
Sukta 7.8
Vasiṣṭha (book 7 attribution)
Agni
Triṣṭubh (likely; verify by scansion)
वसिष्ठ का यह सूक्त अग्नि को राजस, कुलीन अग्रणी के रूप में प्रज्वलित करता है, जो उषाओं के अग्रभाग में स्थित होकर घृत-आहुतियों को श्रद्धापूर्ण स्तुति सहित ग्रहण करता है। इसमें अग्नि की सूर्य-सदृश व्यापक दीप्ति और संग्राम में भरत तथा पूरु को दी गई उसकी रक्षात्मक सहायता का स्मरण है; और अंत में गायक ऋषियों तथा यजमानों के लिए पोषण, प्रेरणा और चिरस्थायी कल्याण की प्रत्यक्ष प्रार्थना के साथ समापन होता है।
Mantra 1
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन । नरो हव्येभिरीळते सबाध आग्निरग्र उषसामशोचि ॥
राजा प्रज्वलित होता है—श्रेष्ठ आर्य—नमस्कारों से; जिसका मुख घृत से आहुति पाकर अर्पित होता है। मनुष्य हवियों से उसे सटकर पूजते हैं; उषाओं के अग्रभाग में अग्नि चमक उठा है।
Mantra 2
अयमु ष्य सुमहाँ अवेदि होता मन्द्रो मनुषो यह्वो अग्निः । वि भा अकः ससृजानः पृथिव्यां कृष्णपविरोषधीभिर्ववक्षे ॥
यह वही महान्-विस्तीर्ण प्रकट हुआ है—मनुष्यों का होता, आनंददायक, वेगवान अग्नि। उसने पृथ्वी पर फैलती हुई ज्योतियों को प्रसारित किया, उंडेला जाकर; और अपने कृष्ण-धार (श्याम-सीमांत) तेज से वह औषधियों—वनस्पतियों—में स्वयं को आवृत करता है।
Mantra 3
कया नो अग्ने वि वसः सुवृक्तिं कामु स्वधामृणवः शस्यमानः । कदा भवेम पतयः सुदत्र रायो वन्तारो दुष्टरस्य साधोः ॥
हे अग्नि, किस मार्ग से तुम हमारे लिए सु-उक्ति (सु-वृक्ति) को खोलोगे? और किस कामना से, हमारे स्तुतिगान किए जाते हुए, तुम हमें स्वधा (स्व-धर्म/स्व-नियम) प्रदान करोगे? हे सुदात्र, कब हम रयि (धन-समृद्धि) के स्वामी, उसके भोगी—और दुस्तर साधु (कठिन-से-पार होने योग्य सिद्धि) के विजेता बनेंगे?
Mantra 4
प्रप्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः । अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ॥
आगे-आगे, यह अग्नि भरत के लिए सुना जाता है—जब वह सूर्य के समान, महान प्रकाश से व्यापक रूप से चमकता है। जो युद्धों में पूरु के लिए खड़ा रहा—दीप्तिमान, दिव्य अतिथि—वह प्रज्वलित हो उठा।
Mantra 5
असन्नित्त्वे आहवनानि भूरि भुवो विश्वेभिः सुमना अनीकैः । स्तुतश्चिदग्ने शृण्विषे गृणानः स्वयं वर्धस्व तन्वं सुजात ॥
तुम में अनेक आह्वान (आहवन) निहित हैं; तुम समस्त शक्तियों के सभी रूपों (अनीक) के साथ सुमना—अनुग्रही—हो जाते हो। हे अग्ने, स्तुत किए जाने पर भी, गाने वाले की तुम सुनते हो; हे सुजात, अपने ही द्वारा अपने तनु (देह) को बढ़ाओ।
Mantra 6
इदं वचः शतसाः संसहस्रमुदग्नये जनिषीष्ट द्विबर्हाः । शं यत्स्तोतृभ्य आपये भवाति द्युमदमीवचातनं रक्षोहा ॥
यह वचन—शत-शक्ति, सहस्र-गुण—अग्नि के लिए ऊर्ध्वमुख होकर जन्म ले, हे द्वि-बर्हा (द्वि-आधार/द्वि-धारक)। यह स्तोताओं के लिए पीने योग्य शान्ति और तृप्ति बने—द्युतिमान, रोग-निवारक, और रक्षो-हा (राक्षस-नाशक)।
Mantra 7
नू त्वामग्न ईमहे वसिष्ठा ईशानं सूनो सहसो वसूनाम् । इषं स्तोतृभ्यो मघवद्भ्य आनड्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अब हम तुम्हें पुकारते हैं, हे अग्नि—हम वसिष्ठजन—तुम, बल (सहस) के पुत्र, समस्त वसुओं/धनों के ईशान। स्तोताओं को, दानशीलों को, इष (प्रेरणा) और पोषण दो; और स्वस्ति के साथ सदा हमारी रक्षा करो।
It kindles and praises Agni as a kingly, radiant presence who carries offerings, protects the community, and grants nourishment, impulse (iṣ), and well-being (svasti).
Because the newly kindled fire is seen as the first light of the day—Agni ‘shines before the Dawns’ and is compared to the Sun to express his expansive, life-giving radiance.
It can be recited during a simple fire-offering or lamp-lighting at dawn, with ghee as the primary offering, focusing on clarity, protection, and steady well-being for the household or community.
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