
Sukta 8.4
Kaṇva (Kaṇva lineage; Kaṇvāḥ)
Indra
Triṣṭubh (probable; needs verification)
इन्द्र को समर्पित यह सूक्त उसे हर दिशा से पुकारता है और सोम-निष्पादन के यज्ञ में शीघ्र आने का आग्रह करता है; उसे विजयी, विघ्नों को तोड़ने वाला कहा गया है। इसमें अनुष्ठान की तात्कालिकता (अध्वर्यु को सोम-धारा प्रवाहित करने के लिए प्रेरित करना) और इन्द्र की विश्वव्यापी भूमिका—वृत्रहन्ता—एक साथ बुनी गई है। अंत में समृद्धि की ऐसी छवि आती है कि प्रकृति की स्थिर शक्तियाँ भी मानो वृद्धि को ‘वितरित’ करती दिखाई देती हैं।
Mantra 1
यदिन्द्र प्रागपागुदङ्न्यग्वा हूयसे नृभिः । सिमा पुरू नृषूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्ध तुर्वशे ॥
हे इन्द्र! चाहे तुम पूर्व से, या पश्चिम से, ऊपर से या नीचे से मनुष्यों द्वारा पुकारे जाओ—तुम ही वह बहुरूप, बहु-शक्ति वाले हो, जो नृ-तेज (मानवीय आत्मबल) से उत्पन्न है। इस साधक के लिए विजयी होकर आगे बढ़ो; तुर्वश के लिए, जो प्रयत्नशील आत्मा है, जयकारी बल बनकर आओ।
Mantra 2
यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा । कण्वासस्त्वा ब्रह्मभिः स्तोमवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि ॥
चाहे रुमा के साथ, रुशम के साथ, श्यावक के साथ, कृप के साथ—हे इन्द्र! तुम सखा-भाव में आनंदित होते हो; परन्तु कण्व, स्तोम और ब्रह्म (मंत्र) को वहन करते हुए, तुम्हें यहाँ खींच लाते हैं। आओ—हमारे प्रेरित वचन ही तुम्हारा रथ हैं।
Mantra 3
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम् । आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब ॥
जैसे पीत-स्वर्ण वर्ण वाला, प्यासा होकर, तैयार किए गए जल की ओर—अविरत धारा की ओर—जाता है; वैसे ही हमारे निकट-आगमन और पूर्ण-संगम की ओर शीघ्र आओ। कण्वों के बीच सखा-भाव से पीओ; अंतर का आनंद तृप्त हो।
Mantra 4
मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दवो राधोदेयाय सुन्वते । आमुष्या सोममपिबश्चमू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः ॥
हे मघवन् इन्द्र! राधा (समृद्धि) देने वाले, सोम-रस की बूँदें तुम्हें प्रसन्न करें—उस सोम को निचोड़ने वाले यजमान के लिए। तुमने उस ‘अमुष्य’ (प्राचीन/अन्य) का, चमू (पात्र) में निचोड़ा हुआ, ज्येष्ठ सोम पिया; उसी से तुमने अपने भीतर वह विजयी सहस् (बल) धारण किया।
Mantra 5
प्र चक्रे सहसा सहो बभञ्ज मन्युमोजसा । विश्वे त इन्द्र पृतनायवो यहो नि वृक्षा इव येमिरे ॥
तुमने सहस् से सहस् को प्रवर्तित किया; ओज से तुमने उग्र मन्यु (क्रोध/उन्माद) को तोड़ डाला। हे इन्द्र! तुम्हारे समस्त पृतनायव (युद्ध-लोलुप) शत्रु—तुम्हारे विजयी वेग के सामने—कटे वृक्षों की भाँति नीचे ढह जाते हैं।
Mantra 6
सहस्रेणेव सचते यवीयुधा यस्त आनळुपस्तुतिम् । पुत्रं प्रावर्गं कृणुते सुवीर्ये दाश्नोति नमउक्तिभिः ॥
जो सहस्र-सा, यवीयुधा (युवा आयुधों) के समान, तुम्हारे संग चलता है और निकट-स्तुति से तुम्हें प्राप्त होता है—वह सुवीर्य (वीर-शक्ति) के क्षेत्र में अग्रगामी फल के रूप में पुत्र को गढ़ता है; नमः-उक्तियों (वंदन-वचनों) से वह सिद्धि/पूर्णता को प्राप्त करता है।
