Rig Veda Sukta 5
Mandala 8Sukta 539 Mantras

Sukta 5

Sukta 8.5

Rishi

Kaṇva lineage (Aṣṭaka 8 Kaṇva collection)

Devata

Uṣas (Dawn) (probable from aruṇa + spreading beam imagery; hymn context continues with Aśvins and Uṣas)

Chandas

Gāyatrī (probable; requires verification)

काण्व-संग्रह का यह सूक्त उषस् की दीप्तिमय छवि से आरम्भ होता है—वही सत्य प्रभात जो दूर से आती है और अपनी किरणों को चारों दिशाओं में फैलाकर जीवन तथा ऋत-युक्त (सही) गति को जगाती है। आगे चलकर स्तुति का ढाँचा अश्विनों की ओर उन्मुख होकर समृद्धि की याचना बन जाता है—गोधन, सन्तान, बल और पोषक ‘इष्’ (वृद्धि/पोषण) के लिए। अंत में यह लाभ के सत्य मार्ग की तुलना खोखले प्रदर्शन से करता है और उदार दाताओं (चेदय) को उचित प्रगति के आदर्श के रूप में प्रशंसित करता है।

Recitation with translationRig Veda 8.5

Mantras

Mantra 1

दूरादिहेव यत्सत्यरुणप्सुरशिश्वितत् । वि भानुं विश्वधातनत् ॥

दूर से ही, मानो यहीं हमारे सामने—वह सत्यस्वरूपिणी, अरुण-दीप्तिमती, चमक उठी; उसने अपनी भानु (किरण) को सर्वत्र फैला दिया।

Mantra 2

नृवद्दस्रा मनोयुजा रथेन पृथुपाजसा । सचेथे अश्विनोषसम् ॥

हे अद्भुतकर्मी अश्विनौ, मन से जुते हुए, अपने विस्तीर्ण-दीप्त रथ के साथ—नरवत् (मानव-हितकारी) सामर्थ्य से—तुम उषस् (प्रभात) के संग चलते हो।

Mantra 3

युवाभ्यां वाजिनीवसू प्रति स्तोमा अदृक्षत । वाचं दूतो यथोहिषे ॥

हे वाजिनीवसू, तुम दोनों के प्रति स्तोत्र प्रत्युत्तर में दृष्टि करते हैं; दूत के समान वाणी तुम्हारे पास आती है, और तुममें ही आसन ग्रहण करती है।

Mantra 4

पुरुप्रिया ण ऊतये पुरुमन्द्रा पुरूवसू । स्तुषे कण्वासो अश्विना ॥

हमारी सहायता के लिए अति-प्रिय, अत्यन्त आनन्ददायी, बहु-सम्पदा से युक्त—ऐसे अश्विनौ की हम कण्वगण स्तुति करते हैं।

Mantra 5

मंहिष्ठा वाजसातमेषयन्ता शुभस्पती । गन्तारा दाशुषो गृहम् ॥

अति-दानशील, बल-लाभ में अति-विजयी, प्रेरित करने वाले—हे शोभा के स्वामी! दाता (यजमान) के घर पधारो।

Mantra 6

ता सुदेवाय दाशुषे सुमेधामवितारिणीम् । घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् ॥

सुदेव के लिए अर्पण करने वाले दाता को वह सुमेधा—जो पार उतारने वाली रक्षिका है—उँडेलो; और घृत से ‘गव्यूति’—गोरश्मियों का पथ—को सींचकर पुष्ट करो।

Mantra 7

आ नः स्तोममुप द्रवत्तूयं श्येनेभिराशुभिः । यातमश्वेभिरश्विना ॥

हमारे स्तोत्र के निकट शीघ्र दौड़कर आओ; तीव्र, वेगवान श्येन-शक्तियों के साथ आओ। हे अश्विनौ, अपने अश्वों सहित आकर उपस्थित होओ।

