
पैंगला उपनिषद (यजुर्वेद-परंपरा से संबद्ध) उत्तरकालीन उपनिषदों में एक संक्षिप्त अद्वैत-वेदांत ग्रंथ है, जो संन्यास और ज्ञान को मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन मानकर व्यवस्थित रूप से समझाता है। इसका केंद्रीय प्रतिपादन है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं; देह-मन-बुद्धि में ‘मैं’ का आरोप (अध्यास) अविद्या से होता है और उसका नाश केवल ज्ञान से होता है। इसलिए मोक्ष कर्म से ‘उत्पन्न’ नहीं होता, बल्कि सत्य का बोध होने पर प्रकट होता है। उपनिषद त्रि-अवस्था (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और पंचकोश-विवेक के माध्यम से दिखाती है कि अनुभव के सभी विषय—स्थूल और सूक्ष्म—अनात्मा हैं, जबकि साक्षी-चैतन्य अपरिवर्तित रहता है। ‘नेति-नेति’ की निषेध-पद्धति से साधक शरीर-मन की पहचान छोड़कर आत्मस्वरूप में स्थित होता है। यह ग्रंथ संन्यास को केवल बाह्य वेश नहीं, बल्कि कर्तृत्व-भोक्तृत्व और स्वामित्व-अहंकार का त्याग बताता है। विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति और मुमुक्षुत्व जैसी योग्यताओं के साथ गुरु के उपदेश में श्रवण-मनन-निदिध्यासन करने पर अपरोक्ष ज्ञान होता है—और वही अद्वैत शांति मोक्ष है।
Start Reading- **Ātman–Brahman identity:** the innermost Self is non-different from brahman
the absolute reality.
- **Avidyā as bondage:** ignorance causes superimposition of body–mind attributes on the Self.
- **Neti-neti / negation:** systematic negation of non-Self reveals the self-luminous witness (sākṣin).
- **Three states analysis:** waking
dream
and deep sleep are transient; the witnessing consciousness is constant.
- **Pañcakośa discrimination:** the five sheaths are objects known to the Self and therefore not the Self.
- **Mokṣa through jñāna:** liberation is not an effect of ritual action but the removal of ignorance by knowledge.
- **Saṃnyāsa as inner renunciation:** abandonment of doership
possessiveness
and ego—not merely external symbols.
- **Śravaṇa–manana–nididhyāsana:** disciplined inquiry under a guru leading to firm abidance in non-duality.
- **Sādhana-catuṣṭaya:** viveka
vairāgya
ṣaṭ-sampatti
and mumukṣutva as prerequisites for realization.
This Upanishad is organized into 4 adhyayas.
पैंगला बारह वर्ष की सेवा-श्रवण के बाद याज्ञवल्क्य से कैवल्य (मोक्ष) का परम रहस्य पूछता है। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि आदि में केवल ‘सत्’ था—नित्य मुक्त, निर्विकार, सत्य-ज्ञान-आनन्दस्वरूप, पूर्ण और अद्वितीय ब्रह्म। फिर वे समझाते हैं कि जगत की बहुलता माया/मूलप्रकृति के कारण प्रतीत होती है, जैसे मृगतृष्णा में जल या शुक्ति में रजत का भ्रम। त्रिगुणात्मक, अनिर्वचनीय प्रकृति में प्रतिबिम्बित चेतना ‘साक्षी’ कहलाती है। सत्त्व-प्रधान अवस्था में आवरण-शक्ति से अव्यक्त बनता है और उसमें प्रतिबिम्बित चेतना ‘ईश्वर’—सर्वज्ञ, सृष्टि-स्थिति-लय का कारण—कही जाती है। रजस्-प्रधान अवस्था में विक्षेप-शक्ति से ‘महत्’ प्रकट होता है और उसमें प्रतिबिम्बित चेतना ‘हिरण्यगर्भ’ के रूप में सूक्ष्म समष्टि मानी जाती है; पर लक्ष्य यही है कि सत्यतः अद्वैत ब्रह्म ही है।
