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Sukta 8.24
Indra
Anuṣṭubh (probable; requires pada-length verification against a metrical index)
यह सूक्त इन्द्र वज्रिन् के लिए प्रेरित वाणी (ब्रह्मन्) को “प्रवृत्त” करने का सामूहिक आह्वान है। इसमें उन्हें निर्भीक, परम पुरुषार्थी शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है, जो बाधाओं को तोड़कर विजय प्रदान करते हैं। बार-बार इन्द्र की महिमा को सोम-पीषण और आहुति से जोड़ा गया है, और अध्वर्यु से आग्रह किया गया है कि वह अधिक उन्मादक/उत्साहवर्धक सोमरस उँडेल दे, जिससे निरन्तर बढ़ने वाला वह वीर और अधिक बलवान हो। पृष्ठभूमि में वल-प्रसंग है—गुप्त आवरण और रहस्यमय बन्धन, जिन्हें इन्द्र भेदकर प्रकाशमान “गौओं” (धन, प्रकाश, अंतर्दृष्टि) को मुक्त करते हैं।
Mantra 1
सखाय आ शिषामहि ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे । स्तुष ऊ षु वो नृतमाय धृष्णवे ॥
हे अंतः-यात्रा के सखाओ, वज्रधारी इन्द्र के लिए ब्रह्म (प्रेरित वाणी) को हम प्रवर्तित करें। हाँ, निश्चय ही, तुम्हारे लिए मैं उसे स्तुत करूँ—नरत्म, धृष्णु इन्द्र को, जो साहस से जय करता है।
Mantra 2
शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा । मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि ॥
बल से ही तू प्रसिद्ध है; वृत्र-हत्या से तू वृत्रहा है। हे शूर, अपने दानों से तू दानशीलों से भी आगे है; तू अपरिमित समृद्धियाँ बाँटता है।
Mantra 3
स नः स्तवान आ भर रयिं चित्रश्रवस्तमम् । निरेके चिद्यो हरिवो वसुर्ददिः ॥
हे हरिवो! हमारे द्वारा स्तुत—तू हमारे लिए रयि, चित्रश्रवस्तम (अत्यन्त उज्ज्वल कीर्ति-सम्पन्न) समृद्धि को यहाँ ला। अल्पता (निरेक) में भी तू ही सच्चे वसु (धन) का दाता है।
Mantra 4
आ निरेकमुत प्रियमिन्द्र दर्षि जनानाम् । धृषता धृष्णो स्तवमान आ भर ॥
हे इन्द्र! हमारे लिए निरेकम् (अल्पता से मुक्ति) और जनों को प्रिय जो है—दोनों को ला। हे धृष्णो! धृष्टता से—क्योंकि हम स्तुति करते हैं—उसे यहाँ हमारे जीवन में भर दे।
Mantra 5
न ते सव्यं न दक्षिणं हस्तं वरन्त आमुरः । न परिबाधो हरिवो गविष्टिषु ॥
हे हरिवो! कोई आमुर (जड़ता/मन्दता) तेरे बाएँ या दाएँ हाथ को रोक नहीं सकता; और गविष्टि (गवेषणा) में—प्रकाश-रश्मियों की खोज में—कोई परिबाध (घेरने वाला दबाव) तुझे बाँध नहीं सकता।
Mantra 6
आ त्वा गोभिरिव व्रजं गीर्भिॠणोम्यद्रिवः । आ स्मा कामं जरितुरा मनः पृण ॥
हे अद्रिवः (सोम-पाषाणधारी), जैसे गौओं से व्रज (बाड़ा) घिर जाता है, वैसे ही मैं तुम्हें स्तुतियों से घेरता/आवृत करता हूँ। अब गायक (जरितृ) की कामना को पूर्ण करो; हमारे मन को भी परिपूर्णता से भर दो।
Mantra 7
विश्वानि विश्वमनसो धिया नो वृत्रहन्तम । उग्र प्रणेतरधि षू वसो गहि ॥
हे परम वृत्रहन्ता, विश्वमनस् (समग्र-चेतना) वाली हमारी धिया (विचार-शक्ति) से हम सब वस्तुओं को प्राप्त करना चाहते हैं। हे उग्र प्रणेतर, हे वसो, यहाँ आओ; हमारे धन-वैभव पर आसीन हो और उसे हमारे भीतर दृढ़ कर दो।
Mantra 8
वयं ते अस्य वृत्रहन्विद्याम शूर नव्यसः । वसोः स्पार्हस्य पुरुहूत राधसः ॥
हे वृत्रहन्, हे शूर, हम तुम्हारी—हे पुरुहूत—स्पृहणीय वसोः (समृद्धि) के सदा-नवीन रूपों को जानें और उन्हें अपना करें; तुम्हारे राधस् (अनुग्रह-सम्पदा) की परिपूर्णता हमें मिले।
Mantra 9
इन्द्र यथा ह्यस्ति तेऽपरीतं नृतो शवः । अमृक्ता रातिः पुरुहूत दाशुषे ॥
