समापन-सोपान: लीला-दर्शन से सिद्धान्त-दर्शन तक। यहाँ साधक ‘चरित’ के रस में रमा हुआ रहते हुए ‘माया-भ्रम’ की जड़ पहचानता है और निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मुक्ति का द्वार केवल राम-कृपा/भजन है। यह चरण ‘लोक-व्यवहार’ बनाम ‘परमार्थ’ के द्वैत को साधकर, भक्त को निर्गुण-सगुण की एकता में स्थिर करता है—अर्थात् लीला को मिथ्या नहीं, उपास्य-सत्य का करुणा-रूप मानकर सीढ़ी की अंतिम पायदान पर चढ़ाता है।
यह अंश उत्तरकाण्ड के उस निर्णायक भाव-खण्ड में आता है जहाँ कथा ‘लीला-रस’ से ‘तत्त्व-निरूपण’ की ओर मुड़ती है। प्रधान रस शान्त है, किन्तु उसके भीतर अद्भुत (भगवत्-ऐश्वर्य), वात्सल्य (बाल-लीला), और करुणा (जीव की माया-ग्रस्त दशा) का संयोग चलता है। काकभुसुंडि पहले गरुड़ के प्रश्न-आधार पर ‘मोह’ की सार्वभौमिकता गिनाते हैं—ज्ञानी, तपस्वी, सूर, कवि, कोबिद तक माया-कटक से घिरते हैं—फिर निर्णायक सिद्धान्त रखते हैं कि यह माया स्वयं प्रभु की भ्रू-विलास-जन्या नटी है, पर प्रभु सच्चिदानन्द अखण्ड हैं। आगे ‘दोष-दर्शन’ की उपमा-श्रृंखला (पीत-चन्द्र, पश्चिम में उगा सूर्य, नौका-भ्रम) से स्पष्ट होता है कि मोह जीव का दृष्टिदोष है, हरि का नहीं। अंततः बाल-राम की लीला में भुसुंडि का ‘मोह’ भी प्रभु-प्रेरित है—दास-रक्षा हेतु—और निष्कर्ष यह कि निर्वाण की चाह भी राम-भजन बिना निष्फल है। इस प्रकार उत्तरकाण्ड यहाँ ‘समापन-सोपान’ बनकर भक्ति को ज्ञान का शिरोमणि सिद्ध करता है।
चौपाई 70.1-4
बोलेउ काकभसुंड बहोरी।नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे।कृपापात्र रघुनायक केरे।।
तुम्हहि न संसय मोह न माया।मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।
पठइ मोह मिस खगपति तोही।रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।
तुम्ह निज मोह कही खग साईं।सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।
नारद भव बिरंचि सनकादी।जे मुनिनायक आतमबादी।।
मोह न अंध कीन्ह केहि केही।को जग काम नचाव न जेही।।
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा।केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।
boleu kākabhasuṇḍa bahorī |nabhaga nātha para prīti na thorī ||
saba bidhi nātha pūjya tumha mere |kṛpā-pātra raghunāyaka kere ||
tumhahi na saṃsaya moha na māyā |mo para nātha kīnha tumha dāyā ||
paṭhai moha misa khagapati tohī |raghupati dīnhi baṛāī mohī ||
tumha nija moha kahī khaga-sāīṃ |so nahiṃ kachu ācaraja gosāīṃ ||
nārada bhava birañci sanakādī |je muni-nāyaka ātamabādī ||
moha na aṃdha kīnha kehi kehī |ko jaga kāma nacāva na jehī ||
tṛsnā̃ kehi na kīnha baurāhā |kehi kara hṛdaya krodha nahiṃ dāhā ||
तब काकभुशुंडि ने पुनः कहा: हे आकाश में विचरने वाले पक्षियों के स्वामी, मेरी आपसे प्रीति थोड़ी नहीं है। हे मेरे नाथ, आप सब प्रकार से पूज्य हैं, क्योंकि आप रघुनाथ के कृपापात्र हैं। आपको न संशय है, न मोह है, न माया है; हे नाथ, मुझ पर दया करके आपने यह किया है। मोह के बहाने आपको, हे खगपति, भेजकर रघुपति ने मुझे बड़ाई दी है। जो अपना मोह आपने कहा है, हे खगों के स्वामी, वह कोई आश्चर्य नहीं है, हे गोसाईं। नारद, शिव, ब्रह्मा, सनक आदि, जो मुनियों के नायक और आत्मज्ञानी हैं। मोह ने किसे अंधा नहीं किया? जगत में कौन है जिसे काम नचाता नहीं? तृष्णा ने किसे बौराया नहीं? किसके हृदय में क्रोध नहीं जला?
