
Sukta 2.9
Gṛtsamada (Bhārgava)
Agni
Triṣṭubh
यह छह-ऋचा त्रिष्टुभ सूक्त अग्नि को सर्वज्ञ होतृ के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जो याज्ञिक आसन पर विराजमान होकर उपासकों के भीतर अपना निवास स्थापित करता है। इसमें उनसे प्रार्थना है कि वे हवि को सुनें, समृद्धि की पुष्टि करें, और सर्वोत्तम यजमान/याजक के रूप में यज्ञ का संचालन करें—हानि से रक्षा करें तथा तेजस्वी प्राणशक्ति और धन प्रदान करें।
Mantra 1
नि होता होतृषदने विदानस्त्वेषो दीदिवाँ असदत्सुदक्षः । अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः ॥
होता—होतृ-आसन में—नीचे बैठ गया; मार्ग-ज्ञाता, तेजस्वी, दीप्तिमान, सु-दक्ष। अदब्ध-व्रत और सुनिश्चित प्रज्ञा वाला वसिष्ठ—शुचि-जिह्वा अग्नि, सहस्र-सम्पदा-धारक—हमारे भीतर प्रतिष्ठित हो।
Mantra 2
त्वं दूतस्त्वमु नः परस्पास्त्वं वस्य आ वृषभ प्रणेता । अग्ने तोकस्य नस्तने तनूनामप्रयुच्छन्दीद्यद्बोधि गोपाः ॥
तुम दूत हो; तुम हमारे दूर-रक्षक हो; तुम श्रेष्ठ की ओर ले जाने वाले नेता हो, हे बल-वृषभ। हे अग्ने, हमारी सन्तति और हमारे अस्तित्व-विस्तार के लिए—अप्रयुच्छ, प्रकाशमान—हममें गोपा बनकर जागो।
Mantra 3
विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे । यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवींषि जुहुरे समिद्धे ॥
हे अग्नि! तेरे परम जन्म में हम तेरी विधिवत् सेवा करें; और प्रकटि के अधो आसन में स्तोत्रों द्वारा भी तेरी आराधना करें। जिस-जिस योनि से तू ऊपर उठकर प्रकट हुआ है, उसी के लिए तुझे यज्ञ-समर्पण किया जाता है; इसलिए, जब तू समिद्ध होता है, तब हवियाँ तेरे ही प्रति अग्रसर होकर आहुति रूप से डाली जाती हैं।
Mantra 4
अग्ने यजस्व हविषा यजीयाञ्छ्रुष्टी देष्णमभि गृणीहि राधः । त्वं ह्यसि रयिपती रयीणां त्वं शुक्रस्य वचसो मनोता ॥
हे अग्नि! हवि से यजन कर, हे यज्ञ के अति-योग्य! श्रवण-युक्त होकर दान को स्वीकार कर और राधस् (समृद्धि) की पुष्टि कर। क्योंकि तू ही रयियों का रयिपति है; तू ही शुक्ल (दीप्तिमय) वचन का मनोता—चिन्तक और सिद्धकर्ता—है।
Mantra 5
उभयं ते न क्षीयते वसव्यं दिवेदिवे जायमानस्य दस्म । कृधि क्षुमन्तं जरितारमग्ने कृधि पतिं स्वपत्यस्य रायः ॥
हे दस्म (अद्भुत-कर्मी)! तेरा वसव्य (धन) द्विविध है और क्षीण नहीं होता—दिन-प्रतिदिन, जब तू निरन्तर जन्म लेता है। हे अग्नि! जरीता (गायक) को क्षुमन्त (बल-सम्पन्न) कर; और उसे स्वपत्य (सुपुत्रता) तथा अधिकार-युक्त रयि का पति बना।
Mantra 6
सैनानीकेन सुविदत्रो अस्मे यष्टा देवाँ आयजिष्ठः स्वस्ति । अदब्धो गोपा उत नः परस्पा अग्ने द्युमदुत रेवद्दिदीहि ॥
हे सुविदत्र (सुप्रज्ञ) अग्नि! अपने सेनानी-रूप अग्रभाग से हमारे लिए ऐसे यष्टा बनो जो स्वस्ति के लिए देवों का सर्वश्रेष्ठ यजन करे। अदब्ध (अपराजित) होकर ज्योतियों के गोपा बनो और हमारे दूरस्थ रक्षक भी; हे अग्नि, द्युमत् (दीप्तिमान) और रेवत् (समृद्धि-युक्त) तेज से हम पर प्रकाश करो।
It asks Agni to take his rightful seat as the priest of the sacrifice, carry the offering properly, listen to the worshippers, and grant well-being, protection, and abundance.
Hotṛ means the officiating priest who recites and performs the offering. The hymn treats Agni as the divine priest who knows the correct path of the rite and mediates between humans and the gods.
Along with the outer fire on the altar, it points to an inner fire—clarity, will, and discerning intelligence—through which prayer becomes effective and life gains light and strength.
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