हे इन्द्र! क्योंकि तुम्हारा नर-बल (शवः) सचमुच अपरिमित है, इसलिए—हे पुरुहूत—यज्ञ में अर्पण करने वाले दाशुष के प्रति तुम्हारी रति (दान) भी अवरुद्ध नहीं, अमुक्त है।
Mantra 10
आ वृषस्व महामह महे नृतम राधसे । दृळ्हश्चिद्दृह्य मघवन्मघत्तये ॥
हे महामह! महा-दानकर्ता! महान, अति-नर-समृद्ध राधस् के लिए अपने को उँडेल दे। हे मघवन्! मघत्तय (समृद्धि-वृद्धि) के लिए जो कठोर-स्थिर है, उसे भी दृढ़ कर, सहारा बना।
Mantra 12
नह्यङ्ग नृतो त्वदन्यं विन्दामि राधसे । राये द्युम्नाय शवसे च गिर्वणः ॥
निश्चय ही, हे नृत (मानव-गति) के स्वामी! राधस् के लिए मैं तुम्हारे सिवा किसी अन्य को नहीं पाता—राय (अन्तर-धन), द्युम्न (दीप्त विजय) और शवस् (आत्मिक बल) के लिए, हे गिर्वणः (स्तुति-स्वीकारक)।
Mantra 13
एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु । प्र राधसा चोदयाते महित्वना ॥
इन्द्र के लिए इन्दु (सोम) उँडेलो; वह सोम-स्वरूप मधु का पान करता है। उसी प्रभावी राधस् (समृद्धि) से, महत्त्व के द्वारा, वह आगे प्रेरित होता है।
Mantra 14
उपो हरीणां पतिं दक्षं पृञ्चन्तमब्रवम् । नूनं श्रुधि स्तुवतो अश्व्यस्य ॥
दो हरि (ताम्र अश्व-शक्तियों) के स्वामी के निकट, दक्ष (समर्थ) को अभिषिक्त होते देख, मैंने कहा—“अब सचमुच स्तुति करने वाले, अश्व्य (अन्तर-अश्व की वेग-शक्ति) चाहने वाले की वाणी सुनो।”
Mantra 15
नह्यङ्ग पुरा चन जज्ञे वीरतरस्त्वत् । नकी राया नैवथा न भन्दना ॥
निश्चय ही, प्राचीन काल से भी, तुमसे अधिक वीर कोई जन्मा नहीं। राया (सम्पदा/पूर्णता) में तुम्हारे समकक्ष कोई नहीं—न किसी प्रकार, न किसी भेदन-बल से।
Mantra 16
एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः । एवा हि वीरः स्तवते सदावृधः ॥
हे अध्वर्यु! निचोड़े हुए रस (अन्धस्) की और भी अधिक मदिर, मधुर धारा उँडेलो; क्योंकि इसी प्रकार सदा-वर्धमान वीर की स्तुति होती है।
Mantra 17
इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्टे पूर्व्यस्तुतिम् । उदानंश शवसा न भन्दना ॥
हे इन्द्र! हरियों (युगल अश्वों) के स्थाता, तुम्हारी प्राचीन स्तुति को कोई नहीं पा सका—न बल से, न भेदन-हिंसा से; तुम्हारा उदान महान् शौर्य सब प्रतिद्वन्द्वी दावे से परे है।
Mantra 18
तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः । अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम् ॥
हे श्रवस्यवः (यश-आकांक्षी साधक)! वाजों के स्वामी उस (इन्द्र) को हम आह्वान करते हैं; अविनाशी यज्ञों द्वारा हम उस वर्धनीय, सदा-वर्धमान को बढ़ाएँ।
Mantra 20
अगोरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः । घृतात्स्वादीयो मधुनश्च वोचत ॥
अगो॑रुध (अवरोध-रहित) उस देव के लिए—जो गविषे (प्रकाश-किरणों का अन्वेषी) है और द्युक्षाय (दीप्ति-वृद्धि) के लिए है—अद्भुत-कर्तृत्व से युक्त वचन बोलो। घृत से भी अधिक मधुर, और मधु से भी अधिक रसपूर्ण—ऐसा पोषक वचन उच्चारो।
Mantra 21
यस्यामितानि वीर्या न राधः पर्येतवे । ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा ॥
जिसके वीर्य (पराक्रम) अपरिमित हैं, और जिसकी राधः (फलदायी समृद्धि) को कोई परिधि में नहीं बाँध सकता। जैसे ज्योति सबको व्याप्त करती है, वैसे उसकी दक्षिणा—समग्र अस्तित्व के ऊपर-चारों ओर स्थित—समावेशक ‘ऋत’ का दान बनकर रहती है।
Mantra 22
स्तुहीन्द्रं व्यश्ववदनूर्मिं वाजिनं यमम् । अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे ॥
