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Book 3 operationalizes the Vijigīṣu’s internal strength by converting dispute-resolution into predictable state capacity. Chapter 3.12 treats upanidhi (sealed/entrusted deposits) and ādhi (pledges) as instruments that protect property, stabilize credit, and prevent private coercion. The state’s aim is not moral exhortation but enforceable certainty: custodians must not ‘discover’ deposits conveniently after calamity; pledge-holders must not profit by manipulation of value; and owners must have structured remedies when the counterparty is absent. By specifying fines (dvādaśa-paṇa, caturviṃśati-paṇa), restitution, and aggravated penalties for alienation (sale, pledge, expenditure), Kauṭilya ties private transactions to public order. This strengthens the Kośa (Treasury) indirectly: secure property rights increase taxable prosperity, reduce litigation costs, and prevent social flight. The chapter also embeds local institutions (grāmavृद्ध) as escrow mechanisms, integrating village authority into royal law, thereby extending the king’s juridical reach without constant direct presence.
Sutra 1
उपनिधिरृणेन व्याख्यातः ॥ कZ_०३.१२.०१ ॥
जब कोई सामान डिपॉजिट करता है, उसके लिए वही रूल लगेगा जो कर्ज़ के लिए होता है। दोनों का काम एक जैसा है। जैसे कर्ज़ वापस करना पड़ता है, वैसे ही डिपॉजिट भी वापस करना पड़ता है।
Sutra 2
परचक्राटविकाभ्यां दुर्गराष्ट्रविलोपे वा प्रतिरोधकैर्वा ग्रामसार्थव्रजविलोपे चक्रयुक्तनाशे वा ग्राममध्याग्न्युदकाबाधे ज्वालावेगोपरुद्धे वा नावि निमग्नायां मुषितायां वा स्वयमुपरूढो नोपनिधिमभ्यावहेत् ॥ कZ_०३.१२.०२ ॥
अगर दुश्मन का अटैक हो, जंगल में लूट हो, किला या राजा की ज़मीन चली जाए, गाँव या कारवां बरबाद हो, आग या पानी से तबाही हो, नाव डूब जाए, ऐसा कुछ हो तो उसके पास जो डिपॉजिट था वो वापस नहीं कर पाएगा। उसकी गलती नहीं है। बड़ी मुसीबत आ गई थी, इसलिए माफ़ है।
Sutra 3
उपनिधिभोक्ता देशकालानुरूपं भोगवेतनं दद्यात्द्वादशपणं च दण्डम् ॥ कZ_०३.१२.०३ ॥
अगर कोई डिपॉजिट रखा था और उसने उसको यूज़ कर लिया, तो उसको पैसे देने पड़ेंगे। देखना पड़ेगा वहाँ टाइम के हिसाब से कितना देना है। और अलग से बारह पाने का जुर्माना भी लगेगा।
Sutra 4
उपभोगनिमित्तं नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत् चतुर्विंशतिपणश्च दण्डः अन्यथा वा निष्पतने ॥ कZ_०३.१२.०४ ॥
