
Sukta 10.91
Traditionally attributed to Agni-related seers in RV 10.91 (exact rishi varies by Anukramaṇī; commonly: Aruṇa Vaitahavya or similar late-maṇḍala attributions—requires śākhā-specific confirmation)
Agni
Jagatī (likely for RV 10.91.1 given line length; meter should be confirmed by syllable count in the received text)
ऋग्वेद 10.91 अग्नि-स्तुति है, जिसमें अग्नि को सदा जाग्रत गृहस्थ-उपस्थिति और सार्वभौम होतृ के रूप में सराहा गया है, जो यज्ञ को सफल और फलदायी बनाता है। इसमें अग्नि को दीप्तिमान बुद्धि (मति/मेधा) कहा गया है, जो सम्यक् अर्पण और देवताओं के साथ उचित संगति स्थापित करता है तथा उपासकों को विस्तृत, वीरतापूर्ण समृद्धि प्रदान करता है।
Mantra 1
सं जागृवद्भिर्जरमाण इध्यते दमे दमूना इषयन्निळस्पदे । विश्वस्य होता हविषो वरेण्यो विभुर्विभावा सुषखा सखीयते ॥
जाग्रत जनों के साथ समस्वर होकर, जरा-रहित-सा बढ़ता अग्नि घर-घर में प्रज्वलित होता है; इळा-पद में वह प्रेरणा को आगे बढ़ाता है। समस्त जगत का वरणीय होता, हवि का होता, व्यापक और दीप्तिमान—वह सुहृद मित्र बनकर मित्रता करता है।
Mantra 2
स दर्शतश्रीरतिथिर्गृहेगृहे वनेवने शिश्रिये तक्ववीरिव । जनंजनं जन्यो नाति मन्यते विश आ क्षेति विश्यो विशंविशम् ॥
वह प्रत्यक्ष तेजस्वी अतिथि (अग्नि) घर-घर, वन-वन में, मानो वेगवान् पक्षी की भाँति, आकर टिक गया है। जन-जन के लिए जन्मा हुआ वह किसी भी कुल/जन-समुदाय से अपने को अलग नहीं मानता; वह सर्वजन का अग्नि, बस्ती-बस्ती में वास करता है, और समुदाय-समुदाय में प्रवेश करता है।
Mantra 3
सुदक्षो दक्षैः क्रतुनासि सुक्रतुरग्ने कविः काव्येनासि विश्ववित् । वसुर्वसूनां क्षयसि त्वमेक इद्द्यावा च यानि पृथिवी च पुष्यतः ॥
हे अग्ने! तू अपनी दक्षताओं से पूर्ण दक्ष है; अपने क्रतु (संकल्प-शक्ति) से तू सुक्रतु—सद्संकल्पी है। काव्य (प्रेरित वाणी) से तू कवि है, और विश्ववित्—सबका जानने वाला। वसुओं में तू ही एक सच्चा वसु (धन/आश्रय) होकर निवास करता है; और द्यावा-पृथिवी जो-जो पोषित करती हैं, उन सबको तू ही बढ़ाता-पनपाता है।
Mantra 4
प्रजानन्नग्ने तव योनिमृत्वियमिळायास्पदे घृतवन्तमासदः । आ ते चिकित्र उषसामिवेतयोऽरेपसः सूर्यस्येव रश्मयः ॥
हे अग्ने! तेरे ऋत्विय (ऋतु-युक्त) योनि को जानकर वे इळा के पद पर—घृत-समृद्ध—आसीन हुए हैं। तेरी ओर निर्मल प्रेरणाएँ चलती हैं—उषाओं की गतियों की भाँति, सूर्य की किरणों की भाँति—तेरे प्रकाशमय सान्निध्य की खोज में।
Mantra 5
तव श्रियो वर्ष्यस्येव विद्युतश्चित्राश्चिकित्र उषसां न केतवः । यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये ॥
हे अग्नि, तेरी श्री-सम्पदाएँ वर्षा-मेघ की विद्युत् के समान, और उषाओं के केतुओं (संकेत-प्रभाओं) के समान, नाना-वर्ण, विचित्र हैं। जब तू औषधियों और वनों पर छोड़ा जाता है, तब तू स्वयं ही अन्न को अपने मुख में समेट लेता है—उस रस को अपने भीतर ग्रहण करता है जो हमारे भीतर बल बनकर प्रकट होगा।
Mantra 6
तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः । तमित्समानं वनिनश्च वीरुधोऽन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा ॥
औषधियों ने उस ऋतु-युक्त (ऋत्विय) गर्भ को धारण किया; आपः—माताएँ—उसी अग्नि को जन्म देती हैं। वही एक—सदा वही—वृक्ष और लताएँ, गर्भवती वनस्पतियाँ, निरन्तर उसे उत्पन्न करती और प्रवर्तित करती रहती हैं।
Mantra 7
वातोपधूत इषितो वशाँ अनु तृषु यदन्ना वेविषद्वितिष्ठसे । आ ते यतन्ते रथ्यो यथा पृथक्छर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः ॥
वायु से झकझोरा गया, प्रेरित होकर, तू नाड़ियों/मार्गों के साथ चलता है; जब अन्न-कण काँप उठते हैं, तब तू अपनी विस्तृत शक्ति में प्रकट होकर स्थिर होता है। हे अग्नि, तेरी ओर अजर दल-समूह ऐसे यत्न करते हैं मानो रथ-पथों पर अलग-अलग दिशाओं से संगम को आते हों—ताकि वे धधककर अजर ज्वाला बन जाएँ।
Mantra 8
मेधाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतमं मतिम् । तमिदर्भे हविष्या समानमित्तमिन्महे वृणते नान्यं त्वत् ॥
