यह सोपान ‘अहंकार-निवृत्ति’ और ‘धर्म-युद्ध में ईश्वर-आश्रय’ का द्वार है। लंका काण्ड में साधक के भीतर की ‘लंका’ (काम-क्रोध-मद) पर धावा होता है: पहले कोलाहल, फिर अंधकार (माया), और अंततः राम-बाण-रूप प्रकाश (ज्ञान/कृपा) से संशय-तम का नाश। यह चरण बताता है कि बल/पराक्रम भी तभी मंगल है जब वह राम-नाम/राम-कृपा से संयुक्त हो; अन्यथा रावण का अभिमान टिट्टिभ-उदात्तान (असमर्थ दंभ) बनकर विनाश को बुलाता है।
यह प्रकरण ‘अंतर-लंका’ पर धावे का रूपक है: (1) कोलाहल = इंद्रिय-वेगों का उन्माद, (2) दुर्ग/प्राचीर = अहंकार की किलेबंदी, (3) मेघनाद का प्रतिरोध = माया-जनित भ्रम और छल-बल, (4) माया-तम = संशय, मोह, आत्म-विस्मृति, (5) राम का अग्नि-सायक/प्रकाश = ज्ञान-कृपा जो तम को काटती है। केंद्रीय प्रतीक-वाक्य: पराक्रम तभी मंगल है जब वह ‘राम-प्रताप’ से संयुक्त हो; अन्यथा रावण का बल ‘असमर्थ दंभ’ बनकर स्वयं-विनाश को बुलाता है। धर्म-युद्ध का संदेश बाह्य रण से आगे बढ़कर साधक के भीतर ‘अहंकार-निवृत्ति’ और ‘ईश्वर-आश्रय’ की साधना बन जाता है।
चौपाई 40.1-5
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी।सुना दसानन अति अहँकारी।।
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई।बिहँसि निसाचर सेन बोलाई।।
आए कीस काल के प्रेरे।छुधावंत सब निसिचर मेरे।।
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा।गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा।।
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू।धरि धरि भालु कीस सब खाहू।।
उमा रावनहि अस अभिमाना।जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना।।
चले निसाचर आयसु मागी।गहि कर भिंडिपाल बर साँगी।।
तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा।सुल कृपान परिघ गिरिखंडा।।
जिमि अरुनोपल निकर निहारी।धावहिं सठ खग मांस अहारी।।
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा।तिमि धाए मनुजाद अबूझा।।
laṅkā̃ bhayau kolāhala bhārī |sunā dasānana ati ahaṅkārī ||
dekhahu banaranha keri ḍhiṭhāī |bihaṁsi nisācara sena bolāī ||
āe kīsa kāla ke prerē |chudhāvanta saba nisicara merē ||
asa kahi aṭṭahāsa saṭha kīnhā |gṛha baiṭhē ahāra bidhi dīnhā ||
subhaṭ sakala cārihũ disi jāhū |dhari dhari bhālu kīsa saba khāhū ||
umā rāvanahi asa abhimānā |jimi ṭiṭṭibha khaga sūta utānā ||
calē nisācara āyasu māgī |gahi kara bhiṇḍipāla bara sā̃gī ||
tomara mugdara parasu pracaṇḍā |sula kṛpāna parigha girikhaṇḍā ||
jimi aruṇopala nikara nihārī |dhāvahiṁ saṭha khaga māṁsa-ahārī ||
coṅca bhaṅga dukha tinhahi na sūjhā |timi dhāē manujāda abūjhā ||
लंका में बहुत ज्यादा शोर मचा। बहुत घमंडी रावन ने वो सुन लिया। रावन बोले, देखो इन बंदरों की हिम्मत। और हँस कर अपनी राक्षस सेना को बुलाया। मौत इन बंदरों को दका मार के लाई है। मेरे सारे राक्षस भूखे हैं। ये बोल कर वो बेवकूफ जोर से हँसा। घर बैठे बैठे भगवान ने हमें खाना भेज दिया। तुम सारे बहादुर सिपाही चारो तरफ जाओ। भालू और बंदर को पकड़ पकड़ कर सब खा जाओ। हे उमा, रावन का घमंड इतना बढ़ गया था, जैसे टिटिभ पक्षी जो अपने पैर ऊपर की तरफ फैला के सोता है। राक्षस ने उसका आदेश माँगा और निकल पड़े। हाथ में भालें, अच्छी भेंकीपाल और भाले पकड़े हुए। उनके पास लोहे के भालें, गदे, खतरनाक कुल्हाड़ी, भाले, तलवार, लोहे के डंडे और पत्थर थे। जैसे मूर्ख मांस खाने वाले पक्षी लाल लाल के पत्थर का ढेर देख कर उसे मांस समझ उस पर झपटे हैं। और उनको अपनी टूट चुकी चोंच का दुख भी महसूस नहीं होता, वैसे ही वो मांस खाने वाले बेवकूफ राक्षस अपनी नादानी में आगे दौड़े पड़े।
