Rig Veda Sukta 72
Mandala 1Sukta 7210 Mantras

Sukta 72

Sukta 1.72

Rishi

Parāśara Śāktya

Devata

Agni

Chandas

Triṣṭubh

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—सदैव सक्रिय दिव्य शिल्पी के रूप में, जो प्रेरित काव्य-रचनाओं (काव्यानि) को धारण करता और उन्हें “स्थापित” करता है, तथा धन-सम्पदा और अमर शक्तियों का स्वामी बनता है। इसमें ब्रह्माण्डीय बिम्ब बुने गए हैं—गुप्त रहस्य, स्वर्ग के “दो नेत्रों” का निर्माण, और नदियों का मुक्त प्रवाह—जो यज्ञ-तत्त्व में रूपान्तरित होकर यह बतलाते हैं कि अग्नि अमृत (अमरत्व) की रक्षा करता है और यजमान की वृद्धि, स्थैर्य तथा आगे की यात्रा की सुरक्षा करता है।

Recitation with translationRig Veda 1.72

Mantras

Mantra 1

नि काव्या वेधसः शश्वतस्कर्हस्ते दधानो नर्या पुरूणि । अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणां सत्रा चक्राणो अमृतानि विश्वा ॥

शाश्वत वेधस् (विधाता) काव्य-प्रेरित कर्मों को स्थापित करता है, अपने हाथ में नर-हितकारी अनेक शक्तियाँ धारण किए। अग्नि रयों (समृद्धियों) का स्वामी बनता है, निरन्तर हमारे भीतर सब अमृत-तत्त्वों को रचता हुआ।

Mantra 2

अस्मे वत्सं परि षन्तं न विन्दन्निच्छन्तो विश्वे अमृता अमूराः । श्रमयुवः पदव्यो धियंधास्तस्थुः पदे परमे चार्वग्नेः ॥

यहाँ सब ओर छिपे हुए वत्स (बछड़े) को खोजते हुए, समस्त अमूढ़ अमृत (अमर) उसे न पा सके। श्रमशील युवा—पथ के अन्वेषक, धिया (प्रज्ञा) को धारण करने वाले—अग्नि के परम, रमणीय पद में स्थित हो गए।

Mantra 3

तिस्रो यदग्ने शरदस्त्वामिच्छुचिं घृतेन शुचयः सपर्यान् । नामानि चिद्दधिरे यज्ञियान्यसूदयन्त तन्वः सुजाताः ॥

हे अग्ने, तीन शरद्-ऋतुओं तक शुचि जनों ने तुम्हें—शुचि को—खोजा और घृत से शुचि भाव से तुम्हारी सेवा की। उन्होंने यज्ञीय नामों को भी स्थापित किया; और सुजात तनुओं (शक्तिमय देहों) को जाग्रत कर कर्म में प्रवृत्त किया।

Mantra 4

आ रोदसी बृहती वेविदानाः प्र रुद्रिया जभ्रिरे यज्ञियासः । विदन्मर्तो नेमधिता चिकित्वानग्निं पदे परमे तस्थिवांसम् ॥

ज्ञान से जाग्रत हुईं दोनों विशाल रोदसी (द्यावा-पृथिवी) की ओर यज्ञीय जनों ने रुद्रिय शक्ति को प्रकट रूप से आगे बढ़ाया। माप को दृढ़ता से स्थापित करने वाला, जानकार मर्त्य ने, परम पद में स्थित अग्नि को पहचानकर पा लिया।

Mantra 5

संजानाना उप सीदन्नभिज्ञु पत्नीवन्तो नमस्यं नमस्यन् । रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः ॥

एक ही बोध में संयुक्त होकर वे अभिज्ञ—अन्तरंग जानने वाले—के समीप आ बैठे। अपनी-अपनी शक्तिरूप पत्नियों से युक्त होकर, जो नमस्य है उसे नमस्कार करते हुए झुके। दोषरहित, परिशुद्ध होकर उन्होंने अपने-अपने तन को स्वस्वरूप में गढ़ा—निमिष-भर की अन्तर्जागृति में मित्र, मित्र की रक्षा करता हुआ।

