
निर्वाण उपनिषद् (अथर्ववेद से संबद्ध) संन्यास-उपनिषदों में एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जो संन्यास को केवल बाह्य त्याग नहीं, बल्कि अहंकार, कर्तृत्व और आसक्ति के आन्तरिक विसर्जन के रूप में परिभाषित करता है। इसके 61 मंत्रों में वेदान्त का मूल प्रतिपादन है कि मोक्ष कोई उत्पन्न होने वाली अवस्था नहीं, बल्कि आत्मा-ब्रह्म की अभिन्नता का प्रत्यक्ष बोध है; बंधन अविद्या और अध्यास से उत्पन्न होता है। यह उपनिषद बाह्य चिह्नों—वस्त्र, दण्ड, भिक्षा-आचार—को गौण मानकर समत्व, निर्भयता, सत्य, करुणा और वैराग्य को संन्यासी की वास्तविक पहचान बताती है। साधना के स्तर पर श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा साक्षी-चैतन्य में स्थिरता और ‘मैं कर्ता नहीं’ की दृढ़ दृष्टि पर बल है। इस प्रकार यह ग्रंथ जीवन्मुक्ति और निर्वाण को इसी जीवन में उपलब्ध होने वाली आत्म-स्वरूप-निष्ठा के रूप में प्रस्तुत करता है।
Start ReadingSaṃnyāsa as inner renunciation: abandonment of ego, doership, and possessiveness rather than mere external withdrawal
Nirvāṇa as direct knowledge (jñāna) of Ātman = Brahman; liberation is recognition, not production
Critique of external marks: robes, staff, and ritual are secondary to realization and equanimity
Avidyā (ignorance) as the root of bondage; adhyāsa (superimposition) as the mechanism of suffering
The Self as self-luminous, actionless, untouched by guṇas; mind and body are objects to the witness (sākṣin)
Ethical foundations for the renunciate: non-violence, truthfulness, non-attachment, compassion, fearlessness
Jīvanmukti ideal: living in the world without clinging, like space—accommodating all, tainted by none
Contemplative discipline: śravaṇa–manana–nididhyāsana culminating in steady abidance in non-dual awareness
61 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। इसका विषय परमहंस है—“सोऽहम्” (मैं वही हूँ)। इसके अधिकारी परिव्राजक संन्यासी हैं; बाह्य-चिह्न ‘पश्चिम-लिङ्ग’ है। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त आकाश-तुल्य है; नदी अमृत की तरंगों से युक्त है। यह अक्षय और निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि है। देवता निर्वाण है। इसकी प्रवृत्ति निष्कुल—कुल-बंधन से परे—है; इसका ज्ञान निष्केवल, अद्वैत, परम ज्ञान है।
Moksha (Nirvāṇa) through non-dual knowledge (Advaita-jñāna) and renunciation (saṃnyāsa/paramahaṃsa)Verse 2
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। इसका विषय परमहंस है—“सोऽहम्” (मैं वही हूँ)। इसके अधिकारी परिव्राजक संन्यासी हैं; बाह्य-चिह्न ‘पश्चिम-लिङ्ग’ है। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त आकाश-तुल्य है; नदी अमृत की तरंगों से युक्त है। यह अक्षय और निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि है। देवता निर्वाण है। इसकी प्रवृत्ति निष्कुल—कुल-बंधन से परे—है; इसका ज्ञान निष्केवल, अद्वैत, परम ज्ञान है।
Atman-Brahman identity (so’ham) and renunciatory realization (paramahaṃsa)Verse 3
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। इसका विषय परमहंस है—“सोऽहम्” (मैं वही हूँ)। इसके अधिकारी परिव्राजक संन्यासी हैं; बाह्य-चिह्न ‘पश्चिम-लिङ्ग’ है। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त आकाश-तुल्य है; नदी अमृत की तरंगों से युक्त है। यह अक्षय और निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि है। देवता निर्वाण है। इसकी प्रवृत्ति निष्कुल—कुल-बंधन से परे—है; इसका ज्ञान निष्केवल, अद्वैत, परम ज्ञान है।
Brahman as akṣaya (imperishable) and nirañjana (stainless); nirvāṇa as the goal realized by so’ham-knowledgeVerse 4
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ कहलाते हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त ‘गगन-सिद्धान्त’ है और नदी ‘अमृत-तरंगिणी’ है। लक्ष्य अक्षय, निरञ्जन है। ऋषि ‘निःसंशय’ है। देवता निर्वाण है। प्रवृत्ति निष्कुल है और ज्ञान निष्केवल, अद्वैत-परम ज्ञान है॥