दोहा 40
नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर।।40।।
nānāyudha sara cāpa dhara jātudhāna bala bīra |koṭa kaṅgūranhi caṛhi gae koṭi koṭi raṇadhīra ||40||
राखसों के पास हर तरह के हथियार थे, तीर और कमान। वो लोग बहुत बलवान और बहादुर थे। उनमे से करो करो ने फोर्ट की दीवार पर चढ़ गए। वो सब लड़ाई में बिल्कुल सामने खड़े रहने वाले थे।
चौपाई 41.1-4
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे।मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ।सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।।
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा।सुनि कादर उर जाहिं दरारा।।
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा।अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा।पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।।
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं।दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।।
उत रावन इत राम दोहाई।जयति जयति जय परी लराई।।
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं।कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।
koṭa kaṅgūranhi sohahiṁ kaisē |meru ke sṛṅgani janu ghana baisē ||
bājahiṁ ḍhola nisāna jujhāū |suni dhuni hoi bhaṭanha mana cāū ||
bājahiṁ bhēri naphīri apārā |suni kādara ura jāhiṁ darārā ||
dekhini jāi kapinha ke ṭhaṭṭā |ati bisāla tanu bhālu subhaṭṭā ||
dhāvahiṁ ganahiṁ na avaghaṭa ghāṭā |parbata phori karahiṁ gahi bāṭā ||
kaṭakaṭāhiṁ koṭinha bhaṭa garjahiṁ |dasana oṭha kāṭahiṁ ati tarjahiṁ ||
uta rāvan ita rāma dohāī |jayati jayati jaya parī larāī ||
nisicara sikhara samūha ḍhahāvahiṁ |kūdi dharahiṁ kapi phēri calāvahiṁ ||
किले के कंगूरों पर राक्षस बहुत अच्छे लग रहे थे, जैसे मेरु पर्वत की चोटियों पर बादल ठहरे हो। युद्ध के लिए ढोल और नगाड़े बज रहे थे, आवाज सुन के सिपाहियों के मन में लड़ाई का जोश भर गया। गिनती नहीं जाने वाले बड़े ढोल और सिंघे बज रहे थे, वो सुन के डरपोकों का दिल फट गया। राक्षसों ने देखा कि बंदरों का एक बड़ा झुंड आ रहा है, और भालू भी, जिनका शरीर बहुत बड़ा है और जो बहुत बलवान लड़ाकू हैं। वो लोग ऐसे ही दौड़ रहे हैं, मुश्किल रास्ते और घाटों की परवाह नहीं करते, पहाड़ पकड़ के तोड़ते हैं और रास्ता बना लेते हैं। लाखों सिपाही दांत पीस रहे हैं और गरज रहे हैं, होंठ काट रहे हैं और बहुत धमकी दे रहे हैं। उस तरफ रावण का नाम चिल्लाते हैं, इस तरफ राम का नाम, जय जय की आवाज के साथ लड़ाई शुरू हो गई। राक्षस पहाड़ की चोटियां गिराते हैं, पर बंदर कूद के उसे पकड़ लेते हैं और वापस फेंक देते हैं।
छंद 41
धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं।।
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए।।
dhari kudhara khaṇḍa pracaṇḍa karkaṭa bhālu gaṛha para ḍārahī |jhapaṭahiṁ carana gahi paṭaki mahi bhaji calata bahuri pacārahī ||
ati tarala taruna pratāpa tarapahiṁ tamaki gaṛha caṛhi caṛhi gae |kapi bhālu caṛhi mandiranha jahã tahã rāma jasu gāvata bhae ||
