
Sukta 8.61
Indra
यह सूक्त इन्द्र के लिए एक सीधा और तात्कालिक आमंत्रण है कि वे कवि की पुकार को “दोनों ओर से” सुनें और प्रेरित बुद्धि (धी) से समर्थ होकर सोम-पान हेतु निकट आएँ। इसमें इन्द्र की स्तुति बलवान भुजाओं वाले, विघ्नों तथा दुर्गबद्ध आवरणों को तोड़ने वाले (पुरन्दर) के रूप में की गई है; उनसे बार-बार प्रार्थना है कि वे आएँ, हवि स्वीकार करें, और धन, संरक्षण तथा विजयकारी शक्ति का प्रसाद मुक्त करें। अंत की प्रतिमा इन्द्र की सामर्थ्य को संतुलित वज्र में एकाग्र करती है—जो प्रतिरोध को चूर कर विजयी व्यवस्था की स्थापना के लिए तत्पर है।
Mantra 1
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥
इन्द्र हमारे लिए उभयतः—दोनों ओर से—सुनें, और इस वचन के निकट आएँ। सत्राच्या—सीधे पथ पर चलने वाला—मघवा (दानवीर) सोमपान के लिए, धिया—चेतना/ध्यान-शक्ति—के बल से, अतिशविष्ठ (अत्यन्त पराक्रमी) होकर हमारे पास आगमन करें।
Mantra 2
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥
उसे ही—स्वराज, वृषभ—बल के लिए धिषणा (प्रेरक बुद्धियाँ) अपने तेज से गढ़ती हैं। और उपमानों (तुलनीयों) में तुम प्रथम आसन ग्रहण करते हो; क्योंकि तुम्हारा मन निश्चय ही सोम-काम है।
Mantra 3
आ वृषस्व पुरूवसो सुतस्येन्द्रान्धसः । विद्मा हि त्वा हरिवः पृत्सु सासहिमधृष्टं चिद्दधृष्वणिम् ॥
हे पुरूवसो (बहुधन), इन्द्र! सुते हुए सोम-रस के आनन्द-रस पर अपने को उँडेल दे। हे हरिवः (हरि-अश्वों के स्वामी), हम तुम्हें जानते हैं—युद्धों में विजयी, और जहाँ कोई टिक न सके वहाँ भी धैर्य से धृष्ट।
Mantra 4
अप्रामिसत्य मघवन्तथेदसदिन्द्र क्रत्वा यथा वशः । सनेम वाजं तव शिप्रिन्नवसा मक्षू चिद्यन्तो अद्रिवः ॥
हे मघवन्, अ-प्रामिसत्य (अच्युत सत्य वाले), ऐसा ही हो, हे इन्द्र—तुम्हारी क्रतु (संकल्प-शक्ति) से, जैसा तुम्हारा वश (इच्छा) हो। हे शिप्रिन् (बलवान जबड़े वाले), अद्रिवः (वज्र/शिला-धारी), तुम्हारी सहायता से हम वाज (बल-समृद्धि) प्राप्त करें—हम बढ़ते हुए, शीघ्र ही।
Mantra 5
शग्ध्यू षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । भगं न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि ॥
हे शचीपति इन्द्र! अपनी समस्त ऊतियों (सहायताओं) सहित हमें निश्चय ही बल प्रदान कर। क्योंकि हम, हे शूर, भाग (भग) के समान, तुम्हारे—यशस्वी, वसु-वित् (समृद्धि के दाता/खोजी)—अनुगामी होकर तुम्हारे पथ में चलते हैं।
Mantra 6
पौरो अश्वस्य पुरुकृद्गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः । नकिर्हि दानं परिमर्धिषत्त्वे यद्यद्यामि तदा भर ॥
हे देव! तुम ही अश्व के प्राचीन स्रोत हो, और गवों (किरण-गवों) के लिए बहु-कर्मा; तुम स्वर्णमय उत्स (स्रोत) हो। तुम्हारे भीतर जो दान है, उसे कोई भी घटा नहीं सकता। मैं जिस-जिस दिशा/पथ पर जाऊँ, वहीं से मेरे लिए वह भरकर ले आ—समृद्धि का वह दान।
Mantra 7
त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन्गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥
तुम ही निश्चय चलायमान साधक के पास आओ; हमारे वसु-त्तय (सच्चे धन की वृद्धि) के लिए भग (भाग्य/आनन्द-भाग) को प्रकट करो। हे मघवन्! गवि-ष्टय (किरणों की विजय) के लिए उठो और उँडेलो; हे इन्द्र! इष्टय (अश्व-बल की प्राप्ति) के लिए उठो।
Mantra 8
त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे । आ पुरंदरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे ॥
हे इन्द्र! तुम दान के लिए यूथों में सहस्रों और शतों को ढेर कर देते हो—समृद्धि की उदारता से। हम, प्रेरित वाणी वाले विप्र, गाते हुए सहायता के लिए पुरंदर इन्द्र को अपने निकट उपस्थित करते हैं।
Mantra 9
अविप्रो वा यदविधद्विप्रो वेन्द्र ते वचः । स प्र ममन्दत्त्वाया शतक्रतो प्राचामन्यो अहंसन ॥
