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Sukta 9.66
Soma Pavamāna
यह पवमान सोम-सूक्त बहते, स्वयं को शुद्ध करने वाले सोम की स्तुति करता है, जब वह ऊनी छन्नी से छाना जाकर देवताओं के योग्य बनाया जाता है। सोम को मित्रों के प्रिय, प्रचण्डों में सबसे शक्तिशाली ज्येष्ठ के रूप में आह्वान किया गया है; स्वर्ग से लाया गया उसका प्रकाशमान “दुग्ध” बल, विजय और जीवन को धारण करने वाली कृपा प्रदान करता है। इस सूक्त का उद्देश्य कर्मकाण्डीय भी है—सोम-अभिषव को ऊर्जस्वित करना—और आध्यात्मिक भी—सोम को प्रेरित वाणी और प्राणशक्ति के रूप में महिमामंडित करना।
Mantra 1
पवस्व विश्वचर्षणेऽभि विश्वानि काव्या । सखा सखिभ्य ईड्यः ॥
हे विश्वचर्षणे, पवित्र हो; समस्त काव्यों (प्रेरित वाणियों) में प्रविष्ट हो। हे सखा, सखाओं द्वारा ईड्य (स्तुत्य) है।
Mantra 2
ताभ्यां विश्वस्य राजसि ये पवमान धामनी । प्रतीची सोम तस्थतुः ॥
उन दोनों (आधारों/लोकों) के द्वारा, समस्त के प्रकाशमान रजस् में, हे पवमान सोम, तेरे वे दो धाम (आश्रय-स्थान) भीतर की ओर मुख किए स्थिर हैं—साधक की ओर प्रत्यञ्च, अंतर्मिलन के लिए तत्पर।
Mantra 3
परि धामानि यानि ते त्वं सोमासि विश्वतः । पवमान ऋतुभिः कवे ॥
हे सोम, तू सर्वत्र है; तेरे चारों ओर तेरे धाम और नियत रूप-व्यवस्थाएँ (धामानि) परिक्रमा करती हैं। हे पवमान, हे कवि, तू ऋतुओं—ऋतु-ऋतु के ऋतु (ऋतु-नियम) के द्वारा प्रकट होता है।
Mantra 4
पवस्व जनयन्निषोऽभि विश्वानि वार्या । सखा सखिभ्य ऊतये ॥
पवित्र हो, आनंद की प्रेरणाएँ (निषः) उत्पन्न करता हुआ; समस्त वरणीय वस्तुओं की ओर अग्रसर हो। सखा बनकर, सखाओं के लिए सहायता (ऊति) लेकर आ।
Mantra 5
तव शुक्रासो अर्चयो दिवस्पृष्ठे वि तन्वते । पवित्रं सोम धामभिः ॥
तेरी उज्ज्वल ज्वालामय किरणें दिव्य आकाश की पीठ पर दूर-दूर तक फैलती हैं। हे सोम, अपने धामों/शक्तियों के द्वारा तू पवित्र करने वाला बनता है—तू स्वयं ही पवित्र (पवित्रम्) छाननी-तत्त्व है।
Mantra 6
तवेमे सप्त सिन्धवः प्रशिषं सोम सिस्रते । तुभ्यं धावन्ति धेनवः ॥
हे सोम, तेरे लिए ये सात सिन्धु तेरी प्रेरक आज्ञा के अनुसार प्रवाहित होते हैं। तेरे ही पास धेनुएँ दौड़ती हैं—पोषक रस-धाराएँ, आनन्द की ओर शीघ्रगामी।
Mantra 7
प्र सोम याहि धारया सुत इन्द्राय मत्सरः । दधानो अक्षिति श्रवः ॥
हे सोम, धारा बनकर आगे बढ़; निचोड़ा हुआ तू इन्द्र के लिए मत्सर (उल्लास) है। अपने साथ अक्षय श्रवस्—अमर कीर्ति—धारण करता हुआ।
Mantra 8
समु त्वा धीभिरस्वरन्हिन्वतीः सप्त जामयः । विप्रमाजा विवस्वतः ॥
समस्त धियों से उन्होंने तुझे स्वर दिया; प्रेरक सात जामयः (बहिनें) तुझे गति में ले आईं। हे विप्र, विवस्वत् से उत्पन्न, तू प्रकाश-यात्रा में जाग्रत हुआ।
Mantra 9
मृजन्ति त्वा समग्रुवोऽव्ये जीरावधि ष्वणि । रेभो यदज्यसे वने ॥
वे एकस्वर स्तुतियों से तुझे मृजन करते हैं—भेड़ की ऊन पर, प्राचीन छलनी पर, उसके गुंजार-नाद सहित; जब, हे रेभ (वाणी-गायक), तू वन में अभिषिक्त होता है।
Mantra 10
पवमानस्य ते कवे वाजिन्त्सर्गा असृक्षत । अर्वन्तो न श्रवस्यवः ॥