पैंगला ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं कि जो ईश्वर समस्त लोकों की सृष्टि‑स्थिति‑लय करता है, वही ‘जीवत्व’ कैसे प्राप्त करता है। याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं कि जीव और ईश्वर का स्वरूप समझने के लिए स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन शरीरों की उत्पत्ति और भेद का विवेक करना होगा। वे शिष्य से एकाग्र होकर सुनने को कहते हैं और विश्लेषण की पद्धति से विषय खोलते हैं। ईश्वर पंचीकृत महाभूतों के अंश लेकर समष्टि‑व्यष्टि रूप से स्थूल शरीरों की रचना करता है; यह शरीर आत्मा नहीं, बल्कि बना हुआ और नश्वर उपकरण है। फिर अपंचीकृत सूक्ष्म भूतों के रजोगुणांश से प्राण की उत्पत्ति बताई जाती है—प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनंजय जैसे उपप्राण और उनके स्थान। इसके बाद पाँच कोशों का निरूपण है: अन्नमय (स्थूल शरीर), प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय (सूक्ष्म शरीर के पक्ष), और आनन्दमय (कारण आवरण)। अंत में इन्द्रियाँ, प्राण, पंचभूत और अन्तःकरण‑चतुष्टय आदि को ‘अष्टपुर’ के रूप में समेटकर दिखाया जाता है। निष्कर्ष यह कि उपाधियों के कारण जीवत्व प्रतीत होता है; मूल चैतन्य एक ही है, जिसे कोश‑विवेक से पहचाना जाता है।
इस अध्याय में पैङ्गल ऋषि याज्ञवल्क्य से महावाक्यों का स्पष्ट विवेचन पूछते हैं। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि ‘तत्त्वमसि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ आदि वाक्यों के अर्थ का निरन्तर अनुसन्धान करना चाहिए। ‘तत्’ पद माया-उपाधि सहित सर्वज्ञ, जगत्-कारण सच्चिदानन्द ब्रह्म को सूचित करता है और ‘त्वम्’ पद अन्तःकरण से सम्बद्ध ‘मैं’ प्रत्यय में प्रतिबिम्बित चैतन्य को। दोनों ओर की उपाधियाँ (माया/अविद्या) छोड़ देने पर शुद्ध चैतन्य की अद्वैत एकता ही वाक्यार्थ बनती है। श्रवण वाक्यार्थ-विचार है, मनन शंकानिवारण, और निदिध्यासन निःसंदेह सत्य में चित्त की एकतानता; इसमें ध्याता-ध्यान का भेद भी त्यागा जाता है। अभ्यास परिपक्व होने पर संचित कर्म क्षीण होते हैं, ‘अमृतधारा’ जैसी शान्ति-आनन्द की अनुभूति बढ़ती है और अंततः धर्ममेघ समाधि में अविद्या के अवशेष भी धुल जाते हैं।
इस अध्याय में पैङ्गल याज्ञवल्क्य से पूछते हैं—ज्ञानी का कर्म क्या है और उसकी स्थिर अवस्था कैसी है। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि ज्ञानी का वास्तविक “कर्म” बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि अमानित्व आदि गुणों से युक्त अंतःशुद्धि और ज्ञान की स्वाभाविक कल्याणकारी शक्ति है; ब्रह्मविद् की उपस्थिति मात्र से भी कुल-समाज का उत्थान कहा गया है। फिर रथ-दृष्टान्त द्वारा आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि, मन को लगाम, इन्द्रियों को घोड़े और विषयों को उनके मार्ग बताकर बंधन और मुक्ति का मनोवैज्ञानिक रहस्य समझाया जाता है। अंत में हृदय में साक्षात् नारायण की प्रतिष्ठा, भोक्तृत्व का औपाधिक स्वरूप और आत्मा की असंग साक्षी-स्थिति बताकर ज्ञानी की स्थिति को समत्व और अकर्तृत्व में स्थापित किया गया है।
31 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
अथ हैनं पैङ्गलः प्रपच्छ याज्ञवल्क्यं—ज्ञानिनः किं कर्म, का च स्थितिरिति ॥१॥
तब पैङ्गल ने याज्ञवल्क्य से पूछा—ब्रह्म-ज्ञानी के लिए कौन-सा कर्म कर्तव्य है, और उसकी निष्ठा अथवा स्थिति क्या है?
