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Sukta 8.74
Agni (Atithi, Jātavedas)
यह सूक्त मुख्यतः अग्नि की स्तुति करता है—अतिथि (दिव्य अतिथि) और जातवेदस् के रूप में—जो गृहस्थ का अंतर्वासी अग्नि-देव है, जिसे प्रत्येक कुल स्वागतपूर्वक स्थापित करता है, ताकि वह बल, समृद्धि और मंगलमय शान्ति प्रदान करे। कवि निकट और आत्मीय बिम्बों के द्वारा प्रार्थना करता है कि अग्नि मधुरतम स्तुति को स्वीकार करें और उसी से पुष्ट होकर उपासकों के लिए ऐश्वर्य और कल्याण सुनिश्चित करें। अंत में महान नदी परुष्णी का भी आवाहन है, जो इस स्तोत्र के सामर्थ्य और रक्षण के भाव को वैदिक जीवन और यात्रा के ठोस भू-दृश्य से जोड़ देता है।
Mantra 1
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम् । अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः ॥
हे विश्व-विश्व जनों! बल-समृद्धियों को बढ़ाने वाले तुम अपने अतिथि—अग्नि, बहु-प्रिय—को आगे बढ़ाते हो। उस तुम्हारे गृहस्थ (दुर्य) अग्नि को मैं वाणी से, और उष्ण तेज के मनोभावों से स्तुति करता हूँ।
Mantra 2
यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम् । प्रशंसन्ति प्रशस्तिभिः ॥
जिसे मनुष्यों में हविष्मान जन मित्र के समान, घृत-आसुत (सर्पिरासुति) वाले, प्रशस्ति-प्रशस्ति से प्रशंसा करते हैं—उस अग्नि की स्तुतियाँ स्तुति करती हैं।
Mantra 3
पन्यांसं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता । हव्यान्यैरयद्दिवि ॥
वंदनीय जातवेदस्—जो देवत्व की ओर उद्यत होकर, दिवि (दिव्य लोक) में हव्यों को प्रवर्तित करता है।
Mantra 4
आगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम् । यस्य श्रुतर्वा बृहन्नार्क्षो अनीक एधते ॥
हम उस परम वृत्रहन्ता, ज्येष्ठ—प्राचीन-नव—अग्नि के पास आए हैं; जिसकी विशाल, दूर-सुनने वाली शक्ति प्रकट-रूप के अग्रभाग में बढ़ती और दीप्त होती है।
Mantra 5
अमृतं जातवेदसं तिरस्तमांसि दर्शतम् । घृताहवनमीड्यम् ॥
अमृत जातवेदस्—अंधकारों के पार भी दर्शनीय; घृत-आहुति से आह्वानित, ईड्य—वंदनीय, साधक-आकांक्षा से अन्वेष्य।
Mantra 6
सबाधो यं जना इमेऽग्निं हव्येभिरीळते । जुह्वानासो यतस्रुचः ॥
अविभक्त भाव से ये जन अग्नि को हवियों से ईळते हैं; यतस्रुच—संयत करछुल धारण किए—आहुति उँडेलते हुए, दान-कर्म में अनुशासित।
Mantra 7
इयं ते नव्यसी मतिरग्ने अधाय्यस्मदा । मन्द्र सुजात सुक्रतोऽमूर दस्मातिथे ॥
हे अग्नि! हमारी यह नवीनतम मति (प्रेरणा) तुममें स्थापित की गई है। हे मन्द्र, सुजात, सुक्रतु—अमूढ़, अद्भुत अतिथि—निकट आओ।
Mantra 8
सा ते अग्ने शंतमा चनिष्ठा भवतु प्रिया । तया वर्धस्व सुष्टुतः ॥
हे अग्नि! वह (मति) तुम्हारे लिए अत्यन्त शान्तिदायिनी, सबसे निकट और प्रिय हो। उसी से तुम, सुस्तुत (सु-स्तुत), बढ़ो—अपने तेज में वृद्धि करो।
Mantra 9
सा द्युम्नैर्द्युम्निनी बृहदुपोप श्रवसि श्रवः । दधीत वृत्रतूर्ये ॥