हे कवे, तुझ्या पवमान अवस्थेत तुझे वाजिन्त् सर्ग (बलवान प्रवाह) मुक्त होतात; कीर्तिलोल अश्वांसारखे ते वेगाने धावून निघतात।
Mantra 11
अच्छा कोशं मधुश्चुतमसृग्रं वारे अव्यये । अवावशन्त धीतयः ॥
मधु-टपकती मधुरता के पात्र की ओर उसे प्रवाहित किया गया, अव्यय ऊन के छनने में। और धीतियाँ (प्रेरित विचार) नीचे की ओर आकांक्षापूर्वक झुकीं—आनन्द को ग्रहण कर धारण करने हेतु।
Mantra 12
अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गावो न धेनवः । अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥
समुद्र की ओर बूँदें (इन्दवः) घर लौट गईं—गायों की भाँति, दुग्धदायिनियों की भाँति। वे ऋत की योनि तक पहुँचीं—उस स्रोत में जहाँ ऋत जन्म लेता और संचित होता है।
Mantra 13
प्र ण इन्दो महे रण आपो अर्षन्ति सिन्धवः । यद्गोभिर्वासयिष्यसे ॥
हे इन्दो, हमारे लिए महान रण हेतु आगे प्रवाहित हो। जब तू गोभिः (किरण-गायों) को हमारे भीतर वास कराने को उद्यत होगा, तब आपः—सिन्धवः, वे वेगवती धाराएँ—प्रवहमान हो उठती हैं।
Mantra 14
अस्य ते सख्ये वयमियक्षन्तस्त्वोतयः । इन्दो सखित्वमुश्मसि ॥
तेरे इस सख्य में हम, तेरी ही सहायता से समर्थ होकर, यज्ञ-भाव से अपने को अर्पित करते हैं। हे इन्दु, हम तेरे साथ सखित्व की अभिलाषा करते हैं।
Mantra 15
आ पवस्व गविष्टये महे सोम नृचक्षसे । एन्द्रस्य जठरे विश ॥
हे सोम, गविष्टि—किरणों/गवों की प्राप्ति के लिए—हमारी ओर पवित्र होकर प्रवाहित हो; मनुष्य में आत्म-दर्शन की महती दृष्टि के लिए। और इन्द्र के जठर में प्रवेश कर।
Mantra 16
महाँ असि सोम ज्येष्ठ उग्राणामिन्द ओजिष्ठः । युध्वा सञ्छश्वज्जिगेथ ॥
हे सोम, तू महान है; उग्रों में ज्येष्ठ है। हे इन्दु, तू ओज में सर्वाधिक शक्तिमान है। युद्ध करते हुए तू सदा-सदा विजय पाता है।
Mantra 17
य उग्रेभ्यश्चिदोजीयाञ्छूरेभ्यश्चिच्छूरतरः । भूरिदाभ्यश्चिन्मंहीयान् ॥
जो उग्रों से भी अधिक बलवान, शूरों से भी अधिक शूरवीर, और बहु-दाता जनों से भी अधिक उदार है—वह सोम अपने अतिशय सामर्थ्य में ऐसा ही है।
Mantra 18
त्वं सोम सूर एषस्तोकस्य साता तनूनाम् । वृणीमहे सख्याय वृणीमहे युज्याय ॥
हे सोम, तुम सूर्य-वीर हो, शीघ्र प्रेरक हो; सन्तान और तनुओं (हमारे देहधारी जीवन) के दाता-विजेता हो। हम तुम्हें सख्य के लिए चुनते हैं; हम तुम्हें कर्म में युक्त-योग के लिए चुनते हैं।
Mantra 19
अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥
हे अग्नि, पवमान होकर हमारे लिए आयुओं की पूर्णताएँ—बल और प्रेरक पोषण—ले आओ; और दुच्छुना (दुष्टता, दुर्भाग्य) को दूर हटा दो।
Mantra 20
अग्निॠषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः । तमीमहे महागयम् ॥
अग्नि—ऋषि, पवमान, पाञ्चजन्य, पुरोहित—उस महागय (महान कल्याण-प्रदाता) को हम पूज्यभाव से चाहते/आह्वान करते हैं।
Mantra 21
अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् ॥
हे अग्ने, पवमान होकर हमारे लिए सुकार्य करने वाले बनो; हममें तेज (वर्चस्) और सुवीर्य (उत्तम वीर-शक्ति) धारण करो; मुझमें रयि (आध्यात्मिक धन) और पोष (समृद्धि-वृद्धि) स्थापित करो।