Mantra 8

येभिस्तिस्रः परावतो दिवो विश्वानि रोचना । त्रीँरक्तून्परिदीयथः ॥

जिन शक्तियों से तुम तीन दूरस्थ प्रदेशों को और द्युलोक के समस्त रोचन—प्रकाशमय स्थानों—को पार करते हो, उन्हीं से तुम तीन ऋतुओं/काल-चक्रों के चारों ओर परिक्रमा करते हो।

Mantra 9

उत नो गोमतीरिष उत सातीरहर्विदा । वि पथः सातये सितम् ॥

और हमें गोमती इष—प्रकाश-समृद्ध प्रेरणाएँ—दो; और अहर्विदा साती—दिन को जानने वाली विजय—भी दो। हमारी सिद्धि के लिए पथों को विस्तृत और निर्मल कर दो।

Mantra 10

आ नो गोमन्तमश्विना सुवीरं सुरथं रयिम् । वोळ्हमश्वावतीरिषः ॥

हे अश्विनौ, हमारे पास गो-सम्पदा से युक्त, अश्व-सम्पदा से युक्त, सुवीर (वीर्यवान) और सुरथ (सुगति-रथ) वाला रयि—समृद्धि—लाओ; हमारे इष (प्रेरणाओं) के अश्व-बलों द्वारा वहन की हुई उस पूर्णता को यहाँ पहुँचाओ।

Mantra 11

वावृधाना शुभस्पती दस्रा हिरण्यवर्तनी । पिबतं सोम्यं मधु ॥

निरन्तर वर्धमान, शोभा और सुसामंजस्य-शक्ति के स्वामी, हे दस्र (अद्भुत) अश्विनौ, जिनकी गतियाँ स्वर्णमय पथों पर मुड़ती हैं—सोम्य मधु, सोम-रस का मधुर आस्वाद पियो।

Mantra 12

अस्मभ्यं वाजिनीवसू मघवद्भ्यश्च सप्रथः । छर्दिर्यन्तमदाभ्यम् ॥

हमारे लिए—और उन सब मगवन् (दानशील) जनों के लिए भी—हे वाजिनीवसू (विजयी बल और समृद्धि के स्वामी), विस्तृत आश्रय-शान्ति लाओ; अदा्भ्य (अपराजेय) रक्षक-छत्र, अटल संरक्षण यहाँ प्रदान करो।

Mantra 13

नि षु ब्रह्म जनानां याविष्टं तूयमा गतम् । मो ष्वन्याँ उपारतम् ॥

हे जनों के ब्रह्म (प्रेरित वाणी) के प्रति—अत्यन्त शीघ्र नीचे उतर आओ, तुरन्त आ पहुँचो। अन्य पुकारों की ओर मत मुड़ो; यहाँ ही निकट आओ, जहाँ आत्मा की वाणी तैयार है।

Mantra 14

अस्य पिबतमश्विना युवं मदस्य चारुणः । मध्वो रातस्य धिष्ण्या ॥

हे अश्विनौ, इसका पान करो; तुम दोनों सुन्दर मद (आनन्द-उन्माद) के योग्य भोक्ता हो। हे धिष्ण्य (आसनस्थ/अधिष्ठाता) शक्तियो, दत्त मधु-रस का पान करो, और वह हमारे भीतर अपना सम्यक् कार्य स्थापित करे।

Mantra 15

अस्मे आ वहतं रयिं शतवन्तं सहस्रिणम् । पुरुक्षुं विश्वधायसम् ॥

हमारे लिए रयि को यहाँ वहन करो—ऐसी समृद्धि जो सैकड़ों-हज़ारों में बढ़े; अनेक वृद्धि-रूपों से परिपूर्ण; जो सर्व शक्तियों को धारण करे और समग्र अस्तित्व का पोषण करे।

Mantra 16

पुरुत्रा चिद्धि वां नरा विह्वयन्ते मनीषिणः । वाघद्भिरश्विना गतम् ॥

हे नरा (वीर-शक्तियो), पुरुत्रा—अनेक स्थानों में—मनीषी जन तुम्हें ही पुकारते हैं। हे अश्विनौ, वाघद्भिः—ऋषियों की उन्नत वाणी (हविस्-वहिनी) के साथ—आओ।