भालु और बंदर पहाड़ के बड़े पत्थर उठा कर किले पर फेंक देते हैं। वो राक्शसों पर कूदते हैं, उनके पैर पकड़ कर ज़मीन पे पटक देते हैं। जब कोई राक्शस भाग जाता है, उसको वापस बुलाते हैं और फिर सामने आने को कहते हैं। ये बहुत तेज़ और जवान हैं, गुस्से और ताक़त से भरे हुए हैं। गुस्से में वो किले पर चढ़ते रहते हैं। बंदर और भालु महलों पर चढ़ जाते हैं और हर जगह राम की तारीफ़ गाने लगते हैं।
दोहा 41
एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ।।41।।
eku eku nisicara gahi puni kapi calē parāi |ūpara āpu hēṭha bhaṭ girahiṁ dharani para āi ||41||
हर एक राक्शस को पकड़ के बंदर वहां से ले चले। जब ज़मीन पर गिरे, तो ऊपर बंदर और नीचे वोह राक्शस लड़का।
चौपाई 42.1-5
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा।मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।।
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर।जय रघुबीर प्रताप दिवाकर।।
चले निसाचर निकर पराई।प्रबल पवन जिमि घन समुदाई।।
हाहाकार भयउ पुर भारी।रोवहिं बालक आतुर नारी।।
सब मिलि देहिं रावनहि गारी।राज करत एहिं मृत्यु हँकारी।।
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना।फेरि सुभट लंकेस रिसाना।।
जो रन बिमुख सुना मैं काना।सो मैं हतब कराल कृपाना।।
सर्बसु खाइ भोग करि नाना।समर भूमि भए बल्लभ प्राना।।
उग्र बचन सुनि सकल डेराने।चले क्रोध करि सुभट लजाने।।
सन्मुख मरन बीर कै सोभा।तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा।।
rāma pratāpa prabala kapijūthā |mardahiṃ nisicara subhaṭa barūthā ||
caṛhe durga puni jahaṃ tahaṃ bānara |jaya raghubīra pratāpa divākara ||
cale nisācara nikara parāī |prabala pavana jimi ghana samudāī ||
hāhākāra bhayau pura bhārī |rovahiṃ bālaka ātura nārī ||
saba mili dehiṃ rāvanahi gārī |rāja karata ehiṃ mṛtyu haṃkārī ||
nija dala bicala sunī tehiṃ kānā |pheri subhaṭa laṅkesa risānā ||
jo rana bimukha sunā maiṃ kānā |so maiṃ hataba karāla kṛpānā ||
sarbasu khāi bhoga kari nānā |samara bhūmi bhae ballabha prānā ||
ugra bacana suni sakala ḍerāne |cale krodha kari subhaṭa lajāne ||
san mukha marana bīra kai sobhā |taba tinhiṃ tajā prāna kara lobhā ||
राम के पावर से बहुत स्ट्रांग बनर सेना ने दुश्मन के डेमन वॉरियर्स को कुचल दिया। बनर किले पर हर जगह चढ़ गए, और चिल्लाए, जय रघुबीर, जिसका ग्लोरी सूरज जैसा है। डेमन की फौज भाग गई, जैसे हवा के झोके से बादल उड़ जाते हैं। शहर में बड़ा हल्ला मच गया। बच्चे रो रहे थे और औरतें परेशान थीं। सब मिलके रावन को गालियां दे रहे थे। ये राज करके इसने अपनी मौत खुद बुलवा ली। लंका के राजा ने अपने कानों से सुना कि उसकी सेना टूट चुकी है। वो गुस्से में आया और अपने वॉरियर्स को फिर रेडी किया। जो भी लड़ाई में पीछे हटता है, मैं अपने कानों से सुनूंगा, उसको अपनी खतरनाक तलवार से मार दूंगा। तुमने मेरा सारा पैसा खर्च किया, हर तरह के मजे किए, और अब लड़ाई के मैदान में तुम्हें अपनी जान प्यारी लगने लगी है। उसके कड़क बोल सुनके सारे वॉरियर्स डरें और शर्मिंदा हुए, और गुस्से में फिर लड़ने के लिए निकल पड़े। हीरो की शान सामने से लड़के मरना है। ये सोचके उनने जान बचाने का लालच छोड़ दिया।
दोहा 42
बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी।।42।।
bahu āyudha dhara subhaṭa saba bhirahiṃ pacāri pacāri |byākula kie bhālu kapi parigha trisūlanhi mārī ||42||
सारे बहादुर योद्धा ने कई तरह के हथियार उठाए और दुश्मन पर बार बार चैलेंज करके हमला किया. लोहे के गदा और त्रिशूल से मारका उन्ने बेयर्स और बंदर को परेशान कर दिया.
