Rig Veda Sukta 85
Mandala 10Sukta 8547 Mantras

Sukta 85

Sukta 10.85

Devata

Satya/Ṛta as sustaining principles; Ādityas; Soma; Sūrya (as upholder of dyauḥ)

Chandas

Triṣṭubh (probable; not metrically verified from input alone)

ऋग्वेद 10.85 प्रसिद्ध ‘सूर्या-विवाह’ (वैदिक विवाह) सूक्त है, जो विवाह को सत्य (सच) और ऋत (धर्म/सम्यक् व्यवस्था) पर आधारित एक ब्रह्माण्डीय कर्म के रूप में प्रस्तुत करता है। यह दम्पति को परस्पर सामंजस्य, संतति-समृद्धि, बन्धनकारी शक्तियों से रक्षा, तथा आदित्यों, सोम और सूर्य द्वारा धारण किए गए तेजोमय नियम में प्रतिष्ठित जीवन का आशीर्वाद देता है।

Mantras

Mantra 1

सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः । ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः ॥

सत्य से भूमि स्थिर है; सूर्य से द्यौ (आकाश) स्थिर है। ऋत से आदित्य दिवि में दृढ़ खड़े हैं; और सोम वहाँ ऊपर प्रतिष्ठित है।

Mantra 2

सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही । अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः ॥

सोम से आदित्य बलवान होते हैं; सोम से यह विशाल पृथ्वी महिमामयी होती है। और इन्हीं नक्षत्रों की गोद में सोम स्थापित है—व्यवस्थित ज्योतियों के बीच उनका गुप्त पोषण और आनन्द बनकर।

Mantra 3

सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिंषन्त्योषधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन ॥

जब वे औषधि को कूटते हैं, तब वह मानता है कि मैंने सोम पी लिया। पर जिस सोम को ब्रह्मज्ञ ऋषि जानते हैं—उसका तो कोई भी भक्षण नहीं करता; बाह्य कर्म से वह नहीं पकड़ा जाता, वह अंतर्ज्ञान का विषय है।

Mantra 4

आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः । ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः ॥

आवरण-रूप विधानों से ढका हुआ, और महान् शक्तियों द्वारा रक्षित, हे सोम, तू सुरक्षित खड़ा है। तू पेषण-शिलाओं की ध्वनि सुनता हुआ स्थित है; तुझे कोई पार्थिव प्राणी नहीं खा सकता—क्योंकि तेरा सत्य बाह्य पकड़ से गुप्त रखा गया है।

Mantra 5

यत्त्वा देव प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः । वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः ॥

हे देव, जब देवगण तुम्हें पीते हैं, तब उसी से तुम फिर-फिर नव रूप से परिपूर्ण हो उठते हो। वायु सोम का रक्षक है; और मास समान चक्रों की आकार-रचना है—जिससे हमारे भीतर आनन्द पुनः नव होता है।

Mantra 6

रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी । सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥

रैभी अनुदेयी—सेवा में देनेवाली—थी; नाराशंसी न्योचनी—स्थिर करनेवाला अलंकरण—थी। सूर्य्या के लिए शुभ वस्त्र, गाथा के साथ, सुसज्जित होकर आगे बढ़ता है—नव संयोग हेतु आत्मा रचित सौन्दर्य से आवृत होती है।

Mantra 7

चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम् । द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम् ॥

चित्तिरा उसका उपबर्हण—तकिया—था; चक्षुरा उसका अभ्यञ्जन—अंजन—था। द्यौः और भूमि कोश—पेटिका—बन गए, जब सूर्य्या पति के पास गई—जब लोकों के भीतर नियत संयोग में दीप्त चेतना प्रविष्ट हुई।

Mantra 8

स्तोमा आसन्प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः । सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः ॥

स्तोत्र उसके प्रतिधार (आधार) बने; छन्द उसके अलंकार और केश-सँवारने के उपकरण बने। सूर्य्या के लिए अश्विनौ वर (चुने हुए युगल) थे, और अग्नि पुरोगामी होकर आगे-आगे चला—उसे अग्रसर करता हुआ।

