Sukta 1.39
प्र यदित्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ । कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं ह धूतयः ॥
prá yád itthā̀ parāvátaḥ śócīr ná mānám ásyatha | kásya krátvā marutaḥ kásya várpasā káṃ yātha káṃ ha dhūtayaḥ ||
जब तुम दूरस्थ परावत्-प्रदेशों से इस प्रकार उमड़ते हो, तब ज्वाला-सा तेज मानो अपना पराक्रम गति में डाल देता है। हे मरुतो, किसके क्रतु (संकल्प/प्रेरणा) से, किसके तेजस्वी रूप-प्रभा से तुम जाते हो? हे धूतयो (जगत्-हिलाने वाले), तुम किसके पास जाते हो, किसे खोजते हो?
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