चौपाई 43.1-4
भय आतुर कपि भागन लागे।जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता।कहँ नल नील दुबिद बलवंता।।
निज दल बिकल सुना हनुमाना।पच्छिम द्वार रहा बलवाना।।
मेघनाद तहँ करइ लराई।टूट न द्वार परम कठिनाई।।
पवनतनय मन भा अति क्रोधा।गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।।
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा।गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।।
भंजेउ रथ सारथी निपाता।ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।।
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना।स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।
bhaya ātura kapi bhāgana lāge |jadyapi umā jītihahiṃ āge ||
kou kaha kahaṃ aṅgada hanumaṃtā |kahaṃ nala nīla dubida balavaṃtā ||
nija dala bikala sunā hanumānā |pacchima dvāra rahā balavānā ||
meghanāda tahaṃ karai larāī |ṭūṭa na dvāra parama kaṭhināī ||
pavana-tanaya mana bhā ati krodhā |garjeu prabala kāla sama jodhā ||
kūdi laṅka gaṛha ūpara āvā |gahi giri meghanāda kahuṃ dhāvā ||
bhaṃjeu ratha sārathī nipātā |tāhi hṛdaya mahuṃ māresi lātā ||
dusareṃ sūta bikala tehi jānā |syaṃdana ghāli turata gṛha ānā ||
डर के मारे बंदर भागने लगे, पर उमा, आखिर में उनकी ही जीत थी। कोई चिल्लाने लगा, अंगद और हनुमान कहाँ गए? नल और नील कहाँ हैं, और बलवान दुविद कहाँ है? हनुमान ने सुना कि अपनी ही सेना परेशान में है। बलवान हनुमान पश्चिम द्वार पर खड़ा था। वहाँ मेघनाद लड़ रहा था, और द्वार बिलकुल नहीं टूट रहा था, बहुत मुश्किल काम था। पवन-पुतर के दिल में बहुत गुस्सा आया, और उस महान योद्धा ने मौत की तरह गरजना की। उसने छलाँग मारके लंका के किले की दीवार पर चढ़ गया, और एक पहाड़ का पत्थर उठाकर मेघनाद पर झपटा। उसने रथ तोड़ दिया, सारथी को नीचे गिरा दिया, और मेघनाद के सीने में लात मारी। दूसरे सारथी ने देखा कि मेघनाद होश में नहीं है, उसे रथ में लिटाकर तुरंत घर ले गया।
दोहा 43
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल।।43।।
aṅgada sunā pavanasuta gaṛha para gayau akela |rana bāṅkurā bālisuta taraki caṛheu kapi khela ||43||
अंगद ने सुना कि हनुमान अकेले किले के ऊपर चला गया। फिर बाली का बेटा, जो लड़ाई में बहुत बहादुर है, उछल कर ऊपर चला गया, जैसे कोई बंदर खेल रहा हो।
चौपाई 44.1-4
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर।राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई।करहि कोसलाधीस दोहाई।।
कलस सहित गहि भवनु ढहावा।देखि निसाचरपति भय पावा।।
नारि बृंद कर पीटहिं छाती।अब दुइ कपि आए उतपाती।।
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं।रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
पुनि कर गहि कंचन के खंभा।कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।
गर्जि परे रिपु कटक मझारी।लागे मर्दै भुज बल भारी।।
काहुहि लात चपेटन्हि केहू।भजहु न रामहि सो फल लेहू।।
juddha biruddha kruddha dvau baṃdara |rāma pratāpa sumiri ura aṃtara ||
rāvana bhavana caṛhe dvau dhāī |karahi kosalādhīsa dohāī ||
kalasa sahita gahi bhavanu ḍhahāvā |dekhi nisācara-pati bhaya pāvā ||
nāri bṛṃda kara pīṭahiṃ chātī |aba dui kapi āe utapātī ||
kapilīlā kari tinhahi ḍerāvahiṃ |rāmacandra kara sujasu sunāvahiṃ ||
puni kara gahi kaṃcana ke khaṃbhā |kahenhi kari'a utapāta araṃbhā ||
garji pare ripu kaṭaka majhārī |lāge mardai bhuja bala bhārī ||
kāhuhi lāta capeṭanhi kehū |bhajahu na rāmahi so phala lehū ||
ये दो बंदर, हनुमान और अंगद, लड़ाई में बहुत गुस्से में थे, और दिल के अंदर राम की ताकत याद कर रहे थे। दोनों दौड़ कर रावन के महल पर चढ़ गए, और कोसला के स्वामी, यानी राम, का नाम लगा कर मदद की पुकार मारी। उन्होंने महल को उसके कलश के साथ पकड़ कर गिरा दिया। ये देख कर डानों का राजा डर गया। औरतों का झुंड अपनी छाती पे हाथ मारी, कहने लगी, अब दो शैतान बंदर आ गए हैं। बंदर वाले चक्कर करके उन्हें डराए, और रामचंद्र की महिमा सुनाई। फिर उन्होंने हाथ में सोने के खम्भे पकडे, और बोले, चलो तबाही शुरू करते हैं। धाड़ते हुए वो दुश्मनों की फौज के बीच गिर पड़े, और अपनी भारी भुजा की ताकत से उन्हें पीटने लगे। किसी को लात मारी, किसी को चांटा, और चिल्लाते हुए बोले, अगर तुम राम को नहीं मानोगे, तो ये लो बदला।