दोहा 70(क)-(ख)
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।70(क)।।
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।70(ख)।।
gyānī tāpasa sūra kabi kobida guna āgāra |kehi kai laubha biḍambanā kīnhi na ehiṃ saṃsāra ||70(ka)||
śrī mada bakra na kīnha kehi prabhutā badhira na kāhi |mṛgalocani ke naina sara ko asa lāga na jāhi ||70(kha)||
ज्ञानी, तपस्वी, वीर, कवि, विद्वान और गुणों के भंडार - इस संसार में ऐसा कौन है जिसे लोभ ने हँसी का पात्र नहीं बनाया? धन के घमंड ने किसको टेढ़ा नहीं किया, और सत्ता ने किसको बहरा नहीं बनाया? मृगलोचनी की आँखों के बाण ऐसा कौन है जिसे नहीं भेद सके?
चौपाई 71.1-4
गुन कृत सन्यपात नहिं केही।कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा।ममता केहि कर जस न नसावा।।
मच्छर काहि कलंक न लावा।काहि न सोक समीर डोलावा।।
चिंता साँपिनि को नहिं खाया।को जग जाहि न ब्यापी माया।।
कीट मनोरथ दारु सरीरा।जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।
सुत बित लोक ईषना तीनी।केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।।
यह सब माया कर परिवारा।प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
सिव चतुरानन जाहि डेराहीं।अपर जीव केहि लेखे माहीं।।
guna kṛta sannyapāta nahiṃ kehī |kou na māna mada tajeu nibehī ||
jobana jvara kehi nahiṃ balakāvā |mamatā kehi kara jasa na nasāvā ||
macchara kāhi kalaṅka na lāvā |kāhi na soka samīra ḍolāvā ||
ciṃtā sā̃pini ko nahiṃ khāyā |ko jaga jāhi na byāpī māyā ||
kīṭa manoratha dāru sarīrā |jehi na lāga ghuna ko asa dhīrā ||
suta bita loka īṣanā tīnī |kehi ke mati inha kṛta na malīnī ||
yaha saba māyā kara parivārā |prabala amiti ko baranai pārā ||
siva caturānana jāhi ḍerāhīṃ |apara jīva kehi lekhe māhīṃ ||
गुणों से उत्पन्न विकार ने किसको नहीं पकड़ा? कौन ऐसा है जिसने अंत तक मान, मद और अभिमान पूरी तरह नहीं छोड़ा? जवानी के ज्वर ने किसको विक्षिप्त नहीं किया? ममता ने किसके यश को नष्ट नहीं किया? मत्सर ने किसको कलंक से अभिभूत नहीं किया? शोक के वायु ने किसको डोलाया नहीं? चिंता रूपी सर्पिणी ने किसको नहीं खाया? संसार में माया किस पर नहीं छाई? मनोरथ कीड़ा है और शरीर काठ का: इतना धीर कौन है जिसमें घुन नहीं लगा? पुत्र, धन और लोकयश, ये तीनों तृष्णा: किसकी बुद्धि को इन्होंने मलिन नहीं किया? यह सब माया का परिवार है। वह प्रबल और अमित है, उसका पार कौन बता सकता है? शिव और चतुरानन ब्रह्मा भी जिससे डरते हैं, अन्य जीव उसके आगे क्या गिनती में हैं?
दोहा 71(क)-(ख)
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।।71(क)।।
सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि।।71(ख)।।
byāpi raheu saṃsāra mahũ māyā kaṭaka pracaṇḍa |senāpati kāmādi bhaṭ daṃbha kapaṭa pāṣaṇḍa ||71(ka)||
so dāsī raghubīra kai samujheṃ mithyā sopi |chūṭa na rāma kṛpā binu nātha kahaũ pada ropi ||71(kha)||
माया की प्रचंड सेना सारे संसार में व्याप्त हो रही है; उसके सेनापति काम आदि वासनाएँ हैं, और उसके सैनिक दंभ, कपट और पाषंड हैं। वह रघुबीर राम की दासी है, और यद्यपि उसे मिथ्या समझा जाता है, तथापि राम की कृपा के बिना उससे छूटकारा नहीं मिलता। हे नाथ, पैर रोपकर मैं यह कहता हूँ।
चौपाई 72.1-4
जो माया सब जगहि नचावा।जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा।नाच नटी इव सहित समाजा।।
सोइ सच्चिदानंद घन रामा।अज बिग्यान रूपो बल धामा।।
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता।अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।सबदरसी अनवद्य अजीता।।
निर्मम निराकार निरमोहा।नित्य निरंजन सुख संदोहा।।
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
इहाँ मोह कर कारन नाहीं।रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।
jo māyā saba jagahi nacāvā |jāsu carita lakhi kāhũ na pāvā ||