अगर उसने डिपॉजिट इस्तेमाल किया और वो खो गया या टूट गया, तो वो पूरा वापस करेगा। और चौबीस पाने का जुर्माना भी लगेगा। लेकिन अगर उसकी गलती नहीं है, वो ऐसे ही गायब हो गया, तो अलग रूल लगेगा।
Sutra 5
प्रेतं व्यसनगतं वा नोपनिधिमभ्यावहेत् ॥ कZ_०३.१२.०५ ॥
अगर कोई मर गया हो, उसके घर से जो सामान रखा था, वो वापस माँगने का ट्राई मत करो। या अगर कोई बड़े मुसीबत में फंस गया हो, उससे भी चीज़ें वापस मत दिलवाओ। इन सिचुएशन्स में डिपॉज़िट रिकवरी से रहो।
Sutra 6
आधानविक्रयापव्ययनेषु चास्य चतुर्गुणपञ्चबन्धो दण्डः ॥ कZ_०३.१२.०६ ॥
अगर कोई डिपॉज़िट की चीज़ें गिरवी रख दे, बेच दे, या खर्च कर दे, तो उसको फाइन करो। फाइन होगा वैल्यू का चार गुना। उसके ऊपर और पेनल्टी भी लगेगा, पाँच गुना तक।
Sutra 7
परिवर्तने निष्पातने वा मूल्यसमः ॥ कZ_०३.१२.०७ ॥
अगर कोई चीज़ को बदल के रख दे, या चीज़ को ले भाग जाए, तो जो वैल्यू है उसके बराबर फाइन होगा। सिंपल है, जितना लॉस होगा उतना पे करना पड़ेगा।
Sutra 8
तेनाधिप्रणाशोपभोगविक्रयाधानापहारा व्याख्याताः ॥ कZ_०३.१२.०८ ॥
इस एक रूल से बहुत सारे केसेज़ क्लियर हो जाते हैं। जैसे अगर डिपॉज़िट खराब हो जाए, या कोई यूज़ कर ले, बेच दे, गिरवी रख दे, या चुरा ले। सब केसेज़ इस रूल से कवर हो जाते हैं।
Sutra 9
नाधिः सोपकारः सीदेत् न चास्य मूल्यं वर्धेत अन्यत्र निसर्गात् ॥ कZ_०३.१२.०९ ॥
जब कोई चीज़ गिरवी रखी है और उससे फायदा होता है, तो उसे पुराना नहीं माना जाता। उसकी कीमत भी ज़्यादा नहीं मानी जाती, जब तक खुद से बढ़ न जाए।
Sutra 10
निरुपकारः सीदेत्मूल्यं चास्य वर्धेत ॥ कZ_०३.१२.१० ॥
अगर किसी चीज़ पर कब्ज़ा करने वाले को उससे कोई फायदा नहीं मिलता, तो उसकी कीमत घटने लगती है। और जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता है, उसकी वैल्यू बढ़नी मानी जाती है।
Sutra 11
उपस्थितस्याधिमप्रयच्छतो द्वादशण्पणो दण्डः ॥ कZ_०३.१२.११ ॥
जब वो बंदा हाज़िर हो और पैसे दे के अपना सामान माँग रहा हो, और फिर भी उसके पास रखा हुआ बंदा वापस न करे। तो ऐसा करने वाले पर बारह पना जुर्माना लगता है।
Sutra 12
प्रयोजकासम्निधाने वा ग्रामवृद्धेषु स्थापयित्वा निष्क्रयमाधिं प्रतिपद्येत ॥ कZ_०३.१२.१२ ॥
अगर वो जो पैसे लेने वाला है वो वहीं नहीं है। तो अपना सामान वापस लेने के लिए गाँव के बड़े लोगों के पास पैसे रखवा दो। फिर वो चीज़ तुम्हारी हो जाती है।
Sutra 13
निवृत्तवृद्धिको वाधिस्तत्कालकृतमूल्यस्तत्रैवावतिष्ठेत अनाशविनाशकरणाधिष्ठितो वा ॥ कZ_०३.१२.१३ ॥
जिस चीज़ पर कब्ज़ा है, अगर उसकी वैल्यू या फायदा बढ़ना बंद हो गया है। तो उस वक़्त जो उसकी कीमत है, वो उस हिसाब से वहीं रहती है। या फिर उसे ऐसे रखना कि न तो खराब हो और न ही खो जाए।
Sutra 14