दोहा 44
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड।।44।।
eka eka soṃ mardahiṃ tori calāvahiṃ muṇḍa |rāvan āgeṃ parahiṃ te janu phūṭahiṃ dadhi kuṇḍa ||44||
एक एक को कुचल के उनका सिर तोड़ के फेंक देते हैं। वो सिरे रावन के सामने गिरते हैं, जैसे दही के बरतन फट रहे हो।
चौपाई 45.1-4
महा महा मुखिआ जे पावहिं।ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा।देहिं राम तिन्हहू निज धामा।।
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी।पावहिं गति जो जाचत जोगी।।
उमा राम मृदुचित करुनाकर।बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर।।
देहिं परम गति सो जियँ जानी।अस कृपाल को कहहु भवानी।।
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी।नर मतिमंद ते परम अभागी।।
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा।कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा।।
लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें।मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें।।
mahā mahā mukhiā je pāvahiṃ |te pada gahi prabhu pāsa calāvahiṃ ||
kahai bibhīṣanu tinh ke nāmā |dehiṃ rāma tinhahū nija dhāmā ||
khala manujād dvijāmiṣa bhogī |pāvahiṃ gati jo jācat jogī ||
umā rāma mṛdu-cita karunākara |bayara bhāva sumirata mohi nisi-cara ||
dehiṃ parama gati so jiyã jāni |asa kṛpāla ko kahahu bhavānī ||
asa prabhu suni na bhajahiṃ bhrama tyāgī |nara mati-manda te parama abhāgī ||
aṅgada aru hanumaṃta prabesā |kīnha durga asa kaha avadhesā ||
laṅkā̃ dvau kapi sohahiṃ kaiseṃ |mathahiṃ siṃdhu dui maṃdara jaiseṃ ||
जो जो बड़े बड़े राक्षस के सरदार बंदर पकड़ लेते थे, उनको पैर से पकड़ के भगवान की तरफ फेंक देते थे। विभीषण उन सबके नाम बताते थे, और राम ने उनको भी अपना धाम दे दिया। वो बुरे मनुष, जो रिशियों का मास खाते थे, उनको वो गति मिल गई जो जोगी माँगते हैं। उमा, राम का दिल बहुत नरम है और वो दया की खान हैं। उस वक्त भले ही उन भूत ने दुश्मनी के भाव से उसका नाम लिया था। फिर भी दिल में जान कर वो उनको सबसे ऊपरी गति दे देते हैं। बताओ भवानी, और कौन इतना दयालु हो सकता है? ऐसे प्रभु के बारे में सुन कर भी जो लोग अपना भ्रम नहीं छोड़ते और उसकी पूजा नहीं करते, वो मूर्ख इंसान हैं और सबसे बुरे भाग वाले हैं। अवध के स्वामी ने कहा, अंगद और हनुमान ने उस किले में एंट्री कर ली है। लंका में दोनों बंदर कैसे लग रहे थे? दो मंदर पहाड़ समुंदर को मथ रहे थे, बिलकुल वैसे लग रहे थे।
दोहा 45
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
bhuja bala ripu dala dalamali dekhi divasa kara aṃta |kūde jugala bigata śrama āe jahã bhagavaṃta ||45||
अपनी बाहुओं की ताकत से दुश्मन की फौज को कुचल डाला। फिर देखा कि दिन खत्म होने वाला है। दोनों बिना थके हुए कूद के वहाँ आ गए जहाँ भगवान खड़े थे।
चौपाई 46.1-6
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए।देखि सुभट रघुपति मन भाए।।
राम कृपा करि जुगल निहारे।भए बिगतश्रम परम सुखारे।।
गए जानि अंगद हनुमाना।फिरे भालु मर्कट भट नाना।।
जातुधान प्रदोष बल पाई।धाए करि दससीस दोहाई।।
निसिचर अनी देखि कपि फिरे।जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।।
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी।लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।।
महाबीर निसिचर सब कारे।नाना बरन बलीमुख भारे।।
सबल जुगल दल समबल जोधा।कौतुक करत लरत करि क्रोधा।।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे।लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।।
अनिप अकंपन अरु अतिकाया।बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।।
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा।बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।
prabhu pada kamala sīsa tinh nāe |dekhi subhaṭ raghupati mana bhāe ||
rāma kṛpā kari jugala nihāre |bhae bigataśrama parama sukhāre ||
gae jāni aṅgada hanumānā |phire bhālu markaṭ bhaṭ nānā ||
jātudhāna pradoṣa bala pāī |dhāe kari dasa-sīsa dohāī ||