Moksha (Nirvāṇa) through non-dual knowledge (Advaita jñāna) and renunciation (saṃnyāsa/paramahaṃsa ideal)Verse 5
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ कहलाते हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त ‘गगन-सिद्धान्त’ है और नदी ‘अमृत-तरंगिणी’ है। लक्ष्य अक्षय, निरञ्जन है। ऋषि ‘निःसंशय’ है। देवता निर्वाण है। प्रवृत्ति निष्कुल है और ज्ञान निष्केवल, अद्वैत-परम ज्ञान है॥
Atman-Brahman identity expressed as Paramahaṃsa ‘so’ham’; Nirvāṇa as the realized stateVerse 6
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ कहलाते हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त ‘गगन-सिद्धान्त’ है और नदी ‘अमृत-तरंगिणी’ है। लक्ष्य अक्षय, निरञ्जन है। ऋषि ‘निःसंशय’ है। देवता निर्वाण है। प्रवृत्ति निष्कुल है और ज्ञान निष्केवल, अद्वैत-परम ज्ञान है॥
Kevala-jñāna (non-dual knowledge) as the means and mark of Nirvāṇa; renunciate transcendence of upādhisVerse 7
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ कहलाते हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त ‘गगन’ है और नदी अमृत-तरंगों वाली अमृतनदी है। यह अक्षय, निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि हैं। निर्वाण देवता है। प्रवृत्ति निष्कुल है और ज्ञान निष्केवल (अद्वैत) है।
Moksha (Nirvāṇa) through Paramahaṃsa/saṃnyāsa identity and niṣkevala (non-dual) jñānaVerse 8
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त ‘गगन’ है; नदी तरंगित अमृतनदी है। यह अक्षय और निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि हैं। निर्वाण देवता है। प्रवृत्ति निष्कुल है; ज्ञान निष्केवल/अद्वैत है।
Atman-Brahman identity expressed as so’ham; renunciant path to NirvāṇaVerse 9
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी ‘पश्चिम-लिङ्ग’ हैं। मन्मथ इस क्षेत्र का पालक है। सिद्धान्त ‘गगन’ है; नदी तरंगों से उमड़ती अमृतनदी है। यह अक्षय, निरञ्जन है। निःसंशय ऋषि हैं। निर्वाण देवता है। प्रवृत्ति निष्कुल है; ज्ञान अद्वैत (निष्केवल) है।
Nirañjana (stainless) ātman and Nirvāṇa as the culmination of saṃnyāsa and jñānaVerse 10
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं वही परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी इसके ‘पश्चिम’ लिंग/चिह्न हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त गगन-आश्रित है और नदी अमृत-तरंगों की धारा है। लक्ष्य अक्षय, निरञ्जन है। ऋषि ‘निःसंशय’ है। देवता ‘निर्वाण’ है। इसकी प्रवृत्ति निष्कुल—कुल-बंधन से परे—है। इसका ज्ञान निष्केवल, अद्वैत है।
Moksha (Nirvana) through non-dual knowledge (Advaita-jñāna) and renunciation (saṃnyāsa/paramahaṃsa)Verse 11
अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः । परमहंसः सोऽहम् । परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः । मन्मथः क्षेत्रपालः । गगनसिद्धान्तः अमृतकल्लोलनदी । अक्षयं निरञ्जनम् । निःसंशय ऋषिः । निर्वाणो देवता । निष्कुलप्रवृत्तिः ...
अब हम निर्वाणोपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। “मैं वही परमहंस हूँ।” परिव्राजक संन्यासी इसके ‘पश्चिम’ लिंग/चिह्न हैं। मन्मथ क्षेत्रपाल है। सिद्धान्त गगन-आश्रित है और नदी अमृत-तरंगों की धारा है। लक्ष्य अक्षय, निरञ्जन है। ऋषि ‘निःसंशय’ है। देवता ‘निर्वाण’ है। इसकी प्रवृत्ति निष्कुल—कुल-बंधन से परे—है। इसका ज्ञान निष्केवल, अद्वैत है।
Atman-Brahman identity (So’ham) and renunciant realization (paramahaṃsa)Verse 12
ऊर्ध्वाम्नायः । निरालम्बपीठः । संयोगदीक्षा । वियोगोपदेशः । दीक्षासन्तोषपानं च । द्वादशादित्यावलोकनम् । विवेकरक्षा । करुणैव केलिः । आनन्दमाला । एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी । अकल्पितभिक्षाशी । हंसाच...
