
Sukta 7.16
Vasiṣṭha (opening of hymn 7.16 in the Vasiṣṭha collection)
Agni
Jagatī (opening verse appears longer; likely Jagatī or mixed meter at hymn start)
ऋग्वेद 7.16 वसिष्ठ का स्तोत्र है, जिसमें अग्नि को यज्ञ का प्रियतम, अत्यन्त विवेकी मार्गदर्शक—“सबका दूत”—के रूप में आह्वान किया गया है, जो हवि को देवों तक पहुँचाता और कर्मकाण्ड में व्यवस्था स्थापित करता है। इसमें अग्नि की होत्र/वह्नि के रूप में स्तुति है—देवों द्वारा अध्वर को प्रकाशमान करने हेतु रचा गया—और उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे ऋषियों और यजमानों को शुभता में आसन दें, धन, वीर्य-सम्पन्न पराक्रम (सुवीर्य) तथा जनों के बीच उचित नेतृत्व प्रदान करें।
Mantra 1
एना वो अग्निं नमसोर्जो नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम् ॥
इस नमस्कार-भाव से मैं तुम्हारे लिए अग्नि को आह्वान करता हूँ—ऊर्जा/पोषण के पुत्र को; प्रिय, चेतना में सर्वाधिक विवेकी, स्वध्वर (सुसंस्कृत यज्ञ) का सुनिश्चित पथ-प्रदर्शक, समस्त का दूत, अमृत (अमर) को।
Mantra 2
स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः । सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देवं राधो जनानाम् ॥
जो अरुष (रक्तिम) शक्तियों को—विश्वभोजस (सबका भोग करने वाली/सबको पोषित करने वाली)—जोतता है, वह, स्वाहुत (सु-आहुति से पूजित), वेग से आगे दौड़ता है। यज्ञ सुब्रह्मा (सु-रचित मंत्र-बल) बनता है; वसुओं के लिए सुशमी (शांतिदायक समरसता), और जनों के लिए देव राधस् (दैवी समृद्धि/दान) होता है।
Mantra 3
उदस्य शोचिरस्थादाजुह्वानस्य मीळ्हुषः । उद्धूमासो अरुषासो दिविस्पृशः समग्निमिन्धते नरः ॥
उसकी शोचि (ज्वाला) ऊपर उठती है—आहूत, मीळ्हुष (उदार दाता) की। उसके धूम ऊपर उठते हैं—अरुष (रक्तिम), दिविस्पृश (स्वर्ग-स्पर्शी); इस प्रकार नर (मानवी शक्तियाँ) मिलकर अग्नि को प्रज्वलित करते हैं।
Mantra 4
तं त्वा दूतं कृण्महे यशस्तमं देवाँ आ वीतये वह । विश्वा सूनो सहसो मर्तभोजना रास्व तद्यत्त्वेमहे ॥
हे अग्नि, तुझे हम अपना दूत बनाते हैं—सबसे यशस्वी; यज्ञ-रस के आस्वादन हेतु देवों को यहाँ ले आ। हे सहस (बल) के पुत्र, मनुष्यों के लिए जो-जो पोषण और मर्त्य-जीवन की धारणाएँ हैं, वे सब हमें दे—वही जो हम तुझसे माँगते हैं।
Mantra 5
त्वमग्ने गृहपतिस्त्वं होता नो अध्वरे । त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि वेषि च वार्यम् ॥
हे अग्नि, तू गृहपति है; अध्वर (यज्ञ-मार्ग) में तू हमारा होता है। हे विश्ववार, प्रचेता, तू पोता (शोधक-शुद्धिकर्ता) है; यज्ञ कर और उत्तम वार्य (श्रेष्ठ धन/वर) भी ले आ।
Mantra 6
कृधि रत्नं यजमानाय सुक्रतो त्वं हि रत्नधा असि । आ न ऋते शिशीहि विश्वमृत्विजं सुशंसो यश्च दक्षते ॥
हे सुक्रतो, यजमान के लिए रत्न (धन/तेज) रच; क्योंकि तू ही रत्नधारक है। तेरे बिना कुछ भी सिद्ध-तैयार नहीं होता; हमारे लिए समस्त ऋत्विज्-कार्य को तीक्ष्ण कर—उसको जो सुशंस (सुमंगल स्तुति वाला) है और जो दक्ष (कुशल) होकर कर्म करता है।