Mantra 9

सोमो वधूयुरभवदश्विनास्तामुभा वरा । सूर्यां यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविताददात् ॥

सोम वधू-याचक (वर-याचक) बना; दोनों अश्विनौ उसके उभय वर (चुने हुए) रहे। जब सूर्य्या पति के लिए प्रशंसा करती हुई थी, तब सविता ने उसे मनसा—अन्तःसंमती से—अर्पित किया।

Mantra 10

मनो अस्या अन आसीद्द्यौरासीदुत च्छदिः । शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात्सूर्या गृहम् ॥

जब सूर्य्या गृह की ओर चली, तब उसका रथ मन था; और द्यौ (आकाश) उसका छद (आवरण) था। दो उज्ज्वल वृषभ-शक्तियाँ जुत गईं—तभी सूर्य्या गृह की ओर गई।

Mantra 11

ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावितः । श्रोत्रं ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचारः ॥

ऋक् और सामन् द्वारा प्रतिष्ठित, तेरी दो गौएँ (ज्ञान-रश्मियाँ) साम-स्वरूप होकर खड़ी हैं। तेरे दो चक्र ‘श्रवण’ हैं; इसलिए दिवि में पन्थ चलायमान हैं—आत्मा के आरोहण हेतु आने-जाने वाले मार्ग।

Mantra 12

शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः । अनो मनस्मयं सूर्यारोहत्प्रयती पतिम् ॥

शुद्ध हैं तेरे चलने वाले चक्र; धुरी (अक्ष) सुचालित होकर गति में स्थापित है। मनोमय रथ पर सूर्य्या आरूढ़ होती है—पति की ओर प्रस्थित; वैसे ही प्रकाशित आत्मा, यथाविधि सिद्ध गति में, योग-समागम की ओर आसन ग्रहण करती है।

Mantra 13

सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् । अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते ॥

सूर्य्या का वहतु (वधू-यात्रा) अग्रसर हुआ—सविता ने उसे अवसर्जित किया, प्रकट रूप में उतारा। अघा (वैर-तमस्) में गौएँ (प्रकाश-रश्मियाँ) आहत होती हैं; तथापि अर्जुन्यः (उज्ज्वल बल) के द्वारा वह चारों ओर वहन किया जाता है—ऋत-गामी शक्ति से संरक्षित होकर।

Mantra 14

यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः । विश्वे देवा अनु तद्वामजानन्पुत्रः पितराववृणीत पूषा ॥

जब अश्विनौ पूछते हुए आए और सूर्याः के त्रिचक्र रथ-प्रयाण के लिए उपस्थित हुए, तब समस्त देवों ने तुम्हारे उस कर्म को अनुमोदित किया। तब पूषन्—पुत्र—ने उन दोनों माता-पिता को वरण किया।

Mantra 15

यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप । क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथुः ॥

हे शुभस्पती! जब तुम दोनों सूर्यां को वरण करने आए, तब तुम्हारा एक चक्र कहाँ था, और तुमने दॆष्ट्रा (लगाम/मार्गदर्शक रज्जु) के लिए कहाँ स्थान लिया?

Mantra 16

द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः । अथैकं चक्रं यद्गुहा तदद्धातय इद्विदुः ॥

हे सूर्ये! तेरे दो चक्रों को ब्राह्मण ऋतु-नियम के अनुसार जानते हैं; पर जो एक चक्र गुहा में छिपा है—उसे तो सत्य के द्रष्टा ऋषि ही वास्तव में जानते हैं।

Mantra 17

सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च । ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः ॥

सूर्या के लिए, देवों के लिए, मित्र और वरुण के लिए—जो भूत (हो चुके) के प्रति व्यापक प्रज्ञा वाले हैं—उन सबको यहाँ मैं नमस्कार-रूप अर्पण करता/करती हूँ। ऋत और मैत्री की शक्तियाँ हमारे भीतर इस प्रकाशमय संयोग को धारण करें।