Jñānin (Brahmavid), karma vs. jñāna, sthitaprajñatā/abidance in BrahmanVerse 2
स होवाच याज्ञवल्क्यः—अमानित्वादिसम्पन्नो मुमुक्षुरेकविंशतिकुलं तारयति। ब्रह्मविन्मात्रेण कुलमेकोत्तरशतं तारयति ॥२॥
याज्ञवल्क्य बोले—अमानित्व आदि गुणों से युक्त मोक्षार्थी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करता है; और केवल ब्रह्म-विद् होने मात्र से एक सौ एक पीढ़ियों का उद्धार करता है।
Mumukṣutva, sādhana-catuṣṭaya/virtues (amānitva etc.), Brahmavid’s salvific merit, mokṣaVerse 3
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥३॥
आत्मा को रथी (सवार) जानो और शरीर को रथ ही समझो; बुद्धि को सारथि जानो और मन को लगाम ही समझो।
Ātman distinct from body-mind; buddhi as discriminative faculty; mastery of mind; sādhana through vivekaVerse 4
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। जङ्गमानि विमानानि हृदयानि मनीषिणः॥४॥
इन्द्रियाँ घोड़े कही गई हैं; विषय उनके विचरण-क्षेत्र हैं। मनीषी कहते हैं कि हृदय चलायमान विमान के समान हैं।
Indriya–viṣaya bandha (sense-object entanglement) and the inner instrument as the locus of experienceVerse 5
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्महर्षयः। ततो नारायणः साक्षाद्धृदये सुप्रतिष्ठितः॥५॥
महर्षि कहते हैं—इन्द्रिय और मन से युक्त आत्मा ही भोक्ता है। तब साक्षात् नारायण हृदय में भली-भाँति प्रतिष्ठित होते हैं।
Jīva (ātman associated with upādhis) vs. inner Lord (Īśvara/Nārāyaṇa) in the heart; adhyāsa and the seat of realizationVerse 6
प्रारब्धकर्मपर्यन्तमहिनिर्मोकवद्व्यवहरति। चन्द्रवच्चरते देही स मुक्तश्चानिकेतनः॥६॥
प्रारब्ध कर्म के क्षय तक वह सर्प की उतरी हुई केंचुली-सा व्यवहार करता है। देही चन्द्रमा-सा विचरता है; वह मुक्त और अनिकेतन है।
Jīvanmukti; prārabdha-karma; non-identification with body (deha-abhimāna-tyāga)Verse 7
तीर्थे श्वपचगृहे वा तनुं विहाय याति कैवल्यम् । प्राणान् अवकीर्य याति कैवल्यम् ॥७॥
तीर्थ में हो या श्वपच (अन्त्यज) के घर में—देह का परित्याग करके वह कैवल्य को प्राप्त होता है। प्राणों को भी त्यागकर वह कैवल्य को प्राप्त होता है॥७॥
Moksha/Kaivalya; de-identification from body and prāṇaVerse 8
तं पश्चाद् दिग्बलिं कुर्याद् अथवा खननं चरेत् । पुंसः प्रव्रजनं प्रोक्तं नेतराय कदाचन ॥८॥
इसके बाद दिशाओं को बलि (दिग्बलि) दे, अथवा गड्ढा खोदकर (समाधि/दफन) करे। पुरुष का प्रव्रजन कहा गया है—कभी भी दूसरे के लिए नहीं (प्रतिनिधि रूप से नहीं)॥८॥
Sannyāsa/pravrajyā; non-transferability of spiritual renunciationVerse 9
नाशौचं नाग्निकार्यं च न पिण्डं नोदकक्रिया । न कुर्यात् पार्वणादीनि ब्रह्मभूताय भिक्षवे ॥९॥
जो भिक्षु ब्रह्मस्वरूप हो गया है, उसके लिए न अशौच, न अग्निकार्य, न पिण्डदान, न उदकक्रिया—और न पार्वण आदि कर्म करने चाहिए॥९॥
Jīvanmukti/ Brahmabhāva; transcendence of ritual obligations (karma)Verse 10
दग्धस्य दहनं नास्ति पक्वस्य पचनं यथा। ज्ञानाग्निदग्धदेहस्य न च श्राद्धं न च क्रिया॥१०॥
जैसे जली हुई वस्तु का फिर जलना नहीं होता और पकी हुई का फिर पकना नहीं होता, वैसे ही ज्ञानाग्नि से देहाभिमान जल जाने पर न श्राद्ध रहता है, न कोई कर्मकाण्डीय क्रिया॥१०॥