अग्नि—मेधा के रचयिता, विदथ (यज्ञ-सभा) के साधक, होता, और सर्वाधिक अतिशय बुद्धि—उसी एक को हम हवि में चुनते हैं, छोटे में भी और महान् में भी; अपने इस महत् कर्म के लिए हम तुम्हारे सिवा किसी और को नहीं अपनाते।
Mantra 9
त्वामिदत्र वृणते त्वायवो होतारमग्ने विदथेषु वेधसः । यद्देवयन्तो दधति प्रयांसि ते हविष्मन्तो मनवो वृक्तबर्हिषः ॥
यहाँ तुम्हारे साधक, हे अग्ने, विदथों में तुम्हें होता के रूप में चुनते हैं—वेधस् (प्रज्ञावान कर्ता) जन। जब देव-आकांक्षी होकर वे तुम्हारे लिए प्रयांसि (अग्र-अर्पण) स्थापित करते हैं—मनु के पुरुष, हवि-सम्पन्न, और बिछी हुई बर्हि (पवित्र कुश) से युक्त।
Mantra 10
तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः । तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे ॥
हे अग्ने, होत्र-कर्म तुम्हारा है; ऋतु में पोत्र-कर्म भी तुम्हारा; नेष्ट्र (नेतृत्व) भी तुम्हारा—और तुम ही सत्य में ऋत को स्थापित करने वाले अग्नीध हो। प्रशास्त्र (निर्देशक वचन) भी तुम्हारा; तुम स्वयं अध्वर्यु बनते हो। तुम ब्रह्मा भी हो, और हमारे धाम में गृहपति भी।
Mantra 11
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय मर्त्यः समिधा दाशदुत वा हविष्कृति । तस्य होता भवसि यासि दूत्यमुप ब्रूषे यजस्यध्वरीयसि ॥
हे अग्नि! जो कोई मर्त्य अमृत (अमर) के निमित्त तुम्हें समिधा अर्पित करता है या हवि की तैयारी करता है—उसके तुम होता बनते हो; तुम दूत बनकर जाते हो; उसके पक्ष में वचन कहते हो; यज्ञ करते हो और अध्वर के कर्म को सिद्ध करते हो।
Mantra 12
इमा अस्मै मतयो वाचो अस्मदाँ ऋचो गिरः सुष्टुतयः समग्मत । वसूयवो वसवे जातवेदसे वृद्धासु चिद्वर्धनो यासु चाकनत् ॥
ये हमारे विचार और वचन उसके लिए एकत्र हुए हैं—हमारी ऋचाएँ, हमारी गिरः, हमारी सुगठित स्तुतियाँ। वसु की कामना करते हुए हम इन्हें वसु, जातवेदस् के पास लाते हैं—वह तो बढ़ी हुई शक्तियों को भी बढ़ाने वाला है, जिनमें वह आनंद लेता है।
Mantra 13
इमां प्रत्नाय सुष्टुतिं नवीयसीं वोचेयमस्मा उशते शृणोतु नः । भूया अन्तरा हृद्यस्य निस्पृशे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥
इस प्राचीन के लिए मैं यह नवीन, सुगठित स्तुति-वाणी कहूँ; वह, जो अभिलाषी है, हमारी सुन ले। यह हृदय के अंतरतम स्पर्श में बार-बार और अधिक प्रवेश करे—जैसे सु-वस्त्रधारी, अभिलाषिणी पत्नी अपने पति के निकट आती है।
Mantra 14
यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुताः । कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये ॥
जिसमें अश्व-शक्तियाँ, ऋषभ (बैल), उक्षण (बलवान वृष), वशा (दुग्धदायिनी गौएँ) और मेष (मेंढ़े)—ये सब मुक्त होकर आहुति रूप में अर्पित होते हैं; उस कीलाल (निचोड़े हुए मधुर रस) पर, सोम-पृष्ठ वेधस् (ज्ञान-कर्ता) के लिए, मैं हृदय से अग्नि के हेतु एक रमणीय मति उत्पन्न करता हूँ।
Mantra 15
अहाव्यग्ने हविरास्ये ते स्रुचीव घृतं चम्वीव सोमः । वाजसनिं रयिमस्मे सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम् ॥
हे अग्ने, आह्वान होने पर हवि तेरे मुख में प्रवेश करता है—जैसे स्रुचि (चम्मच) में घृत, जैसे चम्वी (पात्र) में सोम। हमारे भीतर वह वाज-सनी रयि स्थापित कर—बल-वृद्धि कराने वाली संपदा, सु-वीर (श्रेष्ठ वीरों से युक्त), प्रशस्त, यशस्वी और महान।
It praises Agni as the fire kindled in the home and as the universal priest (Hotṛ) who makes offerings reach the gods and makes the sacrifice succeed.
Because Agni is not only physical fire; he represents the power that clarifies thought and organizes the ritual—turning intention, speech, and offering into a coherent act.
It asks for victorious, force-winning wealth (vājasani rayi), heroic strength or heroic offspring (suvīra), wide acclaim (yaśas), and an expansive, flourishing life.
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