Rig Veda Sukta 87
Mandala 9Sukta 879 Mantras

Sukta 87

Sukta 9.87

Rishi

Unspecified here; hymn-level Anukramaṇī needed.

Devata

Soma Pavamāna.

Chandas

Likely Triṣṭubh (common in RV; requires verification).

यह पवमान सोम-सूक्त सोम के तीव्र, लक्ष्यपूर्ण प्रवाह का स्तवन करता है—जब वह यज्ञीय छननों से शुद्ध होकर, सुसज्जित धावक अश्व की भाँति, पवित्र बर्हिस्-आसन की ओर ले जाया जाता है। मंत्रों में सोम की शुद्धि को बल (वाज), यश/कीर्ति (श्रवस्), पोषण (इष्) और अमरत्व (अमृत) की प्राप्ति से जोड़ा गया है; और अंत में इन्द्र के साथ सोम की संगति तथा सम्यक् स्तुति और प्रभावी प्रेरणा के लिए प्रार्थना की गई है।

Sanskrit recitationRig Veda 9.87

Mantras

Mantra 1

प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष । अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति ॥

आगे धाव; पात्र (कोश) के चारों ओर घूम और उसमें बैठ जा। मनुष्यों द्वारा पवित्र किया हुआ, बल-समृद्धि (वाज) की ओर प्रवाहित हो। जैसे वे वेगवान घोड़े को सँवारते हैं, वैसे ही वे तुझे—वाजिन् (ऊर्जस्वी)—माँजते हैं और रशनाओं (लगामों) से मार्ग दिखाते हुए तुझे बर्हि (पवित्र आसन) तक ले जाते हैं।

Mantra 2

स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजनं रक्षमाणः । पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः ॥

अपने ही आयुध (स्व-शक्ति) से सुसज्जित दिव्य इन्दु प्रवाहित होता है—अशस्ति-हा (अस्तुति-योग्य न होने वाले/दुष्ट का संहारक) होकर, व्रजन (व्यवस्थित क्षेत्र/गो-धन) की रक्षा करता हुआ। देवों का पिता, सु-दक्ष (पूर्ण-कौशल) जनिता, वही द्यौ (स्वर्ग) का विष्टम्भ (दृढ़ आधार) और पृथ्वी का धरण (धारण-आधार) है।

Mantra 3

ऋषिर्विप्रः पुरएता जनानामृभुर्धीर उशना काव्येन । स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यं गुह्यं नाम गोनाम् ॥

ऋषि, विप्र—जन-जन के अग्रणी; ऋभु, धीर, कवि-विद्या से अभिलाषी उशना—उसने भी वह खोज निकाला जो छिपा रखा गया था: गो-रश्मियों (प्रकाश-किरणों) का वह गूढ़, अंतर्निहित नाम।

Mantra 4

एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णे परि पवित्रे अक्षाः । सहस्रसाः शतसा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात् ॥

हे इन्द्र, यह तेरा मधुमय सोम है; वृषभ के लिए वृषभ—वह पवित्र (छन्नी) के चारों ओर बह निकला है। सहस्र-विजयी, शत-विजयी, बहुदाता—वह शाश्वत तेजस्वी वाजस्वी पवित्र बर्हि (यज्ञ-आसन) पर प्रतिष्ठित हुआ है।

Mantra 5

एते सोमा अभि गव्या सहस्रा महे वाजायामृताय श्रवांसि । पवित्रेभिः पवमाना असृग्रञ्छ्रवस्यवो न पृतनाजो अत्याः ॥

ये सोम सहस्र-गव्य (हजारों गो-रश्मियों) की ओर, महान वाज (बल-समृद्धि) की ओर, अमृतत्व और श्रवांसि (प्रेरित श्रवण-शक्तियों) की ओर बढ़ते हैं। पवित्रों के द्वारा स्वयं को पवमान करते हुए वे धाराओं में बह निकले—यश के अभिलाषी, जैसे रण-धावक, वेगवान अश्व।

Mantra 6

परि हि ष्मा पुरुहूतो जनानां विश्वासरद्भोजना पूयमानः । अथा भर श्येनभृत प्रयांसि रयिं तुञ्जानो अभि वाजमर्ष ॥

क्योंकि, हे पुरुहूत (बहु-आहूत) सोम, तू शुद्ध होता हुआ जनों के बीच परिक्रमा करता है, और समस्त आनन्ददायक भोजनों को व्याप्त करता है। तब, हे श्येन-भृत (गरुड़-वाहन), अपने अग्र-प्रदान (प्रयांसि) ले आ; रयि (समृद्धि/आध्यात्मिक धन) को उछालता हुआ तू विजयकारी वाज (बल/विजय) की ओर प्रवाहित हो।

Mantra 7

एष सुवानः परि सोमः पवित्रे सर्गो न सृष्टो अदधावदर्वा । तिग्मे शिशानो महिषो न शृङ्गे गा गव्यन्नभि शूरो न सत्वा ॥

यह सोम, निचोड़ा गया, पवित्र (छन्नी) के चारों ओर छोड़े गए वेग की धारा-सा दौड़ता हुआ आगे बढ़ता है। तीक्ष्ण किनारों पर अपने को तेज करता हुआ—जैसे महिष अपने शृंगों पर—वह गव्यों (गौओं/प्रकाश-किरणों) को खोजता है; शूर-सा, सत्ववान् बलवान् होकर आगे धकेलता है।

Mantra 8

एषा ययौ परमादन्तरद्रेः कूचित्सतीरूर्वे गा विवेद । दिवो न विद्युत्स्तनयन्त्यभ्रैः सोमस्य ते पवत इन्द्र धारा ॥

यह सोम-धारा परम से आकर अद्रि (पाषाण) के अन्तर-हृदय में प्रविष्ट हुई; खोजी बनकर उसने विस्तृत गुहा में गाएँ (प्रकाश-किरणें) पा लीं। जैसे दिव्य विद्युत् मेघों के बीच गर्जती है, वैसे ही, हे इन्द्र, तेरा सोम-प्रवाह शुद्ध होता हुआ बहता है।

Mantra 9

उत स्म राशिं परि यासि गोनामिन्द्रेण सोम सरथं पुनानः । पूर्वीरिषो बृहतीर्जीरदानो शिक्षा शचीवस्तव ता उपष्टुत् ॥

और सचमुच, हे सोम, तू शुद्ध होता हुआ, इन्द्र के साथ एक ही रथ पर आरूढ़, प्रकाशमयी गौओं (गोनाṁ) के भण्डार-राशि के चारों ओर विचरता है। प्राचीन पूर्णताओं वाली महान् पोषण-शक्तियों का दाता, हे बलवान्, शचीपति! हमें उन तेरी शक्तियों का यथोचित स्तवन करना सिखा।

Frequently Asked Questions

It praises Soma as he is purified through the ritual filter and brought to the sacred seat, and it asks for the benefits that purification brings—strength, nourishment, fame, and a taste of immortality.

Because Soma’s flow is fast and forceful, and the ritual purification is like grooming and harnessing a swift horse—turning raw energy into controlled power for victory and blessing.

It expresses their close partnership: Soma empowers Indra for victorious action, and together they secure abundance and protection for the worshippers.

Ask anything about Sukta 87 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App