Mantra 17

जनासो वृक्तबर्हिषो हविष्मन्तो अरंकृतः । युवां हवन्ते अश्विना ॥

जनसमूह, वृक्त-बर्हिषः—विखेरी पवित्र कुशा-घास सजाकर—हविष्मन्तः, अरंकृताः—यथाविधि सिद्ध होकर—हे अश्विनौ, तुम दोनों को हवन्ते: पुकारते हैं।

Mantra 18

अस्माकमद्य वामयं स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः । युवाभ्यां भूत्वश्विना ॥

आज हमारे लिए यह स्तोम तुम्हारे हेतु—वाहिष्ठः, अन्तमः—सबसे अधिक वहन करने वाला, सबसे निकटतम है; हे अश्विनौ, यह यु॒वाभ्याम्—तुम दोनों तक—पहुंचाने वाला सेतु बन जाए।

Mantra 19

यो ह वां मधुनो दृतिराहितो रथचर्षणे । ततः पिबतमश्विना ॥

हे अश्विनौ, रथ के स्वामी! जो मधु-रस से भरी दृति (चर्म-थैली) तुम्हारे लिए रखी गई है—उससे पियो।

Mantra 20

तेन नो वाजिनीवसू पश्वे तोकाय शं गवे । वहतं पीवरीरिषः ॥

उसी (स्वीकारे हुए मधु-आनन्द) से, हे वाजिनीवसू, हमारे लिए पोषणकारी वृद्धि लाओ—हमारी शक्तियों के लिए कल्याण, हमारे तोक (संतति/आत्म-शिशु) के लिए, और गो (गवः—दीप्त किरण/ज्ञान-धेनु) के लिए शुभता; पीवरी इषः (समृद्ध पोषण-प्रेरणाएँ) वहन करो।

Mantra 21

उत नो दिव्या इष उत सिन्धूँरहर्विदा । अप द्वारेव वर्षथः ॥

और हमारे लिए दिव्य इषः (प्रेरणाएँ) बरसाओ; और अहर्विद् (दिन-ज्ञ) के द्वारा सिन्धुओं (प्रवाहों/नदियों) को भी—द्वार खोलने की भाँति खोलकर उँडेल दो, हे अश्विनौ।

Mantra 22

कदा वां तौग्र्यो विधत्समुद्रे जहितो नरा । यद्वां रथो विभिष्पतात् ॥

हे नरा (अश्विनौ), समुद्र में त्यागे गए तौग्र्य को तुम कब (अपनी) सेवा में लगाओगे—जब तुम्हारा रथ अपनी शक्तियों से वेगपूर्वक उड़ता-सा दौड़ता है? वैसे ही संकट में हमारी ओर भी तुम्हारी शीघ्र रक्षक-प्राप्ति पहुँचे।

Mantra 23

युवं कण्वाय नासत्या ऋपिरिप्ताय हर्म्ये । शश्वदूतीर्दशस्यथः ॥

हे नासत्यौ, तुम दोनों कण्व के लिए—हर्म्य (उच्च गृह) में—अक्षत, अविकल, निरन्तर अपनी सहायताएँ प्रदान करते हो; इस प्रकार तुम सदा स्थिर साधक का पालन-पोषण करते हो।

Mantra 24

ताभिरा यातमूतिभिर्नव्यसीभिः सुशस्तिभिः । यद्वां वृषण्वसू हुवे ॥

उन सहायताओं के साथ—जो सदा नवीन और सुशस्ति (सुन्दर, फलदायी) हैं—हमारे पास आओ, जब मैं तुम्हें, हे वृषण्वसू, पुकारता हूँ। तुम्हारी नूतन शक्तियाँ हमारे कर्म में प्रविष्ट हों।

Mantra 25

यथा चित्कण्वमावतं प्रियमेधमुपस्तुतम् । अत्रिं शिञ्जारमश्विना ॥

जैसे तुमने कभी कण्व की सहायता की, यज्ञ में स्तुत प्रियमेध की, और संकट के दबाव में अत्रि शिञ्जार की—वैसे ही, हे अश्विनौ, उसी रक्षक शक्ति के साथ अब हमारी पुकार पर आओ।