soi prabhu bhrū bilāsa khaga-rājā |nāca naṭī iva sahita samājā ||
soi saccidānanda ghana rāmā |aja bigyāna rūpo bala dhāmā ||
byāpaka byāpya akhaṇḍa anaṃtā |akhila amogha-sakti bhagavaṃtā ||
aguna adabhra girā gotītā |sabadarasī anavadya ajītā ||
nirmama nirākāra niramohā |nitya nirañjana sukha saṃdohā ||
prakṛti pāra prabhu saba ura bāsī |brahma nirīha biraja abināsī ||
ihā̃ moha kara kārana nāhīṃ |rabi sanmukha tama kabahũ ki jāhīṃ ||
जो माया सम्पूर्ण जगत को नचाती है, जिसके चरित्र को देखकर किसी ने नहीं समझा, वही प्रभु के भृकुटी-विलास से, हे खगराज, नटी के समान अपने समाज सहित नाचती है। वही राम सच्चिदानंदघन हैं, अजन्मा, विज्ञानस्वरूप और बल के धाम हैं। व्यापक और व्याप्य, अखंड और अनंत, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति भगवान हैं। गुणरहित, अदभ्र, वाणी और इन्द्रियों से अतीत, सर्वदर्शी, अनवद्य और अजीत हैं। निर्मम, निराकार, निर्मोह, नित्य, निरंजन, सुखों के समूह हैं। प्रकृति के पार प्रभु सबके हृदय में निवास करते हैं, ब्रह्म, निरीह, निरज और अविनाशी हैं। यहाँ मोह का कोई कारण नहीं, सूर्य के सामने अंधकार कभी नहीं जा सकता।
दोहा 72(क)-(ख)
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।72(क)।।
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।।72(ख)।।
bhagata hetu bhagavāna prabhu rāma dhareu tanu bhūpa |kiye carita pāvana parama prākṛta nara anurūpa ||72(ka)||
jathā aneka beṣa dhari nṛtya karai naṭa koi |soi soi bhāva dekhāvai āpuna hoi na soi ||72(kha)||
भक्तों के लिए भगवान प्रभु राम ने राजा का शरीर धारण किया, और साधारण मनुष्यों के अनुरूप परम पवित्रकारी चरित्र किए। जैसे कोई नट अनेक वेष धारण कर नृत्य करता है, एक-एक भाव दिखाता है, पर आप उनमें से कोई नहीं होता, वैसे ही प्रभु हैं।
चौपाई 73.1-5
असि रघुपति लीला उरगारी।दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।
जे मति मलिन बिषयबस कामी।प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।।
नयन दोष जा कहँ जब होई।पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा।सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।
नौकारूढ़ चलत जग देखा।अचल मोह बस आपुहि लेखा।।
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं।कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा।सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।
मायाबस मतिमंद अभागी।हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।
ते सठ हठ बस संसय करहीं।निज अग्यान राम पर धरहीं।।
asi raghupati līlā uragārī |danuja bimohani jana sukhakārī ||
je mati malina biṣaya-basa kāmī |prabhu moha dharahim imi svāmī ||
nayana doṣa jā kahaṁ jaba hoī |pīta barana sasi kahuṁ kaha soī ||
jaba jehi disi bhrama hoi khagesā |so kaha pacchima uyau dinesā ||
naukārūṛha calata jaga dekhā |acala moha basa āpuhī lekhā ||
bālaka bhramahim na bhramahim gṛha-ādīṁ |kahahim paraspara mithyābādīṁ ||
hari biṣaika asa moha bihaṅgā |sapanehuṁ nahiṁ ajñāna prasaṅgā ||
māyābasa matimanda abhāgī |hṛdayaṁ jamanikā bahubidhi lāgī ||
te saṭha haṭha basa saṁsaya karahīṁ |nija ajñāna rāma para dharahīṁ ||
हे नागशत्रु, रघुनाथजी की ऐसी ही लीला है, जो दानवों को मोहित करती है और भक्तों को सुख देती है। हे मित्र, जिनकी बुद्धि मलिन है, जो विषयों के वशीभूत और कामी हैं, वे लोग इस प्रकार स्वामी प्रभु पर मोह आरोपित करते हैं। जिसके नेत्रों में जब कोई दोष होता है, वही व्यक्ति चंद्रमा को पीता वर्ण का कहता है। हे खगेश, जब किसी को दिशा के बारे में भ्रम होता है, तब वह सूर्य को पश्चिम में उगता हुआ कहता है। नौका में बैठकर चलता हुआ व्यक्ति संसार को चलता हुआ देखता है, और मोह के वश में आकर अपने को अचल मानता है। बालक घूमते हैं, परंतु घर आदि नहीं घूमते; तो भी वे एक दूसरे से मिथ्या बातें कहते हैं। हे पक्षी, हरि के विषय में ऐसा ही मोह है; स्वप्न में भी उनमें अज्ञान का कोई संबंध नहीं है। माया के वश में आए हुए मतिमंद और अभागे लोगों के हृदय में बहुत प्रकार से जाल लग जाता है। वे मूढ़ लोग हठ के वश में होकर संशय करते हैं और अपने अज्ञान को राम पर आरोपित करते हैं।
