Opening the text

Rishi: Atharvanic tradition (longevity charms frequently ascribed to Atharvan seers in ancillary lists)
Devata: Āyus/Asu (vital breath) with implicit opposition to Mṛtyu; Pitṛs as the avoided destination
Chandas: Mixed/Anuṣṭubh-like cadence (prose-like opening with metrical continuation)
Mantra 1
दीघायुष्यम्। आ॒वत॑स्त आ॒वतः॑ परा॒वत॑स्त आ॒वतः॑ । इ॒हैव भ॑व॒ मा नु गा॒ मा पूर्वा॒ननु॑ गाः पि॒तॄनसुं॑ बध्नामि ते दृ॒ढम्
तुम्हारी उम्र लंबी हो। तुम्हारे पास से भी तुम्हे बचा ले, दूर से भी तुम्हे बचा ले। यहीं रहो, कहीं मत जाओ। अपने पूर्वजों के पीछे मत जाओ। तुम्हारी साँस और तुम्हारी जान को मैं मज़बूती से बाँध देता हूँ।
Mantra 2
यत् त्वा॑भिचे॒रुः पुरु॑षः॒ स्वो यदर॑णो॒ जनः॑ । उ॒न्मो॒च॒न॒प्र॒मो॒च॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते
किसी भी इंसान ने तुम्हारे ऊपर जादू-टोना किया हो, वो तुम्हारा अपना हो या कोई और हो, मैं उसे तोड़ देता हूँ। मैं उसे पूरा खोल देता हूँ और तुम्हे आज़ाद करता हूँ। मेरी ज़बानी यह दो बातें है जो तुम्हे आज़ाद करती है।
Mantra 3
यद् दु॒द्रोहि॑थ शेपि॒षे स्त्रि॒यै पुं॒से अचि॑त्त्या । उ॒न्मो॒च॒न॒प्र॒मो॒च॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते
अगर तुमने किसी औरत या मर्द के साथ गलती कर दी हो, बिना सोचे समझे। तो मैं एक दुआ बोल रहा हूँ जो तुम्हे आज़ाद करे। यह दुआ तुम्हे पूरा छोड़ दे, बड़ा से बड़ा पाप भी साफ़ हो जाए।
Mantra 4
यदेन॑सो मा॒तृकृ॑ता॒च्छेषे॑ पि॒तृकृ॑ताच्च॒ यत्। उ॒न्मो॒च॒न॒प्र॒मो॒च॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते
तुम्हारी माँ की गलतियाँ, तुम्हारे बाप की गलतियाँ, जो भी बची हैं, मैं सब को दूर करने की दुआ बोल रहा हूँ। अब तुम फ्री हो, पूरी तरह से।
Mantra 5
यत् ते मा॒ता यत् ते पि॒ता जा॒मिर्भ्राता॑ च॒ सर्ज॑तः । प्र॒त्यक् से॑वस्व भेष॒जं ज॒रद॑ष्टिं कृणोमि त्वा
तुम्हारी माँ ने, बाप ने, रिश्तेदारों ने या भाई ने जो भी भेजा है, उसे वापस कर दो। दवा का साथ लो। मैं तुम्हे इतनी लंबी उम्र दूंगा कि तुम बूढ़े हो कर भी चल सको।
Mantra 6
इ॒हैधि॑ पुरुष॒ सर्वे॑ण॒ मन॑सा स॒ह। दू॒तौ य॒मस्य॒ मानु॑ गा॒ अधि॑ जीवपु॒रा इ॑हि
हे इंसान, यहीं रहो। पूरा मन यहीं लगाओ। यम के दूतों के पीछे मत जाओ। यहीं आओ, ज़िंदा लोगों के बीच में।
Mantra 7
अनु॑हूतः॒ पुन॒रेहि॑ वि॒द्वानु॒दय॑नं प॒थः । आ॒रोह॑णमा॒क्रम॑णं॒ जीव॑तोजीव॒तोऽय॑नम्
मैं तुम्हे वापस बुला रहा हूँ। आओ, समझदार बन के। उठने का रास्ता पकड़ो। चढ़ो और चलते रहो। यह रास्ता ज़िंदा इंसान को ज़िंदा रखता है।
Mantra 8
0 मा बि॑भे॒र्न म॑रिष्यसि ज॒रद॑ष्टिं कृणोमि त्वा । निर॑वोचम॒हं यक्ष्म॒मङ्गे॑भ्यो अङ्गज्व॒रं तव॑
डर्रो मत, तुम मरोगे नहीं। मैं तुम्हे ऐसा बना देता हूँ कि तुम्हे बुढ़ा होने तक लाठी चाहिए। मैंने तुम्हारे अंगों से बिमारी निकाल दी है। तुम्हारे अंगों में जो बुखार था, वो भी मैंने दूर कर दिया।
Mantra 9
अ॒ङ्ग॒भे॒दो अ॑ङ्गज्व॒रो यश्च॑ ते हृदयाम॒यः । यक्ष्मः॑ श्ये॒न इ॑व॒ प्राप॑प्तद् वा॒चा सा॒ढः प॑रस्त॒राम्
तुम्हारे अंगों में जो दर्द है, बुखार है, या दिल का कोई भी रोग है, वो सब एक बाज़ की तरह तुम पर टूट पड़ा है। अब हमारी दुआ से वो सब दूर भाग जाए।
Mantra 10
