
Sukta 8.60
Agni
Gāyatrī/Anuṣṭubh-like short meter (uncertain; needs metrical verification)
यह सूक्त अग्नि का, चुने हुए होतृ के रूप में, आवाहन है—उन्हें यज्ञ के लिए आने और बर्हिस पर विराजकर यज्ञ का संचालन करने तथा हवि को देवों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करता है। इसमें बार-बार अग्नि से रक्षण की याचना की गई है—विशेषतः रक्षस् (शत्रु/तमसी शक्तियों), यातु (जादू-टोना), विघ्न-बाधा, अमंगल/दुःस्थिति और क्षुधा से—और साथ ही बल, वृद्धि तथा सफल लाभ (वाज) की प्रार्थना भी की गई है। समग्रतः यह अग्नि को यज्ञ-पुरोहित और निकट, विश्वसनीय रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है, जो यजमान के पथ को सुरक्षित करता है।
Mantra 1
अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे । आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे ॥
हे अग्नि! अपने अग्नियों सहित आओ; हम तुम्हें होता के रूप में वरण करते हैं। सुव्यवस्थित हविष्मती आहुति तुम्हें अभिषिक्त करे; हे यजिष्ठ! पवित्र बर्हि पर आकर आसन ग्रहण करो।
Mantra 2
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः स्रुचश्चरन्त्यध्वरे । ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहेऽग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम् ॥
क्योंकि, हे सहस के सूनो, हे अङ्गिरस! अध्वर में स्रुचें सचमुच तुम्हारी ओर चलती हैं। हम घृत-केश, ऊर्ज के नपात—यज्ञों में प्राचीन—अग्नि का अन्वेषण करते हैं।
Mantra 3
अग्ने कविर्वेधा असि होता पावक यक्ष्यः । मन्द्रो यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यो विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः ॥
हे अग्नि! तू कवि और वेधा है; तू होता है, पावक है—यज्ञ करने को तत्पर। तू आनन्दमय, अध्वरों में अति-यजिष्ठ, यज्ञों में स्तुत्य; विप्रों के उज्ज्वल मन्मों (प्रेरित विचारों) से दीप्त होता है।
Mantra 4
अद्रोघमा वहोशतो यविष्ठ्य देवाँ अजस्र वीतये । अभि प्रयांसि सुधिता वसो गहि मन्दस्व धीतिभिर्हितः ॥
हे यविष्ठ! अद्रोघ होकर देवों को निरन्तर यहाँ वहन कर, वीतये—इष्ट भोग के लिए। हे वसु! सुसंस्कृत प्रयांसि (सुव्यवस्थित अर्पण) की ओर आ; धीतियों से हित होकर मन्दस्व—आनन्द कर।
Mantra 5
त्वमित्सप्रथा अस्यग्ने त्रातॠतस्कविः । त्वां विप्रासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वेधसः ॥
हे अग्ने! तू ही इस (विश्व) का सप्रथा—विस्तार करने वाला; तू ऋत का त्राता और कवि है। वेधस् विप्र, तुझे समिधान कर दीदिवान् ज्वाला बनाकर, तुझी की ओर आकर अर्पण और बोधकर्म करते हैं।
Mantra 6
शोचा शोचिष्ठ दीदिहि विशे मयो रास्व स्तोत्रे महाँ असि । देवानां शर्मन्मम सन्तु सूरयः शत्रूषाहः स्वग्नयः ॥
हे अति-दीप्तिमान् (अग्नि), प्रज्वलित हो, और भी अधिक चमक; जन-समुदाय के लिए प्रकाशमान हो। हमारे स्तोत्र में ‘मयः’ (आनन्द/कल्याण) प्रदान कर; क्योंकि तू महान् है। मेरे शूरवीर देवों के शरण-स्थल में निवास करें—शत्रु-विजयी, अपने भीतर सु-अग्नि (स्वग्नि) धारण करने वाले।