दोहा 73(क)-(ख)
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप।।73(क)।।
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ।।73(ख)।।
kāma krodha mada lobha rata gṛhāsakta dukharūpa |te kimi jānahim raghupatihi mūṛha pare tama kūpa ||73(ka)||
nirguna rūpa sulabha ati saguna jāna nahiṁ koi |sugama agama nānā carita suni muni mana bhrama hoi ||73(kha)||
काम, क्रोध, मद और लोभ में रत, गृह में आसक्त और दुःखरूप, तमः कूप में गिरे हुए मूढ़ लोग रघुपति को कैसे जान सकते हैं? निर्गुण रूप अत्यंत सुलभ है, परन्तु सगुण रूप कोई नहीं जानता। उनके नाना चरित्र, कुछ सुगम और कुछ अगम, सुनकर मुनियों के मन भ्रमित होते हैं।
चौपाई 74.1-4
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई।कहउँ जथामति कथा सुहाई।।
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही।सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता।हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ।परम रहस्य मनोहर गावउँ।।
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ।जन अभिमान न राखहिं काऊ।।
संसृत मूल सूलप्रद नाना।सकल सोक दायक अभिमाना।।
ताते करहिं कृपानिधि दूरी।सेवक पर ममता अति भूरी।।
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई।मातु चिराव कठिन की नाईं।।
sunu khagesa raghupati prabhutāī |kahaũ jathāmati kathā suhāī ||
jehi bidhi moha bhayau prabhu mohī |sou saba kathā sunāvaũ tohī ||
rāma kṛpā bhājana tumha tātā |hari guna prīti mohi sukhadātā ||
tāte nahiṁ kachu tumhahiṁ durāvaũ |parama rahasya manohara gāvaũ ||
sunahu rāma kara sahaja subhāū |jana abhimāna na rākhahiṁ kāū ||
saṁsṛta mūla sūlaprada nānā |sakala soka dāyaka abhimānā ||
tāte karahiṁ kṛpānidhi dūrī |sevaka para mamatā ati bhūrī ||
jimi sisu tana brana hoi gosāī |mātu cirāva kaṭhina kī nāīṁ ||
सुनो, पक्षियों के स्वामी, रघुनाथ जी की प्रभुता की कथा मैं अपनी समझ अनुसार कहता हूँ, जो अति सुंदर है। जिस प्रकार मुझे मोह उत्पन्न हुआ, हे प्रभु, वह सारी कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तुम, हे तात, राम की कृपा के भाजन हो, और हरि के गुणों से तुम्हारी प्रीति मुझे सुख देती है। इसलिए मैं तुमसे कुछ नहीं छिपाता, और परम रहस्यमय मनोहर कथा गाता हूँ। सुनो, राम का सहज स्वभाव है कि वे अपने दासों को अभिमान नहीं रखने देते। अभिमान संसार का मूल है, अनेक पीड़ा देने वाला है, और सब शोक का कारण है। इसलिए कृपानिधि उसे दूर करते हैं, क्योंकि सेवक पर उनकी ममता अत्यंत अधिक है। जैसे बालक के शरीर पर फोड़ा हो जाने पर, हे स्वामी, माता उसे चीरती है, कठिन होते हुए भी।
दोहा 74(क)-(ख)
जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर।।74(क)।।
तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि।तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि।।74(ख)।।
jadapi prathama dukha pāvai rovai bāla adhīra |byādhi nāsa hita jananī ganati na so sisu pīra ||74(ka)||
timi raghupati nija dāsakara harahiṁ māna hita lāgi |tulasidāsa aise prabhuhi kasa na bhajahu bhrama tyāgi ||74(kha)||
यद्यपि प्रथम बालक दुःख पाकर अधीर होकर रोता है, तो भी व्याधि के नाश के लिए जननी उस शिशु की पीड़ा की गणना नहीं करती। उसी प्रकार रघुपति अपने दास का मान हर लेते हैं, उसके हित के लिए। तुलसीदास कहते हैं: ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर तुम क्यों नहीं भजते?
