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Sukta 10.66
Vasiṣṭha (continuity of collection; traditional attribution for these adjacent hymns often to Vasiṣṭha—needs external Anukramaṇī confirmation)
Viśve Devāḥ (Indra as foremost within the collective)
Triṣṭubh (probable)
This hymn invokes the Viśve Devāḥ—“the All-Gods”—as the wide-hearing, ritually luminous powers who establish the sacrifice and advance the worshipper in well-being (svasti). With Indra as the foremost among them, they are praised as upholders and increasers of ṛta, remembered for victory-myths such as the releasing of the waters after the Vṛtra struggle. The sukta closes with Vasiṣṭha’s bow to the immortals who stand over all worlds, asking for broad, far-reaching prosperity and constant protection.
Mantra 1
देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः । ये वावृधुः प्रतरं विश्ववेदस इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः ॥
मैं भगवानों को पुकारता हूँ जो सब सुनते हैं, हमारे भले के लिए। यह वो हैं जो यज्ञ के लिए रोशनी बनाते हैं, जो जाग के समझ में आए हैं। यह आगे बढ़ते रहे, सब कुछ जानते हैं। इंद्र सबसे बड़ा है, यह अमृत है जो धरम को बढ़ाते हैं।
Mantra 2
इन्द्रप्रसूता वरुणप्रशिष्टा ये सूर्यस्य ज्योतिषो भागमानशुः । मरुद्गणे वृजने मन्म धीमहि माघोने यज्ञं जनयन्त सूरयः ॥
इंद्र इन्हे चलाता है, वरुण रास्ता दिखाता है। यह सूरज की रोशनी का हिस्सा पाए हैं। हम मरुत गण के साथ अपना सोच रखते हैं, जंग के टाइम। रिशि लोग यज्ञ शुरू करते हैं, जो दान देने वाले के लिए ताकत बन जाता है।
Mantra 3
इन्द्रो वसुभिः परि पातु नो गयमादित्यैर्नो अदितिः शर्म यच्छतु । रुद्रो रुद्रेभिर्देवो मृळयाति नस्त्वष्टा नो ग्नाभिः सुविताय जिन्वतु ॥
इंद्र वसुओं के साथ हमारी जान बचाए। अदिति आदित्यों के साथ हमें सुरक्षा दे। रुद्र रुद्रों के साथ हमें माफ करे। त्वष्ट्र अपनी ताकत से हमें सही रास्ते पे ले चल।
Mantra 4
अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वर्बृहत् । देवाँ आदित्याँ अवसे हवामहे वसून्रुद्रान्त्सवितारं सुदंससम् ॥
अदिति, आकाश और धरती, बड़ा सच, इंद्र और विष्णु, मरुत गण, और उजिया दुनिया। हम भगवानों को पुकारते हैं, आदित्यों को, मदद के लिए। वसु, रुद्र, और सविता जो अच्छा काम करते हैं।
Mantra 5
सरस्वान्धीभिर्वरुणो धृतव्रतः पूषा विष्णुर्महिमा वायुरश्विना । ब्रह्मकृतो अमृता विश्ववेदसः शर्म नो यंसन्त्रिवरूथमंहसः ॥
सरस्वन हमारी सोच के साथ, वरुण जो अपना नियम रखता है। पूषन, विष्णु जो बड़ा है, वायु और अश्विन। यह अमृत हैं, जो बनी बनाते हैं, सब जानते हैं। यह हमें शांति दें और तीन तरह की सुरक्षा दें बुरी चीज़ों से।
Mantra 6
वृषा यज्ञो वृषणः सन्तु यज्ञिया वृषणो देवा वृषणो हविष्कृतः । वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः ॥
यह मंत्र कहता है कि यज्ञ में जो शक्ति चाहिए वो बैल जैसी होनी चाहिए। जो लोग यज्ञ करते हैं, वो भी स्ट्रॉन्ग हों। देवता भी स्ट्रॉन्ग हों, जो हवन करते हैं वो भी। धरती और आसमान दोनों स्ट्रॉन्ग हैं, क्योंकि यह सच को धारण करते हैं। पर्जन्य देवता स्ट्रॉन्ग है, और जो स्त्रोत को संभालता है वो भी स्ट्रॉन्ग है।
Mantra 7
अग्नीषोमा वृषणा वाजसातये पुरुप्रशस्ता वृषणा उप ब्रुवे । यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसतः ॥
अग्नि और सोम दोनों देवता हैं, इनको बुलाया जाता है ताकि हमें बरकत मिले। इनकी बहुत तारीफ होती है। यह देवताओं की पूजा में लगे रहते हैं। इनकी दुआ है कि हमें शांति मिले, और तीन तरह की सुरक्षा हमें मिले।
Mantra 8
धृतव्रताः क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहद्दिवा अध्वराणामभिश्रियः । अग्निहोतार ऋतसापो अद्रुहोऽपो असृजन्ननु वृत्रतूर्ये ॥
