कुछ दिया। चार हज़ार से भी ज़्यादा, और आठ हज़ार और भी दिए। जब इंद्र की ताकत आती है, तो देने की शक्ति बढ़ती है।
Mantra 42
उत सु त्ये पयोवृधा माकी रणस्य नप्त्या । जनित्वनाय मामहे ॥
वो लोग दूध बढ़ाने वाले हैं। खुशी और लड़ाई में उनकी कमी नहीं है। नए जनम की शक्ति के लिए हम उनको बड़ा के पुकारते हैं।
Indra is the main deity. He is addressed as Vasu and repeatedly invited to drink the freshly pressed Soma.
The poets offer and pour Soma, calling Indra to drink it. In exchange they ask for protection, fearlessness, victory, fame, and prosperity.
It highlights Indra’s exceptional generosity and reliability in giving aid. The phrase means he helps in countless ways, especially when properly invoked with Soma and praise.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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