ऊर्ध्वाम्नाय—ऊर्ध्व मार्ग की परम्परा। निरालम्बपीठ—आश्रयरहित पवित्र आसन। संयोगदीक्षा—एकत्व का दीक्षा-प्रवेश; वियोगोपदेश—वैराग्य/वियुक्ति का उपदेश। दीक्षा के रूप में संतोष-पान। द्वादश आदित्यों का अवलोकन—बारह सूर्य-तत्त्वों का ध्यान। विवेक द्वारा रक्षा। करुणा ही क्रीड़ा है। आनन्द की माला। एकान्त गुहा में मुक्ति-आसन के सुख की सत्संग-गोष्ठी। अकल्पित भिक्षा का सेवन—जो सहज मिले वही। हंसाचार—हंसवत् आचरण। यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Sādhana for Moksha: viveka-vairāgya, inner renunciation, and recognition of the indwelling Self (antarātman)Verse 13
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
(ये लक्षण/व्रत हैं:) ऊर्ध्वाम्नाय, निरालम्ब पीठ, संयोग-दीक्षा, वियोग/वैराग्य का उपदेश, दीक्षा-संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का अवलोकन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनंद की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन की सुखद गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा का आहार; हंस-आचार; तथा यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Moksha (jīvanmukti) through viveka-vairāgya; Haṃsa (Paramahaṃsa) as inner Self (Ātman/Brahman) present in all beingsVerse 14
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
(ये लक्षण/व्रत हैं:) ऊर्ध्वाम्नाय, निरालम्ब पीठ, संयोग-दीक्षा, वियोग/वैराग्य का उपदेश, दीक्षा-संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का अवलोकन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनंद की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन की सुखद गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा का आहार; हंस-आचार; तथा यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Jīvanmukti; Ātman as immanent Brahman (sarvabhūtāntarvartin)Verse 15
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
(ये लक्षण/व्रत हैं:) ऊर्ध्वाम्नाय, निरालम्ब पीठ, संयोग-दीक्षा, वियोग/वैराग्य का उपदेश, दीक्षा-संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का अवलोकन; विवेक द्वारा रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनंद की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन की सुखद सभा; अकल्पित/अकृत्रिम भिक्षा का आहार; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Ātman/Brahman non-duality expressed as the ‘Haṃsa within all beings’; renunciate freedom (nirvāṇa/jīvanmukti)Verse 16
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
[उसकी विशेषताएँ हैं:] ऊर्ध्वाम्नाय (ऊर्ध्व परम्परा), निरालम्ब पीठ (आश्रयरहित आसन), संयोग-दीक्षा, वियोग/वैराग्य का उपदेश, तथा दीक्षा-रूप संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का अवलोकन, विवेक की रक्षा, करुणा ही क्रीड़ा, आनंद की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के सुख की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा पर निर्वाह; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर वास करता है।
Moksha (jīvanmukti) through viveka-vairāgya; Haṃsa as inner Ātman/BrahmanVerse 17
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
[उसकी पहचान:] ऊर्ध्वाम्नाय, निरालम्ब पीठ, संयोग-दीक्षा, वियोग/वैराग्य का उपदेश, और दीक्षा-रूप संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का अवलोकन, विवेक की रक्षा, करुणा ही क्रीड़ा, आनंदमाला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के सुख की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा से जीवन; हंस-आचार; तथा यह सिद्धान्त कि हंस सभी प्राणियों के भीतर स्थित है।
Ātman as sarvabhūtāntarvartin (indweller) and the marks of the liberated asceticVerse 18
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
ऊर्ध्व परम्परा; आश्रयरहित आसन; संयोग की दीक्षा; वैराग्य का उपदेश; और दीक्षा के रूप में संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का ध्यान; विवेक की सुरक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनंद की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के आनंद की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा पर निर्वाह; हंस-आचार; तथा यह प्रतिपादन कि हंस सभी भूतों के भीतर निवास करता है।
Nondual indwelling Self (Ātman/Brahman) and the discipline of renunciationVerse 19
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशावदित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभ...