चौपाई 75.1-4
राम कृपा आपनि जड़ताई।कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।
जब जब राम मनुज तनु धरहीं।भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।
तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ।बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।।
जन्म महोत्सव देखउँ जाई।बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।
इष्टदेव मम बालक रामा।सोभा बपुष कोटि सत कामा।।
निज प्रभु बदन निहारि निहारी।लोचन सुफल करउँ उरगारी।।
लघु बायस बपु धरि हरि संगा।देखउँ बालचरित बहुरंगा।।
rāma kṛpā āpani jaṛatāī |kahuṁ khageśa sunahu mana lāī ||
jaba jaba rāma manuja tanu dharahīṁ |bhakta hetu līlā bahu karahīṁ ||
taba taba avadhapurī maiṁ jāūṁ |bālacarita biloki haraṣāūṁ ||
janma mahotsava dekhauṁ jāī |baraṣa pāṁca tahaṁ rahauṁ lobhāī ||
iṣṭadeva mama bālaka rāmā |sobhā bapuṣ koṭi sata kāmā ||
nija prabhu badana nihāri-nihārī |locana suphala karauṁ uragārī ||
laghu bāyasa bapu dhari hari saṅgā |dekhauṁ bālacarita bahuraṅgā ||
राम की कृपा और अपनी मूढ़ता कहूँगा, हे खगेश, मन लगाकर सुनो। जब-जब राम मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिए अनेक लीलाएँ करते हैं, तब-तब मैं अयोध्यापुरी में जाता हूँ और बालचरित्र देखकर हर्षित होता हूँ। जन्म महोत्सव देखने जाता हूँ और वहाँ पाँच वर्ष आसक्त होकर रहता हूँ। बालक राम मेरे इष्टदेव हैं, जिनके वपुष की शोभा शतकोटि कामदेवों के समान है। अपने प्रभु के मुख को बार-बार निहारकर, हे उरगारी, अपने नयनों को सफल करता हूँ। लघु काक का रूप धारण करके हरि के संग रहता हूँ और उनके बहुरंगी बालचरित्र देखता हूँ।
दोहा 75(क)-(ख)
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।।
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।।
larikāīṁ jahaṁ jahaṁ phirahīṁ tahaṁ tahaṁ saṅga uṛāūṁ |jūṭhani parai ajira maṁha so uṭhāi kari khāūṁ ||75(ka)||
eka bāra atisaya saba carita kiye raghubīra |sumirata prabhu līlā soi pulakita bhayau sarīra ||75(kha)||
बाल्यकाल में वह जहाँ-जहाँ विचरता, मैं वहाँ-वहाँ उड़कर उसके साथ जाता, और आँगन में जो जूठन गिरता, उसे उठाकर मैं खाता। एक बार रघुकुल श्रेष्ठ ने अत्यन्त अद्भुत सब चरित्र किए; प्रभु की उसी लीला को स्मरण कर यह शरीर पुलकित हो गया।
चौपाई 76.1-4
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक।रामचरित सेवक सुखदायक।।
नृपमंदिर सुंदर सब भाँती।खचित कनक मनि नाना जाती।।
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई।जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।
बालबिनोद करत रघुराई।बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा।अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।
नव राजीव अरुन मृदु चरना।पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।
ललित अंक कुलिसादिक चारी।नूपुर चारू मधुर रवकारी।।
चारु पुरट मनि रचित बनाई।कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।
kahai bhasuṇḍa sunahu khaganāyaka |rāmacarita sevaka sukhadāyaka ||
nṛpamandira sundara saba bhāṁtī |khacita kanaka mani nānā jātī ||
barani na jāi rucira aṅganāī |jahaṁ khelahiṁ nita cāriu bhāī ||
bālabinoda karata raghurāī |bicarata ajira janani sukhadāī ||
marakata mṛdula kalevara syāmā |aṅga aṅga prati chabi bahu kāmā ||
nava rājīva aruna mṛdu caranā |padaja rucira nakha sasi duti haranā ||
lalita aṅka kulisādika cārī |nūpura cāru madhura ravakārī ||
cāru puraṭa mani racita banāī |kaṭi kiṅkina kala mukhara suhāī ||
भसुंडी कहते हैं: सुनो, हे पक्षियों के राजा, राम के चरित्र सेवकों को सुख देने वाले हैं। राजा का महल हर तरह से सुंदर था, जिसमें सोना और अनेक प्रकार के रत्न जड़े हुए थे। उस रमणीय आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई प्रतिदिन खेलते थे। रघुनाथ अपनी माता को सुख देते हुए बाल-क्रीड़ा करते और आँगन में विचरते थे। उनका कोमल शरीर मरकत मणि के समान श्याम था, और अंग-अंग में अनेक कामदेवों के समान छटा थी। उनके कोमल चरण नवीन कमल के समान अरुण थे, और उनके चरणों के सुंदर नखों ने चंद्रमा की चमक हर ली थी। उनके चरणों में वज्र आदि चार चिह्न अति सुंदर थे, और मधुर ध्वनि करने वाले नूपुर मनोहर थे। उनकी कटि में सोने और रत्नों से बना सुंदर कलगी वाला किंकिणी-मेखला थी, जो मधुर ध्वनि करती और नेत्रों को आकर्षित करती थी।
