
Sukta 9.94
Soma Pavamāna (the purifying Soma)
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है जब वह जल और ऊन के छलनी (फ्लीस) से होकर शुद्ध किया जाता है। इसमें जाग्रत विचार और प्रेरित अंतर्दृष्टियाँ परस्पर स्पर्धा करती हुई क्रमबद्ध होकर वृद्धि के एक स्थिर “बाड़े/गोठ” में स्थापित होती हैं। सोम को कवि के रूप में महिमामंडित किया गया है, जो काव्य-शक्ति को समस्त लोकों में वहन करता है, देवों के बीच यश प्रदान करता है और समर्थ उपासक को व्यवहारिक समृद्धि देता है। अंत में सूक्त सीधे पोषण, व्यापक प्रकाश, दिव्य आनंद तथा शत्रु शक्तियों के प्रतिघात की याचना पर समाप्त होता है।
Mantra 1
अधि यदस्मिन्वाजिनीव शुभः स्पर्धन्ते धियः सूर्ये न विशः । अपो वृणानः पवते कवीयन्व्रजं न पशुवर्धनाय मन्म ॥
जब इस (शुद्ध सोम) में वाजिनी-सा तेजस्वी शुभः—विचार-शक्तियाँ—उत्सुक रथियों की भाँति परस्पर स्पर्धा करती हैं, जैसे प्रजाएँ सूर्य की ओर एकत्र होती हैं; तब वह—अपः (जल-धाराओं) को चुनता हुआ—कवितर (कवीयन) बनकर प्रवाहित होता है, और अंतः-पशुओं (किरण-सम्पदा) की वृद्धि के लिए व्रज (गो-आवास/आश्रय) के समान सुव्यवस्थित पूर्णता का मन्म (मनन-रूप विधान) स्थापित करता है।
Mantra 2
द्विता व्यूर्ण्वन्नमृतस्य धाम स्वर्विदे भुवनानि प्रथन्त । धियः पिन्वानाः स्वसरे न गाव ऋतायन्तीरभि वावश्र इन्दुम् ॥
वह द्विविध रीति से अमृत के धाम को उघाड़ता है और स्वर्विद् (स्वर्—दीप्त लोक—का ज्ञाता/पानेवाला) के लिए भुवनों को विस्तृत करता है। स्व-सर (अपने ही सरोवर/चरागाह) में रंभाती गौओं की भाँति पिन्वमान धियः, ऋत के अनुसार चलती हुई, उज्ज्वल इन्दु के प्रति दबाव देती हुई, उसकी ओर दौड़ती और उसके चारों ओर शीघ्र घूमती हैं।
Mantra 3
परि यत्कविः काव्या भरते शूरो न रथो भुवनानि विश्वा । देवेषु यशो मर्ताय भूषन्दक्षाय रायः पुरुभूषु नव्यः ॥
जब कवि अपनी काव्या (काव्य-दृष्टि) को सर्वत्र वहन करता है—वीर के रथ की भाँति, जो समस्त भुवनों को पार करता है—तब वह देवों में यश रचता है और मर्त्य के लिए भूषण करता है; और दक्ष (सद्कर्म-समर्थ शक्ति) के लिए नूतन, बहुविध रयः (समृद्धियाँ/धन) प्रकट होती हैं।
Mantra 4
श्रिये जातः श्रिय आ निरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति । श्रियं वसाना अमृतत्वमायन्भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ ॥
श्री के लिए जन्मा हुआ वह श्री में ही अग्रसर होता है; वह जारित्रों (स्तुतिकर्ता ऋषियों) को श्रीरूप प्राण-बल का उत्कर्ष प्रदान करता है। श्री से आवृत होकर, अमृतत्व को प्राप्त होकर, वे सत्य हो जाते हैं—मित (मापी हुई) दृढ़ता में एक साथ समिधा-वत् प्रज्वलित।
Mantra 5
इषमूर्जमभ्यर्षाश्वं गामुरु ज्योतिः कृणुहि मत्सि देवान् । विश्वानि हि सुषहा तानि तुभ्यं पवमान बाधसे सोम शत्रून् ॥
इष और ऊर्ज के साथ हमारी ओर प्रवाहित हो; अश्व और गौ को (समृद्धि-रूप) ले आ—विस्तृत ज्योति कर। भीतर से देवों को तृप्त कर। क्योंकि ये सब तुझसे सु-सह्य हैं; इसलिए, हे पवमान सोम, शत्रुओं (अवरोधक शक्तियों) को बाधित कर, पीछे ढकेल।
The hymn praises Soma Pavamāna—Soma as he is purified while flowing through the waters and the filter during the Soma ritual.
It means the purified Soma is seen as a power of inspiration: he clarifies the mind, carries poetic vision, and helps right understanding arise in the worshipper.
It asks for nourishment and vital strength, prosperity (symbolized by horse and cow), wide inner light, joy for the gods, and protection by pushing back hostile forces.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.