nisicara anī dekhi kapi phire |jahã tahã kaṭakaṭāi bhaṭ bhire ||
dvau dala prabala pacāri-pacārī |larata subhaṭ nahiṃ mānahiṃ hārī ||
mahābīra nisicara saba kāre |nānā barana balīmukha bhāre ||
sabala jugala dala samabala jodhā |kautuka karata larata kari krodhā ||
prābiṭ sarada payoda ghanere |larata manahũ māruta ke prere ||
anipa akaṃpana aru atikāyā |bicalata sena kīnhi inh māyā ||
bhayau nimiṣa mãha ati ãdhiyārā |bṛṣṭi hoi rudhiropala chārā ||
1. डोनो ने राम के पैरों में सर झुका. राम को उन ऐसे बहादुर सिपाही देख कर दिल खुश हो गया. 2. राम ने डोनो पर कृपा की नज़र डाली. डोनो का थकान गया और डोनो बहुत खुश हो गए. 3. अंगद और हनुमान चले गए, ये जान कर बहुत सारे भालु और बंदर के सिपाही वापस मुड गए. 4. रात होने से राक्षसों को ताकत मिल गई. वो दौड के आगे बढे और रावन का नाम चिल्लाने लगे. 5. राक्षस की सेना देख कर बंदर वापस मुड गए. सिपाही इधर उधर दांत पैसा कर आपस में टकराये. 6. डोनो सेनाये बहुत ताकतवर थी. सिपाही आपस को बार बार चैलेंज देते हुए लड रहे थे और हार नहीं मान रहे थे. 7. राक्षस सब बहादुर और काले रंग के थे. बडे बडे बंदर बहुत सारे अलग अलग रंग के थे. 8. डोनो सेनाये ताकतवर थी और डोनो के सिपाही बराबर ताकत के थे. वो गुस्से में लड रहे थे जैसे कोई खेल हो रहा हो. 9. वो डोनो बराबर बादल लगते थे, एक बरसात का और एक पतझड का, जैसे हवा उन्हें आपस में धकेल रही हो. 10. जब सेना हिलने लगी, तब अकम्पन और अतिकाय ने एक माया किया. 11. एक पल में बहुत अंधेरा हो गया. खून, पत्थर और राख बरसने लगी.
दोहा 46
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
dekhi nibiṛ tama dasahũ disi kapidala bhayau khabhāra |ekahi eka na dekhī jahã tahã karahiṃ pukāra ||46||
हर तरफ बहुत घना अंधेरा देख के वानर सेना घबरा गई। कोई अपने साथियों को नहीं देख पा रहा था। सब इधर उधर चिल्लाने लगे।
चौपाई 47.1-4
सकल मरमु रघुनायक जाना।लिए बोलि अंगद हनुमाना।।
समाचार सब कहि समुझाए।सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।।
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा।पावक सायक सपदि चलावा।।
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं।ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा।धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।।
हनूमान अंगद रन गाजे।हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।
भागत पट पटकहिं धरि धरनी।करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।।
गहि पद डारहिं सागर माहीं।मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।
sakala maramu raghunāyaka jānā |liye boli aṅgada hanūmānā ||
samācāra saba kahi samujhāe |sunata kopi kapikuñjara dhāe ||
puni kṛpāla haṁsi cāpa caṛhāvā |pāvaka sāyaka sapadi calāvā ||
bhayu prakāsa katahuṁ tama nāhīṁ |gyāna udayaṁ jimi saṁsaya jāhīṁ ||
bhālu balīmukha pāi prakāsā |dhāe haraṣa bigata śrama trāsā ||
hanūmāna aṅgada rana gāje |hāṁka sunata rajanīcara bhāje ||
bhāgata paṭa paṭakahiṁ dhari dharanī |karahiṁ bhālu kapi adbhuta karanī ||
gahi pada ḍārahiṁ sāgara māhīṁ |makara uraga jhaṣa dhari-dhari khāhīṁ ||
राम सब बात समझ गया। उसने अंगद और हनुमान को बुलाया। सब कुछ उन्हें बता के समझा दिया। यह सुन के वानर सरदार, जो हाथी जैसे बलवान थे, गुस्से में दौड़ पड़े। फिर राम मुस्कुराए, कमान पे तीर चढ़ाया, और तुरंत आग वाला तीर चलाया। चमक फैल गई, अंधेरा कहीं नहीं रहा। जैसे ज्ञान आने पर शक दूर हो जाता है। भालू और वानर को रोशनी मिली तो खुशी से दौड़ पड़े, थकान और डर गायब हो गए। हनुमान और अंगद रन भूमि में गरजे, राक्षस उनकी आवाज सुन के भाग गए। राक्षस भाग रहे थे, भालू और वानर उन्हें पकड़ के ज़मीन पे पटक रहे थे, अजब काम कर रहे थे। पैर पकड़ के उन्हें समुंदर में फेंक रहे थे, वहां मगरमच्छ, सांप और मछली ने पकड़ के खा लिया।
दोहा 47
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।
kachu māre kachu ghāyala kachu gaṛha caṛhe parāi |garjahiṁ bhālu balīmukha ripu dala bala bicalāi ||47||
कुछ दुश्मन मारे गए, कुछ घायल हो गए, और कुछ भाग के किले पर चढ़ गए. भालु और बंदर की सेना दुश्मन का दम तोड़ दिया और जोर से चिल्लाई.