Mantra 6

त्रिः सप्त यद्गुह्यानि त्वे इत्पदाविदन्निहिता यज्ञियासः । तेभी रक्षन्ते अमृतं सजोषाः पशूञ्च स्थातॄञ्चरथं च पाहि ॥

जब त्रिः-सप्त—इक्कीस—गुह्य तत्त्व तुममें ही निहित किए गए, तब यज्ञिय जनों ने पदचिह्नों द्वारा उन्हें पा लिया। उन्हीं के द्वारा, एकरस होकर, वे अमृत की रक्षा करते हैं। तुम भी हमारे पशुओं, हमारे स्थिर आधारों, और यात्रा के रथ—गति—की रक्षा करो।

Mantra 7

विद्वाँ अग्ने वयुनानि क्षितीनां व्यानुषक्छुरुधो जीवसे धाः । अन्तर्विद्वाँ अध्वनो देवयानानतन्द्रो दूतो अभवो हविर्वाट् ॥

हे अग्ने, मनुष्यों के निवासों की वयुनाएँ—व्यवस्थाएँ—तुम जानते हो; जीवन के लिए तुमने, तंतु-तंतु करके, विस्तृत द्वारों को क्रम में स्थापित किया। देवयान पथों के भीतर-भीतर जानने वाले, अतन्द्र तुम दूत बने—हविर्वाट्, हवि-प्रेरणा के वहनकर्ता।

Mantra 8

स्वाध्यो दिव आ सप्त यह्वी रायो दुरो व्यृतज्ञा अजानन् । विदद्गव्यं सरमा दृळ्हमूर्वं येना नु कं मानुषी भोजते विट् ॥

स्वाधीन होकर, दिव्य लोक से आईं सात यह्वियाँ (महाशक्तियाँ) सत्य-ज्ञान को धारण किए हुए रयों (समृद्धि) के द्वारों को जानकर उन्हें व्यापक रूप से खोल देती हैं। सरमा ने प्रकाश का दृढ़ बाड़ा/आवरण—गव्य (गौ-धन) का निधान—पा लिया; उसी के द्वारा अब मानव-समुदाय अपना भाग, अपना भोग और पोषण प्राप्त करता है।

Mantra 9

आ ये विश्वा स्वपत्यानि तस्थुः कृण्वानासो अमृतत्वाय गातुम् । मह्ना महद्भिः पृथिवी वि तस्थे माता पुत्रैरदितिर्धायसे वेः ॥

जो समस्त श्रेष्ठ स्वपत्य (सु-उत्पत्तियाँ/कल्याणकारी अवस्थाएँ) स्थापित करते हैं, वे अमृतत्व के लिए मार्ग गढ़ते हैं। अपनी महत्ता से पृथ्वी विस्तृत होकर स्थिर हुई; माता अदिति अपने पुत्रों सहित, भीतर के लोकों को धारण करने और पोषण देने के कर्म में प्रवृत्त हुई।

Mantra 10

अधि श्रियं नि दधुश्चारुमस्मिन्दिवो यदक्षी अमृता अकृण्वन् । अध क्षरन्ति सिन्धवो न सृष्टाः प्र नीचीरग्ने अरुषीरजानन् ॥

उन्होंने इस अस्तित्व में रमणीय श्री को दृढ़ता से स्थापित किया, जब अमृतों ने दिव्य के दो नेत्र रचे। तब नदियाँ मानो मुक्त की गई हों—हे अग्नि—वैसे बहने लगीं; नीचे की ओर अरुण (रक्तिम) धाराएँ प्रकट होकर जानी गईं।

Frequently Asked Questions

It praises Agni as the sacred fire who carries inspired power, grants abundance, and protects immortality (amṛta). The hymn also uses creation imagery—hidden secrets, Heaven’s “two eyes,” and flowing rivers—to show how Agni brings what is concealed into light.

It is a symbolic way of speaking about concealed sacrificial and cosmic powers placed within Agni. The hymn says the ritual-wise discover these mysteries “by the steps,” meaning through ordered practice, insight, and correct performance.

It can be recited during a simple fire offering or lamp worship to invoke clarity, protection, and steady progress. The key prayer is for Agni to guard vitality and increase, firm foundations, and safe movement on one’s life-journey.

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