Opening the text

Rishi: Atharvanic/Āṅgirasa milieu (enemy-destruction hymns frequently Angiras-like; specific r̥ṣi not provided here)
Devata: Aśvattha (tree-power) as the operative agent; implicit Indraic violence in the background
Chandas: Anuṣṭubh (probable)
Mantra 1
शत्रुनाशनम्। पुमा॑न् पुंसः परि॑जातोऽश्व॒त्थः ख॑दि॒रादधि॑ । स ह॑न्तु॒ शत्रू॑न् माम॒कान् यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम्
यह मंत्र दुश्मन मिटाने के लिए है। पीपल का पेड़ खदिर के पेड़ से निकला है, जैसे किसी मर्द से दूसरा मर्द पैदा हुआ हो। वो पेड़ मेरे दुश्मनों को मारे। जिनसे मैं नफरत करता हूँ और जो मुझसे नफरत करते हैं।
Mantra 2
तान॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ शत्रू॑न् वैबाध॒दोध॑तः । इन्द्रे॑ण वृत्र॒घ्ना मे॒दी मि॒त्रेण॒ वरु॑णेन च
अये पीपल के पेड़, उन दुश्मनों को तोड़ के भगा दे। ज़ोर से मारकर उन्हे दूर कर। इंद्र के साथ, जो वृत्र को मारने वाला है। मेदी के साथ, मित्र और वरुण के साथ।
Mantra 3
यथा॑श्वत्थ नि॒रभ॑नो॒ऽन्तर्म॑ह॒त्यऽर्ण॒वे। ए॒वा तान्त्सर्वा॒न् निर्भ॑ङ्ग्धि॒ यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम्
जैसे पीपल के पेड़ ने बड़े पानी में दुश्मनों को भगा दिया, वैसे ही यह मंत्र भी दुश्मनों को तोड़ के भगा देता है। जो लोग मुझसे नफ़रत करते हैं, और जिससे मैं नफ़रत करता हूँ, वो सब दूर हो जाएँ।
Mantra 4
यः सह॑मान॒श्चर॑सि सासहा॒न इव ऋष॒भः । तेना॑श्वत्थ॒ त्वया॑ व॒यं स॒पत्ना॑न्त्सहिषीमहि
अश्वत्थ पेड़ की ताकत की बात हो रही है। तू जैसे बैल की तरह टगड़ा है, किसी को नहीं मारता। उसी ताकत से हम अपने दुश्मनों को हरा देंगे। तू हमारे साथ है, हम जीत जायेंगे।
Mantra 5
सि॒नात्वे॑ना॒न् निरृ॑तिर्मृ॒त्योः पाशै॑रमो॒क्यैः । अश्व॑त्थ॒ शत्रू॑न् माम॒कान् यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम्
अश्वत्थ, इन दुश्मनों को पकड़ ले। जो लोग मुझे दुश्मन हैं, जो मुझसे नफरत करते हैं, उन सब को बाँध दे। मृत्यु की रस्सी से इतनी टाइट बाँध दे कि वो कभी न खुले।
Mantra 6
यथा॑श्वत्थ वानस्प॒त्याना॒रोह॑न् कृणु॒षेऽध॑रान्। ए॒वा मे॒ शत्रो॑र्मू॒र्धानं॒ विष्व॑ग् भिन्द्धि॒ सह॑स्व च
अश्वत्थ, तू पेड़ों का राजा है। तू लोगों को नीचे गिरा देता है, ऊपर नहीं चढ़ने देता। मेरी दुश्मन का सिर भी ऐसे ही फाड़ दे। उसे ज़मीन पे गिरा दे और तू जीत जा।
Mantra 7
तेऽध॒राञ्चः॒ प्र प्ल॑वन्तां छि॒न्ना नौरि॑व॒ बन्ध॑नात्। न वै॑बा॒धप्र॑णुत्तानां॒ पुन॑रस्ति नि॒वर्त॑नम्
जैसे नाव को रोपे से खोल के बहने देते हैं, वैसे ही दुश्मन भी बह के चले जायेंगे। जो लोग भगा दिए गए हैं, वापस नहीं आते। एक बार गए तो गए, वापस नहीं आते।
Mantra 8
प्रैणा॑न् नुदे॒ मन॑सा॒ प्र चि॒त्ते॑नो॒त ब्रह्म॑णा । प्रैणा॑न् वृ॒क्षस्य॒ शाख॑याश्व॒त्थस्य॑ नुदामहे
मैं उनको बाहर भगा देता हूँ, अपने मन से, अपने इरादे से, और मंत्र के साथ। हम पेड़ की डाल से भी उनको भगाते हैं, पीपल पेड़ की डाल से।
To counter active enemies by turning the Aśvattha tree’s power into a ritual force that strikes, binds, and expels those who hate the practitioner and are hated in return.
It is not just symbolic: the branch functions as the physical implement that carries the mantra’s intent—used to thrust away foes and to embody coercive vanaspati power.
Both. Some verses push enemies outward (expulsion), while others explicitly ask Nirṛti and Mṛtyu to bind them with unloosenable nooses, creating restraint and ruin.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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