Moksha (jñāna-nisṭhā; transcendence of karma and ritual obligation)Verse 11
यावच्चोपाधिपर्यन्तं तावच्छुश्रूषयेद्गुरुम्। गुरुवद्गुरुभार्यायां तत्पुत्रेषु च वर्तनम्॥११॥
जब तक उपाधियों की सीमा में स्थित है, तब तक गुरु की शुश्रूषा और सेवा करनी चाहिए; तथा गुरु-पत्नी और गुरु-पुत्रों के प्रति भी गुरु के समान ही आचरण करना चाहिए॥११॥
Guru-śiṣya-paramparā; upādhi (limiting adjuncts) and discipline (sādhana)Verse 12
शुद्धमानसः शुद्धचिद्रूपः सहिष्णुः सोऽहमस्मि सहिष्णुः सोऽहमस्मीति प्राप्ते ज्ञानेन विज्ञाने ज्ञेये परमात्मनि हृदि संस्थिते देहे लब्धशान्तिपदं गते तदा प्रभामनोबुद्धिशून्यं भवति॥१२॥
शुद्ध मन वाला, शुद्ध चैतन्य-स्वरूप, सहिष्णु—‘मैं वही हूँ, सहिष्णु वही मैं हूँ’—ऐसा निश्चय करके; जब ज्ञान और अनुभूत-विज्ञान प्राप्त हो जाए, जानने योग्य परमात्मा हृदय में प्रतिष्ठित हो जाए, और देह में शान्ति-पद उपलब्ध हो जाए, तब (अन्तःकरण) मन-बुद्धि के आभास तक से शून्य हो जाता है॥१२॥
Atman/Brahman realization; antaḥkaraṇa-śuddhi; mano-nāśa (cessation of mind as a limiting appearance)Verse 13
अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोजनम्। एवं स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदैः प्रयोजनं किं भवति। ज्ञानामृततृप्तयोगिनो न किञ्चित्कर्तव्यमस्ति। तदस्ति चेन्न स तत्त्वविद्भवति। दूरस्थोऽपि न दूरस्थः पिण्डवर्जितः पिण्ड...
अमृत से तृप्त पुरुष के लिए दूध का क्या प्रयोजन? इसी प्रकार अपने आत्मस्वरूप को जान लेने पर वेदों का क्या प्रयोजन रह जाता है। ज्ञानामृत से तृप्त योगी के लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता। यदि कुछ कर्तव्य शेष हो, तो वह तत्त्वज्ञ नहीं है। वह दूर होकर भी दूर नहीं; देह से रहित होकर भी देह में स्थित—अन्तरात्मा सर्वव्यापी हो जाती है॥१३॥
Moksha through Atman-Brahman knowledge; akartṛtva (non-doership) and all-pervasiveness of the inner SelfVerse 14
हृदयं निर्मलं कृत्वा चिन्तयित्वाप्यनामयम्। अहमेव परं सर्वमिति पश्येत्परं सुखम्॥१४॥
हृदय को निर्मल करके और निरामय आत्मा का ध्यान करके—‘मैं ही परम हूँ, मैं ही सर्व हूँ’—ऐसा साक्षात् देखे; तब परम सुख की प्राप्ति होती है॥१४॥
Antaḥkaraṇa-śuddhi and aparokṣa-jñāna (direct realization) of non-duality; Brahmānubhava as paramānandaVerse 15
यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। अविशेषो भवेत् तद्वज्जीवात्मपरमात्मनोः॥१५॥
जैसे जल में डाला गया जल, दूध में दूध और घी में घी भेदरहित हो जाता है, वैसे ही जीवात्मा और परमात्मा में अभेद है॥१५॥
Jīva–Brahman aikya (identity); bheda-nivṛtti (negation of difference)Verse 16
देहे ज्ञानेन दीपिते बुद्धिरखण्डाकाररूपा यदा भवति तदा विद्वान् ब्रह्मज्ञानाग्निना कर्मबन्धं निर्दहेत् ॥१६॥
जब देह ज्ञान से प्रकाशित हो और बुद्धि अखण्डाकार (अद्वैत) स्वरूप हो जाए, तब विद्वान् ब्रह्म-ज्ञान की अग्नि से कर्म-बन्धन को भस्म कर दे।
Moksha (liberation) through Brahma-jñāna; destruction of karma by knowledgeVerse 17
ततः पवित्रं परमेश्वराख्यमद्वैतरूपं विमलाम्बराभम्। यथोदके तोयमनुप्रविष्टं तथात्मरूपो निरुपाधिसंस्थितः ॥१७॥
