Rig Veda Sukta 73
Mandala 1Sukta 7310 Mantras

Sukta 73

Sukta 1.73

Rishi

Madhucchandā Vaiśvāmitra (traditional for RV 1.73)

Devata

Agni

Chandas

Gāyatrī/Anuṣṭubh not applicable here; RV 1.73 is commonly Triṣṭubh (probable for this verse)

ऋग्वेद 1.73 में अग्नि का आह्वान सु-मार्गदर्शक होतृ के रूप में किया गया है, जो यजमान के “सद्मन्” (गृह/आवास) को आशीर्वाद, समृद्धि और ऋत-सम्यक् व्यवस्था के क्षेत्र में विस्तारित करते हैं। यह सूक्त अग्नि के विवेकपूर्ण नेतृत्व (सुप्रणीति) की स्तुति करता है, उनकी उस शक्ति का गुणगान करता है जो ऋत के प्रवाह को मुक्त करती है—जिसे बाधा तोड़कर निकलती गौओं और नदियों के रूप में कल्पित किया गया है—और अंत में प्रार्थना करता है कि कवि के वचन प्रिय हों तथा अग्नि का सु-योजित शासन धन और देव-नियत यश प्रदान करे।

Mantras

Mantra 1

रयिर्न यः पितृवित्तो वयोधाः सुप्रणीतिश्चिकितुषो न शासुः । स्योनशीरतिथिर्न प्रीणानो होतेव सद्म विधतो वि तारीत् ॥

जो पितृ-सम्पत्ति के समान सु-अर्जित रयि है, वही हमारे वय (विकास/बल) को धारण करता है; सु-प्रणीति (श्रेष्ठ मार्गदर्शन) से वह विवेकी जनों को अनुशासित करता है। स्योन (सुखद) अतिथि की भाँति, जो प्रीति जगाता है, वह तृप्त करता है; और होता की भाँति, यजमान के सद्म (गृह/आश्रय) को विधाता के लिए विस्तृत कर देता है।

Mantra 2

देवो न यः सविता सत्यमन्मा क्रत्वा निपाति वृजनानि विश्वा । पुरुप्रशस्तो अमतिर्न सत्य आत्मेव शेवो दिधिषाय्यो भूत् ॥

देव सविता के समान, जिसका मन सत्य है, वह अपने क्रतु (संकल्प/शक्ति) से समस्त व्रजन (वक्रताएँ/विघ्न) को रोककर सीधा करता है। बहु-प्रशस्त, वह असत्य अमति (कुटिल बुद्धि) नहीं, अपितु सत्य है; आत्मा के समान, वह शेव (कल्याणकारी) होकर दृढ़ धारण किए जाने योग्य बनता है।

Mantra 3

देवो न यः पृथिवीं विश्वधाया उपक्षेति हितमित्रो न राजा । पुरःसदः शर्मसदो न वीरा अनवद्या पतिजुष्टेव नारी ॥

देव के समान वह सर्वाधारा पृथ्वी पर निवास करता है—मित्र-भाव से हितकारी, राजा के समान समरस संधियों वाला। वह पुरःसद् (अग्र-आसीन) है, शर्मसद् (शान्ति में स्थित) है, वीरों के समान; अनवद्य, स्वामी द्वारा प्रिय पत्नी के समान।

Mantra 4

तं त्वा नरो दम आ नित्यमिद्धमग्ने सचन्त क्षितिषु ध्रुवासु । अधि द्युम्नं नि दधुर्भूर्यस्मिन्भवा विश्वायुर्धरुणो रयीणाम् ॥

हे अग्नि, तुम्हें—जिसे मनुष्य गृह में सदा प्रज्वलित रखते हुए, स्थिर निवासों में निरन्तर समीप आते हैं—उसी तुममें वे बहुल तेजोमय द्युम्न को अधिष्ठित करते हैं। हमारे लिए तुम विश्व-आयु के धारक बनो, और रयियों (समृद्धियों) के दृढ़ आधार बनो।

Mantra 5

वि पृक्षो अग्ने मघवानो अश्युर्वि सूरयो ददतो विश्वमायुः । सनेम वाजं समिथेष्वर्यो भागं देवेषु श्रवसे दधानाः ॥

