Rig Veda Sukta 55
Mandala 3Sukta 5522 Mantras

Sukta 55

Sukta 3.55

Rishi

Viśvāmitra Gāthina (traditional for Mandala 3; RV 3.55 commonly in his family-book domain)

Devata

Viśve Devāḥ / the One Asura-might behind the gods; Dawn as revelatory condition

Chandas

Triṣṭubh (probable; confirm)

ऋग्वेद 3.55 में यह विचार किया गया है कि अनेक देव एक ही विशाल, एकमेव अधिराज्य/सार्वभौम सत्ता (एकम् असुरत्वम्) द्वारा धारण किए जाते हैं, जो तब प्रकट होती है जब उषा छिपे हुए विधान को खोल देती है। प्रतीकात्मक बिंबों की एक शृंखला—‘प्रकाश के पद’ में वाणी, युग्मित दुहनी गायें, जल और वनस्पतियाँ, पृथ्वी की समृद्धि—के माध्यम से यह सूक्त ऋत की अंतःसंगति की स्तुति करता है, जो देवताओं को सामर्थ्य देती है और यज्ञ तथा जीवन को धारण करती है।

Mantras

Mantra 1

उषसः पूर्वा अध यद्व्यूषुर्महद्वि जज्ञे अक्षरं पदे गोः । व्रता देवानामुप नु प्रभूषन्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

जब पूर्व की उषाएँ प्रस्फुटित होती हैं, तब प्रकाश (गोः) के पद में महान् अविनाशी अक्षर जन्म लेता है। देवों के व्रतों को अलंकृत और प्रकट करता हुआ, देव-शक्तियों का एक ही विशाल असुरत्व प्रकट हो उठता है।

Mantra 2

मो षू णो अत्र जुहुरन्त देवा मा पूर्वे अग्ने पितरः पदज्ञाः । पुराण्योः सद्मनोः केतुरन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

यहाँ देव हमें त्याग न दें; और हे अग्नि, पथ-ज्ञाता पूर्व पितर भी हमें न ठुकराएँ। दो प्राचीन सद्मनों के भीतर केतु (प्रकाश-चिह्न) स्थित है—देवों का एक ही विशाल असुरत्व।

Mantra 3

वि मे पुरुत्रा पतयन्ति कामाः शम्यच्छा दीद्ये पूर्व्याणि । समिद्धे अग्नावृतमिद्वदेम महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

मेरी कामनाएँ अनेक दिशाओं में उड़ती-फिरती हैं; प्रज्वलित ज्वाला की ओर मैं प्राचीन ज्योतियों को दीप्त करता हूँ। प्रज्वलित अग्नि में हम ऋत—स्वयं सत्य—का उच्चारण करें; देवों की वही एक महान् असुरत्व-शक्ति है।

Mantra 4

समानो राजा विभृतः पुरुत्रा शये शयासु प्रयुतो वनानु । अन्या वत्सं भरति क्षेति माता महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

एक ही राजा अनेक रूपों में धारण किया जाता है; वह शय्यास्थानों में लेटा है, वनों के भीतर गतिमान रहता है। कोई अन्य वत्स को धारण करता है; माता निवास करती और पोषण करती है—देवों की वही एक महान् असुरत्व-शक्ति।

Mantra 5

आक्षित्पूर्वास्वपरा अनूरुत्सद्यो जातासु तरुणीष्वन्तः । अन्तर्वतीः सुवते अप्रवीता महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

उत्तरवर्ती (पश्चात्) पूर्ववर्ती के भीतर प्रतिष्ठित है; अनुनाद-रहित तत्त्व नवजात तरुण रूपों के भीतर है। अंतर्भारिणी, बिना उद्घोष के भी, प्रसव करती है—देवों की वही एक महान् असुरत्व-शक्ति।

Mantra 6

शयुः परस्तादध नु द्विमाताबन्धनश्चरति वत्स एकः । मित्रस्य ता वरुणस्य व्रतानि महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

जो परे स्थित है, वही अब सचमुच द्वि-माता—अबंधन—एकमात्र वत्स के रूप में विचरता है। ये मित्र और वरुण के व्रत (नियम) हैं—देवों का एक ही महत् असुरत्व (दैवी प्रभुत्व)।