Mantra 7
यथा चिद्वृद्धमतसमग्ने संजूर्वसि क्षमि । एवा दह मित्रमहो यो अस्मध्रुग्दुर्मन्मा कश्च वेनति ॥
हे अग्ने, जैसे तू पृथ्वी पर उगी हुई घनी झाड़ी/जाल को भी भस्म कर देता है, वैसे ही, हे महाबलों के मित्र, जो कोई हमें द्रोह करे—कोई भी दुर्मना, जो जीतना चाहे—उसे पूर्णतः जला दे।
Mantra 8
मा नो मर्ताय रिपवे रक्षस्विने माघशंसाय रीरधः । अस्रेधद्भिस्तरणिभिर्यविष्ठ्य शिवेभिः पाहि पायुभिः ॥
हमें नश्वर शत्रु के हवाले न कर; न अन्धकार के रक्षक के, न दुष्ट-वचन बोलने वाले के। हे यविष्ठ्य (अत्यन्त युवा) अग्ने, अच्युत तरणियों (पार कराने वाली शक्तियों) से और शुभ पायुभिः (रक्षक-आवरणों) से हमारी रक्षा कर।
Mantra 9
पाहि नो अग्न एकया पाह्युत द्वितीयया । पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो ॥
हे अग्नि, एक शक्ति से हमारी रक्षा कर; और दूसरी से भी रक्षा कर। हे ऊर्जाओं के स्वामी, वाणी के तीन स्तुतिगीतों से हमारी रक्षा कर; हे वसु, चार प्रकार की (रक्षा) से हमारी रक्षा कर।
Mantra 10
पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्णः प्र स्म वाजेषु नोऽव । त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय आपिं नक्षामहे वृधे ॥
हर भक्षक राक्षस-बल से, हे अग्नि, हमारी रक्षा कर; और हमारे वाजों (बल-समृद्धियों) में हमें आगे बढ़ा। क्योंकि हे निकटतम, देवताओं की वृद्धि के लिए हम तुझे ही निकटतम आश्रय—आपि—के रूप में प्राप्त करते हैं।
Mantra 11
आ नो अग्ने वयोवृधं रयिं पावक शंस्यम् । रास्वा च न उपमाते पुरुस्पृहं सुनीती स्वयशस्तरम् ॥
हे अग्नि, पावक, हमारे पास वयो-वर्धक रयि—प्रशंसनीय धन—ले आ, जो आत्मा द्वारा स्तुत्य है। और हे उपमाते, हमें वह भी दे—बहु-आकांक्षित समृद्धि: सुनीति (सद्गति/सद्नीत) और अधिक स्वयशस् (स्वयं-प्रकाशित) यश।
Mantra 12
येन वंसाम पृतनासु शर्धतस्तरन्तो अर्य आदिशः । स त्वं नो वर्ध प्रयसा शचीवसो जिन्वा धियो वसुविदः ॥
जिसके द्वारा हम युद्धों में, उमड़ती सेनाओं को चीरते हुए, आर्य-मार्गों/दिशाओं की ओर बढ़कर विजय पाते हैं—हे शचीवस् (प्रभावी शक्ति के स्वामी), तू हमें अपने प्रयत्न-बल से बढ़ा; हमारी धियों को प्रेरित कर, ताकि वे वसु-विद्—सच्चे धन की खोज करने वाली—हो जाएँ।
Mantra 14
नहि ते अग्ने वृषभ प्रतिधृषे जम्भासो यद्वितिष्ठसे । स त्वं नो होतः सुहुतं हविष्कृधि वंस्वा नो वार्या पुरु ॥
हे अग्ने, वृषभ (बलवान बैल) — जब तू अपने पराक्रम में स्थिर होकर प्रकट होता है, तब तेरे जबड़ों का प्रतिरोध कोई नहीं कर सकता। इसलिए, हे हमारे होतृ, हमारे हवि को सुहुत—भली-भाँति आहुति—बना; हमारे लिए बहुत-से वरणीय (इच्छित) वसु जीत ला।
Mantra 15
शेषे वनेषु मात्रोः सं त्वा मर्तास इन्धते । अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि ॥