Mantra 26

यथोत कृत्व्ये धनेंऽशुं गोष्वगस्त्यम् । यथा वाजेषु सोभरिम् ॥

जैसे कठिन-प्राप्त धन में (तुमने सहायता की), और तेजस्वी गौ-सम्पदा के बीच अगस्त्य को संभाला—वैसे ही वाजों के क्षेत्र में सोभरि को बल दो; ताकि हर प्रयत्न में तुम्हारा पराक्रम हमारे लिए कार्य करे।

Mantra 27

एतावद्वां वृषण्वसू अतो वा भूयो अश्विना । गृणन्तः सुम्नमीमहे ॥

हे वृषण्वसू, इतना ही हमने तुम्हें कहा; और अब, हे अश्विनौ, इससे भी अधिक के लिए हम याचना करते हैं—स्तुति करते हुए हम तुम्हारे सुम्न, तुम्हारी प्रसन्न अनुग्रह-शक्ति, वह अंतःसुख माँगते हैं जो अस्तित्व को सम्यक् करता है।

Mantra 28

रथं हिरण्यवन्धुरं हिरण्याभीशुमश्विना । आ हि स्थाथो दिविस्पृशम् ॥

हे अश्विनौ! स्वर्ण-जुए से जुते, स्वर्ण-लगामों वाले रथ पर—आओ, प्रकट होकर स्थित होओ; क्योंकि तुम दिवि-स्पृश, स्वर्ग को स्पर्श करने वाले हो। वह ऊर्ध्व-गति हमारी इस यात्रा में प्रवेश करे।

Mantra 29

हिरण्ययी वां रभिरीषा अक्षो हिरण्ययः । उभा चक्रा हिरण्यया ॥

तुम्हारा रथ-ढाँचा स्वर्णमय है, ईषा (धुरा/दण्ड) स्वर्णमय, अक्ष (धुरी) स्वर्णमय; दोनों चक्र भी स्वर्णमय हैं। यह समग्र तेज हमारे पथ को सम और अखण्ड करे।

Mantra 30

तेन नो वाजिनीवसू परावतश्चिदा गतम् । उपेमां सुष्टुतिं मम ॥

उसी (रक्षक) शक्ति से, हे वाजिनीवसू—विजय-सम्पदा के स्वामी—दूरस्थ परावत से भी हमारे पास आओ। मेरी इस सु-स्तुति के निकट आओ, और यह हमारे भीतर तुम्हारी वृद्धि का मार्ग बने।

Mantra 31

आ वहेथे पराकात्पूर्वीरश्नन्तावश्विना । इषो दासीरमर्त्या ॥

दूर परे से रथ हाँकते हुए आओ, हे अश्विनौ; प्राचीन हवियों का आस्वाद लेते हुए। हे अमर्त्य, हमें ‘इष्’ की धाराएँ प्रदान करो—पोषक प्रेरणाएँ, जो आत्मा की यात्रा को अन्न देती हैं।

Mantra 32

आ नो द्युम्नैरा श्रवोभिरा राया यातमश्विना । पुरुश्चन्द्रा नासत्या ॥

दीप्तिमान शक्तियों के साथ, कीर्ति के विस्तार के साथ, और राया—अस्तित्व की पूर्णता—के साथ हमारे पास आओ, हे अश्विनौ। हे नासत्य, बहु-किरणमय, वह उज्ज्वल बहुलता ले आओ जो हमारे स्वभाव को सत्य के लिए निर्मल क्षेत्र बनाती है।

Mantra 33

एह वां प्रुषितप्सवो वयो वहन्तु पर्णिनः । अच्छा स्वध्वरं जनम् ॥

यहाँ तुम्हें, चमकती शक्ति से समृद्ध, पंखों वाले बल वहन करें। सुव्यवस्थित यज्ञ वाले जन के पास आओ—ताकि अर्पण की सही लय भीतर के जीवन की भी सही लय बन जाए।