Mantra 7

द्विमाता होता विदथेषु सम्राळन्वग्रं चरति क्षेति बुध्नः । प्र रण्यानि रण्यवाचो भरन्ते महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

द्वि-माता होता विदथों में सम्राट् है; अग्र का अनुगमन करता हुआ वह चलता है, और बुध्न (गहन आधार) में निवास करता है। वे रमणीय निधियाँ और रण्य-वाच (आनन्द-वाणी) आगे लाते हैं—देवों का एक ही महत् असुरत्व।

Mantra 8

शूरस्येव युध्यतो अन्तमस्य प्रतीचीनं ददृशे विश्वमायत् । अन्तर्मतिश्चरति निष्षिधं गोर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

जैसे युद्धरत शूर के अन्तर्म में, वह प्रत्यचीन होकर—जो कुछ उसकी ओर आया है—उस समस्त को देखता है। अन्तर-मति गो (किरण/प्रकाश) के निष्यिद्ध (गुप्त आसन) की ओर चलती है—देवों का एक ही महत् असुरत्व।

Mantra 9

नि वेवेति पलितो दूत आस्वन्तर्महाँश्चरति रोचनेन । वपूंषि बिभ्रदभि नो वि चष्टे महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

धवल-केशी प्राचीन दूत धाराओं के भीतर वेग से उतरता-सा चलता है; महान होकर वह रोचन (दीप्त लोक) में विचरता है। अनेक रूप धारण करके वह विवेकपूर्वक हम पर दृष्टि डालता है—देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) है।

Mantra 10

विष्णुर्गोपाः परमं पाति पाथः प्रिया धामान्यमृता दधानः । अग्निष्टा विश्वा भुवनानि वेद महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

विष्णु गोपा (रक्षक) परम पथ की रक्षा करता है, प्रिय अमृत धामों को स्थापित करता हुआ। अग्नि इन समस्त भुवनों को जानता है—देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) है।

Mantra 11

नाना चक्राते यम्या वपूंषि तयोरन्यद्रोचते कृष्णमन्यत् । श्यावी च यदरुषी च स्वसारौ महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

सगोत्रा दो बहनें नाना रूप रचती हैं; उन दोनों में एक दीप्त है, दूसरी कृष्ण (अंधकारमय) है। श्यावी और अरुषी—वे बहनें—घोषित करती हैं: देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) है।

Mantra 12

माता च यत्र दुहिता च धेनू सबर्दुघे धापयेते समीची । ऋतस्य ते सदसीळे अन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

जहाँ माता और पुत्री—दो दुहनी धेनुएँ—समभाव से साथ-साथ दुहती हैं, और परस्पर पोषण करती हैं। ऋत के उस अन्तर्-आसन में मैं उनका स्तवन करता हूँ—देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) वहाँ विद्यमान है।

Mantra 13

अन्यस्या वत्सं रिहती मिमाय कया भुवा नि दधे धेनुरूधः । ऋतस्य सा पयसापिन्वतेळा महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

दूसरी की वत्स को चाटती हुई वह रंभाती है; किस प्रकार के भाव से धेनु अपना थन नीचे रखती है? ऋत के पयस् से वह फूली-फली—इळा; देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) है।

Mantra 14

पद्या वस्ते पुरुरूपा वपूंष्यूर्ध्वा तस्थौ त्र्यविं रेरिहाणा । ऋतस्य सद्म वि चरामि विद्वान्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

अपने चरणों से वह अनेक रूपों के वस्त्र धारण करती है; ऊर्ध्व खड़ी होकर त्रिविध पोषण को चाटती है। जानकार होकर मैं ऋत के सद्म (गृह) में विचरता हूँ—देवों का एक ही महत् असुरत्व (प्रभुत्व) है।

Mantra 15

पदे इव निहिते दस्मे अन्तस्तयोरन्यद्गुह्यमाविरन्यत् । सध्रीचीना पथ्या सा विषूची महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

दस्म (अद्भुत) के भीतर रखे हुए दो पदचिह्नों के समान—उन दोनों में से एक गुप्त है, दूसरा प्रकट। एक सीधी, सममुख (सध्रीचीना) पथ्या है, दूसरी विषूची—विचलित/विभिन्न दिशा को जाती है। देवों का वही एक महत् असुरत्व (अधिपत्य) है।