Mantra 7
त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः । यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान्दयन्त गोनाम् ॥
हे अग्नि, स्वाहा से सम्यक् आहुत किए गए तुझमें प्रिय सूरी (ऋषि) निवास पाएं—वे नेता, जो जनों के बीच उदार दाता हैं, जो गोओं के विस्तृत उर्वर क्षेत्रों को बढ़ाते-पोषते हैं।
Mantra 8
येषामिळा घृतहस्ता दुरोण आँ अपि प्राता निषीदति । ताँस्त्रायस्व सहस्य द्रुहो निदो यच्छा नः शर्म दीर्घश्रुत् ॥
जिनके गृह में घृत-हस्त इळा प्रभात में आकर बैठती है—हे सहस्य (बल के पुत्र), उन्हें द्रोह और निन्दा से बचा; कुटिल शत्रु और दोषारोपण करने वाली वाणी से रक्षा कर; हे दीर्घश्रुत, हमें शरण प्रदान कर।
Mantra 9
स मन्द्रया च जिह्वया वह्निरासा विदुष्टरः । अग्ने रयिं मघवद्भ्यो न आ वह हव्यदातिं च सूदय ॥
आनन्ददायी जिह्वा और मुख से—हव्य-वह्नि, सर्वाधिक विद्वान—हे अग्नि, मगवद्भ्यः (उदार दाताओं) के लिए हमें रयि (समृद्धि) ला; और हव्य-दान (आहुति-प्रदान) को प्रवर्तित कर।
Mantra 10
ये राधांसि ददत्यश्व्या मघा कामेन श्रवसो महः । ताँ अंहसः पिपृहि पर्तृभिष्ट्वं शतं पूर्भिर्यविष्ठ्य ॥
जो (यजमान) कामना से, महान् श्रवस् (यश) के लिए, सिद्धि-रूप राधाएँ और अश्ववत् शीघ्र, मघ (समृद्धि) देने वाली शक्तियाँ प्रदान करते हैं—उनकी तुम अंहस् (क्लेश/पाप) से रक्षा करो। हे यविष्ठ (अत्यन्त युवा) अग्नि, रक्षकों सहित, प्रकाश के सौ दुर्गों से उनकी रक्षा-परिरक्षा करो।
Mantra 11
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्यासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते ॥
देव द्रविणोदा (धन/पदार्थ का दाता) ने तुम्हारे लिए पूर्ण पात्र खोल दिया है। उसे ऊपर की ओर उँडेलो, या और भर दो; तब निश्चय ही वह देव तुम्हें आगे ढोता है—तुम्हारे होने को पूर्णता की ओर वह ले चलता है।
Mantra 12
तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे ॥
उसे देवों ने अध्वर (अन्तर्यज्ञ) का प्रचेतस् (प्रबुद्ध) होता, वह्नि (वहक) बनाकर रचा—जो हवि को वहन करता है। विधाता (विधि-कर्ता) के लिए, और दाशुष (अर्पण करने वाले) जन के लिए, अग्नि रत्न रखता है—सुवीर्य (वीर्य-समृद्धि) का खजाना।
Agni is praised—especially as the immortal messenger who carries offerings to the gods and as the Hotṛ (chief priest) who makes the sacrifice succeed.
It asks Agni to guide the rite in right order, support inspired leaders and seers, and grant “ratna” (treasure) and “suvīrya” (heroic strength and capability).
It means Agni connects humans and gods: he receives the offering here, conveys it to the divine powers, and returns their blessings as protection, clarity, and prosperity.
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