यह लोग अपने नियम में पक्के रहते हैं, राजा जैसी शक्ति रखते हैं। यह यज्ञ को पूरा करते हैं और आसमान के सामने चमकते हैं। अग्नि के पंडित जो सच के साथ चलते हैं, वो धोखा नहीं देते। उन्होंने वृत्र के युद्ध में पानी को आज़ाद किया।
Mantra 9
द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रताप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया । अन्तरिक्षं स्वरा पप्रुरूतये वशं देवासस्तन्वी नि मामृजुः ॥
धरती और आसमान ने नियम के हिसाब से पानी पैदा किया। फूल-पत्ते और जंगल की चीज़ें भी यहाँ हैं जो यज्ञ के काम आती हैं। इन्होंने बीच का आसमान और रोशनी वाली जगह को हमारे लिए भर दिया। देवताओं ने अपनी शक्ति से हम में सही रास्ता दिखाया।
Mantra 10
धर्तारो दिव ऋभवः सुहस्ता वातापर्जन्या महिषस्य तन्यतोः । आप ओषधीः प्र तिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम् ॥
ऋभु नाम के देवता हैं जो आसमान को संभालते हैं, इनके हाथ काम में बहुत तेज़ हैं। हवा और पर्जन्य देवता भी हैं जो बादल गरजते हैं। पानी और फूल-पत्ते हमारी बातों को आगे ले जाएँ। भग देवता जो हिस्सा देता है, वो हमारी पूजा सुन ले और हमें दे।
Mantra 11
समुद्रः सिन्धू रजो अन्तरिक्षमज एकपात्तनयित्नुरर्णवः । अहिर्बुध्न्यः शृणवद्वचांसि मे विश्वे देवास उत सूरयो मम ॥
यह मंत्र समुंदर और नदियों को पुकारता है। आसमान और धरती के बीच की जगह भी है इसमें। अज एकपद नाम की शक्ति है, बिजली से पैदा हुई, बादल गरजने वाली। अहि बुध्न्य नाम का देवता है जो नीचे रहता है। वो मेरा कहना सुन ले। सारे देवता और मेरे रिशि भी सुनें।
Mantra 12
स्याम वो मनवो देववीतये प्राञ्चं नो यज्ञं प्र णयत साधुया । आदित्या रुद्रा वसवः सुदानव इमा ब्रह्म शस्यमानानि जिन्वत ॥
हम आपके हो जायें, पूर्वज शक्तियों। देवताओं की कृपा पाने के लिए। हमारी पूजा सीधा रास्ते पे ले जाओ। आदित्य, रुद्र, वसु, यह तीनों अच्छे देनेवाले हैं। हमारी बातें जो हम बोल रहे हैं, उनको शक्ति दो।
Mantra 13
दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया । क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशमीमहे विश्वान्देवाँ अमृताँ अप्रयुच्छतः ॥
पूजा के मैन पुरोहित साथ हैं, सबसे पहले और आगे खड़े। मैं सच के रास्ते पे चल रहा हूँ, सही ढंग से। खेत के मालिक को ढूंढ रहे हैं, जो पास ही रहता है। सारे देवता अमर हैं, वो कभी हारते नहीं, पीछे हटते नहीं।
Mantra 14
वसिष्ठासः पितृवद्वाचमक्रत देवाँ ईळाना ऋषिवत्स्वस्तये । प्रीता इव ज्ञातयः काममेत्यास्मे देवासोऽव धूनुता वसु ॥
वशिष्ठ रिशियों ने बात बनाई जैसे बाप अपने बच्चे को समझाता है। देवताओं को पुकारा, रिशियों की तरह, हमारे भले के लिए। देवता खुश हो के आयें, जैसे अपने ही लोग घर आयें। हमारे लिए संपत्ति दें, जो दिल में खुशी लाये।
Mantra 15
देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः । ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
वशिष्ठ अमर देवताओं को नमन करता है। वो सारी दुनिया में हैं, हर जगह। आज वो हमें बड़ा गौरव दें, जिससे हम आगे बढ़ें। आप हमेशा हमारी रक्षा करो, शांति और सुख के साथ।
They are the “All-Gods,” a collective address to the divine powers as one assembly. The hymn still notes Indra as the chief among them, leading the group’s protective and victorious force.
It asks for svasti (well-being and safe passage), for the sacrifice to become luminous and successful, and for broad, far-reaching prosperity (urugāya), along with ongoing protection.
The Vṛtra motif is a memory of removing obstruction: when the gods overcome blockage, the waters flow again. In ritual terms it means clearing obstacles so life, truth (ṛta), and the rite itself can move forward.
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