तत्पश्चात् परम पवित्र, ‘परमेश्वर’ नामक, अद्वैत-स्वरूप—निर्मल आकाश के समान—का साक्षात्कार होता है। जैसे जल में जल मिल जाता है, वैसे ही आत्मस्वरूप उपाधिरहित होकर स्थित रहता है।
Brahman/Ātman non-duality; nirupādhi (freedom from adjuncts); identity/mergence imageryVerse 18
आकाशवत्सूक्ष्मशरीर आत्मा न दृश्यते वायुवदन्तरात्मा। स बाह्यमभ्यन्तरनिश्चलात्मा ज्ञानोल्कयापश्यति चान्तरात्मा ॥१८॥
आकाश के समान, सूक्ष्मशरीर से सम्बद्ध होकर भी आत्मा दिखाई नहीं देता; वायु के समान अन्तरात्मा पकड़ी नहीं जाती। वही निश्चल आत्मा, जो बाहर-भीतर व्याप्त है, ज्ञान-दीपक (उल्का) से ‘देखी’ जाती है।
Ātman as subtle, invisible, all-pervading; knowledge as the means of ‘seeing’ (aparokṣa-anubhava)Verse 19
यत्र यत्र मृतो ज्ञानी येन वा केन मृत्युना । यथा सर्वगतं व्योम तत्र तत्र लयं गतः ॥१९॥
जहाँ-जहाँ ज्ञानी पुरुष किसी भी प्रकार की मृत्यु से देह त्यागता है, सर्वव्यापी आकाश की भाँति वह वहीं-वहीं लय को प्राप्त हो जाता है।
Moksha (videha-mukti), laya in Brahman; all-pervasiveness of Ātman/BrahmanVerse 20
घटाकाशमिवात्मानं विलयं वेत्ति तत्त्वतः । स गच्छति निरालम्बं ज्ञानालोकं समन्ततः ॥२०॥
जो घट के आकाश की भाँति आत्मा के विलय को तत्त्वतः जानता है, वह सर्वतोमुखी ज्ञान-प्रकाश—निरालम्ब—को प्राप्त होता है।
Ātman–Brahman non-difference; upādhi-bheda (apparent limitation) and its negation; nirālamba-jñānaVerse 21
तपेद् वर्षसहस्राणि एकपादस्थितो नरः । एतस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥२१॥
मनुष्य एक पाँव पर खड़ा होकर हजारों वर्षों तक तप करे, तब भी वह इस ध्यान-योग की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं होता।
Dhyāna/Nididhyāsana as superior means toward jñāna; critique of mere tapas without liberating insightVerse 22
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातुमिच्छति। अपि वर्षसहस्रायुः शास्त्रान्तं नाधिगच्छति॥२२॥
“यह ज्ञान है, यह जानने योग्य है”—ऐसा कहकर जो सब कुछ जानना चाहता है, वह सहस्र वर्ष जीकर भी शास्त्रों के अंत तक नहीं पहुँचता।
Jñāna vs. śāstra-vistāra; limitation of encyclopedic learning; primacy of liberating knowledge (ātma-jñāna)Verse 23
विज्ञेयोऽक्षरतन्मात्रो जीवितं वापि चञ्चलम्। विहाय शास्त्रजालानि यत्सत्यं तदुपासताम्॥२३॥
केवल उस अक्षर, अविनाशी तत्त्व को ही जानना चाहिए; जीवन निश्चय ही चंचल है। शास्त्र-जाल को त्यागकर जो सत्य है, उसी का उपासन-ध्यान करें।
Akṣara (Imperishable Brahman/Ātman); vairāgya; satya-upāsanā leading to jñānaVerse 24
अनन्तकर्मशौचं च जपो यज्ञस्तथैव च। तीर्थयात्राभिगमनं यावत्तत्त्वं न विन्दति॥२४॥
अंतहीन कर्मकाण्ड और शौच-शुद्धि, तथा जप और यज्ञ, और तीर्थयात्रा—यह सब तब तक चलता है, जब तक तत्त्व-यथार्थ का साक्षात्कार नहीं होता।
Karma-kāṇḍa limitation; tattva-jñāna as culmination; mokṣa through knowledgeVerse 25
अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्षहेतुर्महात्मनाम्। द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च॥२५॥