ऊर्ध्वाम्नाय यह है—आश्रयरहित पीठ; संयोग की दीक्षा; वियोग अर्थात् वैराग्य का उपदेश; दीक्षा-सन्तोष का पान; आदित्य का द्वादशरूप दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन-सुख की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा का आहार; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Moksha (jīvanmukti) through viveka-vairāgya and recognition of the inner Haṃsa (Ātman) in all beingsVerse 20
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशावदित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभ...
ऊर्ध्वाम्नाय यह है—आश्रयरहित पीठ; संयोग की दीक्षा; वियोग अर्थात् वैराग्य का उपदेश; दीक्षा-सन्तोष का पान; आदित्य का द्वादशरूप दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन-सुख की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा का आहार; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Moksha (jīvanmukti) through viveka-vairāgya and recognition of the inner Haṃsa (Ātman) in all beingsVerse 21
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशावदित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभ...
ऊर्ध्वाम्नाय यह है—आश्रयरहित पीठ; संयोग की दीक्षा; वियोग अर्थात् वैराग्य का उपदेश; दीक्षा-सन्तोष का पान; आदित्य का द्वादशरूप दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन-सुख की गोष्ठी; अकल्पित भिक्षा का आहार; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Sarvātmabhāva (the Self as all) culminating in moksha/jīvanmukti; paramahaṃsa idealVerse 22
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
ऊर्ध्वाम्नाय—ऊर्ध्वमार्ग की परम्परा; निरालम्बपीठ—आश्रयरहित ब्रह्मनिष्ठ आसन; संयोगदीक्षा—आत्मा-ब्रह्म के ऐक्य में दीक्षा; वियोगोपदेश—वैराग्य/वियुक्ति का उपदेश; दीक्षा-रूप संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का ध्यान-दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के सुख की सत्संग-गोष्ठी; अकल्पित (अयत्न-प्राप्त) भिक्षा खाने वाला; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस (परमात्मा) सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Moksha (liberation) through viveka-vairāgya and recognition of the inner Haṃsa/Ātman as all-pervading indwellerVerse 23
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
ऊर्ध्वाम्नाय—ऊर्ध्वमार्ग की परम्परा; निरालम्बपीठ—आश्रयरहित ब्रह्मनिष्ठ आसन; संयोगदीक्षा—आत्मा-ब्रह्म के ऐक्य में दीक्षा; वियोगोपदेश—वैराग्य/वियुक्ति का उपदेश; दीक्षा-रूप संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का ध्यान-दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के सुख की सत्संग-गोष्ठी; अकल्पित (अयत्न-प्राप्त) भिक्षा खाने वाला; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस (परमात्मा) सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Ātman as antaryāmin (inner dweller) and the saṃnyāsa discipline that supports realizationVerse 24
ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासन्तोषपानं च। द्वादशादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसुखगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभू...
ऊर्ध्वाम्नाय—ऊर्ध्वमार्ग की परम्परा; निरालम्बपीठ—आश्रयरहित ब्रह्मनिष्ठ आसन; संयोगदीक्षा—आत्मा-ब्रह्म के ऐक्य में दीक्षा; वियोगोपदेश—वैराग्य/वियुक्ति का उपदेश; दीक्षा-रूप संतोष का पान; द्वादश आदित्यों का ध्यान-दर्शन; विवेक की रक्षा; करुणा ही क्रीड़ा; आनन्द की माला; एकान्त गुहा में मुक्तासन के सुख की सत्संग-गोष्ठी; अकल्पित (अयत्न-प्राप्त) भिक्षा खाने वाला; हंस-आचार; और यह प्रतिपादन कि हंस (परमात्मा) सर्वभूतों के भीतर निवास करता है।
Brahman/Ātman immanence (sarvabhūtāntarvartitva) and the paramahaṃsa idealVerse 25
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीन वैराग्य ही कौपीन है, और विवेक ही दण्ड है। ब्रह्मावलोकन योग-पट्ट है, श्री (समृद्धि) पादुका है, और चलना परम की इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का संयम ही बन्ध है। परम निन्दा-कलंक से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है; वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ और मेघ-गज के समान। देह आदि का संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु-सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य और सिद्ध योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वस्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वसंविति। अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड ध्यान का विषय है।
Moksha (jīvanmukti) through viveka; Brahman beyond guṇas; jagat as māyā/adhyāsa (rope-snake)Verse 26
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीन वैराग्य ही कौपीन है, और विवेक ही दण्ड है। ब्रह्मावलोकन योग-पट्ट है, श्री (समृद्धि) पादुका है, और चलना परम की इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का संयम ही बन्ध है। परम निन्दा-कलंक से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है; वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ और मेघ-गज के समान। देह आदि का संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु-सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य और सिद्ध योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वस्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वसंविति। अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड ध्यान का विषय है।