धारणिकासम्निधाने वा विनाशभयादुद्गतार्घं धर्मस्थानुज्ञातो विक्रीणीत आधिपालप्रत्ययो वा ॥ कZ_०३.१२.१४ ॥
अगर किसी चीज़ के खराब होने का डर हो और उसकी कीमत बढ़ रही हो। तो सरकारी आदमियों की नज़र में या कोर्ट की इजाज़त से उस चीज़ को बेचा जा सकता है। या फिर किसी ज़िम्मेदार आदमी की गारंटी पर भी बेच सकते हैं।
Sutra 15
स्थावरस्तु प्रयासभोग्यः फलभोग्यो वा प्रक्षेपवृद्धिमूल्यशुद्धमाजीवममूल्यक्षयेणोपनयेत् ॥ कZ_०३.१२.१५ ॥
ज़मीन जैसी कोई चीज़ गिरवी रखनी हो, तो उसका फायदा दो तरह से उठा सकते हो। या तो उस पर काम करके, या उसके फल से। लेकिन हिसाब साफ रखना। कितना लगाया, कितना बढ़ा, वैल्यू कितनी है, यह सब लिख के रखना। असली रक़त कम नहीं होनी चाहिए।
Sutra 16
अनिसृष्टोपभोक्ता मूल्यशुद्धमाजीवं बन्धं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१२.१६ ॥
अगर कोई बिना पूछे गिरवी रखी चीज़ इस्तेमाल कर बैठे, तो उसको सज़ा मिलेगी। वो पैसा देना पड़ेगा जो उसने कमाया, और सिक्युरिटी भी देनी पड़ेगी।
Sutra 17
शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥ कZ_०३.१२.१७ ॥
बाकी चीज़ें वही रूल लगेंगे जो किसी को अमानत में सामान सोने पर लगते हैं।
Sutra 18
एतेनादेशोऽन्वाधिश्च व्याख्यातौ ॥ कZ_०३.१२.१८ ॥
इसी तरह दूसरे भी काम करते हैं, जैसे किसी को पैसा दिया हो या कोई गिरवी रखनी हो। सब में यही रूल चलेगा।
Sutra 19
सार्थेनान्वाधिहस्तो वा प्रदिष्टां भूमिमप्राप्तश्चोरैर्भग्नोत्सृष्टो वा नान्वाधिमभ्यावहेत् ॥ कZ_०३.१२.१९ ॥
अगर कोई आदमी सामान लेकर काफ़िले के साथ जा रहा हो और मंज़िल तक नहीं पहुँच पाए, या चोर उसे लूट ले और वो सामान छोड़ के भाग जाए, तो उसका दोष नहीं माना जाएगा।
Sutra 20
अन्तरे वा मृतस्य दायादोऽपि नाभ्यावहेत् ॥ कZ_०३.१२.२० ॥
अगर बीच में मौत आ जाए, तो मरने वाले का वारिस भी जवाब नहीं देगा। उस्से कोई क्लेम का आंसर नहीं देना पड़ेगा।
Sutra 21
शेषमुपनिधिना व्यकह्यातम् ॥ कZ_०३.१२.२१ ॥
बाकी बात उपनिधि के टॉपिक में समझाया है। वो पढ़ लो, सब क्लियर हो जाएगा।
Sutra 22
याचितकमवक्रीतकं वा यथाविधं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्पयेयुः ॥ कZ_०३.१२.२२ ॥
जब कोई चीज़ माँग के ली या क्रेडिट पे ली, उस्से सही तरह लेना। और वापस करते वक़्त भी वैसे ही देना। जैसा लिया, वैसा ही रिटर्न करना।
Sutra 23
भ्रेषोपनिपाताभ्यां देशकालोपरोधि दत्तं नष्टं विनष्टं वा नाभ्यावहेयुः ॥ कZ_०३.१२.२३ ॥
अगर कोई आफत आ जाए या एक्सिडेंट हो जाए, और जगह या टाइम की वजह से चीज़ गायब हो जाए या टूट जाए, तो उसका ज़िम्मेदार नहीं मानना। उसमें उसकी गलती नहीं है।
Sutra 24
शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥ कZ_०३.१२.२४ ॥