महात्माओं के लिए मोक्ष का निश्चित कारण ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का दृढ़ ज्ञान है। बंधन और मुक्ति के लिए दो ही शब्द हैं—‘मेरा’ और ‘मेरा नहीं’।
Moksha through Brahma-jnana; mamakara (mine-ness) as bondageVerse 26
ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते। मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥२६॥
‘मेरा’ की भावना से जीव बंधता है; ‘निर्मम’ (मेरा नहीं) से मुक्त होता है। क्योंकि जब मन उन्मनी-भाव में स्थित होता है, तब द्वैत का अनुभव सर्वथा नहीं होता।
Mamakāra as bondage; unmanī (mind-transcendence) and nonduality (advaita)Verse 27
यदा यात्युन्मनीभावस्तदा तत्परमं पदम्। यत्रयत्र मनो याति तत्रतत्र परं पदम्॥२७॥
जब उन्मनी-भाव की प्राप्ति होती है, तब वही परम पद है। मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ ही परम पद का साक्षात्कार होता है।
Paramapada (supreme state) as nondual Brahman; omnipresence of Brahman; unmanī as contemplative pointerVerse 28
तत्र तत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम्। हन्यान्मुष्टिभिराकाशं क्षुधार्तः खण्डयेत्तुषम्। नाहं ब्रह्मेति जानाति तस्य मुक्तिर्न जायते॥२८॥
वहाँ-वहाँ परम ब्रह्म सर्वत्र समान रूप से स्थित है। कोई मुट्ठियों से आकाश को पीटे, या भूख से पीड़ित मनुष्य भूसी को कूटे—वैसे ही जो ‘मैं ब्रह्म हूँ’ यह नहीं जानता, उसके लिए मुक्ति उत्पन्न नहीं होती।
Moksha through Brahma-jñāna (Aham Brahmāsmi)Verse 29
य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति। स वायुपूतो भवति। स आदित्यपूतो भवति। स ब्रह्मपूतो भवति। स विष्णुपूतो भवति। स रुद्रपूतो भवति। स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति। स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति। स सर्व...
जो इस उपनिषद् का नित्य अध्ययन करता है, वह अग्नि से शुद्ध होता है, वायु से शुद्ध होता है, सूर्य से शुद्ध होता है, ब्रह्मा से शुद्ध होता है, विष्णु से शुद्ध होता है, रुद्र से शुद्ध होता है। वह मानो सभी तीर्थों में स्नान कर चुका होता है, सभी वेदों का अध्ययन कर चुका होता है, और सभी वैदिक व्रत-चर्याओं का आचरण कर चुका होता है। उससे इतिहास-पुराणों तथा रुद्र-जप के शतसहस्र जपों के फल प्राप्त होते हैं; मानो प्रणव का दस हज़ार बार जप हो गया हो। वह दस पूर्वजों और दस उत्तरजों को पवित्र करता है; वह पंक्ति-पावन होता है; वह महान होता है। वह ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण-चौर्य, गुरु-पत्नी-गमन तथा उन पातकों के संयोग से भी शुद्ध हो जाता है।
Śravaṇa/adhyayana as purificatory means supporting Brahma-jñāna; pāpa-kṣaya and adhikāritvaVerse 30
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥३०॥
विष्णु का वह परम पद ऋषि-जन सदा देखते हैं—मानो आकाश में फैली हुई दृष्टि के समान।
Paramapada / supreme reality as ever-visible to the illumined; Brahman as the highest ‘abode’Verse 31
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत्परमं पदम्। ॐ सत्यमित्युपनिषत्॥३१॥
वे प्रेरित ऋषि—स्तोत्र-ज्ञ, प्रबुद्ध और जाग्रत—उसको प्रज्वलित करते हैं, अर्थात् विष्णु के परम पद को। ॐ—“सत्य” इति; यही उपनिषद् है॥
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