
Sukta 1.77
Gautama
Agni
Triṣṭubh
गौतमों का यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ सूक्त पूछता है कि कौन-सा उचित, देव-स्वीकृत वचन अग्नि की सच्ची स्तुति कर सकता है—उस तेजस्वी होतृ की, जो यज्ञ में देवताओं को उपस्थित करता है। फिर यह अग्नि को ऋतावा (ऋत/विश्व-व्यवस्था का धारक), अंतःस्थ संकल्प और सम्यक् मार्गदर्शन के रूप में, तथा उपासक के लिए यश, बल और पोषण बढ़ाने वाली शक्ति के रूप में महिमामंडित करता है।
Mantra 1
कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः । यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा होता यजिष्ठ इत्कृणोति देवान् ॥
हम अग्नि को कैसे अर्पित हों, और देवों को प्रिय कौन-सी वाणी उस तेजस्वी के लिए कही जाए? जो मर्त्यों में अमृत है, ऋत का धारक है, और यजन में सर्वाधिक कुशल होतृ है—वही हमारे लिए देवों को साकार करता है (उन्हें उपस्थित और प्रभावी बनाता है)।
Mantra 2
यो अध्वरेषु शंतम ऋतावा होता तमू नमोभिरा कृणुध्वम् । अग्निर्यद्वेर्मर्ताय देवान्त्स चा बोधाति मनसा यजाति ॥
जो यज्ञ-मार्गों (अध्वर) में सबसे अधिक शान्ति देने वाला है, ऋत-धारी होता—उसे नमस्कार-भाव से अपना बनाओ। क्योंकि जब अग्नि सचमुच मर्त्य के लिए देवों को चुनकर (जीतकर) ले आता है, तब वह मन से भी जाग्रत करता है और मनसा यजन करता है।
Mantra 3
स हि क्रतुः स मर्यः स साधुर्मित्रो न भूदद्भुतस्य रथीः । तं मेधेषु प्रथमं देवयन्तीर्विश उप ब्रुवते दस्ममारीः ॥
वह ही क्रतु (संकल्प-शक्ति) है; वही मर्य (वीर-बल) है; वही साधु—मित्र के समान सीधा सहायक—है; वह अद्भुत पथ का रथी बनता है। उसे ही मेधाओं (दीक्षाकर्मों) में प्रथम, देव-प्रार्थी जन निकट बुलाते हैं, और दक्ष (दस्म) को चारों ओर से पुकारते हैं।
Mantra 4
स नो नृणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम् । तना च ये मघवानः शविष्ठा वाजप्रसूता इषयन्त मन्म ॥
वह अग्नि—मनुष्यों में सबसे अधिक पुरुषार्थी, हानिकारकों का संहारक—अपनी सहायता सहित हमारे पास आए और हमारी धीत (प्रेरित वाणी) को सिद्धि तक पहुँचाए। और वे महावान, अतिशय बलवान शक्तियाँ, वाज-प्रसूता (बल-समृद्धि से प्रेरित) होकर, हमारे मन को आगे की ओर प्रेरित करें।
Mantra 5
एवाग्निर्गोतमेभिॠतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः । स एषु द्युम्नं पीपयत्स वाजं स पुष्टिं याति जोषमा चिकित्वान् ॥
इस प्रकार ऋत में स्थित, जातवेदस् अग्नि की गौतमों—प्रेरित विप्रों—ने स्तुति की। वह इन कर्मों में दिव्य तेज (द्युम्न) को बढ़ाता है; वह वाज—बल और विजय—को पुष्ट करता है; और चित्कित्, जागरूक ज्ञाता होकर, प्रसन्न स्वीकृति (जोष) के साथ वृद्धि और पोषण (पुष्टि) की ओर आता है।
It teaches that Agni is the key mediator of worship: the right, God-pleasing praise and offering through Agni makes the Gods present and brings strength, glory, and nourishment.
Fire appears in human homes and rituals, yet its divine power is treated as deathless and cosmic—an immortal presence working within mortal life.
It means “a hymn/word accepted by the Gods”—speech that is not just poetic, but ritually true and effective when offered through Agni.
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