Mantra 7
मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव । महत्ते वृष्णो अभिचक्ष्यं कृतं पश्येम तुर्वशं यदुम् ॥
हम न डरें, न थकें—तेरी उग्र सख्यता में, हे इन्द्र। हे वृषन् (बलवान), तेरे महान् कर्म का जो अन्तर्दृष्टि में प्रकट हुआ है, उसे हम देखें—(विजयस्वरूप) तुर्वश और यदु को अपने पक्ष में लाने का।
Mantra 8
सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति । मध्वा सम्पृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब ॥
वाम (बाएँ) पथ के साथ फूली-फली समृद्धि प्रवाहित होती है; वृषभ की भाँति उसका दान हर्षित वेग से उमड़ पड़ता है। मधु और सार से संयुक्त वे धाराएँ—हे पूर्णता की धेनुओं—शीघ्र आओ; यहाँ दौड़ो, पियो।
Mantra 9
अश्वी रथी सुरूप इद्गोमाँ इदिन्द्र ते सखा । श्वात्रभाजा वयसा सचते सदा चन्द्रो याति सभामुप ॥
अश्ववान, रथी, सुरूप, तेजस्वी गो-सम्पदा से युक्त—ऐसा है तेरा सखा, हे इन्द्र। शौर्य-भागी, प्राणबल की वृद्धि के साथ वह सदा संग रहता है; नित्य दीप्त वह सभा की ओर आरोहण करता है।
Mantra 10
ऋश्यो न तृष्यन्नवपानमा गहि पिबा सोमं वशाँ अनु । निमेघमानो मघवन्दिवेदिव ओजिष्ठं दधिषे सहः ॥
ऋषि-पशु की भाँति प्यासा होकर, हे इन्द्र, इस पान-स्थान की ओर आ; अपनी वशा (इच्छा) के अनुसार सोम पान कर। हे मघवन्, भीतर-भीतर संचित होते हुए, तू दिन-प्रतिदिन परम ओजस्वी बल को धारण करता है।
Mantra 11
अध्वर्यो द्रावया त्वं सोममिन्द्रः पिपासति । उप नूनं युयुजे वृषणा हरी आ च जगाम वृत्रहा ॥
हे अध्वर्यु, सोम को प्रवाहित कर; इन्द्र को उसकी प्यास है। अब उसने अपने दो बलवान हरि (अश्व) जोत लिए हैं; वृत्रहा समीप आ पहुँचा है।
Mantra 12
स्वयं चित्स मन्यते दाशुरिर्जनो यत्रा सोमस्य तृम्पसि । इदं ते अन्नं युज्यं समुक्षितं तस्येहि प्र द्रवा पिब ॥
दाता जन भी स्वयं ऐसा ही मानता है—जहाँ तू सोम से तृप्ति पाता है। यह तेरा योग्य अन्न है, भली-भाँति छिड़का हुआ और तैयार; इसके पास आ—आगे बढ़, दौड़कर पी।
Mantra 13
रथेष्ठायाध्वर्यवः सोममिन्द्राय सोतन । अधि ब्रध्नस्याद्रयो वि चक्षते सुन्वन्तो दाश्वध्वरम् ॥
हे अध्वर्युजनो, रथ-पथ पर दृढ़ स्थित इन्द्र के लिए सोम निचोड़ो। ब्रध्न (दीप्त) आधार पर अधर्यु (दबाने) के पत्थर कार्यरत दीखते हैं; यज्ञ अर्पित करने वाले सोम-निचोड़ने वाले उस अध्वर (यज्ञकर्म) को प्रकट करते हैं।
Mantra 14
उप ब्रध्नं वावाता वृषणा हरी इन्द्रमपसु वक्षतः । अर्वाञ्चं त्वा सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप ॥
दीप्त ब्रध्न के समीप वे दोनों बलवान हरि (अश्व) फुफकारते हुए इन्द्र को अप्सु (जल) के पार ले जाते हैं। हमारी ओर—प्रत्येक सवन में—यज्ञ-श्रीरूप सात (शक्तियाँ) तुम्हें यहाँ वहन करें।
Mantra 15
प्र पूषणं वृणीमहे युज्याय पुरूवसुम् । स शक्र शिक्ष पुरुहूत नो धिया तुजे राये विमोचन ॥