बाकी बात उपनिधि में ही है। वहाँ देख लो, सब डिटेल मिल जाएगा।
Sutra 25
वैयावृत्यविक्रयस्तु वैयावृत्यकरा यथादेशकालं विक्रीणानाः पण्यं यथाजातं मूल्यमुदयं च दद्युः ॥ कZ_०३.१२.२५ ॥
जब कोई एजेंट माल बेचता है, तो वो जगह और टाइम के हिसाब से बेचे। बेचने के बाद वो असली दाम और जो प्रॉफिट बना है, वो सारी रकम मालिक को दे।
Sutra 26
देशकालातिपातने वा परिहीणं सम्प्रदानकालिकेनार्घेण मूल्यमुदयं च दद्युः ॥ कZ_०३.१२.२६ ॥
अगर एजेंट ने सही टाइम पे माल नहीं दिया, और माल खराब हो गया या कम हो गया। तो वो उस टाइम के दाम हिसाब देगा जब माल देना चाहिए था। असली दाम और प्रॉफिट दोनों उस हिसाब से देना पड़ेगा।
Sutra 27
यथासम्भाषितं वा विक्रीणाना नोदयमधिगच्छेयुः मूल्यमेव दद्युः ॥ कZ_०३.१२.२७ ॥
अगर एजेंट ने वही प्राइस पे माल बेचा जो पहले फिक्स किया था। तो उसको कोई प्रॉफिट नहीं मिलेगा। वो सिर्फ असली दाम मालिक को देगा।
Sutra 28
अर्घपतने वा परिहीणं यथापरिहीणं मूल्यमूनं दद्युः ॥ कZ_०३.१२.२८ ॥
अगर मार्केट में प्राइस गिर गया और माल की वैल्यू कम हो गई। तो एजेंट उतना ही असली दाम देगा, जितना माल की वैल्यू बची है। जो लॉस हुआ वो मालिक का प्रॉब्लम है।
Sutra 29
सांव्यवहारिकेषु वा प्रात्ययिकेष्वराजवाच्येषु भ्रेषोपनिपाताभ्यां नष्टं विनष्टं वा मूल्यमपि न दद्युः ॥ कZ_०३.१२.२९ ॥
जब दो लोग आपस में कोई डील करते हैं बिना कोर्ट के, और उसमे कोई ऐसे घटना हो जाए जो किसी की गलती नहीं है, माल खो जाए या टूट जाए। ऐसे में किसी से पैसा लेना नहीं चाहिए, भले ही माल का कितना भी लॉस हो।
Sutra 30
देशकालान्तरितानां तु पण्यानां क्षयव्ययविशुद्धं मूल्यमुदयं च दद्युः पण्यसमवायानां च प्रत्यंशम् ॥ कZ_०३.१२.३० ॥
जब माल दूसरी जगह ले जाया जाता है या टाइम बदल जाता है, तो उसकी वैल्यू अलग होती है। उस केस में खर्च और खराब हिस्सा निकल के प्राइस देना। जो प्रॉफिट बना है वो भी देना। अगर काम मिलके कर रहे हैं, तो हर एक का हिस्सा हिसाब से देना।
Sutra 31
शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् ॥ कZ_०३.१२.३१ ॥
बाकी चीज़ें उपनिधि के रूल्स से समझ लो। उपनिधि मतलब कोई चीज़ किसी को संभालने के लिए दे दी हो।
Sutra 32
एतेन वैयावृत्यविक्रयो व्याख्यातः ॥ कZ_०३.१२.३२ ॥
इसी तरह एजेंट के ज़रिये माल बेचने का भी काम समझ लो। एजेंट जो करेगा वो उपनिधि जैसा ही होगा।
Sutra 33
निक्षेपश्चोपनिधिना ॥ कZ_०३.१२.३३ ॥
निक्षेप भी उपनिधि के रूल्स से ही चलेगा। निक्षेप भी वही है, कोई सामान किसी को रखने के लिए दे दिया।
Sutra 34
तमन्येन निक्ष्पितमन्यस्यार्पयतो हीयेत ॥ कZ_०३.१२.३४ ॥
अगर कोई तुम्हारा माल दूसरे को दे दे जो किसी और ने रखा था, और माल खराब हो जाए, तो तुम ही ज़िम्मेदार हो। गलती तुम्हारी है।