इन्द्र की स्तुति करो—व्यश्ववत् (अश्व-सम्पन्न), अनूर्मि (अवरोध से अविचल), वाजिन् (बल-समृद्ध) और यमम् (अव्यवस्था का संयमक)। वह आर्य (उदात्त) शक्ति, जो गयम् (जीवन-बल) को बढ़ाती है और दाशुषे (यज्ञ-दान करने वाले) को उसे व्यापक रूप से वितरित करती है।
Mantra 23
एवा नूनमुप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम् । सुविद्वांसं चर्कृत्यं चरणीनाम् ॥
हे वैयश्व! अब भी समीप आकर स्तुति से पुष्टि करो—सदा नव-नव और फिर भी दशम-पूर्णता को; उस सुविद्वान को, उस कृत्य-कर्ता को, और चरणियों (गतिशील शक्तियों) के पथ-प्रदर्शक को।
Mantra 24
वेत्था हि निॠतीनां वज्रहस्त परिवृजम् । अहरहः शुन्ध्युः परिपदामिव ॥
क्योंकि हे वज्रहस्त! तू निॠतियों (विघटन-शक्तियों) के परिवृज्—परिक्रामी निरसन—को जानता है; दिन-प्रतिदिन तू पथों को शुद्ध करता है, जैसे कोई आगे बढ़ने वाले के लिए संकटमय पगडंडियों को साफ़ कर दे।
Mantra 25
तदिन्द्राव आ भर येना दंसिष्ठ कृत्वने । द्विता कुत्साय शिश्नथो नि चोदय ॥
हे इन्द्र! वह सहायता हमारे पास ले आ, जिससे तू कृत्वने (सिद्धि-कार्य) के लिए सर्वाधिक समर्थ है; उसी से तू फिर से कुत्स को बल देता है और विरोधी दबाव को नीचे ढकेल देता है।
Mantra 26
तमु त्वा नूनमीमहे नव्यं दंसिष्ठ सन्यसे । स त्वं नो विश्वा अभिमातीः सक्षणिः ॥
हे दंसिष्ठ (अत्यन्त समर्थ) देव, हम अभी भी तुम्हीं को—सदा नूतन—विजय-प्राप्ति के लिए पुकारते हैं। तुम ही हमारे लिए सब प्रकार की अभिमातियों (आक्रमक शत्रुताओं) को सहकर भी उन्हें परास्त करने में सक्षम हो।
Mantra 27
य ऋक्षादंहसो मुचद्यो वार्यात्सप्त सिन्धुषु । वधर्दासस्य तुविनृम्ण नीनमः ॥
जो ऋक्षा (कष्ट/दुःख) के अंहस (संकट) से छुड़ाता है, जो सप्त सिन्धुओं में आर्य-बल की रक्षा करता है; जो दास का वध करने वाला है—हे तुविनृम्ण (महापुरुष-शक्ति वाले), हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और अपना प्रयत्न तुम्हें समर्पित करते हैं।
Mantra 28
यथा वरो सुषाम्णे सनिभ्य आवहो रयिम् । व्यश्वेभ्यः सुभगे वाजिनीवति ॥
जैसे उचित वरण करने वाला, वैसे ही—हे सुभगे, हे वाजिनीवति—विजय के साधकों के लिए रयि (समृद्धि/पूर्णता) को ले आओ; और व्यापक अश्व-शक्तियों के लिए भी।
Mantra 29
आ नार्यस्य दक्षिणा व्यश्वाँ एतु सोमिनः । स्थूरं च राधः शतवत्सहस्रवत् ॥
आर्य (श्रेष्ठ) की दक्षिणा—विस्तृत सामर्थ्य से युक्त—सोमिनों (सोम-निष्पादकों) के पास आए। और स्थिर, दृढ़ राधस् (समृद्धि) भी आए—शतगुण, सहस्रगुण—पूर्णता सहित।
Mantra 30
यत्त्वा पृच्छादीजानः कुहया कुहयाकृते । एषो अपश्रितो वलो गोमतीमव तिष्ठति ॥
जब यजमान तुम्हें पूछता है—हे गुप्त कर्मों के स्वामी—गुप्त मार्ग से, गुप्त रचना द्वारा; तब यह वल (Vala), अपश्रित और आश्रित-सा, नीचे ठहरा रहता है, गोमती (प्रकाशमयी) धेनुओं को रोककर।
It is a Soma-ritual hymn that praises Indra as the thunderbolt-bearing hero and asks that the inspired Word and Soma offering strengthen him to grant victory and boons.
Because Soma is treated as Indra’s empowering drink; pouring the richer, more exhilarating draught symbolizes giving Indra greater force to overcome obstacles.
Vala is an enclosure that hides the ‘cows’ (wealth, light, insight). The hymn hints that Indra can break this concealment, releasing what is kept back—both outward prosperity and inner clarity.
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