Brahman/Ātman as self-awareness (saṃvit); māyā/adhyāsa; jīvanmuktiVerse 27
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीन वैराग्य ही कौपीन है, और विवेक ही दण्ड है। ब्रह्मावलोकन योग-पट्ट है, श्री (समृद्धि) पादुका है, और चलना परम की इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का संयम ही बन्ध है। परम निन्दा-कलंक से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है; वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ और मेघ-गज के समान। देह आदि का संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु-सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य और सिद्ध योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वस्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वसंविति। अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड ध्यान का विषय है।
Brahman as sat-cit (sattā/saṃvit) and the sublation of vikāra (change) through knowledgeVerse 28
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन; विचार दण्ड है, ब्रह्मावलोकन-योग पट्टा; श्री पादुका है, परेच्छा का अनुसरण ही आचरण; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। निन्दा-प्रतिनिन्दा से मुक्त वह जीवन्मुक्त है; शिव-योगनिद्रा और खेचरी-मुद्रा में स्थित। वह परमानन्द में प्रतिष्ठित, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान; देहादि संघात भी मोह-गुणजाल से बुना, रज्जु-सर्पवत् कल्पित है। लक्ष्य वही है जो विष्णु, विद्या आदि सैकड़ों नामों से अभिहित है; अङ्कुश मार्ग है, ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है; सत्य-सिद्धि का योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वप्रकाश संवित्। अजपा ही गायत्री है; विकार-निवारक दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Mokṣa through viveka-vairāgya; Brahman/Ātman as self-luminous consciousness; māyā as rope-snake projection; jīvanmukti; nirguṇatva (beyond the three guṇas)Verse 29
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन; विचार दण्ड है, ब्रह्मावलोकन-योग पट्टा; श्री पादुका है, परेच्छा का अनुसरण ही आचरण; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। निन्दा-प्रतिनिन्दा से मुक्त वह जीवन्मुक्त है; शिव-योगनिद्रा और खेचरी-मुद्रा में स्थित। वह परमानन्द में प्रतिष्ठित, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान; देहादि संघात भी मोह-गुणजाल से बुना, रज्जु-सर्पवत् कल्पित है। लक्ष्य वही है जो विष्णु, विद्या आदि सैकड़ों नामों से अभिहित है; अङ्कुश मार्ग है, ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है; सत्य-सिद्धि का योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वप्रकाश संवित्। अजपा ही गायत्री है; विकार-निवारक दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Jīvanmukti; adhyāsa (rope-snake); nirguṇa Brahman as self-awareness; inner saṃnyāsaVerse 30
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन; विचार दण्ड है, ब्रह्मावलोकन-योग पट्टा; श्री पादुका है, परेच्छा का अनुसरण ही आचरण; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। निन्दा-प्रतिनिन्दा से मुक्त वह जीवन्मुक्त है; शिव-योगनिद्रा और खेचरी-मुद्रा में स्थित। वह परमानन्द में प्रतिष्ठित, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान; देहादि संघात भी मोह-गुणजाल से बुना, रज्जु-सर्पवत् कल्पित है। लक्ष्य वही है जो विष्णु, विद्या आदि सैकड़ों नामों से अभिहित है; अङ्कुश मार्ग है, ‘शून्य’ संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है; सत्य-सिद्धि का योग ही मठ है। अमर पद उसका स्वरूप है—आदि ब्रह्म की स्वप्रकाश संवित्। अजपा ही गायत्री है; विकार-निवारक दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Nondual Brahman as self-awareness; māyā/adhyāsa; jīvanmukti; inner renunciation; transcendence of guṇasVerse 31
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन है, और विचार दण्ड है। ब्रह्म-दर्शन योगपट्ट है, श्री पादुका है, और आचरण परम-इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का बन्धन (संयम/उत्थान) है; पर-अपवाद से मुक्त साधक जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है। वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अङ्कुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है; उसका स्वरूप अमर पद है। आदिब्रह्म की स्वसंवित् है; अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड का ध्यान (अतिक्रमण हेतु) करना चाहिए।
Jīvanmukti; Brahman beyond guṇas; Māyā/adhyāsa (rope-snake); viveka as meansVerse 32
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन है, और विचार दण्ड है। ब्रह्म-दर्शन योगपट्ट है, श्री पादुका है, और आचरण परम-इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का बन्धन (संयम/उत्थान) है; पर-अपवाद से मुक्त साधक जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है। वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अङ्कुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है; उसका स्वरूप अमर पद है। आदिब्रह्म की स्वसंवित् है; अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड का ध्यान (अतिक्रमण हेतु) करना चाहिए।
Internalized saṃnyāsa; Brahman-realization; jagat as anitya and adhyāsaVerse 33