ऋषी॑ बोधप्रतीबो॒धाव॑स्व॒प्नो यश्च॒ जागृ॑विः । तौ ते॑ प्रा॒णस्य॑ गो॒प्तारौ॒ दिवा॒ नक्तं॑ च जागृताम्
दो रिशि हैं, एक जगाने वाला, एक फिर से जगाने वाला। एक नींद नहीं आने देता, एक होशियार रखता है। यह दोनों तुम्हारी जान की रक्षा करते हैं, दिन रात जागे रह के।
Mantra 11
अ॒यम॒ग्निरु॑प॒सद्य॑ इ॒ह सूर्य॒ उदे॑तु ते । उ॒देहि॑ मृ॒त्योर्ग॑म्भी॒रात् कृ॒ष्णाच्चि॒त् तम॑स॒स्परि॑
अग्नि यहाँ है, उसके पास बैठो। सूरज तुम्हारे लिए उगे। तुम मौत के गहरे अंधेर से बाहर आओ। काली रात से निकलो, रोशनी में आओ।
Mantra 12
नमो॑ य॒माय॒ नमो॑ अस्तु मृ॒त्यवे॒ नमः॑ पि॒तृभ्य॑ उ॒त ये नय॑न्ति । उ॒त्पार॑णस्य॒ यो वेद॒ तम॒ग्निं पु॒रो द॑धे॒ऽस्मा अ॑रिष्टता॑तये
यमराज को प्रणाम, मौत को प्रणाम, और अपने पुरखों को भी प्रणाम जो यहाँ से ले जाते हैं। जो इंसान को बचाने का रास्ता जानता है, वो अग्नि को आगे लगा देता है ताकि कोई बुरा असर न हो।
Mantra 13
ऐतु॑ प्रा॒ण ऐतु॑ मन॒ ऐतु॒ चक्षु॒रथो॒ बल॑म्। शरी॑रमस्य॒ सं वि॑दां॒ तत् प॒द्भ्यां प्रति॑ तिष्ठतु
साँस वापस आए, मन वापस आए, और आँखों की नज़र वापस आए। ताकत भी वापस आए। इस आदमी का पूरा बॉडी मैं पहचान लेता हूँ। वो अपने पाँव पर खड़ा रहे।
Mantra 14
प्रा॒णेना॑ग्ने चक्षु॑षा॒ सं सृ॑जे॒मं समी॑रय त॒न्वा॒३सं बले॑न । वेत्था॒मृत॑स्य॒ मा नु गा॒न्मा नु भूमि॑गृहो भुवत्
अग्नि भगवान, साँस और नज़र से इस इंसान को ठीक करो। उसकी बॉडी और ताकत वापस लाओ। तुम्हे अमृत का रास्ता पता है। इसलिए यह मत जाने दो कि मर जाए। ज़मीन में उसका घर न बनने दो।
Mantra 15
मा ते॑ प्रा॒ण उप॑ दस॒न्मो अ॑पा॒नोऽपि॑ धायि ते । सूर्य॒स्त्वाधि॑पतिर्मृ॒त्योरु॒दाय॑च्छतु र॒श्मिभिः॑
तुम्हारी साँस मत रुकने दो, नीचे की साँस भी मत दबने दो। सूर्य भगवान तुम्हारा मालिक है। वो अपनी किरणों से तुम्हे मौत से खींच के लाएगा।
Mantra 16
इ॒यम॒न्तर्व॒दति जि॒ह्वा ब॒द्धा प॑निष्प॒दा। त्वया॒ यक्ष्मं॒ निर॑वोचं श॒तं रोपी॑श्च त॒क्मनः॑
यह मंत्र अंदर से बोलता है। जैसे कोई चुपके से चलता है। मैं तुमसे कह रहा हूँ, यह बीमारी भाग गई। सौ रोग जो रेंगते थे, वो भी गायब हो गए। बुखार भी चला गया।
Mantra 17
अ॒यं लो॒कः प्रि॒यत॑मो दे॒वाना॒मप॑राजितः । यस्मै॒ त्वमि॒ह मृ॒त्यवे॑ दि॒ष्टः पु॑रुष जज्ञि॒षे। स च॒ त्वानु॑ ह्वयामसि॒ मा पु॒रा ज॒रसो॑ मृथाः
यह दुनिया भगवान को सबसे प्यारी है। कोई इसको हरा नहीं सकता। मौत के लिए तुम पैदा हुए थे, लेकिन अब तुम्हे वापस बुला रहे हैं। बूढ़े होने तक मत मरो, लंबी उम्र जियो।
It is a ritual and verbal act of stabilizing the person’s life-breath so it does not ‘slip away’ toward death. Practically, it is often paired with tying a cord as a symbolic anchor for vitality.
In Atharvavedic healing language, going to the Pitṛs implies dying and joining the ancestral realm. The hymn blocks that destination by commanding the patient to remain here among the living.
Primarily it is for life-threatening weakness or collapse, but it also addresses ‘sent harm’ and ominous influences. It functions as both healing and protective stabilization when death feels near.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Atharva Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.