दोहा 76
रेखा त्रय सुन्दर उदर नाभी रुचिर गँभीर।उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर।।76।।
rekhā traya sundara udara nābhī rucira gaṁbhīra |ura āyata bhrājata bibidha bāla bibhūṣana cīra ||76||
तीन रेखाओं से सुंदर उदर, नाभी रुचिर और गंभीर। विस्तृत वक्ष पर विविध प्रकार के बालकों के आभूषण और वस्त्र शोभायमान हैं।
चौपाई 77.1-5
अरुन पानि नख करज मनोहर।बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा।चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।
कलबल बचन अधर अरुनारे।दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।।
ललित कपोल मनोहर नासा।सकल सुखद ससि कर सम हासा।।
नील कंज लोचन भव मोचन।भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए।कुंचित कच मेचक छबि छाए।।
पीत झीनि झगुली तन सोही।किलकनि चितवनि भावति मोही।।
रूप रासि नृप अजिर बिहारी।नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।।
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा।बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।
किलकत मोहि धरन जब धावहिं।चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।
aruna pāni nakha karaja manohara |bāhu bisāla bibhūṣana sundara ||
kaṅdha bāla kehari-dara grīvā |cāru cibuka ānana chabi sīṁvā ||
kalabala bacana adhara arunāre |dui dui dasana bisada bara bāre ||
lalita kapola manohara nāsā |sakala sukhada sasi kara sama hāsā ||
nīla kañja locana bhava mocana |bhrājata bhāla tilaka gorocana ||
bikaṭa bhṛkuṭi sama śravan suhāe |kuñcita kaca mecaka chabi chāe ||
pīta jhīni jhagulī tana sohī |kilakani citavani bhāvati mohī ||
rūpa rāsi nṛpa ajira bihārī |nācahiṁ nija pratibiṁba nihārī ||
mohi sana karahīṁ bibidha bidhi krīḍā |baranata mohi hoti ati brīḍā ||
kilakata mohi dharana jaba dhāvahīṁ |calauṁ bhāgi taba pūpa dekhāvahīṁ ||
उनके हाथ लाल थे, नख और अंगुलियाँ मनोहर थीं, भुजाएँ लंबी-बलशाली थीं और सुंदर आभूषणों से अलंकृत थीं। उनके कंधे बाल केसरी के समान थे, गला शंख की रेखाओं से युक्त था, ठोर सुहावना था और मुख की छटा सौंदर्य की सीमा थी। उनकी बोली मधुर कलबलाहट थी, ओठ लाल थे, और ऊपर-नीचे दो-दो दाँत बड़े श्वेत और स्वच्छ थे। उनके गाल सुरम्य और नाक मनोहर थी, उनकी हँसी सबको सुख देने वाली चंद्रकिरणों के समान थी। उनकी आँखें नीलकमल के समान थीं और संसार-बंधन से मुक्त कर देने वाली थीं, उनके मस्तक पर गोरोचन का तिलक चमकता था। उनकी भौंें चौड़ी-तिरी थीं, कान सुडौल और सुमेलित थे, और घुंघराले काले केशों की छटा छाई थी। उनके शरीर पर पीली पतली छोटी अंगिया सोहती थी, और उनकी किलकार और दृष्टियाँ मुझे अति प्रिय थीं। वे सौंदर्य का भंडार राजा के आँगन में विहार करते थे, और अपना प्रतिबिंब देखकर नाचते थे। वे मेरे साथ अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ करते थे, जिन्हें वर्णन करते हुए मुझे अत्यंत लाज आती है। जब वे किलकलाते हुए मुझे पकड़ने के लिए दौड़ते थे, तब मैं भाग जाती थी, और फिर वे मुझे पूप दिखाते थे।
दोहा 77(क)-(ख)
आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं।।77(क)।।
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह।।77(ख)।।
āvata nikaṭa haṁsahiṁ prabhu bhājata rudana karāhiṁ |jāuṁ samīpa gahana pada phiri-phiri citai parāhiṁ ||77(ka)||
prākṛta sisu iva līlā dekhi bhayau mohi moha |kavana caritra karata prabhu cidānanda saṁdoha ||77(kha)||
जब मैं निकट आता, प्रभु हँसते; जब मैं भागता, वे रोने लगते। जब मैं उनके चरण पकड़ने के लिए समीप जाता, तो वे भाग जाते, बार-बार फिरकर मुझे देखते। साधारण बालक के समान उनकी लीला देखकर मुझे मोह छा गया: चिदानंद के संदोह, प्रभु ऐसे कौन-से चरित्र कर रहे हैं?
चौपाई 78.1-4
एतना मन आनत खगराया।रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।
सो माया न दुखद मोहि काहीं।आन जीव इव संसृत नाहीं।।
नाथ इहाँ कछु कारन आना।सुनहु सो सावधान हरिजाना।।
ग्यान अखंड एक सीताबर।माया बस्य जीव सचराचर।।