Sutra 35
निक्षेपापहारे पूर्वापदानं निक्षेप्तारश्च प्रमाणम् ॥ कZ_०३.१२.३५ ॥
जब कोई डिपॉज़िट के पैसे गवा दे, तो प्रूफ क्या है? जो बात डिपॉज़िट के टाइम पे कही थी, वो लिखा होना चाहिए। और जो बंडा डिपॉज़िट कराया था, वो भी प्रूफ माना जाता है।
Sutra 36
अशुचयो हि कारवः ॥ कZ_०३.१२.३६ ॥
काम करने वाले लोगों पे भरोसा करना मुश्किल है। वो ऐसे काम में ठीक से पकड़ नहीं रखते।
Sutra 37
नैषां करणपूर्वो निक्षेपधर्मः ॥ कZ_०३.१२.३७ ॥
इसलिए इन काम करने वालों के लिए डिपॉज़िट तभी माना जाएगा जब पहले से कोई लिखा पेपर हो। बिना पेपर के डिपॉज़िट वैलिड नहीं है।
Sutra 38
करणहीनं निक्षेपमपव्ययमानं गूढभित्तिन्यस्तान् साक्षिणो निक्षेप्ता रहसि प्रणिपातेन प्रज्ञापयेत् वनान्ते वा मद्यप्रहवणविश्वासेन ॥ कZ_०३.१२.३८ ॥
अगर कोई डिपॉज़िट का पेपर नहीं है और वो बंडा पैसा गवा दे, तो क्या करे? पहले चुप के किसी को देखने के लिए बिठा ले, जैसे दीवार के पीछे। फिर जाके जज को बता। या फिर उसको ड्रिंक पिला के बात निकल, किसी सुनसान जगह पे ले जाके।
Sutra 39
रहसि वृद्धो व्याधितो वा वैदेहकः कश्चित्कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत् ॥ कZ_०३.१२.३९ ॥
कोई बुड्डा आदमी, या बीमार आदमी, या कोई फिरकी दुकान वाला, कोई भी हो, अगर वो चुप-चाप किसी चीज़ को तुम्हारे हाथ में दे के चले जाए, तो वो ठीक है। चीज़ पे निशानी होगी, उससे पहचानना।
Sutra 40
तस्य प्रतिदेशेन पुत्रो भ्राता वाभिगम्य निक्षेपं याचेत ॥ कZ_०३.१२.४० ॥
उसकी तरफ से खींच के, बेटा या भाई जा सकता है। वो रखा हुआ माल वापस माँग सकता है।
Sutra 41
दाने शुचिः अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१२.४१ ॥
अगर वो माल वापस दे दे, तो उसका काम साफ हो जाता है। अगर नहीं दे, तो वो माल वापस करेगा और चोरी करने वाले की सज़ा भी देगा।
Sutra 42
प्रव्रज्याभिमुखो वा श्रद्धेयः कश्चित्कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्य प्रतिष्ठेत ॥ कZ_०३.१२.४२ ॥
या फिर कोई भरोसे वाला आदमी, जो संन्यासी बन के जाना चाहता है, उसके पास अपना निशानी वाला माल रख सकता है। फिर वो चला जाता है।
Sutra 43
ततः कालान्तरागतो याचेत ॥ कZ_०३.१२.४३ ॥
फिर जब वो कुछ टाइम बाद वापस आता है, तो वो अपना माल माँग सकता है।
Sutra 44
दाने शुचिः अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१२.४४ ॥
अगर वो माल वापस दे दे, तो उसका काम साफ हो जाता है। अगर नहीं दे, तो वो माल वापस करेगा और चोरी करने वाले की सज़ा भी देगा।
Sutra 45
कृतलक्षणेन वा द्रव्येण प्रत्यानयेदेनम् ॥ कZ_०३.१२.४५ ॥
या तो उस्से वापस लाया जाए, वो चीज़ जिसमें पहचाने का निशान हो।
Sutra 46
