Opening the text

Sukta 10.86
Traditionally: Indra-related dialogue hymn; RV 10.86 often connected with Indra and Vṛṣākapi (and Indrāṇī) in later tradition
Indra (with Vṛṣākapi as prominent figure)
Trishtubh (likely; narrative/dialogue hymns commonly Triṣṭubh)
ऋग्वेद 10.86 एक सजीव संवाद-स्तोत्र है, जिसका केंद्र इन्द्र और रहस्यमय वृषाकपि हैं; विनिमय में इन्द्राणी भी प्रवेश करती है, और बार-बार यह प्रशंसा गूँजती है कि “इन्द्र सब से ऊँचे हैं।” इसके हास्यपूर्ण, घरेलू रंग के नीचे यह सूक्त प्रतिद्वन्द्विता, निष्ठा, और सोम-प्रेरित शक्ति को उचित मार्ग में प्रवाहित करने की जाँच करता है, ताकि इन्द्र का सार्वभौम तेज पुष्टि पाए और पुनः स्थापित हो। यह लोककथात्मक रूपकों (उर्वरता, उपचार, असाधारण जन्म) को भी सँजोए रखता है—जो इस बात के संकेत हैं कि इन्द्र में प्राणियों को बन्धन से परे उठाने की क्षमता है।
Mantra 1
वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत । यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
सोम-रस की धाराएँ बह निकलीं, फिर भी उन्होंने देव इन्द्र को तृप्त न किया। जहाँ वृषाकपि—आर्य, पुष्टियों के बीच, मेरा सखा—उन्मत्त हुआ, वहीं इन्द्र सब से ऊपर उठ खड़ा हुआ, सर्वोत्कृष्ट।
Mantra 2
परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः । नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे इन्द्र, वृषाकपि की व्याकुलता से प्रेरित होकर तू सचमुच दूर दौड़ता है। पर सोमपान के लिए तू कहीं और नहीं पाएगा; क्योंकि इन्द्र सब से ऊपर केवल यथार्थ आनन्द से उठता है, चंचल बिखराव से नहीं।
Mantra 3
किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः । यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
यह वृषाकपि—यह हरितवर्ण मृग-सा बल—तेरे साथ क्या कर बैठा है? तू किसके लिए ईर्ष्या से जलता है? क्या उस आर्य के लिए, जो पुष्टि का धन धारण करता है? पर इन्द्र—तेजस्वी सामर्थ्य के स्वामी—सबसे ऊपर हैं।
Mantra 4
यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि । श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
जिस वृषाकपि को तू प्रिय मानकर, हे इन्द्र, रक्षा करता है—अब तो कुत्ता भी उस पर झपटता है, कान को काटता है। वराह-प्रेरित वेग को वश में किया जाए; इन्द्र हर चंचल गति से ऊपर हैं।
Mantra 5
प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत् । शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
मेरे भीतर की प्रिय, सुगढ़ शक्तियाँ—कपि-बल—प्रकट हो गईं और जो बँधा था उसे ढीला कर दिया। फिर भी मैंने उसका सिर कुचल दिया; दुष्कृत्य के लिए सुगम मार्ग नहीं होता। इन्द्र सब से ऊपर हैं, वे शक्तियों को सम्यक् माप में स्थापित करते हैं।
Mantra 6
न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत् । न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
मेरे समान कोई स्त्री सु-कल्याण में अधिक सुस्थिर-आसीन नहीं; न कोई मुझसे अधिक शीघ्र शुभ को प्राप्त करने वाली है। न कोई मुझे पराजित कर सकती, न कोई संग्राम में मेरे विरुद्ध जंघा उठा सकती; क्योंकि इन्द्र सब से उत्तम (उच्च) हैं।
Mantra 7
उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति । भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे अम्बे, हे सुलाभिके! जैसे ही होगा, वैसे ही होगा। मेरा आसन दृढ़ है, मेरी जंघा दृढ़ है; मेरा शिर भी मानो विस्तार पाकर हर्षित होता है—क्योंकि इन्द्र सब से उत्तम (उच्च) हैं।
Mantra 8
किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने । किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे सुबाहो, हे स्वङ्गुरे, हे पृथुष्टे, हे पृथुजाघने! हे शूरपत्नी, तू वृषाकपि पर क्यों आक्रमण करती है? इन्द्र सब से उत्तम (उच्च) हैं।
Mantra 9
अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते । उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
यह चंचल जन मुझे मानो वीर्य-हीन, नायक-बल से रहित समझता है। पर मैं तो वीरिणी हूँ—इन्द्र की पत्नी, मरुतों की सखी। इन्द्र सब से उत्तम, सब से ऊँचा है; इसलिए मेरा तेज और बल क्षीण नहीं हो सकता।
Mantra 10
संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति । वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
पूर्वकाल में नारी संहॊत्र—सामूहिक होम-यज्ञ—और समान सभा में जाती थी। पर अब इन्द्र की वीरिणी-शक्ति महिमामय होती है—वह ऋत (सत्य-नियम) की वेधा, विधानकर्त्री है। इन्द्र सब से उत्तम, सब से ऊँचा है; उसके उत्कर्ष से यज्ञ भी अंतःसंयोग बन जाता है।
Mantra 11
इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् । नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
स्त्रियों में मैंने इन्द्राणी को परम सौभाग्यवती सुना है। क्योंकि उसका पति जरा से मुरझाता नहीं—इससे बढ़कर कोई नहीं। इन्द्र सब से उत्तम, सब से ऊँचा है; उसके साथ आत्मा के संधि-बंधन में बल का क्षय नहीं होता।
Mantra 12
नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेॠते । यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे इन्द्राणी! मैं वृषाकपि से भिन्न किसी सख्य में रमण नहीं करता। जिसका यह अप्य (जल-सम्बन्धी) हवि देवों के बीच प्रिय होकर पहुँचता है। परन्तु इन्द्र तो समस्त से उत्तम (ऊँचा) है।
Mantra 13
वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे । घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे रेवती! हे समृद्धि-दीप्ति से युक्त! हे सुपुत्रवती! हाँ, हे सुस्नुषे (सद्गृहवधू)! इन्द्र—उक्षण (वीर्यवान वृष-बल)—तेरे लिए किसी प्रिय, फलदायी हवि को भक्षण करे। इन्द्र समस्त से उत्तम है।
Mantra 14
उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् । उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
मेरे लिए वे पन्द्रह उक्षणों को बीस के साथ मिलाकर पकाते हैं। और मैं भी उस पुष्ट मेद का भक्षण करता हूँ; मेरे दोनों कुक्षि भर जाते हैं। इन्द्र समस्त से उत्तम है।
Mantra 15
वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत् । मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
जैसे तीक्ष्ण-शृंग वाला वृषभ झुंडों के बीच गरजता है, वैसे ही, हे इन्द्र, तेरा मन्थन (सोम-मन्थन) हृदय के लिए शान्ति है—यह वह सोम-प्रेसन है जिसे भावयु (जाग्रत करने वाला/उत्साहक) तेरे लिए तैयार करता है; इसी से इन्द्र सब से ऊँचा होता है।
Mantra 16
न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत् । सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
जिसका गुप्त आवेग जाँघों के बीच मचलता है, वह स्वामी नहीं; पर जिसका रोमश बल, बैठ जाने पर, फैलकर जाग उठता है—वही स्वामी है; इसी से इन्द्र सब से ऊँचा होता है।
Mantra 17
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते । सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
जिसका रोमश बल, बैठ जाने पर भी, केवल जम्हाई लेता-सा फैलता है, वह स्वामी नहीं; पर जिसका आवेग जाँघों के बीच गतिमान होता है—वही स्वामी है; (संवाद की इस उलटबासी में) इसी से इन्द्र सब से ऊँचा होता है।
Mantra 18
अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत् । असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे इन्द्र, यह वृषाकपि परस्वन्त के मारे हुए को पा गया। उसने असि (तलवार), निचोड़ा हुआ सोम, नया चरु (पका हुआ हवि), और ईंधन से भरी गाड़ी—सब ग्रहण किए; इस प्रकार इन्द्र सब से ऊपर उठता है।
Mantra 19
अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन्दासमार्यम् । पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
अब मैं विवेक-दीप्त होकर चलता हूँ, दास (अन्धकार-सेवक) और आर्य को छाँटता हुआ। मैं सु-पक्व/सु-निचोड़े सोम का पान करता हूँ, और धीर बुद्धि की ओर प्रकाशमान होता हूँ—इस प्रकार इन्द्र सब से ऊपर उठता है।
Mantra 20
धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना । नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
धन्व (उजाड़ विस्तार) और कृतन्त्र (काटे हुए पथ) के पार—वे कितनी योजनों की दूरी हैं? हे वृषाकपि, और निकट आ; घरों की ओर, गृहों में आ—इस प्रकार इन्द्र सब से ऊपर उठता है।
Mantra 21
पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै । य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे वृषाकपि, फिर लौट आओ; आओ हम शुभ-गमन (सुविता) को सुव्यवस्थित करें। यह वही पथ है जो स्वप्न-भ्रम का नाश करता है; इसी पथ से तुम फिर गृह को जाते हो—इस प्रकार इन्द्र सबके परे, सर्वोपरि उठता है।
Mantra 22
यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन । क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
हे वृषाकपे, जब तुम दोनों उत्तर दिशा की ओर जाते हुए, हे इन्द्र, गृह को पहुँचे—वह धूलि-उछालने वाला, जन-क्षोभक मृग कहाँ है? वह किसके पास चला गया?—इस प्रकार इन्द्र सबके परे, सर्वोपरि उठता है।
Mantra 23
पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् । भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥
मानवी स्त्री पर्शु ने सचमुच एक साथ बीस को जन्म दिया। जिसका उदर पीड़ित था, उसे कल्याणकारी शुभ फल प्राप्त हुआ—क्योंकि इन्द्र सबके परे उठकर उसे भी विश्व-आकुलता से पार ले गया।
Vṛṣākapi is a prominent, somewhat mysterious figure in this dialogue hymn, portrayed as exulting amid abundance and becoming a point of tension in Indra’s household. The hymn uses him to explore rivalry and the proper orientation of power and offering toward Indra.
The repeated line functions like a refrain that re-establishes Indra’s supremacy whenever the dialogue becomes conflicted or ambiguous. It signals that all relationships, offerings, and energies find their right place only under Indra’s sovereign force.
Both. Its domestic, argumentative tone can sound humorous, but it serves a serious ritual and spiritual purpose: to correct misalignment, restore harmony, and affirm the victorious power that brings prosperity and release from affliction.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.