Mantra 16

आ धेनवो धुनयन्तामशिश्वीः सबर्दुघाः शशया अप्रदुग्धाः । नव्यानव्या युवतयो भवन्तीर्महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

धेनुएँ स्वयं को झटककर गति में आएँ—अशिश्वीः (अक्षीण), सबर्दुघाः (एक साथ दुहने वाली), शशया—अब तक पूरी तरह न दुही हुई। नित्य-नवीन, वे बार-बार युवती बनती हैं। देवों का वही एक महत् असुरत्व (अधिपत्य) है।

Mantra 17

यदन्यासु वृषभो रोरवीति सो अन्यस्मिन्यूथे नि दधाति रेतः । स हि क्षपावान्त्स भगः स राजा महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

जब वृषभ-बल अन्य यूथों में गर्जता है, तब वह दूसरे यूथ में अपना रेतस् (वीर्य/शक्ति-बीज) स्थापित करता है। वही क्षपावान्—रात्रियों का स्वामी, वही भग—आनन्ददाता, वही राजा है। देवों का वही एक महत् असुरत्व—एकमात्र असुर-शक्ति (सार्वभौम प्रभुत्व) है।

Mantra 18

वीरस्य नु स्वश्व्यं जनासः प्र नु वोचाम विदुरस्य देवाः । षोळ्हा युक्ताः पञ्चपञ्चा वहन्ति महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

हे जनो, अब हम उस वीर की सुसज्जित अश्वोंवाली शक्ति का उद्घोष करें; देव उसे जानते हैं। सोलह युक्त (रथाश्व), पाँच और पाँच (के समूहों में), उसे आगे वहन करते हैं—देवों का एक ही महान असुरत्व (सार्वभौम प्रभुत्व), वही एक असुर-शक्ति।

Mantra 19

देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जजान । इमा च विश्वा भुवनान्यस्य महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

देव त्वष्टा—सर्वरूप सविता—ने प्रजाओं का पोषण किया; बहुधा उसने जनों को जन्म दिया, और ये समस्त भुवन उसी के हैं। यह उसी का है—देवों का एक ही महान असुरत्व, वही एक असुर-शक्ति।

Mantra 20

मही समैरच्चम्वा समीची उभे ते अस्य वसुना न्यृष्टे । शृण्वे वीरो विन्दमानो वसूनि महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

महती (विस्तीर्ण) सत्ता, साथ-साथ मिलने वाले दो चषकों के साथ सम्यक् संयोग में चलती है; उसके दोनों वसु (धन-रत्न) भीतर स्थापित हैं। वीर सुनता है, वसुओं को पाता हुआ—देवों का एक ही महान असुरत्व, वही एक असुर-शक्ति।

Mantra 21

इमां च नः पृथिवीं विश्वधाया उप क्षेति हितमित्रो न राजा । पुरःसदः शर्मसदो न वीरा महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

यह हमारी सर्वथा धारण करने वाली पृथ्वी—उसके निकट वह हित-मित्र राजा की भाँति निवास करता है। अग्र-आसीन वीरों की तरह, शरण में बैठे हुए, वह रक्षा-आश्रय स्थापित करता है—देवों का एक महान् अधिपत्य, एकमात्र असुरत्व-शक्ति।

Mantra 22

निष्षिध्वरीस्त ओषधीरुतापो रयिं त इन्द्र पृथिवी बिभर्ति । सखायस्ते वामभाजः स्याम महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥

वेग से प्रवाहित/दबाने वाली शक्तियाँ तेरी हैं—औषधियाँ और जल भी; और पृथ्वी तेरे लिए रयि, वह समृद्धि, धारण करती है। हम तेरे सखा हों, तेरे प्रिय दानों के भागीदार बनें—देवों का एक महान् अधिपत्य, एकमात्र असुरत्व-शक्ति।

Frequently Asked Questions

It means “the one great sovereignty (asura-might) of the gods.” The hymn says the many divine powers work as one coordinated reality grounded in a single lordship.

Dawn is the condition of revelation: when the Dawns “open out,” hidden order becomes visible and the imperishable Word is said to be born in the seat/step of Light.

The hymn uses a symbolic image of two complementary powers that nourish each other in harmony within Ṛta. Interpreters often relate it to paired realities like Night and Dawn or Heaven and Earth, understood also as inner spiritual complements.

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