जौं सब कें रह ग्यान एकरस।ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।
माया बस्य जीव अभिमानी।ईस बस्य माया गुनखानी।।
परबस जीव स्वबस भगवंता।जीव अनेक एक श्रीकंता।।
मुधा भेद जद्यपि कृत माया।बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।
etanā mana ānata khagarāyā |raghupati prērīta byāpī māyā ||
so māyā na dukhada mohi kāhīṁ |āna jīva iva saṁsṛta nāhīṁ ||
nātha ihāṁ kachu kārana ānā |sunahu so sāvadhāna harijānā ||
gyāna akhaṇḍa eka sītābara |māyā basya jīva sacarācara ||
jauṁ saba keṁ raha gyāna eka-rasa |īswara jīvahi bhēda kahahu kasa ||
māyā basya jīva abhimānī |īsa basya māyā guṇakhānī ||
parabasa jīva svabasa bhagavaṁtā |jīva anēka eka śrīkaṁtā ||
mudhā bhēda jadyapi kṛta māyā |binu hari jāi na kōṭi upāyā ||
हे पक्षीराज, जब मैं मन में इतना चिंतन कर रहा था, तब रघुपति के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गई। परंतु वह माया मुझे कहीं दुःख नहीं देती, और न मैं अन्य जीवों की भाँति संसार में बँधता हूँ। हे नाथ, यहाँ और भी कारण था। हे हरि के वाहन, उसे सावधानीपूर्वक सुनो। अखंड ज्ञान एक श्री सीतापति का है; सचराचर सम्पूर्ण जीव माया के वश में हैं। यदि सबका ज्ञान एकरस रहे, तो कहो, ईश्वर और जीव में भेद कैसा हो? जीव अभिमानी होकर माया के वश में है; गुणों की खान माया ईश्वर के वश में है। जीव परवश है, भगवान स्ववश हैं; जीव अनेक हैं, श्रीकांत एक हैं। यद्यपि माया द्वारा किया गया भेद मिथ्या है, तथापि हरि के बिना कोटि उपाय अपनाने पर भी वह दूर नहीं होता।
दोहा 78(क)-(ख)
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।।78(क)।।
राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ।सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।78(ख)।।
rāmacandra ke bhajana binu jo caha pada nirbāna |gyānavanta api so nara pasu binu pūṁcha biṣāna ||78(ka)||
rākāpati ṣōṛasa uahiṁ tārāgana samudāi |sakala girinha dava lāia binu rabi rāti na jāi ||78(kha)||
रामचंद्र के भजन के बिना जो निर्वाण पद की इच्छा करता है, वह ज्ञानवान होने पर भी बिना पूँछ और सींग वाला पशु है। चंद्रमा सोलह कलाओं सहित और ताराओं के समूह के साथ उदय हो जाए, और सभी पर्वतों में आग लगा दी जाए, तब भी सूर्य के बिना रात्रि नहीं जाएगी।
चौपाई 79.1-4
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा।मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या।प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।
ताते नास न होइ दास कर।भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर।।
भ्रम ते चकित राम मोहि देखा।बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ।जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।
जानु पानि धाए मोहि धरना।स्यामल गात अरुन कर चरना।।
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी।राम गहन कहँ भुजा पसारी।।
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा।तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।
aiseehiṁ hari binu bhajana khagēsā |miṭai na jīvanha kera kalēsā ||
hari sēvakahi na byāpa abidyā |prabhu prērīta byāpai tehi bidyā ||
tātē nāsa na hōi dāsa kara |bhēda bhagati bhāṛhai bihaṁgabara ||
bhrama tē cakita rāma mohi dēkhā |bihaṁsē so sunu carita bisēṣā ||
tehi kautuka kara maramu na kāhūṁ |jānā anuj na mātu pitāhūṁ ||
jānu pāni dhāē mohi dharanā |syāmala gāta aruna kara caranā ||
taba maiṁ bhāgi calēuṁ uragāmī |rāma gahana kahaṁ bhujā pasārī ||
jimi-jimi dūri uṛāuṁ akāsā |tahiṁ bhuj hari dēkhauṁ nija pāsā ||
हे पक्षियों के स्वामी, इसी प्रकार हरि के भजन के बिना जीवों के क्लेश मिटते नहीं। अविद्या हरि के सेवक को व्याप्त नहीं करती; जो विद्या उसे व्याप्त करती है वह प्रभु द्वारा प्रेरित होती है। इसलिए हे श्रेष्ठ पक्षी, दास का नाश नहीं होता, क्योंकि भेद और भक्ति बढ़ती रहती है। भ्रम से चकित मुझे राम ने देखा और हँसे। अब उस विशेष चरित्र को सुनो। उस कौतुक का रहस्य किसी ने नहीं जाना, न अनुजों ने, न माता-पिता ने। घुटनों और हाथों पर दौड़कर वे मुझे पकड़ने आए, उनका शरीर श्याम और हाथ-पैर अरुण वर्ण के थे। तब मैं भाग गया, हे गरुड़, और राम ने मुझे पकड़ने के लिए भुजा फैलाई। जितना ही मैं आकाश में दूर उड़ा, उतना ही हरि की भुजा मुझे अपने पास दिखाई दी।