हे इन्द्र! यह तुम्हारा वचन—चाहे किसी अविप्र ने रचा हो या किसी विप्र ने—तुम्हारे प्रति अग्र-मन होकर बढ़ने वाले को आनन्दित और दृढ़ करता है, हे शतक्रतु; और उसे ‘अहं’ में विजयी, आत्म-स्थिर बनाता है।
Mantra 10
उग्रबाहुर्म्रक्षकृत्वा पुरंदरो यदि मे शृणवद्धवम् । वसूयवो वसुपतिं शतक्रतुं स्तोमैरिन्द्रं हवामहे ॥
यदि उग्रबाहु, पुरंदर, मेरी पुकार सुन ले—तो हम वसूयव, वसु-पति, शतक्रतु इन्द्र को स्तोत्रों से आवाहन करते हैं।
Mantra 11
न पापासो मनामहे नारायासो न जळ्हवः । यदिन्न्विन्द्रं वृषणं सचा सुते सखायं कृणवामहै ॥
हम अपने को न पापी मानते हैं, न वैरभाव रखने वाले, न कुटिल-प्रेरणा वाले; क्योंकि अब हम निचोड़े हुए सोम के समीप, बलवान् वृषभ इन्द्र को अपना सखा और सहचर बनाना चाहते हैं।
Mantra 12
उग्रं युयुज्म पृतनासु सासहिमृणकातिमदाभ्यम् । वेदा भृमं चित्सनिता रथीतमो वाजिनं यमिदू नशत् ॥
युद्धों में हम उग्र शक्ति को जूते हैं—अजेय, विजयी, अदा्भ्य; जो ऋण-बन्धन को काट देता है। वह भ्रम-परिवर्तन को भी जानता है और फिर भी जीतता है; रथियों में श्रेष्ठ वही वाजिन् है, जिसे वह परिपूर्ण बल-समृद्धि सचमुच प्राप्त होती है।
Mantra 13
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि । मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि ॥
हे इन्द्र, जिससे भी हम भय करते हैं, उसी से हमें अभय कर दे। हे मघवन्, अपना जय-बल हमें प्रदान कर; अपनी ऊतियों से द्वेषियों को तितर-बितर कर, शत्रु-आक्रमणों को तितर-बितर कर, उन्हें दूर हटा।
Mantra 14
त्वं हि राधस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विधतः । तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे ॥
हे राधस्पते! तू ही राधा (दान‑समृद्धि) का स्वामी है; विधाता (यजमान) के लिए महान् क्षय (निवास‑समृद्धि) का अधिपति है। इसलिए हम, सोम को निचोड़कर, हे मघवन् इन्द्र, हे गिर्वण (स्तुतिप्रिय), तुझे आवाहन करते हैं।
Mantra 15
इन्द्रः स्पळुत वृत्रहा परस्पा नो वरेण्यः । स नो रक्षिषच्चरमं स मध्यमं स पश्चात्पातु नः पुरः ॥
इन्द्र—प्रकट और विजयी—वृत्रहा, दूर से रक्षक, हमारा वरेण्य (वरणीय) बल: वह हमारे अंतिम चरण की और मध्य चरण की रक्षा करे; वह हमें पीछे से और आगे से बचाए।
Mantra 16
त्वं नः पश्चादधरादुत्तरात्पुर इन्द्र नि पाहि विश्वतः । आरे अस्मत्कृणुहि दैव्यं भयमारे हेतीरदेवीः ॥
हे इन्द्र! तू हमें पीछे से, नीचे से, ऊपर से और आगे से—सब ओर से—दृढ़ता से बचा। हमारे से दूर कर दे दैव्य (परलोक/अतिदैव) से उत्पन्न भय को; दूर कर दे शत्रु की चोटों को, अदैवी शक्तियों को।
Mantra 17
अद्याद्या श्वःश्व इन्द्र त्रास्व परे च नः । विश्वा च नो जरितॄन्त्सत्पते अहा दिवा नक्तं च रक्षिषः ॥
आज-आज, और फिर आज-आज; कल-कल तक भी—हे इन्द्र, हमारी रक्षा कर; और जो परे है उससे भी हमें बचा। हे सत्पते, हमारे सब स्तोताओं की दिन में भी और रात में भी रक्षा करते रहो।
Mantra 18
प्रभङ्गी शूरो मघवा तुवीमघः सम्मिश्लो विर्याय कम् । उभा ते बाहू वृषणा शतक्रतो नि या वज्रं मिमिक्षतुः ॥
भेदन करने वाला, शूरवीर, महादानी, विशाल दानवाला—वह इन्द्र पराक्रम-कर्म के लिए सन्नद्ध होकर एकत्रित है। हे शतक्रतो, वृषभ-बल वाले, तेरे दोनों बाहु वज्र को नीचे रखकर उसे दृढ़ आसन में जमाएँ और दबाएँ।
It is an invitation hymn asking Indra to hear the poet’s call, come close for Soma-drinking, and grant strength, victory, and wealth by breaking obstacles.
In Vedic ritual Soma is the energizing offering that delights Indra and is believed to intensify his heroic power, making him swift to help the worshippers.
Purandara means “breaker of strongholds/fortresses.” Here it describes Indra as the one who shatters closed, resistant powers—both in outer conflict and inner struggle.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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