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता कौपीन है, और विचार दण्ड है। ब्रह्म-दर्शन योगपट्ट है, श्री पादुका है, और आचरण परम-इच्छा के अनुसार है। कुण्डलिनी का बन्धन (संयम/उत्थान) है; पर-अपवाद से मुक्त साधक जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा और खेचरी-मुद्रा है। वह परमानन्दी, त्रिगुणातीत, विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे है। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-हाथी आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अङ्कुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही तत्त्व है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है; उसका स्वरूप अमर पद है। आदिब्रह्म की स्वसंवित् है; अजपा ही गायत्री है; विकार-दण्ड का ध्यान (अतिक्रमण हेतु) करना चाहिए।
Brahman as self-luminous awareness; negation of nāma-rūpa; jīvanmuktiVerse 34
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता ही कौपीन; विचार ही दण्ड है; ब्रह्म-दर्शन ही योग-पट्ट है; श्री (समृद्धि) ही पादुका है; आचरण परम-इच्छा के अनुसार है; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। परम निन्दा/दोषारोप से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा भी है और खेचरी-मुद्रा भी। वह परम आनन्दी है, त्रिगुणातीत—विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-गज आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है। वही स्वरूप अमर पद है। वही आदिब्रह्म की स्वसंविति है। अजपा ही गायत्री है। विकार-दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Jīvanmukti; Māyā/adhyāsa (rope-snake); Nirguṇa Brahman beyond guṇas; VivekaVerse 35
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता ही कौपीन; विचार ही दण्ड है; ब्रह्म-दर्शन ही योग-पट्ट है; श्री (समृद्धि) ही पादुका है; आचरण परम-इच्छा के अनुसार है; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। परम निन्दा/दोषारोप से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा भी है और खेचरी-मुद्रा भी। वह परम आनन्दी है, त्रिगुणातीत—विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-गज आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है। वही स्वरूप अमर पद है। वही आदिब्रह्म की स्वसंविति है। अजपा ही गायत्री है। विकार-दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Brahman as self-awareness (sva-saṃvit); Guṇātīta; Avidyā/adhyāsa; JīvanmuktiVerse 36
धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गतगुणत्रयम्। विवेकलभ्...
धैर्य ही कन्था है, उदासीनता ही कौपीन; विचार ही दण्ड है; ब्रह्म-दर्शन ही योग-पट्ट है; श्री (समृद्धि) ही पादुका है; आचरण परम-इच्छा के अनुसार है; कुण्डलिनी-बन्ध ही संयम है। परम निन्दा/दोषारोप से मुक्त वही जीवन्मुक्त है। शिव-योग की निद्रा भी है और खेचरी-मुद्रा भी। वह परम आनन्दी है, त्रिगुणातीत—विवेक से प्राप्त, मन-वाणी से परे। उत्पन्न जगत अनित्य है—स्वप्न-जगत, मेघ-गज आदि के समान। देहादि संघात भी मोह-गुणों के जाल से बुना हुआ, रज्जु में सर्प की भाँति कल्पित है। लक्ष्य वही है जिसे ‘विष्णु’, ‘विद्या’ आदि सैकड़ों नामों से कहा गया है। अंकुश मार्ग है; शून्य संकेत नहीं। परमेश्वर की सत्ता ही सत्य है। सत्य-सिद्ध योग ही मठ है। वही स्वरूप अमर पद है। वही आदिब्रह्म की स्वसंविति है। अजपा ही गायत्री है। विकार-दण्ड का ध्यान करना चाहिए।
Neti-neti style negation culminating in Brahman as self-luminous consciousness; Jīvanmukti; GuṇātītaVerse 37
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को रोकने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द-भिक्षा पर जीने वाला। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान, आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था; शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा; उन्मनी की गति। निर्मल देह; निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया; श्वेत, शुद्ध आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और पात्र की कुशलता। परा-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत, सदा-आनन्द है।
Moksha (liberation) through Advaita-realization; unmanī (mind-transcendence) and sadānanda-svarūpa (ever-blissful Self)Verse 38
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को रोकने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द-भिक्षा पर जीने वाला। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान, आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था; शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा; उन्मनी की गति। निर्मल देह; निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया; श्वेत, शुद्ध आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और पात्र की कुशलता। परा-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत, सदा-आनन्द है।
Advaita Brahman/Ātman as ever-bliss; sādhana (śama-dama) and yogic unmanī as supports to liberationVerse 39
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को रोकने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द-भिक्षा पर जीने वाला। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान, आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था; शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा; उन्मनी की गति। निर्मल देह; निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया; श्वेत, शुद्ध आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और पात्र की कुशलता। परा-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत, सदा-आनन्द है।