चौपाई 48.1-4
निसा जानि कपि चारिउ अनी।आए जहाँ कोसला धनी।।
राम कृपा करि चितवा सबही।भए बिगतश्रम बानर तबही।।
उहाँ दसानन सचिव हँकारे।सब सन कहेसि सुभट जे मारे।।
आधा कटकु कपिन्ह संघारा।कहहु बेगि का करिअ बिचारा।।
माल्यवंत अति जरठ निसाचर।रावन मातु पिता मंत्री बर।।
बोला बचन नीति अति पावन।सुनहु तात कछु मोर सिखावन।।
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी।असगुन होहिं न जाहिं बखानी।।
बेद पुरान जासु जसु गायो।राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।
nisā jāni kapi cāriu anī |āe jahāṁ kosalā dhanī ||
rāma kṛpā kari citavā sabahī |bhae bigata-śrama bānara tabahī ||
uhāṁ dasānana saciva haṁkāre |saba sana kahesi subhaṭa je māre ||
ādhā kaṭaku kapinha saṅghārā |kahahu begi kā kari'a bicārā ||
mālyavanta ati jaraṭha nisācara |rāvana mātu-pitā maṁtrī bara ||
bolā bacana nīti ati pāvana |sunahu tāta kachu mora sikhāvana ||
jaba te tumha sītā hari ānī |asaguna hohiṁ na jāhiṁ bakhānī ||
beda purāna jāsu jasu gāyo |rāma bimukha kāhūṁ na sukha pāyo ||
रात हो गई जान के चारों हिस्से के बंदर वहाँ आ गए जहाँ राम थे। राम ने सब पर कृपा की नज़र डाली, और तुरंत बंदर का थकान खत्म हो गया। वहाँ रावन ने अपने मंत्रियों को बुलाया, और उन्हें बताया कि कौन कौन से बहादुर सैनिक मारे गए। उसने कहा, बंदरों ने आधी सेना खत्म कर दी है। जल्दी बताओ, अब क्या प्लान बनाए? मल्यवंत बहुत बूढ़ा एक राक्षस था, रावन की माँ और बाप का सबसे बड़ा मंत्री। उसने बहुत सही बात कही। बोले, सुनो बेटा, थोड़ी सी मेरी समझाओ की बात सुन लो। जब से तुम सीता को उठा के यहाँ लाए हो, ऐसे बुरे लगे हैं जो बताए नहीं जा सकते। जिसकी महिमा वेद और पुरान गाते हैं, उस राम से मुह मोड़ के किसी ने भी कभी खुशी नहीं पाई।
दोहा 48(क)-(ख)
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।।
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।
hiraṇyāccha bhrātā sahita madhu kaiṭabha balavān |jehi māre soi avatareu kṛpāsiṁdhu bhagavān ||48(ka)||
kālarūpa khala-bana-dahana guṇa-āgāra ghanabodha |śiva birañci jehi sevahiṁ tāsoṁ kavan birodha ||48(kha)||
हिरन्याक्ष अपने भाई के साथ, और मधु कैटभ जो बहुत ताकतवर थे। जिसने उन सबको मारा, वही भगवान अब दया के सागर बनके उतरे हैं। वह बुरे लोगों के लिए मौत है, उनका जंगल जलाने वाली आग, गुणों का खजाना, और घन बादल जैसा ग्यान। जिसे शिव और ब्रह्मा सेवा करते हैं, उससे क्या विरोध हो सकता है?
