
Sukta 8.91
Soma (primary in narrative) oriented to Indra as recipient; effectively an Indra-Soma setting
यह संक्षिप्त सूक्त सोम को पाए गए और उठाकर लाए गए खज़ाने के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे विशेषतः इन्द्र—विजयी शक्ति—के लिए निचोड़ा गया है। इन्द्र इस हवि का पान कर बल प्रदान करते हैं। सूक्त सोम की खोज की सजीव, पौराणिक छवि से आगे बढ़कर आशापूर्ण आह्वान में आता है—“कदाचित्” इन्द्र हमारे कल्याण के लिए कार्य करें—और अंततः अपाला-प्रसंग पर समाप्त होता है, जहाँ इन्द्र की शोधनकारी शक्ति नवजीवन देती और प्रकाश से भर देती है।
Mantra 1
कन्या वारवायती सोममपि स्रुताविदत् । अस्तं भरन्त्यब्रवीदिन्द्राय सुनवै त्वा शक्राय सुनवै त्वा ॥
विस्तृत पुकार के साथ चलती कन्या ने प्रवाहित पथ पर सोम को पा लिया। उसे घर की ओर ले जाती हुई वह बोली—‘इन्द्र के लिए मैं तुम्हें सुतूँगी, शक्र (पराक्रमी) के लिए मैं तुम्हें सुतूँगी।’—इस प्रकार विजयी बल के लिए आनन्द-रस तैयार होता है।
Mantra 2
असौ य एषि वीरको गृहंगृहं विचाकशद् । इमं जम्भसुतं पिब धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् ॥
यह जो जाता-फिरता वीरक (साहसी अतिथि) है, घर-घर अपना परिचय कराता है—इस जंभसुत (दाँतों/जबड़ों से पिसा हुआ) सोम-रस को पी; जो धान्य-सम्पन्न है, करम्भ (मिश्रित अर्पण) से युक्त है, अपूप (पुए/केक) सहित है, और उक्थ (स्तोत्र) की शक्ति से युक्त है। भटकती हुई शक्ति इस संस्कृत सार से तृप्त हो।
Mantra 3
आ चन त्वा चिकित्सामोऽधि चन त्वा नेमसि । शनैरिव शनकैरिवेन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
हम तुम्हें न तो भली-भाँति जान पाते हैं, न ही तुम्हारा पूरा माप कर पाते हैं। फिर भी, धीरे-धीरे, चरण-चरण, हे सोम (इन्दु), इन्द्र के लिए चारों ओर प्रवाहित हो—इन्द्र के लिए बहो।
Mantra 4
कुविच्छकत्कुवित्करत्कुविन्नो वस्यसस्करत् । कुवित्पतिद्विषो यतीरिन्द्रेण संगमामहै ॥
कौन जाने—कदाचित वह समर्थ हो, कदाचित वह कर्म करे; कदाचित वह हमारे लिए अधिक उत्तम कल्याण रचे। कौन जाने—कदाचित हम इन्द्र के साथ संगम करें और स्वामी-भाव के विरोधी द्वेषियों को दूर कर दें।
Mantra 5
इमानि त्रीणि विष्टपा तानीन्द्र वि रोहय । शिरस्ततस्योर्वरामादिदं म उपोदरे ॥
ये तीन लोक—ये व्यवस्थित निवास के त्रिविध लोक—हे इन्द्र, इन्हें उन्नत कर, इन्हें विकसित कर। उस (पुरुष) के शिर से वृद्धि का क्षेत्र—उर्वरा—प्रकट कर; और इसे भी मेरे भीतर, मेरे अन्तर-गर्भ के निकट, स्थापित कर।
Mantra 6
असौ च या न उर्वरादिमां तन्वं मम । अथो ततस्य यच्छिरः सर्वा ता रोमशा कृधि ॥
और वह भी—जो उर्वरा (खेत) से हमारे पास आती है—मेरे इस तनु (शरीर) को (योग्य पात्र) बना दे। और फिर, उस रूप-रचना का जो भी शिरः (शीर्ष) हो, उसे सर्वथा रोमशा कर दे—जीवित रोमों से पूर्ण; उसे उस स्वाभाविक बल-आवरण से आच्छादित कर दे जो रक्षा करता और टिकाए रखता है।
Mantra 7
खे रथस्य खेऽनसः खे युगस्य शतक्रतो । अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्व्यकृणोः सूर्यत्वचम् ॥
रथ के खे (खुले आकाश/खुली जगह) में, अनस (गाड़ी) के खे में, युग (जुए) के खे में, हे शतक्रतो! इन्द्र, तूने अपाला को त्रिः-पूत्व्य (तीन बार शुद्ध करके) सूर्य-त्वचम्—सूर्य-सी त्वचा—बना दिया: प्रकाश का नया दीप्तिमान आवरण।
It begins with a maiden who finds Soma on a flowing path, brings it home, and declares she will press it for Indra. The hymn later recalls Indra’s act of triple purification that renews Apālā with radiant ‘sun-skin’.
It expresses a devotional, hopeful stance: the worshipper trusts that Indra may act, may grant a better condition, and may help remove forces that oppose well-being.
On the ritual level it echoes repeated straining/cleansing of Soma; inwardly it points to progressive purification that enables a luminous transformation, symbolized by Apālā’s renewed radiance.
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