दोहा 79(क)-(ख)
ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात।।79(क)।।
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि।।79(ख)।।
brahmaloka lagi gayauṁ maiṁ citayauṁ pācha uṛāta |juga aṅgula kara bīca saba rāma bhujahi mohi tāta ||79(ka)||
saptābaraṇa bhēda kari jahāṁ lagēṁ gati mōri |gayauṁ tahāṁ prabhu bhuja nirakhi byākula bhayauṁ bahōri ||79(kha)||
मैं ब्रह्मलोक तक गया और उड़ते हुए पीछे मुड़कर देखा, हे तात, राम की भुजा और मुझमें केवल दो अंगुल की दूरी थी। सात आवरणों को भेदकर मैं जहाँ तक मेरी गति ले जा सकती थी वहाँ तक गया; परन्तु वहाँ पहुँचकर प्रभु की भुजा देखी तो मैं पुनः व्याकुल हो गया।
भक्ति-शिक्षा का केंद्र यह है कि ‘मोह’ सार्वभौमिक है—केवल अज्ञानी नहीं, ज्ञानि-तपस्वी-प्रतापी-विद्वान भी माया-कटक में पड़ सकते हैं; इसलिए साधक का भरोसा अपने गुणों पर नहीं, राम-कृपा पर टिके। माया को प्रभु-शक्ति मानकर भी दोष हरि पर न धरा जाए—भ्रम ‘दृष्टिदोष’ है; अतः उपाय भी दृष्टि-शुद्धि है, जो राम-नाम/राम-भजन से होती है। लीला को मिथ्या कहकर त्यागना नहीं—लीला ‘उपास्य-सत्य’ का करुणा-रूप है, जो निर्गुण-सगुण की एकता में स्थिर करती है। ‘निर्वाण’ की चाह भी यदि अहं-आश्रित या भजन-विहीन हो तो निष्फल—मुक्ति का द्वार केवल राम-भजन, दास्य-भाव, और प्रभु-प्रेरणा पर भरोसा है। इस खंड में श्रोता-भक्त के लिए अंतिम निष्कर्ष: लोक-व्यवहार में रहते हुए भी परमार्थ की दृष्टि—राम ही सत्य, राम ही शरण—यही समापन-सोपान की सिद्धि है।
यह अंश उत्तरकाण्ड के उस निर्णायक भाव-खंड में आता है जहाँ कथा ‘लीला-रस’ से ‘तत्त्व-निरूपण’ की ओर मुड़ती है। प्रधान रस शान्त है, किन्तु उसके भीतर अद्भुत (भगवत्-ऐश्वर्य), वात्सल्य (बाल-लीला), और करुणा (जीव की माया-ग्रस्त दशा) का संयोग चलता है। काकभुसुंडि पहले गरुड़ के प्रश्न-आधार पर ‘मोह’ की सार्वभौमिकता गिनाते हैं—ज्ञानि, तपस्वी, सूर, कवि, कोबिद तक माया-कटक से घिरते हैं—फिर निर्णायक सिद्धान्त रखते हैं कि यह माया स्वयं प्रभु की भ्रू-विलास-जन्या नटी है, पर प्रभु सच्चिदानन्द अखण्ड हैं। आगे ‘दोष-दर्शन’ की उपमा-श्रृंखला (पीत-चन्द्र, पश्चिम में उगा सूर्य, नौका-भ्रम) द्वारा स्पष्ट होता है कि मोह जीव का दृष्टिदोष है, हरि का नहीं। अंततः बाल-राम की लीला में भुसुंडि का ‘मोह’ भी प्रभु-प्रेरित है—दास-रक्षा हेतु—और निष्कर्ष यह कि निर्बान की चाह भी राम-भजन बिना निष्फल है। इस प्रकार उत्तरकाण्ड यहाँ ‘समापन-सोपान’ बनकर भक्ति को ज्ञान का शिरोमणि सिद्ध करता है।
आरम्भ में उपदेशात्मक शान्त-रस का स्थिर आधार है—काकभुसुंडि गरुड़ को ‘प्रीति’ की कसौटी पर लाकर संवाद को आत्मीय बनाते हैं। फिर करुणा-रस उभरता है: जीव की सार्वभौमिक माया-ग्रस्तता (ज्ञानि-तपस्वी-शूर-कवि-कोविद तक) गिनाकर श्रोता के भीतर आत्म-परीक्षण और दैन्य जागता है। इसके बाद अद्भुत-रस का प्रकाश: माया को प्रभु की ‘भ्रू-विलास-जन्या नटी’ कहकर ईश्वरीय ऐश्वर्य का बोध होता है, पर साथ ही सिद्धान्त-स्थैर्य रहता है कि प्रभु सच्चिदानन्द अखण्ड हैं। मध्य में ‘दोष-दर्शन’ की उपमाओं से बौद्धिक स्पष्टता आती है—भ्रम का कारण हरि नहीं, जीव का दृष्टिदोष—यहाँ शान्त रस तर्क-प्रमाण से और गाढ़ा होता है। अंत में वात्सल्य/करुणा का संगम: बाल-राम-लीला में ‘मोह’ भी प्रभु-प्रेरित होकर दास-रक्षा का साधन बनता है; परिणति निष्कर्षात्मक शान्ति में होती है—निर्गुण-सगुण की एकता में टिककर यह निश्चय कि मुक्ति/निर्वाण की चाह भी राम-कृपा और राम-भजन बिना निष्फल है।
परम्परागत मान्यता अनुसार यह खंड ‘माया-भ्रम’ की निवृत्ति और ‘राम-भजन की अनिवार्यता’ का बोध कराता है। इसके पाठ/श्रवण से साधक में शान्ति, विवेक, और दास्य-भाव दृढ़ होता है—विशेषतः ‘अभिमान-नाश’ और ‘भक्ति-निष्ठा’ की सिद्धि के लिए इसे फलदायक माना जाता है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संकीर्तन) या ‘राम राम’ का जप-सम्पुट प्रचलित है। कई परम्पराओं में सिद्धान्त-पंक्तियों पर ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-स्मरण (अर्थ-सम्पुट) भी जोड़ा जाता है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.