
Sukta 3.56
Viśvāmitra Gāthina (family attribution for Maṇḍala 3)
Dharmic/Ṛta-order of the gods (cosmic law) rather than a single personalized deity
Triṣṭubh
यह सूक्त अटूट ऋत की स्तुति करता है—वे दृढ़, आद्य विधान (व्रत) जिनके द्वारा देवगण विश्व-व्यवस्था को धारण करते हैं—इतने स्थिर कि लोक और पर्वत भी झुकने को विवश नहीं होते। तीन-तीन की आवृत्त रचनाओं (तीन लोक, तीन शक्तियाँ, तीन जल) के माध्यम से यह दिखाता है कि ब्रह्माण्डीय क्रम एक नमूनेदार, लयबद्ध शासन है, जो यज्ञ-सत्र में उतर आता है। इस सूक्त का प्रयोजन यजमान के कर्मकाण्ड और मनोभाव को उस उच्च, अभेद्य नियम के साथ समन्वित करना है, ताकि देव ‘आएँ’ और कल्याण की स्थापना करें।
Mantra 1
न ता मिनन्ति मायिनो न धीरा व्रता देवानां प्रथमा ध्रुवाणि । न रोदसी अद्रुहा वेद्याभिर्न पर्वता निनमे तस्थिवांसः ॥
मायिनः—शक्ति के स्वामी—और धीर बुद्धिमान, देवों के प्रथम और दृढ़ व्रतों का उल्लंघन नहीं करते। सत्य के प्रति अद्रुह—अविश्वासी नहीं—वे दोनों लोक भी उनके कर्मों से नहीं झुकते; न ही स्थिर खड़े पर्वत झुकाए जाते हैं।
Mantra 2
षड्भाराँ एको अचरन्बिभर्त्यृतं वर्षिष्ठमुप गाव आगुः । तिस्रो महीरुपरास्तस्थुरत्या गुहा द्वे निहिते दर्श्येका ॥
एक ही, गतिमान होकर, छह भारों को धारण करता है और ऋत—अत्यन्त प्रचुर सत्य—को भी; गौएँ उसके निकट आती हैं। तीन विशाल ऊर्ध्व लोक स्थिर खड़े हैं; दो गुहा (रहस्य) में निहित हैं, एक प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
Mantra 3
त्रिपाजस्यो वृषभो विश्वरूप उत त्र्युधा पुरुध प्रजावान् । त्र्यनीकः पत्यते माहिनावान्त्स रेतोधा वृषभः शश्वतीनाम् ॥
त्रिपाज (त्रिविध तेज) वाला वह वृषभ, विश्वरूप है; और त्रिविध रीति से, अनेक प्रकारों में, प्रजाओं/जन्मों से परिपूर्ण है। त्र्यनीक (त्रिमुख/त्रिमुखी) होकर वह शासन करता है, महिमा में महान; वही रेतोधा (बीज-धारक) वृषभ शाश्वतताओं का स्वामी है।
Mantra 4
अभीक आसां पदवीरबोध्यादित्यानामह्वे चारु नाम । आपश्चिदस्मा अरमन्त देवीः पृथग्व्रजन्तीः परि षीमवृञ्जन् ॥
उनका पथ निकट ही जाग्रत हुआ; आदित्यों के आह्वान पर वह मनोहर ‘नाम’ उदित हुआ। देवियाँ—आपः (दिव्य जल)—भी उसके लिए अनुकूल हुईं; अपने-अपने मार्गों में पृथक् चलती हुई, उन्होंने उसे चारों ओर से घेर लिया।
Mantra 5
त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट् । ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः ॥
छः-आधार (षड्-धाम) में स्थित तीन नदियाँ हैं; कवियों का कर्म भी त्रिविध है; और विदथों (यज्ञ-सभाओं) में त्रि-माता सम्राज्ञी है। ऋत को बढ़ाने वाली तीन कन्याएँ हैं; गहन के तीन जल हैं; वे स्वर्ग से त्रिवार प्रवाहित होती हैं, यज्ञ-सत्रों में अधिपत्य करती हुई।
Mantra 6
त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिव आ सुव त्रिर्नो अह्नः । त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्रातर्धिषणे सातये धाः ॥
हे सवितृ! स्वर्ग से त्रिवार वरणीय वरदानों को प्रकट कर; दिन-प्रतिदिन उन्हें प्रवर्तित कर—हमारे लिए दिनों में त्रिवार। त्रिधातु लोक से धन और वसु-निधियाँ उँडेल; हे भग, रक्षक! विजय-प्राप्ति के लिए हमारी धिषणा (बुद्धि) में सामर्थ्य स्थापित कर।
Mantra 7
त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी । आपश्चिदस्य रोदसी चिदुर्वी रत्नं भिक्षन्त सवितुः सवाय ॥
स्वर्ग से त्रिवार सविता अपनी प्रेरणा को प्रवर्तित करता है; और सुहस्त दो राजा—मित्र और वरुण—उसका संबल देते हैं। जल भी, और विस्तीर्ण द्यावा-पृथिवी भी, सवितृ के सव (सृजन-प्रेरण) हेतु रत्न की याचना करते हैं।
Mantra 8
त्रिरुत्तमा दूणशा रोचनानि त्रयो राजन्त्यसुरस्य वीराः । ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः ॥
तीन बार वे परम, दुर्गम, दीप्तिमान लोक हैं; वहाँ असुर के तीन वीर राज्य करते हैं। ऋतवान्, वेगवान् और दुर्जेय—वे देव हमारे यज्ञ-सत्र में स्वर्ग से तीन बार आएँ।
It is mainly about Ṛta—the firm cosmic order and the gods’ unbreakable ordinances. The hymn says this order cannot be bent, and it asks the divine powers to preside over the sacrifice.
The repeated triads (three realms, three waters/rivers, three ruling powers) present the universe as patterned and governed. The hymn uses this structure to show that Ṛta is an ordered, rhythmic principle that also guides the ritual.
Not strictly. Its focus is the dharmic/Ṛta-order upheld by the gods, though some verses can be read alongside Savitṛ-like ordering and impulsion; the emphasis remains on the governing law rather than a single personalized deity.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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