वह प्रेरणा, द्युम्नों से द्युम्निनी, हमारे श्रवण में महान् यश-कीर्ति को और-और निकट स्थापित करे; वह वृत्र-तूर्य (वृत्र-वध के संग्राम) में विजयी बल को दृढ़ धारण करे।
Mantra 10
अश्वमिद्गां रथप्रां त्वेषमिन्द्रं न सत्पतिम् । यस्य श्रवांसि तूर्वथ पन्यम्पन्यं च कृष्टयः ॥
वह अश्व-बल, प्रकाश की गौ, और आगे बढ़ाने वाला रथ प्रदान करता है—इन्द्र के समान तेजस्वी, पथ का सच्चा स्वामी; जिसके यश, हे तूर्वथ, जन-समुदाय बार-बार ‘अति-प्रशंसनीय’ कहकर गाते हैं।
Mantra 11
यं त्वा गोपवनो गिरा चनिष्ठदग्ने अङ्गिरः । स पावक श्रुधी हवम् ॥
हे अग्नि, प्रकाशमान धेनुओं के रक्षक अङ्गिरस् ने वाणी द्वारा तुम्हें प्रज्वलित किया है। हे पावक, हमारी हवि की पुकार सुनो।
Mantra 12
यं त्वा जनास ईळते सबाधो वाजसातये । स बोधि वृत्रतूर्ये ॥
जिसे जन-समुदाय पूजते हैं—वाज-प्राप्ति में अजेय—वह तुम जागो; वृत्र-तूर्य में (वृत्र-विघ्न-भेदन संग्राम में) हमारे भीतर बोधवान् हो।
Mantra 13
अहं हुवान आर्क्षे श्रुतर्वणि मदच्युति । शर्धांसीव स्तुकाविनां मृक्षा शीर्षा चतुर्णाम् ॥
मैं, गरुड़ (सूर्य-पक्षी) की विस्तृत उड़ान में आह्वान करता हुआ, उस श्रुत-प्रवण वेग में—जो मद (आनन्द) को मुक्त करता है—स्तुतिकर्ताओं के समूहों-सी जमी हुई प्रतिरोध-शक्तियों को चूर करता हूँ; मानो मार्ग रोकने वाली चतुर्विध शक्तियों के शिरों को कुचल देता हूँ।
Mantra 14
मां चत्वार आशवः शविष्ठस्य द्रवित्नवः । सुरथासो अभि प्रयो वक्षन्वयो न तुग्र्यम् ॥
परम-शक्तिमान की चार शीघ्र शक्तियाँ—गति-प्रेरणा से समृद्ध—सुरथों-सी सुयोजित होकर मुझे पोषणमय प्रचुरता की ओर वहन करती हैं; जैसे बलवान अश्व दूर लक्ष्य चाहने वाले को ले जाते हैं।
Mantra 15
सत्यमित्त्वा महेनदि परुष्ण्यव देदिशम् । नेमापो अश्वदातरः शविष्ठादस्ति मर्त्यः ॥
सत्य ही, हे महा-नदी परुष्णी, मैंने तुझे दीप्त कर दिया है; और मर्त्यों में कोई नहीं—कोई अश्वदाता भी नहीं—जो तुझसे अधिक बलवान हो, हे परम-शक्तिमान।
Because the sacred fire is treated as a revered presence welcomed into the home and the ritual. The hymn portrays every clan ‘setting forward’ Agni as the honored Guest who brings blessings when received properly.
It asks for auspicious peace, strength, and increase—especially that Agni accept the closest and most peace-giving praise and grow powerful through it, returning prosperity to the worshippers.
The river functions as a protective and life-sustaining power in the Vedic landscape. Invoking Paruṣṇī links the hymn’s theme of might and safeguarding to real-world travel, territory, and sustaining waters, reinforcing the request for support and strength.
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