Rig Veda Sukta 76
Mandala 9Sukta 765 Mantras

Sukta 76

Sukta 9.76

Devata

Soma Pavamāna

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है, जब वह शोधन-प्रक्रिया से होकर प्रवाहित होता है। उसे स्वर्ग को धारण करने वाला, देवकुशल सार कहा गया है, जो ‘नदियों’ (धाराओं/मार्गों) में छोड़ा जाता है और देवताओं के आस्वादन के योग्य बनाया जाता है। सूक्त बार-बार सोम की निर्मल, परिशोधित धारा को इन्द्र के सामर्थ्य-वर्धन से जोड़ता है—वह भीतर के पात्रों में प्रवेश करता है, विद्युत् की भाँति लोकों को जगा देता है, और उपासकों को बल तथा विजय प्रदान करता है।

Mantras

Mantra 1

धर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः । हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजांसि कृणुते नदीष्वा ॥

दिव का धारक पवित्र होता हुआ प्रवाहित होता है—कृत्यशील रस, देवों का दक्षत्व, जिसे नृशक्तियाँ आस्वादित करें। हरितवर्ण सोम, मुक्त होकर, बलवान अश्व की भाँति, नदियों में प्रवेश करते हुए, अपने महाबल पाजांसि को स्वच्छन्द रचता है।

Mantra 2

शूरो न धत्त आयुधा गभस्त्योः स्वः सिषासन्रथिरो गविष्टिषु । इन्द्रस्य शुष्ममीरयन्नपस्युभिरिन्दुर्हिन्वानो अज्यते मनीषिभिः ॥

शूर की भाँति वह अपने गभस्ति-हस्तों में आयुध धारण करता है; स्वः (दीप्त लोक) की कामना करता हुआ, गविष्टि—किरण-खोज—में रथपथ पर दृढ़ रहता है। अपस्यु कर्मों द्वारा इन्द्र के शुष्म को उदीरित करता हुआ, प्रेरित इन्दु मनीषियों की धिया से अभिषिक्त होता है।

Mantra 3

इन्द्रस्य सोम पवमान ऊर्मिणा तविष्यमाणो जठरेष्वा विश । प्र णः पिन्व विद्युदभ्रेव रोदसी धिया न वाजाँ उप मासि शश्वतः ॥

हे सोम, इन्द्र के लिए पवमान होकर, अपनी उछलती ऊर्मि (तरंग) के साथ इन अन्तर-उदर-रूप पात्रों में प्रवेश कर; बल में बढ़ता हुआ। हमें पुष्ट कर—जैसे मेघ में विद्युत् से दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) जाग उठती हैं—बल-समृद्धियों के साथ, धिया (प्रेरित बुद्धि) के साथ, सदा हमारे निकट आ।

Mantra 4

विश्वस्य राजा पवते स्वर्दृश ऋतस्य धीतिमृषिषाळवीवशत् । यः सूर्यस्यासिरेण मृज्यते पिता मतीनामसमष्टकाव्यः ॥

समस्त का राजा पवमान होकर बहता है, स्वः (दीप्त लोक) को देखनेवाला; ऋत की प्रेरित धीत को जगाता है, ऋषि-शाल (कुटिल/मिथ्या ऋषित्व का भंजक) होकर। जो सूर्य की तीक्ष्ण धार से परिमार्जित होता है, वही मतियों (प्रेरित विचारों) का पिता बनता है—असम (अतुल) अष्टकाव्य (अद्वितीय समन्वय-कर्ता कवि)।

Mantra 5

वृषेव यूथा परि कोशमर्षस्यपामुपस्थे वृषभः कनिक्रदत् । स इन्द्राय पवसे मत्सरिन्तमो यथा जेषाम समिथे त्वोतयः ॥

झुंडों में वृषभ की भाँति तू पात्र के चारों ओर वेग से दौड़ता है; अपां (जल) की गोद में वृषभ गर्जता है। तू इन्द्र के लिए पवमान होता है, मद में सर्वाधिक मत्सरिन्तम; ताकि हम संग्राम में तेरी ओट (सहायता) से जय पाएं।

Frequently Asked Questions

The hymn praises Soma in his Pavamāna form—Soma as he flows and purifies through the filter and waters, becoming fit to be offered to the gods, especially Indra.

It refers to the ritual filtration of Soma juice through the pavitra (sieve), and also symbolizes inner clarification—turning raw energy into luminous strength and clear inspiration.

Because Soma is offered to empower Indra, the god of force and conquest; the hymn asks that this Indra-strengthening Soma help the worshippers win in contests and overcome obstacles.

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