Mantra 22
पवमानो अति स्रिधोऽभ्यर्षति सुष्टुतिम् । सूरो न विश्वदर्शतः ॥
पवमान होकर वह अवरोधकों (स्रिध्) के पार बहता है और सुष्टुति—उत्तम स्तुति—की ओर वेग से धावता है; सूर्य के समान, सर्वत्र-दर्शनीय, विश्व को प्रकाशित करने वाला।
Mantra 23
स मर्मृजान आयुभिः प्रयस्वान्प्रयसे हितः । इन्दुरत्यो विचक्षणः ॥
वह उज्ज्वल इन्दु (सोम), आयु-शक्तियों से अपने को परिशुद्ध करता हुआ, पेषित आनन्द-रस से समृद्ध, उसी रस-क्रिया में प्रतिष्ठित—विवेक-दृष्टि वाला, वेगवान अश्व की भाँति गतिमान होता है।
Mantra 24
पवमान ऋतं बृहच्छुक्रं ज्योतिरजीजनत् । कृष्णा तमांसि जङ्घनत् ॥
पवमान सोम अपने शुद्ध प्रवाह में ऋत का विशाल, शुक्ल ज्योति उत्पन्न करता है; वह कृष्ण तमसों को चूर्ण कर देता है।
Mantra 25
पवमानस्य जङ्घ्नतो हरेश्चन्द्रा असृक्षत । जीरा अजिरशोचिषः ॥
पवमान जब अवरोधक तमस को प्रहार कर गिराता है, तब हरि के चन्द्र किरण छूट पड़ते हैं—तीव्रगामी, अजर (अम्लान) प्रकाश-ज्वाला वाले।
Mantra 26
पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः । हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः ॥
पवमान—यात्रा के रथ के लिए सर्वाधिक योग्य—शुभ्रों के साथ, शुभ्रता में सर्वाधिक प्रशंसित; हरित-दीप्त, मरुद्गण-सम बलवान् है।
Mantra 27
पवमानो व्यश्नवद्रश्मिभिर्वाजसातमः । दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥
पवमान अपनी रश्मियों से फैलता और पहुँचता है—समृद्धि का सर्वोत्तम विजेता; वह स्तोत्र में सु-वीर्य, उदात्त वीर-बल, स्थापित करता है।
Mantra 28
प्र सुवान इन्दुरक्षाः पवित्रमत्यव्ययम् । पुनान इन्दुरिन्द्रमा ॥
प्र—दबाया गया इन्दु रक्षक-सा—पवित्र से, अव्यय (अविनाशी) के पार, प्रवाहित हुआ; स्वयं को पवित्र करता हुआ इन्दु इन्द्र की ओर गमन करता है।
Mantra 29
एष सोमो अधि त्वचि गवां क्रीळत्यद्रिभिः । इन्द्रं मदाय जोहुवत् ॥
यह सोम, गौओं की त्वचा (आवरण) पर, अद्रि-शिलाओं से पेरित होकर, प्रकाश-किरणों के बीच क्रीड़ा करता है; वह इन्द्र को मद (उन्माद) के लिए पुकारता है।
Mantra 30
यस्य ते द्युम्नवत्पयः पवमानाभृतं दिवः । तेन नो मृळ जीवसे ॥
हे पवमान! तेरा जो द्युम्न-सम्पन्न पयः (दूध-रस) दिव्य लोक से लाया गया है—उसी से हमारे प्रति अनुग्रही हो, ताकि हम जीवित रहें।
The hymn addresses Soma as Pavamāna (“the self-purifying one”), also called Indu, praised while he is being strained and made fit for offering.
It supports the Soma ritual by invoking Soma’s purification and power, and it asks Soma to grant strength, inspiration, victory, and the grace that sustains life.
These images describe Soma’s nourishing, life-giving essence and his radiant, heaven-linked potency—both the ritual drink’s vitality and its spiritual symbolism of clarified consciousness.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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