हम अग्रभाग में पूषण को चुनते हैं—जुए में जुड़ने योग्य, बहुवसु (अनेक संपदाओं) से युक्त। हे शक्र, हे पुरुहूत, हमारी धिया (प्रेरित बुद्धि) को शिक्षित कर; हे विमोचन, तुज (प्रेरणा) के लिए—राय (समृद्धि/धन) हेतु।
Mantra 16
सं नः शिशीहि भुरिजोरिव क्षुरं रास्व रायो विमोचन । त्वे तन्नः सुवेदमुस्रियं वसु यं त्वं हिनोषि मर्त्यम् ॥
हे विमोचन! हमें एक साथ तीक्ष्ण कर, जैसे चर्मकार के हाथ में उस्तरा; और हमें समृद्धि का धन प्रदान कर। तुझमें ही वह सुस्थापित, उषा-सा उदित होने वाला वसु है, जिसे तू नश्वर मनुष्य के भीतर प्रवर्तित करता है।
Mantra 17
वेमि त्वा पूषन्नृञ्जसे वेमि स्तोतव आघृणे । न तस्य वेम्यरणं हि तद्वसो स्तुषे पज्राय साम्ने ॥
हे पूषन्! मैं तुझे तेरे ऋञ्जस—सीधे चलने वाले नेतृत्व में जानता हूँ; हे आघृणे (उष्ण-दीप्तिमान)! मैं तेरा स्तवन करना जानता हूँ। तेरे उस वसो—समृद्धि की सीमा मैं नहीं जानता; इसलिए पज्र के दृढ़ साम-गान से मैं तुझे स्तुषे—प्रशंसित करता हूँ।
Mantra 18
परा गावो यवसं कच्चिदाघृणे नित्यं रेक्णो अमर्त्य । अस्माकं पूषन्नविता शिवो भव मंहिष्ठो वाजसातये ॥
हे आघृणे अमर्त्य! चाहे किरण-गावें (गावः) अपने यवस—चरागाह की ओर दूर चली जाएँ, तेरा रेक्णः—धन सदा स्थिर रहता है। हे पूषन्! हमारे लिए शिव—कल्याणकारी अविता—रक्षक बन; वाजसातये—बल-समृद्धि की विजय के लिए तू सबसे मंहिष्ठ—अत्यन्त उदार हो।
Mantra 19
स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु । राज्ञस्त्वेषस्य सुभगस्य रातिषु तुर्वशेष्वमन्महि ॥
कुरुङ्ग के दिव्य प्रयत्नों में, तथा वेगवान् और सौभाग्यशाली राजा के दानों में—तुर्वशों के बीच की रतियों में—हमने उस स्थिर, ठोस समृद्धि को, जो सौ अश्वों से युक्त है, पहचानकर हृदय में धारण किया है।
Mantra 20
धीभिः सातानि काण्वस्य वाजिनः प्रियमेधैरभिद्युभिः । षष्टिं सहस्रानु निर्मजामजे निर्यूथानि गवामृषिः ॥
प्रेरित धियों से, काण्व के लाभों से—बलवानों से, प्रिय-मेधा और स्वर्ग-विजयी शक्तियों से—हम क्रमशः साठ सहस्र निकालते हैं; ऋषि गवों के यूथों को (रश्मि-गणों को) गुप्तता से बाहर प्रकट करता है।
Mantra 21
वृक्षाश्चिन्मे अभिपित्वे अरारणुः । गां भजन्त मेहनाश्वं भजन्त मेहना ॥
मेरे निकट वास में तो वृक्ष भी मेरे प्रति अनुकूल हो उठे हैं। वे मुझे गौ (किरण) बाँटते हैं, वे मुझे अश्व (बल) बाँटते हैं—वृद्धि देने वाले।
It is an invocation of Indra to come quickly to the Soma sacrifice, praised as the obstacle-slayer who brings victory and material increase like cattle and horses.
Because the hymn is tied to the Soma-pressing ritual: the Adhvaryu’s action of pressing and letting Soma run is the moment that draws Indra near, since Indra is said to thirst for Soma.
In Vedic language, cows and horses symbolize wealth, light, and strength; the hymn asks that Indra’s presence convert the sacrifice into tangible prosperity and sustained power for the worshipper and community.
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