हे अग्नि, दानशील मघवान और खोजी साधक आगे बढ़ें; दीप्तिमान सूरी (ऋषि) समस्त आयु-पर्यन्त दान को विस्तृत करें। समर-स्थलों में हम वाज (बल-सम्पदा) को जीतें; और आर्य-भाव (उदात्त आकांक्षा) देवों में अपना भाग धारण करे, श्रवस् (यश) को स्थापित करता हुआ।

Mantra 6

ऋतस्य हि धेनवो वावशानाः स्मदूध्नीः पीपयन्त द्युभक्ताः । परावतः सुमतिं भिक्षमाणा वि सिन्धवः समया सस्रुरद्रिम् ॥

क्योंकि ऋत की धेनुएँ, आनन्द से रंभाती हुई, हमारे लिए अपने स्तनों को भरती हैं—द्युभक्त (प्रकाश-भाग) वितरित करती हुई। परावत् (दूर-पार) से सुमति (सद्बुद्धि) की याचना करती हुई, नदियाँ अलग भी और साथ भी बहती हैं, अड्रि (अवरोध-शिला) को चीरती हुई।

Mantra 7

त्वे अग्ने सुमतिं भिक्षमाणा दिवि श्रवो दधिरे यज्ञियासः । नक्ता च चक्रुरुषसा विरूपे कृष्णं च वर्णमरुणं च सं धुः ॥

हे अग्नि! तुझमें सुमति (सद्बुद्धि) की याचना करते हुए यज्ञीय जन दिवि में अपना श्रवः (यश/कीर्ति) स्थापित करते हैं। रात्रि और उषा—भिन्न-भिन्न रूपों वाली—ने मिलकर कृष्ण वर्ण और अरुण वर्ण को क्रम से धारण कराया है; अंधकार और प्रकाश अपनी-अपनी बारी से व्यवस्थित हैं।

Mantra 8

यान्राये मर्तान्त्सुषूदो अग्ने ते स्याम मघवानो वयं च । छायेव विश्वं भुवनं सिसक्ष्यापप्रिवान्रोदसी अन्तरिक्षम् ॥

हे अग्नि, सुषूद (सुप्रेरक)! जिन मर्त्यों को तू रायि (समृद्धि) की ओर प्रेरित करता है, हम भी उन्हीं मघवानों (दानशीलों) में हों। छाया के समान तू समस्त भुवन को आलिंगित करे; हमारे भीतर रोदसी (द्यावा-पृथिवी) और अन्तरिक्ष को पूर्ण कर।

Mantra 9

अर्वद्भिरग्ने अर्वतो नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्वनुयामा त्वोताः । ईशानासः पितृवित्तस्य रायो वि सूरयः शतहिमा नो अश्युः ॥

हे अग्नि! अश्वों के साथ, वेगवान शक्तियों के साथ; नर-वीरों के साथ—तेरे द्वारा रक्षित होकर हम वीरों से वीरों को जीतें। पितृवित्त (पितरों से प्राप्त) रायि के स्वामी बनकर, हमारे लिए सूरी (दीप्तिमान ऋषि) शतगुण परिमाणों में प्रयत्न करें।

Mantra 10

एता ते अग्न उचथानि वेधो जुष्टानि सन्तु मनसे हृदे च । शकेम रायः सुधुरो यमं तेऽधि श्रवो देवभक्तं दधानाः ॥

हे वेधस् अग्नि! ये स्तुतिवचन तुम्हारे लिए हैं, वे मन और हृदय को प्रिय हों। हम तुम्हारे सुयोजित नियम—समृद्धि के यम—को धारण कर सकें और उसे आगे बढ़ा सकें; और देव-भक्त (देवदत्त) श्रवस्—कीर्ति/यश—को, दिव्य अंश में प्रतिष्ठित, अपने ऊपर स्थापित करें।

Frequently Asked Questions

It asks Agni to lead correctly (supraṇīti), make the sacrificer’s home and ritual space flourish, remove obstructions, and grant abundance (rayi) and divinely given fame (śravas).

These are images of Ṛta (right order) and nourishment: the “cows of Ṛta” give plenty, and the rivers symbolize life-forces that Agni helps to flow by breaking through what blocks them.

It can be recited when kindling a lamp or fire, at the start of a homa, or before any focused work—invoking Agni as inner clarity and outer protection, asking for right guidance and steady prosperity.

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