Mantra 34

रथं वामनुगायसं य इषा वर्तते सह । न चक्रमभि बाधते ॥

हे (अश्विनौ)! जो रथ स्तुति के अनुगान के साथ समस्वर होकर चलता है, जो इषा (पोषक प्रेरणा) को सहचर बनाकर मुड़ता है, और चक्र से टकराकर बाधित नहीं होता—वैसी ही हमारी गति भी भीतर के अवरोध से रहित, ऋत (सही लय) के अनुरूप हो।

Mantra 35

हिरण्ययेन रथेन द्रवत्पाणिभिरश्वैः । धीजवना नासत्या ॥

हे नासत्या! हिरण्य रथ से, ऐसे अश्वों के साथ जिनके ‘हाथ’ भी द्रुत हैं, धीजवन (प्रेरित बुद्धि में वेगवान) होकर आओ; हमारे भीतर प्रवेश करो, और हमारी धि को सत्य में जीवन को आगे ले जाने वाली तेजस्वी गति बना दो।

Mantra 36

युवं मृगं जागृवांसं स्वदथो वा वृषण्वसू । ता नः पृङ्क्तमिषा रयिम् ॥

हे अश्विनौ, वृषण्वसू (आनन्द-वर्षा में समर्थ)! तुम जाग्रत मृग—जागे हुए साधक/अन्वेषी—में प्रसन्न होते हो; तब इषा (अन्तःपोषण-शक्ति) के साथ हमारे लिए रयि (सम्पन्नता/पूर्णता) को हमारे जीवन में मिला दो।

Mantra 37

ता मे अश्विना सनीनां विद्यातं नवानाम् । यथा चिच्चैद्यः कशुः शतमुष्ट्रानां ददत्सहस्रा दश गोनाम् ॥

हे अश्विनौ! मेरे लिए प्राचीनों और नित-नवीनों की ‘सनीना’—विजय-प्राप्ति—को तुम जानो, उसे सिद्ध करो। जैसे कभी चैद्य कशु ने उदारता से सौ ऊँट और दस सहस्र गौएँ दान कीं, वैसे ही तुम हमें भी प्रचुर वृद्धि प्रदान करो—शक्तियाँ और प्रकाश-किरणें, सहस्रों और दशकों में।

Mantra 38

यो मे हिरण्यसंदृशो दश राज्ञो अमंहत । अधस्पदा इच्चैद्यस्य कृष्टयश्चर्मम्ना अभितो जनाः ॥

जो मेरे लिए स्वर्ण-सदृश शक्तियों को—दस राजाओं की—विस्तृत करता है; ऐसा कि चैद्य के जन भी, अपने चरणों में नीचे रखे हुए, संरक्षण-धर्म के आवरण में चारों ओर से घिरे खड़े रहें। इस प्रकार दिव्य वृद्धि साधक के चारों ओर रक्षित व्यवस्था को स्थापित करती है।

Mantra 39

माकिरेना पथा गाद्येनेमे यन्ति चेदयः । अन्यो नेत्सूरिरोहते भूरिदावत्तरो जनः ॥

इस पथ से—केवल गीत-प्रदर्शन के—कोई भी न जाए; ये चैद्य जन इस मार्ग से नहीं चलते। कोई अन्य सूरी (दाता-पोषक) उन्हें सचमुच नहीं लाँघता; वे बहु-दान में अधिकतर हैं—वृद्धि के सत्य पथ को चुनने वाली आत्मा की सही गति का प्रतिरूप।

Frequently Asked Questions

It begins with clear Dawn (Uṣas) imagery—ruddy light and spreading beams—but later verses function as Aśvin petitions for nourishment and well-being. Many Mandala 8 hymns move fluidly between closely linked morning deities.

Cosmically it is sunrise filling the world with light; inwardly it points to clarity spreading through the mind, making right perception and right action possible.

That closing praise highlights that true prosperity is tied to right conduct and generosity. The hymn contrasts genuine increase and giving with mere show, presenting worthy patrons as models of the ‘right path.’

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