Jīvanmukti (liberation while living) characterized by mind-restraint, purity, and non-dual blissVerse 40
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को निरुद्ध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में निवास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी की गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया। पाण्डुर गगन। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र-पात्र की कुशलता। पर-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है॥
Moksha (jīvanmukti) through Advaita-realization and mind-transcendence (unmanī)Verse 41
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को निरुद्ध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में निवास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी की गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया। पाण्डुर गगन। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र-पात्र की कुशलता। पर-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है॥
Brahman-Atman identity expressed as advaita-sadānanda; sādhanā culminating in unmanīVerse 42
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन को निरुद्ध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में निवास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी की गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों जैसी आनन्द-क्रिया। पाण्डुर आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के अभ्यास में क्षेत्र-पात्र के प्रति कुशलता। पर-अपरा का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है॥
Advaita (nonduality) and ananda as Brahman’s svarūpa; sādhanā-lakṣaṇa of the liberated sageVerse 43
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा पर जीवन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी की गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों की आनन्द-क्रिया। श्वेत आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और पात्र की कुशलता। पर और अपर का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है।
Moksha (jīvanmukti) through mano-nirodha culminating in Advaita-sadānanda (non-dual bliss)Verse 44
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा पर जीवन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी की गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों की आनन्द-क्रिया। श्वेत आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और पात्र की कुशलता। पर और अपर का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है।
Advaita realization expressed through yogic mano-nirodha and unmanīVerse 45
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग के द्वारा सदा-आनन्दस्वरूप का साक्षात् दर्शन। आनंद की भिक्षा से पोषण। महाश्मशान में भी आनंदवन में निवास। एकान्तता। आनंद का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा की चेष्टा। उन्मनी का प्रवाह। निष्कलंक देह। निरालम्ब पीठ। अमृत-लहरियों की आनंदमयी क्रिया। धवल आकाश। महा-सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के अनुष्ठान में क्षेत्र-पात्र की निपुणता। पर और अपर का योग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदानन्द है।
Ātman-Brahman non-duality (Advaita) as ever-present bliss realized via yogic stillnessVerse 46
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा। उन्मनी की ओर गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों की आनन्दमयी क्रिया। पाण्डुर आकाश। महान सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र-पात्र की कुशलता। पर और अपर का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है।
Moksha (liberation) through Advaita-realization and mind-transcendence (unmanī)Verse 47
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा। उन्मनी की ओर गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों की आनन्दमयी क्रिया। पाण्डुर आकाश। महान सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र-पात्र की कुशलता। पर और अपर का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है।
Advaita Brahman as Sadānanda (ever-bliss) realized through mind-restraintVerse 48
मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशानेऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलान...
मन का निरोध करने वाली कन्था। योग से सदा-आनन्दस्वरूप का दर्शन। आनन्द की भिक्षा से जीवन-यापन। महाश्मशान में भी आनन्दवन में वास। एकान्त स्थान। आनन्द का मठ। उन्मनी अवस्था। शारदा (प्रज्ञा) की चेष्टा। उन्मनी की ओर गति। निर्मल देह। निरालम्ब आसन। अमृत-तरंगों की आनन्दमयी क्रिया। पाण्डुर आकाश। महान सिद्धान्त। शम-दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र-पात्र की कुशलता। पर और अपर का संयोग। तारक उपदेश। देवता अद्वैत सदा-आनन्द है।
Brahman/Ātman as Advaita-Sadānanda (non-dual ever-bliss)Verse 49
नियमः स्वात्मेन्द्रियनिग्रहः। भयमोहशोकक्रोधत्यागस्त्यागः। अनियामकत्वनिर्मलशक्तिः। स्वप्रकाशब्रह्मतत्त्वे शिवशक्तिसम्पुटितप्रपञ्चच्छेदनम्। तथा पत्राक्षाक्षिकमण्डलुः। भवाभावदहनम्। बिभ्रत्याकाशाधारम्। शि...
