
Sukta 9.77
Soma Pavamāna (as Indra’s vajra-form)
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है, जब वह छाना जाकर पात्र में शुद्ध होकर तैयार होता है और इन्द्र के वज्र-स्वरूप—अप्रतिहत शक्ति—की भाँति विजय और समृद्धि प्रदान करता हुआ दीप्तिमान होता है। मन्त्रों में छनित सोम को मधुर, तेजस्वी और ऋत (धर्म-नियम) को धारण करने वाला कहा गया है; वह घृत-सदृश सार की समृद्ध धाराओं को अपनी ओर खींचता है और यजमान को बल, “किरणों/गौओं” (गो) तथा प्रेरित वाणी से ऊर्जस्वित करता है। अंत में सोम-प्रवाह को वरुण और मित्र की व्यापक, विश्वसनीय शक्तियों के साथ एकीकृत बताया गया है, जिससे यह शोधन केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और अंतःसत्य के सामंजस्य का भी विधान बन जाता है।
Mantra 1
एष प्र कोशे मधुमाँ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टरः । अभीमृतस्य सुदुघा घृतश्चुतो वाश्रा अर्षन्ति पयसेव धेनवः ॥
यह (सोम) पात्र में प्रकट होकर मधुमय होकर ऊँचे स्वर से गर्जता है—इन्द्र का वज्र, तेज से भी अधिक तेजस्वी। ऋत (सत्य-नियम) की सुदोहा धाराएँ, घृत-रस से टपकती हुई, उसकी ओर वैसे बहती हैं जैसे दूध से भरी रँभाती गौएँ।
Mantra 2
स पूर्व्यः पवते यं दिवस्परि श्येनो मथायदिषितस्तिरो रजः । स मध्व आ युवते वेविजान इत्कृशानोरस्तुर्मनसाह बिभ्युषा ॥
वह प्राचीन (सोम) पवित्र होकर बहता है—जिसे श्येन (बाज) ने दिव्य लोक के परे से, मध्य-रजस् के पार से लाया था। वह मधु-रस के साथ वेग से दौड़ता है, शक्ति से कम्पित; और कृशानु धनुर्धर के बाण से भी, मन में भय का कारण था।
Mantra 3
ते नः पूर्वास उपरास इन्दवो महे वाजाय धन्वन्तु गोमते । ईक्षेण्यासो अह्यो न चारवो ब्रह्मब्रह्म ये जुजुषुर्हविर्हविः ॥
हमारे लिए वे प्राचीन और उत्तरवर्ती सोम-बिन्दु, गो-सम्पन्न महावाज (महाबल-समृद्धि) की ओर दौड़ें। देखने योग्य, सर्पों की भाँति तीव्र-गामी—जो प्रत्येक मंत्र के साथ प्रत्येक हवि को स्वीकारते हैं—वे हमारे भीतर मंत्र पर मंत्र होकर प्रवाहित हों।
Mantra 4
अयं नो विद्वान्वनवद्वनुष्यत इन्दुः सत्राचा मनसा पुरुष्टुतः । इनस्य यः सदने गर्भमादधे गवामुरुब्जमभ्यर्षति व्रजम् ॥
यह इन्दु (सोम) सब जानने वाला होकर हमारे लिए वन-वन में खोजने वाले की भाँति (गुप्त धन को) जीतता है; मन से सीधा-सतत चलने वाला, बहुतों द्वारा स्तुत। जो आसन/सदन में गर्भ (अन्तर्निहित रूप) को धारण करता है, वह गौओं के विस्तृत बाड़े—उरु-ब्ज व्रज—की ओर, जहाँ तेजस्वी रश्मियों के झुंड संचित हैं, वेग से प्रवाहित होता है।
Mantra 5
चक्रिर्दिवः पवते कृत्व्यो रसो महाँ अदब्धो वरुणो हुरुग्यते । असावि मित्रो वृजनेषु यज्ञियोऽत्यो न यूथे वृषयुः कनिक्रदत् ॥
दिवः से (उतरकर) पवित्र होता हुआ रस प्रवाहित होता है—कर्मों को सिद्ध करने वाला, व्यापक-क्रियाशील सार। वह महान है, अछेद्य/अदब्ध—वरुण, ऋत के विशाल विधान का स्वामी, विस्तृत क्षेत्रों में विचरता। मित्र भी हमारे व्रजनों/क्षेत्रों में निचोड़ा जाता है, यज्ञ के योग्य; यूथ में बलवान अश्व की भाँति, वृषयु होकर हिनहिनाता/गर्जता है।
The hymn praises Soma Pavamāna—Soma as he is purified and made ready for offering—described as Indra’s thunderbolt-like power.
Because purified Soma is seen as the force that empowers Indra to overcome obstacles; spiritually, it represents a concentrated, decisive energy born from purification.
The final verse shows Soma’s flow as carrying the powers of Varuṇa (vast, unbreakable cosmic law) and Mitra (harmony and right relationship), so the ritual purification also signifies alignment with ṛta.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.