
Sukta 10.92
Agni (as Hotṛ, guest, luminous ketu ascending to heaven)
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—यज्ञ के रथी और कुल-पुरोहित (होतृ) के रूप में, रात्रि के अतिथि के रूप में, जो सूखी समिधाओं में प्रज्वलित होकर धधक उठता है और स्वर्ग की ओर दीप्त केतु की भाँति आरोहण करता है। इसमें उसकी अजेय शक्ति का गुणगान है—इतनी महान कि सूर्य की गति और इन्द्र-सदृश पराक्रम का भी स्मरण होता है—और साथ ही प्राचीन अङ्गिरस ऋषि-परम्परा तथा सोम-पीषण के उपकरणों का उल्लेख है, जो अनुष्ठान और अंतर्दृष्टि के लिए एक स्पष्ट पथ स्थापित करते हैं।
Mantra 1
यज्ञस्य वो रथ्यं विश्पतिं विशां होतारमक्तोरतिथिं विभावसुम् । शोचञ्छुष्कासु हरिणीषु जर्भुरद्वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत ॥
यज्ञ का तुम्हारा रथ्य (रथ-चालक), जनों का स्वामी, विशों का होता, रात्रियों का अतिथि, सर्व-प्रकाशमान विभावसु—वह दहकता हुआ सूखी समिधाओं में परिश्रम करता है। वह वृष (बलवान) केतु—यजनीय, तेजस्वी चिन्ह—स्वयं को द्यौ (स्वर्ग) तक फैला देता है।
Mantra 2
इममञ्जस्पामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम् । अक्तुं न यह्वमुषसः पुरोहितं तनूनपातमरुषस्य निंसते ॥
इस तेज से अभ्यञ्जन करने वाले अग्नि को—उभय (द्यावा-पृथिवी/दोनों पक्ष) ने—धर्म का धारक, विदथ (सभा-यज्ञ) का साधक बनाया है। रात्रि की ज्वाला के समान, उस यह्व (वेगवान) को उषाएँ पुरोहित रूप में अग्रस्थ करती हैं; अरुष (रुद्र-तेज) के तनूनपात को प्रतिष्ठित किया जाता है।
Mantra 3
बळस्य नीथा वि पणेश्च मन्महे वया अस्य प्रहुता आसुरत्तवे । यदा घोरासो अमृतत्वमाशतादिज्जनस्य दैव्यस्य चर्किरन् ॥
हम उसके बल की नीतियों का, और पणि के भेदन (अवरोध-भंजन) का मनन करते हैं; उसकी वयः (पक्षी-सदृश तीव्र शक्तियाँ) आसुरत्त (भक्षण) के लिए प्रहुत (प्रेषित) की गईं। जब वे घोर जन अमृतत्व को पहुँचे, तब उन्होंने दैव्य जन को जय-नाद से गुंजा दिया।
Mantra 4
ऋतस्य हि प्रसितिर्द्यौरुरु व्यचो नमो मह्यरमतिः पनीयसी । इन्द्रो मित्रो वरुणः सं चिकित्रिरेऽथो भगः सविता पूतदक्षसः ॥
क्योंकि ऋत की प्रसिति (अग्र-प्रेरणा) विस्तीर्ण, दूर-व्यापक द्यौ है; महती अरमति—अत्यन्त वन्दनीया—को नमस्कार। इन्द्र, मित्र, वरुण ने इसे एक साथ जाना; और पूतदक्ष (शुद्ध विवेक) वाले भग तथा सविता ने भी।
Mantra 5
प्र रुद्रेण ययिना यन्ति सिन्धवस्तिरो महीमरमतिं दधन्विरे । येभिः परिज्मा परियन्नुरु ज्रयो वि रोरुवज्जठरे विश्वमुक्षते ॥
रुद्र के प्रेरक होने पर नदियाँ आगे बढ़ती हैं; वे पृथ्वी भर में महती अरमति (धर्म-बुद्धि/स्थिर-चिन्तन) को धारण करती हैं। जिनके साथ वह परिभ्रमण करने वाला व्यापक ढलानों के चारों ओर चलता है, ऊँचे स्वर से गर्जता हुआ—वह अपने उदर (गर्भ-गह्वर) के भीतर सबको सींचता है।