‘नियम’ अपने आत्मा और इन्द्रियों का संयम है। ‘त्याग’ भय, मोह, शोक और क्रोध का परित्याग है। बाह्य विधियों से अनियंत्रित रहने की निर्मल शक्ति ही नियम है। स्वप्रकाश ब्रह्म-तत्त्व में, शिव-शक्ति से आवृत होकर, प्रपञ्च का छेदन—यही नियम है। मण्डलु नेत्रों के पत्र-सम (पंखुड़ी-जैसे) मण्डल के समान है। भाव और अभाव का दहन, आकाश-आधार का धारण भी नियम है। यज्ञोपवीत शिव—तुरीय है; शिखा ‘तत्’ में लय है; त्यक्त दण्ड चिन्मय है। सतत मण्डलु अखण्ड जागरूकता है; कन्था कर्म का निर्मूलन है; माया, ममता और अहंकार का दहन नियम है। श्मशान में देह अनाहत है; ‘समय’ त्रिगुणातीत स्वरूप का अनुसंधान है; भ्रान्ति-हरण और कामादि वृत्तियों का दहन भी नियम है। कौपीन कठोरता और दृढ़ता है; चीर और अजिन में वास है। मंत्र अनाहत है, और अक्रिया से ही आस्वादित होता है। स्वेच्छाचार रूप स्वभाव ही मोक्ष है—परब्रह्म; आचरण नौका के समान है। ब्रह्मचर्य से शान्ति का संग्रह; ब्रह्मचर्य-आश्रम में अध्ययन कर, सर्व-संवित्-न्यास रूप संन्यास; अंत में अखण्डाकार ब्रह्म में स्थिति और नित्य सब संदेहों का नाश।
Saṃnyāsa as inner renunciation; Turīya/Brahman as the true sacred thread; destruction of māyā and ahaṅkāra; nistrai-guṇya (beyond the guṇas)Verse 50
नियमः स्वात्मेन्द्रियनिग्रहः। भयमोहशोकक्रोधत्यागस्त्यागः। अनियामकत्वनिर्मलशक्तिः। स्वप्रकाशब्रह्मतत्त्वे शिवशक्तिसम्पुटितप्रपञ्चच्छेदनम्। तथा पत्राक्षाक्षिकमण्डलुः। भवाभावदहनम्। बिभ्रत्याकाशाधारम्। शि...
‘नियम’ अपने आत्मा और इन्द्रियों का संयम है। ‘त्याग’ भय, मोह, शोक और क्रोध का परित्याग है। बाह्य विधियों से अनियंत्रित रहने की निर्मल शक्ति ही नियम है। स्वप्रकाश ब्रह्म-तत्त्व में, शिव-शक्ति से आवृत होकर, प्रपञ्च का छेदन—यही नियम है। मण्डलु नेत्रों के पत्र-सम (पंखुड़ी-जैसे) मण्डल के समान है। भाव और अभाव का दहन, आकाश-आधार का धारण भी नियम है। यज्ञोपवीत शिव—तुरीय है; शिखा ‘तत्’ में लय है; त्यक्त दण्ड चिन्मय है। सतत मण्डलु अखण्ड जागरूकता है; कन्था कर्म का निर्मूलन है; माया, ममता और अहंकार का दहन नियम है। श्मशान में देह अनाहत है; ‘समय’ त्रिगुणातीत स्वरूप का अनुसंधान है; भ्रान्ति-हरण और कामादि वृत्तियों का दहन भी नियम है। कौपीन कठोरता और दृढ़ता है; चीर और अजिन में वास है। मंत्र अनाहत है, और अक्रिया से ही आस्वादित होता है। स्वेच्छाचार रूप स्वभाव ही मोक्ष है—परब्रह्म; आचरण नौका के समान है। ब्रह्मचर्य से शान्ति का संग्रह; ब्रह्मचर्य-आश्रम में अध्ययन कर, सर्व-संवित्-न्यास रूप संन्यास; अंत में अखण्डाकार ब्रह्म में स्थिति और नित्य सब संदेहों का नाश।
Inner saṃnyāsa and akartṛtva (non-doership) culminating in Brahman-realizationAnswers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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