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Sukta 1.78
Gautama (Gotama lineage; ‘Gotamāḥ’ indicates the family-seers)
Agni (Jātavedas)
Gāyatrī (3×8 syllables)
यह संक्षिप्त गायत्री सूक्त अग्नि जातवेदस्—सर्वज्ञ अग्नि—को पुकारता है कि वह प्रेरित वाणी और ‘दीप्तिमय शक्तियों’ (द्युम्नैः) द्वारा प्रबल रूप से प्रज्वलित हो और आगे बढ़ाया जाए। गोतम वंश के ऋषि (और नामतः राहूगण) उन्हें व्यापक-दर्शी और वाज—प्राणबल तथा समृद्धि—को जीतने में सर्वाधिक विजयी मानकर आवाहन करते हैं, ताकि उनकी ज्योति और ऊर्जा उपासकों के भीतर कार्य करे।
Mantra 1
अभि त्वा गोतमा गिरा जातवेदो विचर्षणे । द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥
हे जातवेदस्, सर्वदर्शी शक्तिमान! गौतमगण वाणी (गिरा) से तुम्हारी ओर अभिमुख होते हैं; द्युम्न—दीप्तिमय शक्तियों—से हम तुम्हें हमारे भीतर आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं।
Mantra 2
तमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति । द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥
हे अग्नि! रयि—समृद्धि और पूर्णता—की कामना से गौतम वाणी (गिरा) द्वारा तुम्हारी सेवा करता है; द्युम्न—दीप्त शक्तियों—से हम तुम्हें हमारे भीतर आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं।
Mantra 3
तमु त्वा वाजसातममङ्गिरस्वद्धवामहे । द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥
हे अङ्गिरस-स्वरूप अग्नि, वाजसातम—वाज (बल-समृद्धि) को जीतने में सर्वाधिक विजयी—तुम्हें ही हम श्रद्धापूर्वक आह्वान करते हैं। द्युम्नों (दीप्तिमय शक्तियों) से हम तुम्हें हमारे भीतर आगे प्रवृत्त करते हैं।
Mantra 4
तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूँरवधूनुषे । द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥
हे वृत्रहन्तम—वृत्र का सर्वाधिक सामर्थ्यवान संहारक—जो दस्युओं (अवरोधक शक्तियों) को झटककर दूर करता है—तुम्हें ही हम आह्वान करते हैं। द्युम्नों (दीप्तिमय शक्तियों) से हम तुम्हें हमारे भीतर आगे प्रवृत्त करते हैं।
Mantra 5
अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वचः । द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥
हम रहूगणों ने अग्नि के लिए मधुमद् वचन—मधुर, सत्य-सम्पन्न स्तुति—उच्चारित किया है। द्युम्नों (दीप्तिमय शक्तियों) से हम उसे हमारे भीतर आगे प्रवृत्त करते हैं।
It calls Agni (Jātavedas) to be strongly kindled and made active through sincere mantra and offerings, so his light and strength work both in the ritual fire and within the worshipper.
The refrain emphasizes the act of “urging forward” Agni with dyumna—luminous power or brilliance—showing that the hymn is meant to intensify Agni’s presence and effectiveness.
It means “honeyed speech”—words that are pleasing, true, and spiritually effective—treated as an offering that kindles Agni and brings beneficial results.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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