चौपाई 49.1-5
परिहरि बयरु देहु बैदेही।भजहु कृपानिधि परम सनेही।।
ताके बचन बान सम लागे।करिआ मुह करि जाहि अभागे।।
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही।अब जनि नयन देखावसि मोही।।
तेहि अपने मन अस अनुमाना।बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।।
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा।तब सकोप बोलेउ घननादा।।
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा।करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।।
सुनि सुत बचन भरोसा आवा।प्रीति समेत अंक बैठावा।।
करत बिचार भयउ भिनुसारा।लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।।
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा।नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।।
बिबिधायुध धर निसिचर धाए।गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।
parihari bayaru dehu baidehī |bhajahu kṛpānidhi parama sanehī ||
tāke bacana bāna sama lāge |kariyā muha kari jāhi abhāge ||
būṛha bhaesi na ta marateuṁ tohī |aba jani nayana dekhāvasi mohī ||
tehi apane mana asa anumānā |badhyo cahata ehi kṛpānidhānā ||
so uṭhi gayau kahata durbādā |taba sakopa boleu ghananādā ||
kautuka prāta dekhi'ahu morā |karihauṁ bahuta kahauṁ kā thorā ||
suni suta bacana bharosā āvā |prīti sameta aṅka baiṭhāvā ||
karata bicāra bhayu bhinusārā |lāge kapi puni cahuṁ duārā ||
kopi kapinha durghaṭa gaṛhu gherā |nagara kolāhalu bhayu ghanerā ||
bibidhāyudha dhari nisicara dhāe |gaṛha te parabata sikhara ḍhahāe ||
अपनी दुश्मनी छोड़ दे और वैदेही को वापस कर दे। उस दया के खजाने को भगवान मान जो अपने भक्तों का सबसे बड़ा दोस्त है। उसके बाण जैसे बान लागे रावन को। जा, तू बदकिस्मत आदमी, कहीं और जा अपना मूह काला कर। तू बूढ़ा हो गया है, वरना मैं तुझे मार देता। अब अपनी आखियाँ मुझे दोबारा मत दिखावा। विभीषण अपने मन में ऐसा सोचने लगा कि ये रावन उस दया के धाम वाले के हाथों मरना चाहता है। तोह वो उठकर वहाँ से चला गया और बुरा बोलते हुए निकल गया। फिर मेघनाद गुस्से में बोला। कल सुबह तू मेरा कमाल देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा, थोड़ी बात बोलने का क्या फायदा। अपने बेटे की बात सुनकर रावन को भरोसा आया, और प्यार से उसे अपनी गोद में बिठा लिया। जब वो लोग आपस में सलाह कर रहे थे तब सुबह हो गयी, और बंदर फिर से चारों तरफ से शहर पर अटैक किया। गुस्से में बंदरों ने उस किले को घेर लिया जो तोड़ना मुश्किल था, और शहर में बहुत शोर मच गया। राक्षस हर तरह के हथियार लेकर दौड़े, और किले से पहाड़ की चोटियाँ उखाड़ कर फेंकी।
छंद 49
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले॥
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए॥
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥
ḍhāhe mahīdhara sikhara koṭinh bibidha bidhi golā cale |ghaharāta jimi pabi-pāta garjata janu pralaya ke bādale ||
markaṭ bikaṭ bhaṭ juṭata kaṭata na laṭata tana jarjara bhae |gahi sail tehi gaṛha para calāvahiṃ jahã so tahã nisi-cara hae ||
उन्होने करोड़ों पहाड़ की चोटियां गिरा दी, और कई तरह के गोले उड़ने लगे। वो ऐसे गिर रहे थे जैसे बिजली गिरती है, और ऐसी गूंज उठी जैसे प्रलय के बादल गरजते हैं। बड़े दरपल बंदर योद्धा आपस में लड़ाई में जुड़ गए। काट-ते थे, चीरे जाते थे, फिर भी थकते नहीं, जबकि उनका तन बदन टुकड़े टुकड़े हो गया। पत्थर उठाकर उस गढ़ पर चलाते, और जहां जहां राक्षस खड़े थे, वही उनको मार गिराते।
दोहा 49
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ।उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ।।49।।
meghanāda suni śravaṇa asa gaṛhu puni chẽkā āi.utaryo bīra durga tẽ sanmukha calyo bajāi ||49||
मेघनाद ने सुना कि बंदर वाले फिर आए हैं और किले को घेर लिया है। तो वो बहादुर किले से नीचे उतरा और ढोल बजाते हुए सामने की तरफ बढ़ने लगा।
परंपरागत मान्यता में लंका काण्ड के युद्ध-प्रसंगों का पाठ ‘भय-निवारण’, ‘अहंकार-क्षय’ और ‘संकट में राम-आश्रय की दृढ़ता’ देता है; विशेषतः ‘ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं’ भाव का श्रवण/पाठ मन के तम और संशय को शांत करने वाला माना जाता है।
सामान्यतः संकट-निवारण हेतु ‘राम रक्षा’ भाव से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘जय रघुबीर’ का जप/सम्पुट प्रचलित है; कई परंपराओं में हनुमान-प्रधान प्रसंगों पर ‘हनुमान चालीसा/बजरंग बाण’ का पाठ सहगामी रूप से जोड़ा जाता है।
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