Mantra 6
क्राणा रुद्रा मरुतो विश्वकृष्टयो दिवः श्येनासो असुरस्य नीळयः । तेभिश्चष्टे वरुणो मित्रो अर्यमेन्द्रो देवेभिरर्वशेभिरर्वशः ॥
बलवान रुद्र, समस्त जनों के मरुत, दिव्य श्येन (बाज़), असुर के नीड (आश्रय-धाम) — इन्हीं के द्वारा वरुण देखता है; मित्र, अर्यमन्, इन्द्र भी—देवों के साथ, वेगवानों के साथ, सदा वेगवान।
Mantra 7
इन्द्रे भुजं शशमानास आशत सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये । प्र ये न्वस्यार्हणा ततक्षिरे युजं वज्रं नृषदनेषु कारवः ॥
इन्द्र में उन्होंने भुज (बल) को पाया, स्वामित्व में बढ़ते हुए; सूर्य को दर्शन में, और वृषभ को पौरुष में। जो योग्य कारीगर थे, उन्होंने नृषदन (मनुष्य-आसन/मानव-लोक) में उसके लिए युक्त वज्र को गढ़ा।
Mantra 8
सूरश्चिदा हरितो अस्य रीरमदिन्द्रादा कश्चिद्भयते तवीयसः । भीमस्य वृष्णो जठरादभिश्वसो दिवेदिवे सहुरिः स्तन्नबाधितः ॥
उसके द्वारा तेजस्वी सूर्य भी और उसके हरित (शीघ्रगामी) अश्व भी गति में प्रवृत्त होते हैं। इन्द्र की उस अतिशय सामर्थ्य से भला कौन निर्भय रह सकता है? उस भीषण वृषभ के उदर से बल का प्रचण्ड श्वास (प्राण) उठता है; दिन-प्रतिदिन वह सहनशील शक्ति आगे बढ़ती है, अजेय और अबाधित।
Mantra 9
स्तोमं वो अद्य रुद्राय शिक्वसे क्षयद्वीराय नमसा दिदिष्टन । येभिः शिवः स्ववाँ एवयावभिर्दिवः सिषक्ति स्वयशा निकामभिः ॥
आज तुम लोग रुद्र—उस प्राज्ञ, क्षयद्वीर (वीरत्व को स्थिर करने वाले) स्वामी—के लिए स्तोत्र रचो; नम्र नमस्कार सहित उसे अर्पित करो। जिन शक्तियों से वह शिव है, स्ववाँ (स्वाधीन) है, और प्रेरक-वाहक है—उन स्वयशा, निकाम (अन्तःकामना के अनुरूप) शक्तियों से वह दिव्य लोक से अपना विस्तार करता है।
Mantra 10
ते हि प्रजाया अभरन्त वि श्रवो बृहस्पतिर्वृषभः सोमजामयः । यज्ञैरथर्वा प्रथमो वि धारयद्देवा दक्षैर्भृगवः सं चिकित्रिरे ॥
उन्होंने ही प्रजा के लिए वाणी की विस्तृत कीर्ति को धारण किया—बृहस्पति, वृषभ, सोम का सजात (सोमजामय)। यज्ञों द्वारा अथर्वा ने सबसे पहले कर्म-व्यवस्था को स्थिर किया; देवगण दक्षताओं सहित, और भृगुजन, सम्यक् बोध (सम्-चिकित्रिरे) को प्राप्त हुए।
Mantra 11
ते हि द्यावापृथिवी भूरिरेतसा नराशंसश्चतुरङ्गो यमोऽदितिः । देवस्त्वष्टा द्रविणोदा ऋभुक्षणः प्र रोदसी मरुतो विष्णुरर्हिरे ॥
वे ही—सृजन-बीज से समृद्ध द्यावा-पृथिवी; नराशंस; चतुरङ्ग (चार-अंगों वाली) शक्ति; यम और अदिति; देव-त्वष्टा, द्रविणोदा (समृद्धि-दाता) ऋभुक्षण; तथा मरुत और विष्णु—इन सबने विस्तीर्ण रोदसी (द्यौः-पृथिवी) को अर्जित किया है और उसे स्थिर धारण किया है, अग्रसर आत्मा के लिए।