तेरी दो माताओं के विश्राम-वनों में भी, मर्त्य जन तुझे एकत्र प्रज्वलित करते हैं। हे हविष्कृत (आहुति-कर्ता), तू अतन्द्र—अथक—होकर हव्यों को वहन करता है; और तब ही तू देवों के बीच राज्य करता है।
Mantra 16
सप्त होतारस्तमिदीळते त्वाग्ने सुत्यजमह्रयम् । भिनत्स्यद्रिं तपसा वि शोचिषा प्राग्ने तिष्ठ जनाँ अति ॥
सात होतृ-शक्तियाँ उसी तुम्हारी स्तुति करती हैं, हे अग्नि—तुम, जिन्हें छोड़ना कठिन है, जो अथक हो। तपस् से तुम शिला को चीर देते हो, और अपने विस्तीर्ण-दीप्त शोचिष् से; हे अग्नि, अग्रभाग में स्थित हो, और हमें जन-सीमाओं के परे ले चलो।
Mantra 17
अग्निमग्निं वो अध्रिगुं हुवेम वृक्तबर्हिषः । अग्निं हितप्रयसः शश्वतीष्वा होतारं चर्षणीनाम् ॥
अग्नि पर अग्नि—हम तुम्हें पुकारते हैं, हे अध्रिगु (अडिग-बलवान), हे बिछे हुए बर्हिस् वाले। हम अग्नि को बुलाते हैं—हम, जो अर्पणों को यथाविधि रखते हैं—जनताओं के शाश्वत होतृ को।
Mantra 18
केतेन शर्मन्त्सचते सुषामण्यग्ने तुभ्यं चिकित्वना । इषण्यया नः पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये ॥
किस केतु (चिह्न) से, और किस शर्मन् (आश्रय) में, वे तुम्हारे साथ जुड़ते हैं, हे सुषामन् अग्नि—तुम्हारे लिए, जाग्रत-चेतना से? इषण्यया (प्रेरक शक्ति) से हमारे लिए बहुरूप समृद्धि ले आओ; सहायता के लिए निकटतम वाज (बल-सम्पदा) प्रदान करो।
Mantra 19
अग्ने जरितर्विश्पतिस्तेपानो देव रक्षसः । अप्रोषिवान्गृहपतिर्महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः ॥
हे अग्नि, हे स्तोता के सहचर, हे विश्पति (गृहों के स्वामी)! हे देव, तू प्रज्वलित होकर रक्षस् (तमसी शक्तियों) के विरुद्ध दहकता है। तू अप्रोषिवान्—अविचल, गृहपति—गृह का स्वामी—महान् है; दिवः का पायु—स्वर्ग का रक्षक—और दुरोणयुः—सच्चे गृह की अभिलाषा करने वाला है।
Mantra 20
मा नो रक्ष आ वेशीदाघृणीवसो मा यातुर्यातुमावताम् । परोगव्यूत्यनिरामप क्षुधमग्ने सेध रक्षस्विनः ॥
हे आघृणीवस् (विस्तीर्ण-दीप्तिमान), रक्षस् (अंधकार-बल) हममें प्रवेश न करे; यातु की यातुर्या—जादुई हिंसा—हम पर न आए। पथ को रोकने वाली अनिराम अमंगलता को दूर हटा; क्षुधा को बाहर निकाल; हे अग्नि, रक्षस्विन् (शत्रु-रक्षक) शक्तियों को रोक, प्रतिहत कर।
It invites Agni to preside as the sacrificial priest (hotṛ), accept offerings, and protect the worshippers by driving away hostile forces, sorcery, obstacles, and hunger.
Because Agni is the most immediately accessible god in the ritual—present as the visible fire—and is relied on as a close, dependable support for strength and spiritual increase.
It can be recited at the start of a fire-offering (homa) or during daily lamp/fire worship to invoke clarity, protection, and the removal of negativity and impediments, alongside a simple ghee offering.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.