Rig Veda Sukta 47
Mandala 3Sukta 475 Mantras

Sukta 47

Sukta 3.47

Rishi

Viśvāmitra Gāthina (traditional, Mandala 3)

Devata

Indra (with Maruts as associates)

Chandas

Triṣṭubh (likely)

यह संक्षिप्त इन्द्र–मरुत् सूक्त मरुतों के साथ युद्ध-वृषभ इन्द्र को आमंत्रित करता है कि वह निचोड़ा हुआ सोम पिए और विजय तथा रक्षण के लिए उल्लसित हो। इसमें इन्द्र की शक्ति को ऋत (सम्यक् व्यवस्था और उचित समय) से जोड़ा गया है; स्मरण कराया गया है कि वृत्र-वध के समय मरुत् उसके पीछे चले और उसके भीतर बल को “स्थापित” किया। इसका उद्देश्य व्यावहारिक और याज्ञिक है—उचित समय पर सोम-आहुति द्वारा उपासकों के लिए नवीन सहायता, बल और जय सुनिश्चित करना।

Recitation with translationRig Veda 3.47

Mantras

Mantra 1

मरुत्वाँ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय । आ सिञ्चस्व जठरे मध्व ऊर्मिं त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम् ॥

हे मरुत्वान् इन्द्र! रण का वृषभ (वीर), अपने अनुरूप आनन्द के लिए, मद (उन्माद/उत्साह) के लिए सोम का पान कर। मधुर मधु की ऊर्मि (लहर) को अपने जठर में उँडेल; तू प्रदिवि में सुते हुए पानों का राजा है।

Mantra 2

सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान् । जहि शत्रूँरप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः ॥

हे इन्द्र! मरुद्गण के साथ एक ही हर्ष में, एक ही संगति में—हे वृत्रहा, हे शूर, हे विद्वान—सोमपान करो। शत्रुओं को मारो, आक्रमणों को दूर हटा दो; और तब हमारे लिए चारों दिशाओं से अभय कर दो।

Mantra 3

उत ऋतुभिॠतुपाः पाहि सोममिन्द्र देवेभिः सखिभिः सुतं नः । याँ आभजो मरुतो ये त्वान्वहन्वृत्रमदधुस्तुभ्यमोजः ॥

और ऋतुओं के साथ—हे ऋतु-पालक—हमारे निचोड़े हुए सोम की रक्षा करो, हे इन्द्र, देव-शक्तियों रूपी अपने सखा-देवों के साथ। वे मरुत जिन्हें तुमने अपने लिए बाँटा, जो तुम्हारे पीछे चले और वृत्र को मारा—उन्होंने तुम्हारे भीतर विजय-बल स्थापित किया।

Mantra 4

ये त्वाहिहत्ये मघवन्नवर्धन्ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ । ये त्वा नूनमनुमदन्ति विप्राः पिबेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः ॥

हे मघवन्! अहि-वध में जिन्होंने तुम्हें बढ़ाया; हे हरिवः! शम्बर-युद्ध में जिन्होंने; और गविष्टि—गौओं/प्रकाश की खोज—में जिन्होंने—वे ही। जो विप्र अब तुम्हारी स्तुति करते हैं—हे इन्द्र! मरुद्गण के साथ सोमपान करो।

Mantra 5

मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम् । विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम ॥

मरुतों से युक्त, निरन्तर बढ़ते हुए वृषभ—अकवारि (कंजूस नहीं), दिव्य शासक इन्द्र को—जो विश्व-विजयी है, नूतन सहायता के लिए, उग्र और बल-प्रदाता—उसी को हम यहाँ आवाहन करते हैं।

Frequently Asked Questions

The hymn asks Indra, together with the Maruts, to drink the pressed Soma, become powerfully exhilarated, and give renewed protection and victory to the worshippers.

The Maruts are Indra’s stormy allies who amplify his strength. The hymn recalls that they followed him in the Vṛtra battle and helped establish his victorious force (ojas).

“Ṛtupāḥ” means “guardian of the right times/seasons.” It suggests that Indra’s help is most effective when the offering and action are aligned with ṛta—right order, timing, and measure.

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