बालिशजातीयो वा रात्रौ राजदायिकाक्षणभीतः सारमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत् ॥ कZ_०३.१२.४६ ॥
कभी-कभी कोई सीधा-सादा आदमी रात को डर जाता है। राजा के आदमी टैक्स लेने आए हैं, उस्से डर लगता है। वो अपना सामान किसी और के हाथ में दे के भाग जाता है।
Sutra 47
स एनं बन्धनागारगतो याचेत ॥ कZ_०३.१२.४७ ॥
फिर वो आदमी जेल में जाके माँग करे, मेरा सामान मेरे पास करो।
Sutra 48
दाने शुचिः अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१२.४८ ॥
अगर वो चीज़ वापस दे दे, तो उसका काम साफ़ हो जाता है। वरना उसको वो सामान वापस करना पड़ेगा, और चोरी की सज़ा भी देनी पड़ेगी।
Sutra 49
अभिज्ञानेन चास्य गृहे जनमुभयं याचेत ॥ कZ_०३.१२.४९ ॥
जब कोई केस आता है, पहले लोगों को पहचानना चाहिए। फिर दोनों तरफ के लोगों को बुलाया जाता है। जज उन सब को घर भी बुला सकता है। दोनों तरफ के लोगों को सामने लाना पड़ेगा।
Sutra 50
अन्यतर्तादाने यथोक्तं पुरस्तात् ॥ कZ_०३.१२.५० ॥
अगर किसी और को दिया जाये, जो पहले decide किया था उससे अलग, तो जो ऊपर बताया है वही follow करो।
Sutra 51
द्रव्यभोगानामागमं चास्यानुयुञ्जीत तस्य चार्थस्य व्यवहारोपलिङ्गनमभियोक्तुश्चार्थसामर्थ्यम् ॥ कZ_०३.१२.५१ ॥
उसके पास पैसा और सामान कहाँ से आया, यह पूछो। देखो कोई proof है कि सच में deal हुई या नहीं। और देखो जिसने case किया है, उसके पास पैसा है कि case चल सके।
Sutra 52
एतेन मिथःसमवायो व्याख्यातः ॥ कZ_०३.१२.५२ ॥
इससे यह भी समझ आ जाता है कि दो लोग मिल कर कुछ गलत कर रहे हैं।
Sutra 53
स्वे परे वा जने कार्यं देशकालाग्रवर्णतः ॥ कZ_०३.१२.५३च्द् ॥
इसलिए जो बात कहते हैं उसमे गवाह होन। सब कुछ साफ साफ होना चाहिए, कुछ छुप के नहीं।
Predictable custody and pledge law increases trust in deposits and credit, reduces retaliatory violence, keeps wealth circulating safely, and strengthens the taxable economy—thereby stabilizing the Treasury and internal order.
Key penalties include: (i) deposit-holder must pay appropriate usage-wage and a 12-paṇa fine; (ii) if loss arises from unauthorized enjoyment, restitution plus a 24-paṇa fine; (iii) for pledging/selling/spending entrusted property, aggravated punishment described as ‘fourfold and pañcabandha’ fine; (iv) for substitution or wrongful disposal, liability equal to value; (v) for refusing to return a present pledge, a 12-paṇa fine—while losses due to invasion, calamities, shipwreck/robbery, death, or incapacity are exempted.
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