Mantra 18

पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीळन्तौ परि यातो अध्वरम् । विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः ॥

ये दोनों, पूर्व और अपर, दिव्य माया से चलते हैं—दो बालक-से खेलते हुए यज्ञ के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। एक समस्त भुवनों को देखता है; दूसरा ऋतुओं का विधान करता है—वह फिर-फिर जन्म लेता है। इस प्रकार ये युग्म-शक्तियाँ समय में नवीकरण के चक्र-नियम और ऋत की व्यवस्थापक बुद्धि को प्रकट करती हैं।

Mantra 19

नवोनवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रम् । भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ॥

जन्म लेते ही वह नित-नूतन हो जाता है; दिनों का ध्वज-चिह्न बनकर वह उषाओं के अग्रभाग में आता है। आगे बढ़ते हुए वह देवों के लिए भाग का विधान करता है; और चन्द्रमा दीर्घ आयु को फैलाता है। इस प्रकार नवीकरण और यथोचित विभाजन समय के प्रवाह में प्राणी-भाव की वृद्धि को संभालते हैं।

Mantra 20

सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम् । आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥

दीप्तिमय आनन्द और सर्वरूप सौन्दर्य से युक्त—स्वर्णवर्ण, सुबुना, सुचक्र—उस शुभ वस्त्र को धारण कर। हे सूर्ये, अमृत के लोक में आरोहण कर; पति के लिए वहतु (विवाह-यात्रा) को स्योन—सुरक्षित और सुखमय—बना दे।

Mantra 21

उदीर्ष्वातः पतिवती ह्येषा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे । अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि ॥

यहाँ से उठ जा; क्योंकि यह अब पतिवती है। नमस्कार और स्तुति-वाणी से मैं विश्वावसु को आह्वान करता हूँ। पितृलोक के लिए स्पष्ट रूप से नियत किसी अन्य को खोज; वही तेरा जन्मसिद्ध भाग है—उसे ऐसा ही जान।

Mantra 22

उदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळा महे त्वा । अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं सं जायां पत्या सृज ॥

यहाँ से उठ जा, हे विश्वावसु; नमस्कार सहित हम तुझे पुकारते हैं। किसी अन्य को खोज; जाया को पति के साथ मुक्त कर और संयुक्त कर—सच्चा संयोग सिद्ध हो।

Mantra 23

अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम् । समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवाः ॥

अखंड और सीधे हों वे पथ, जिनसे हमारे सखा इस वरणीय वधू तक जाएँ। आर्यमन् और भग हमें साथ-साथ ले चलें; और हे देवो, गृह-स्वामित्व (जास्पत्य) में सुशासनयुक्त, सुमंगल सामंजस्य स्थापित हो।

Mantra 24

प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः । ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि ॥

मैं तुम्हें वरुण के पाश से आगे मुक्त करता हूँ—जिससे सविता, सुशेव (कल्याणकारी), ने तुम्हें बाँधा था। ऋत के योनि में, सुकृत के लोक में, मैं तुम्हें—अक्षत—अपने पति के साथ स्थापित करता हूँ।

Mantra 25

प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम् । यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति ॥

यहाँ से मैं उसे मुक्त करता हूँ, परे से नहीं; यहाँ दृढ़ बँधी रहे, वहाँ नहीं। हे मीढ्व (दानशील) इन्द्र, ऐसी ही वह सुपुत्रों से समृद्ध हो और सौभाग्यवती बने।

Mantra 26

पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन । गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि ॥

पूषन् तुम्हें यहाँ से आगे ले चले, हाथ पकड़कर; अश्विनौ तुम्हें अपने रथ से आगे प्रवाहित करें। गृह को जाओ—गृहपत्नी बनकर—ताकि तुम स्वाधीन और समस्वर शक्ति से विदथ (सभा) में वाणी बोलो।

Mantra 27

इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन्गृहे गार्हपत्याय जागृहि । एना पत्या तन्वं सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथः ॥

