
Sukta 7.57
Vasiṣṭha (traditional attribution for much of Maṇḍala 7; specific hymn-level r̥ṣi not supplied in input)
Marutāḥ (the Maruts)
Triṣṭubh (probable for RV 7.57; verse appears in 4 pādas of ~11 syllables)
यह सूक्त मरुतों की स्तुति करता है—मधुर नाम वाले, बल से परिपूर्ण, तूफ़ानी देव, जो यज्ञ में वेग से उमड़ते हैं, स्वर्ग और पृथ्वी को कंपा सकते हैं और छिपे हुए समृद्धि-स्रोतों को प्रकट कर देते हैं। इसमें उल्लासपूर्ण आवाहन के साथ मानव-त्रुटि के लिए क्षमा-याचना भी है—प्रार्थना है कि उनकी विद्युत् और क्रोध दूर रहें और उनकी अटल सद्भावना उपासकों की रक्षा करे। अंत में मरुतों से निवेदन है कि वे चारों दिशाओं से आकर समुदाय के नेताओं को बल दें और सबकी स्थायी कल्याण-रक्षा करें।
Mantra 1
मध्वो वो नाम मारुतं यजत्राः प्र यज्ञेषु शवसा मदन्ति । ये रेजयन्ति रोदसी चिदुर्वी पिन्वन्त्युत्सं यदयासुरुग्राः ॥
हे यजनीय मरुतो, तुम्हारा नाम ही मधुर-मधु है; तुम यज्ञों में अपने बल से उन्मत्त होकर आगे बढ़ते हो। जो उग्र होकर दोनों विस्तृत लोकों को भी कंपा देते हो—जब तुम अपनी शक्तियों को प्रवृत्त करते हो, तब गुप्त स्रोत को उफनाते, भर देते हो।
Mantra 2
निचेतारो हि मरुतो गृणन्तं प्रणेतारो यजमानस्य मन्म । अस्माकमद्य विदथेषु बर्हिरा वीतये सदत पिप्रियाणाः ॥
क्योंकि मरुत सचमुच विवेकी पथ-प्रदर्शक हैं; वे स्तुति गाने वाले यजमान के मनोभाव को आगे ले जाते हैं। आज हमारे विदथों (सभाओं) में, प्रिय होते हुए, अपने वीति (आनन्द-ग्रहण) के लिए बर्हि (यज्ञ-आसन) पर आकर बैठो।
Mantra 3
नैतावदन्ये मरुतो यथेमे भ्राजन्ते रुक्मैरायुधैस्तनूभिः । आ रोदसी विश्वपिशः पिशानाः समानमञ्ज्यञ्जते शुभे कम् ॥
इन मरुतों के समान अन्य कोई नहीं—ये स्वर्णिम रुक्मों, आयुधों और अपनी देहगत शक्तियों से दीप्त होते हैं। सर्वरूप रचते हुए, वे एक ही शोभा से दोनों लोकों (रोदसी) को अलंकृत करते हैं—दीप्त आनन्द के लिए।
Mantra 4
ऋधक्सा वो मरुतो दिद्युदस्तु यद्व आगः पुरुषता कराम । मा वस्तस्यामपि भूमा यजत्रा अस्मे वो अस्तु सुमतिश्चनिष्ठा ॥
हे मरुतो, यदि मानवी चूक से हमने आपके प्रति अपराध किया हो, तो आपकी विद्युत् हमसे अलग रहे। यजनीयों, हम उस में न पड़ें; हमारे लिए आपकी सर्वाधिक स्थिर सुमति (सद्बुद्धि) बनी रहे।
Mantra 5
कृते चिदत्र मरुतो रणन्तानवद्यासः शुचयः पावकाः । प्र णोऽवत सुमतिभिर्यजत्राः प्र वाजेभिस्तिरत पुष्यसे नः ॥
कृत कार्य हो जाने पर भी, यहाँ मरुतो गूँजते रहें—निर्दोष, शुचि, पावक। यजनीयों, सुमतियों से हमारी रक्षा करो; बल-समृद्धियों से हमें पार ले चलो, ताकि हमारा पोषण और पूर्णता बढ़े।
Mantra 6
उत स्तुतासो मरुतो व्यन्तु विश्वेभिर्नामभिर्नरो हवींषि । ददात नो अमृतस्य प्रजायै जिगृत रायः सूनृता मघानि ॥
और स्तुति किए जाने पर, हे मरुतो, वे वीर, अपने समस्त नामों के साथ हमारी हवियाँ (आहुतियाँ) विस्तृत करें। अमृतत्व की प्रजा (संतति/वृद्धि) के लिए हमें प्रदान करो; हमारे लिए धन—सूनृता (सत्य-वाणी) और उदार मघ (दान-सम्पदा)—को पकड़कर स्थिर करो।
Mantra 7
आ स्तुतासो मरुतो विश्व ऊती अच्छा सूरीन्त्सर्वताता जिगात । ये नस्त्मना शतिनो वर्धयन्ति यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे स्तुत मरुतो, समस्त सहायता के साथ, चारों ओर से, हमारे सूरीन् (प्रकाशित/नेता) के पास आओ। जो अपने आत्मबल से हमारी शक्तियों को शतगुण बढ़ाते हो—तुम सदा स्वस्तिभिः (कल्याण-समन्वयों) से हमारी रक्षा करो।
The Maruts are a shining troop of storm and wind deities, known for thunder, lightning, swift movement, and protective help when properly invoked in the sacrifice.
Because their power is intense: the hymn admits that humans may err, and it seeks forgiveness and a safe, benevolent form of their energy rather than destructive force.
It asks them to come with help from every side, strengthen the community and its leaders, increase strength greatly, and protect everyone continually with well-being (svasti).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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