Opening the text

Sukta 1.163
Dīrghatamas Āucathya (traditional for RV 1.163)
Aśva (mystic steed; divine life-force in ascent)
Triṣṭubh (common for RV 1.163; verse-level verification recommended)
RV 1.163 is a mystical hymn to the Aśva—at once the consecrated horse and a divine life-force that rises from the deep and moves toward the highest station. It praises the steed’s wondrous birth, power, and victorious ascent, while warning that pursuit of mere enjoyment diverts the mortal to lower nourishment instead of the “step of Go” (light/ray). The hymn culminates in the Aśva’s arrival at the supreme seat, welcomed by the gods and dispensing desirable plenitudes to the giver.
Mantra 1
यदक्रन्दः प्रथमं जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात् । श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन् ॥
जब यह घोड़ा पहली बार पैदा हुआ, उसने ज़ोर से आवाज़ निकाली। वो समुंदर से या ज़मीन से निकला था। उसके पंख बाज़ जैसे थे और बाज़ू हिरन जैसी। यह एक बड़ी चीज़ थी, घोड़े की पैदाइश में।
Mantra 2
यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत् । गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरादश्वं वसवो निरतष्ट ॥
यम ने यह घोड़ा दिया, और त्रित ने उसे जोड़ा। इंद्र सबसे पहले उसपर सवार हुआ। गंधर्व ने उसकी लगाम पकड़ी, और सूर्य के पास से वसु लोगों ने इसको बनाया। यह सब शक्तियाँ हैं जो सही काम करती हैं।
Mantra 3
असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन । असि सोमेन समया विपृक्त आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि ॥
हे घोड़ा, तुम यम हो, जो सही काम सिखाता है। तुम आदित्य हो, जो रोशनी फैलाता है। तुम त्रित हो, जो गुप्त रिवाज़ फॉलो करता है। तुम सोम के साथ जुड़ा हुआ है। लोग कहते हैं आसमान में तुम्हारे तीन बंधन हैं।
Mantra 4
त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे । उतेव मे वरुणश्छन्त्स्यर्वन्यत्रा त आहुः परमं जनित्रम् ॥
लोग कहते हैं आसमान में तुम्हारे तीन बंधन हैं, पानी में तीन, और समुंदर के अंदर भी तीन। वरुण मुझे वो नज़र दे जिससे मैं तुम्हे ढूंढ सकूँ। वो जगह दिखाओ जहाँ तुम्हारा असली जन्म हुआ।
Mantra 5
इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफानां सनितुर्निधाना । अत्रा ते भद्रा रशना अपश्यमृतस्य या अभिरक्षन्ति गोपाः ॥
यह तुम्हारे साफ करने वाले पानी हैं, घोड़ा। यह वो निशानियाँ हैं जहाँ तुमने कदम रखा। मैंने यहाँ तुम्हारी अच्छी लगाम देखी। यह वो लोग संभालते हैं जो सचाई की राह पर चलते हैं।
Mantra 6
आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतंगम् । शिरो अपश्यं पथिभिः सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि ॥
मैंने अपने मन से तुम्हे दूर से जाना। तुम आसमान से उड़ने वाला पक्षी हो। मैंने तुम्हारा सिर देखा जो अच्छी राह पर जा रहा है। तुम धूल के बिना उड़ रहे हो, पक्षी की तरह।
Mantra 7
अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष आ पदे गोः । यदा ते मर्तो अनु भोगमानळादिद्ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः ॥
मैंने तुम्हारा सबसे बड़ा रूप देखा। तुम जीत के लिए तैयार थे, रोशनी की तरफ बढ़ रहे थे। जब कोई इंसान सिर्फ अपनी खुशी के पीछे भागता है, सच्चे रास्ते को छोड़ के, तो वो नीचे गिर जाता है। फिर वो सिर्फ घास-पत्थर खाता है, रोशनी की जगह।
Mantra 8
अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोऽनु भगः कनीनाम् । अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते ॥
तुम्हारे पीछे रथ चलता है, तुम्हारे पीछे योद्धा आते हैं। तुम्हारे पीछे रोशनी की किरणें हैं, और खुशी का हिस्सा सबको मिलता है। तुम्हारे पीछे सब ग्रुप आते हैं, तुम्हारा दोस्त बन जाते हैं। देवता भी तुम्हारे पीछे आते हैं, तुम्हारी ताकत को नापते हैं।
Mantra 9
हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा अवर इन्द्र आसीत् । देवा इदस्य हविरद्यमायन्यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत् ॥
इस घोड़े के सींग सोना हैं, पाय लोहे के हैं। वो इतना तेज़ है जैसे मन चलता है। इंद्र उसमें हैं, उसे संभालते हैं। देवता उसकी भेंट लेने आए, क्योंकि वो पहले घोड़े पर सवार हुआ, वो पहला इंसान बना जो यज्ञ करे।
Mantra 10
ईर्मान्तासः सिलिकमध्यमासः सं शूरणासो दिव्यासो अत्याः । हंसा इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वाः ॥
यह देवता के घोड़े बहुत ताकतवर हैं, तेज़ दौड़ने वाले हैं। वो एक साथ दौड़ते हैं, जैसे हंस उड़ते हैं लाइन में। जब यह घोड़े आसमान की राह पकड़ लेते हैं, तब वो ऊपर पहुँच जाते हैं।
Mantra 11
तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वात इव ध्रजीमान् । तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति ॥
तुम्हारा बदन उड़ने के लिए बेताब है, तुम्हारा मन हवा की तरह तेज़ चलता है। तुम्हारे सींग बहुत जगह खड़े हैं, जंगल में घूमते हैं। यह इसकी निशानी है कि अगर ताकत को संभाला नहीं, तो वो बिखर जाती है।
Mantra 12
उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यानः । अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभाः ॥
यह अश्व आगे बढ़ रहा है। वो जा रहा है जहाँ शब्द की बात चलती है। भगवान की तरफ उसका ध्यान है, उसका मन चमक रहा है। जो पैदा नहीं हुआ, वो आगे चल रहा है। उसके पीछे रिशि और जो मंत्र बोलते हैं, सब चल रहे हैं।
Mantra 13
उप प्रागात्परमं यत्सधस्थमर्वाँ अच्छा पितरं मातरं च । अद्या देवाञ्जुष्टतमो हि गम्या अथा शास्ते दाशुषे वार्याणि ॥
यह अश्व सबसे ऊपर पहुँच रहा है। वो उस जगह जा रहा है जहाँ सब कुछ पूरा होता है। पिता और माता की तरफ उसका रास्ता है। आज वो देवताओं को सबसे ज़्यादा पसंद है। जो कुछ देते हैं, उनको वो अच्छी चीज़ें बाँट रहा है।
No. It praises the horse, but also uses the Aśva as a symbol of a divine, rising life-force that carries one from lower states toward light, order, and the highest attainment.
Literally it is the “step/place of Go (cow).” In Vedic symbolism, Go often points to light or the ray and its nourishment, so the phrase suggests reaching the station of radiance and true sustenance.
Direct your energy toward truth and higher nourishment rather than chasing mere pleasure. When the life-force is guided rightly, it becomes victorious and brings fullness; when misdirected, it sinks to lower satisfactions.
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