यहीं तुम्हारा प्रिय प्रजा (संतति) के द्वारा समृद्ध हो; इस गृह में गार्हपत्य-अग्नि के लिए जागृत रहो। इस पति के साथ अपने समस्त तनु (अस्तित्व) को एक कर लो; तब पूर्ण जीवन में तुम दोनों विदथ (यज्ञ-सभा) में वाणी बोलो।

Mantra 28

नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते । एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते ॥

नील-लोहित चिह्न प्रकट होता है; कृत्या का आसक्त बंधन ढीला होकर अलग हो जाता है। इसके ज्ञाति (कुटुम्बी) बल में बढ़ते हैं, और पति बन्धनों में बँधता है—धर्म्य संयोग के उचित बन्ध में स्थिर।

Mantra 29

परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु । कृत्यैषा पद्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम् ॥

शामुल्य को दूर कर; ब्राह्मणों में धन का विभाजन कर। यह कृत्या अन्यत्र पग-ठिकाना पाकर वहीं चली जाए; तब पत्नी अपने पति में प्रवेश करे।

Mantra 30

अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया । पतिर्यद्वध्वो वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते ॥

उस पापमयी (भ्रमित करने वाली) बाह्य प्रेरणा से देह तेजहीन हो जाता है और झूठी चमक में बदल जाता है—जब पति वस्त्र के द्वारा, केवल बाह्य रूप से, वधू के स्व-स्वरूप को अपने अधिकार में लेना चाहता है।

Mantra 31

ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु । पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः ॥

जो-जो क्षयकारी बल वधू के पीछे-पीछे उसके चन्द्र-सम उज्ज्वल आनन्द को हरने जाते हैं, यज्ञ-पालक देव उन्हें फिर वहीं लौटा दें, जहाँ से वे आए थे।

Mantra 32

मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती । सुगेभिर्दुर्गमतीतामप द्रान्त्वरातयः ॥

जो घात लगाकर बैठे हैं वे उन दोनों दम्पतियों को न पा सकें, जो एक ही गृह-स्वामित्व में साथ बैठे हैं। शुभ-गमन के द्वारा वे दुर्गम मार्ग को पार कर जाएँ; शत्रु शक्तियाँ दूर हटी रहें, पीछे हटकर गिर पड़ें।

Mantra 33

सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत । सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन ॥

इस मंगलमयी वधू को यहाँ एकत्र होकर देखो। इसे सौभाग्य-शक्ति प्रदान करके, फिर तुम सब अपने-अपने घरों को जाओ; आशीर्वाद इसमें स्थिर होकर बना रहे।

Mantra 34

तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे । सूर्यां यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति ॥

यह तीखा और कड़वा है, विष के समान—यह भक्षण के लिए नहीं है। जो सूर्याऽ के विषय में ब्रह्म (पवित्र वचन) और विधि को जानता है, वही वास्तव में वधूत्व और उसकी शक्ति के निकट जाने योग्य है।

Mantra 35

आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम् । सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति ॥

आशसन, विशसन तथा अधिविकर्तन—ये सूर्याया (सूर्या) के रूप हैं; इन्हें देखो। इन विकृतियों को ब्रह्मा—मंत्र-विद्या का सत्य तेज—शुद्ध कर के सम्यक् कर देता है।

Mantra 36

गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः । भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥

सौभाग्य-प्राप्ति के लिए मैं तुम्हारा हाथ ग्रहण करता हूँ, ताकि मेरे पति होने पर तुम बल सहित जरा तक पहुँचो। भग, अर्यमन्, सविता और पुरंधि—ये देव—तुम्हें मुझे गृहपत्य की स्थिर अग्नि, गृह-हवन की दृढ़ वेदी के लिए प्रदान करें।

Mantra 37

तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति । या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम् ॥

हे पूषन्, उसे परम शिव-कल्याण की ओर प्रेरित कर, जिसमें मनुष्य बीज बोते हैं। जो हमारे लिए कामना से अपनी ऊरुओं को विस्तृत करती है—उसी में, अभिलाषा सहित, हम सृजन-शक्ति का प्रक्षेप करें।