Mantra 12
उत स्य न उशिजामुर्विया कविरहिः शृणोतु बुध्न्यो हवीमनि । सूर्यामासा विचरन्ता दिविक्षिता धिया शमीनहुषी अस्य बोधतम् ॥
और वह दूर-विचरने वाला कवि—उशिजाम्—अहि (सर्प) हमें हवीमनि (हवन-कर्म में) सुनें; बुध्न्य (गभीर-स्थित) भी सुनें। दिवि-क्षिता (स्वर्ग-निवासी) सूर्य और चन्द्रमा, जो आकाश में विचरते हैं, शमी और नहुष की धिया (प्रबुद्ध बुद्धि) से, इस (हमारे आह्वान) को जानें—और हमें इसके प्रति जाग्रत करें।
Mantra 13
प्र नः पूषा चरथं विश्वदेव्योऽपां नपादवतु वायुरिष्टये । आत्मानं वस्यो अभि वातमर्चत तदश्विना सुहवा यामनि श्रुतम् ॥
पूषा हमारी यात्रा को आगे ले चले; विश्वदेव्या (समस्त देव-समूह) रक्षा करें; अपां नपात् रक्षा करे; वायु हमारे इष्टये (चुने हुए साध्य) में सहायक हो। उस प्राण/आत्मान को, जो अधिक प्रकाशमय वस्यः (श्रेष्ठ कल्याण) की ओर मुड़ता है, स्तुति से अर्चित करो। और सुहवा (सहज आह्वेय) अश्विनौ अपने यामनि (गमन में) इसे सुनें।
Mantra 14
विशामासामभयानामधिक्षितं गीर्भिरु स्वयशसं गृणीमसि । ग्नाभिर्विश्वाभिरदितिमनर्वणमक्तोर्युवानं नृमणा अधा पतिम् ॥
हम अपनी स्तुतिगीतियों से उस स्वयशस्वी, स्वप्रकाश परम को गाते हैं, जो इन निर्भय जनों के ऊपर अधिष्ठित है। समस्त ग्ना-शक्तियों सहित हम अदिति को—अनर्वण, अच्युत—उषा के उदय में युवा, नर-मन को आनन्द देने वाली, सच्चे पति-स्वरूप प्रभु को—स्वीकारते और स्तुत करते हैं।
Mantra 15
रेभदत्र जनुषा पूर्वो अङ्गिरा ग्रावाण ऊर्ध्वा अभि चक्षुरध्वरम् । येभिर्विहाया अभवद्विचक्षणः पाथः सुमेकं स्वधितिर्वनन्वति ॥
यहाँ जन्म से प्राचीन अङ्गिरा ने प्रेरित रेव-ध्वनि उच्चारी; ऊर्ध्व उठे ग्रावाणों ने अध्वर-यज्ञ की ओर दृष्टि की। इन्हीं साधनों से वह व्यापक (तत्त्व) विचक्षण हुआ; पथ सुमेध होकर स्थिर हुआ—जैसे स्वधिति (कुल्हाड़ी) वन-वनस्पति को काटती हुई मार्ग बनाती है।
Agni is the main deity—praised as the Hotṛ (chief ritual priest), the welcomed guest, and a radiant ketu (luminous sign) rising toward heaven.
Because Agni is ritually ‘received’ and tended, especially in evening or night-kindling; the fire is treated like an honored guest whose presence brings light, protection, and ritual success.
It recalls the ancient seer-line associated with discovering and establishing sacred fire and ritual knowledge, implying that today’s sacrifice follows a proven, well-made path that also awakens inner insight.
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