Mantra 38

तुभ्यमग्रे पर्यवहन्त्सूर्यां वहतुना सह । पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह ॥

हे अग्नि! पहले तुम्हारे लिए वे सूर्यां को विवाह-यात्रा के साथ परिक्रमा कराते हुए ले गए; अब उसे फिर पतियों को पत्नी रूप में लौटा दो—प्रजा-शक्ति सहित।

Mantra 39

पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा । दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम् ॥

फिर अग्नि ने पत्नी को आयु और तेज के साथ प्रदान किया। उसका पति दीर्घायु है—वह सौ शरद्-ऋतुएँ जीवित रहता है।

Mantra 40

सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥

सोम ने पहले तुम्हें पाया; फिर गन्धर्व ने तुम्हें पाया। तीसरे, अग्नि तुम्हारा पति हुआ; चौथे, मनुष्य-जन्य (मानव) तुम्हारे (पति) हैं।

Mantra 41

सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये । रयिं च पुत्राँश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम् ॥

सोम ने उसे गन्धर्व को सौंपा; गन्धर्व ने उसे अग्नि को सौंपा। और अग्नि ने मुझे यह वधू प्रदान की—रयि (समृद्धि) सहित और पुत्रों सहित।

Mantra 42

इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् । क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे ॥

यहीं साथ-साथ स्थिर रहो; अलग न होओ। जीवन-आयु की समग्र विस्तीर्णता को प्राप्त करो। पुत्रों और पौत्रों के साथ क्रीड़ा करते, आनंदित होते, अपने ही घर में निवास करो।

Mantra 43

आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा । अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥

प्रजापति हमारे लिए सच्ची प्रजा—हमारे अस्तित्व की वृद्धि—उत्पन्न करें। अर्यमन् हमें अजरत्व के लिए अभिषिक्त करें, उचित बन्धन को दृढ़ करें। अमङ्गल-रहित होकर पति-लोक में प्रवेश करो; हमारे द्विपद और चतुष्पद जीवन के लिए शान्ति और कल्याण बनो।

Mantra 44

अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः । वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥

अघोर-दृष्टि वाली बन; गृहपति का वध करने वाली न हो। पशुओं के प्रति शिव-कल्याणकारी, सुमना (सद्भावयुक्त) और सुवर्चा (तेजस्विनी) हो। वीरों को जनने वाली, देवकामना से युक्त, स्योना (सुख-निवास, सुरक्षित) बन—हमारे द्विपदों के लिए शान्ति हो, और चतुष्पदों के लिए भी शान्ति हो।

Mantra 45

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु । दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि ॥

हे मीढ्वः इन्द्र (वृद्धिदाता), इस स्त्री को सुपुत्रा और सुभगा कर। इसमें दस पुत्रों को स्थापित कर, और पति को ग्यारहवाँ कर दे।

Mantra 46

सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव । ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ॥

श्वशुर के घर में सम्राज्ञी हो; श्वश्रू के घर में सम्राज्ञी हो। ननदों के बीच सम्राज्ञी हो; और देव-ऋषुओं के बीच भी सम्राज्ञी हो—मर्यादा और अधिकार में प्रतिष्ठित।

Mantra 47

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ । सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥

हम दोनों को समरसता में अभिषिक्त करें सभी देव; और आपः (जल-देवताएँ) हमारे हृदयों को एक कर दें। मातरिश्वा और धाता हमें साथ-साथ स्थापित करें, और देष्ट्री (मार्गदर्शक नियन्ता) हमारी एकता को दृढ़ कर दे।

Frequently Asked Questions

It is the classic Vedic wedding hymn. It links marriage to satya (truth) and ṛta (right order) and prays for protection, harmony, and a stable household for the couple.

Because the hymn treats marriage as a lawful, sacred bond that should reflect the same order that holds the cosmos together. Living truthfully and in right order is presented as the basis for lasting union.

Varuṇa represents binding law and restraint. The mantra asks that any constraining bond be properly loosened so the bride can be placed safely and rightly into the new union, established in ṛta.

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