राज्याभिषेक-उपरांत ‘धर्म-स्थापन’ और ‘भक्ति-स्थैर्य’ का सोपान: साधक के भीतर राम-राज्य (अन्तःकरण-राज्य) की प्रतिष्ठा, जहाँ सेवा, सत्संग, और नाम-स्मरण जीवन-व्यवस्था बनते हैं। यह चरण ‘फल-श्रुति’ द्वारा पाठक को प्रत्यक्ष साधना-फल का आश्वासन देकर मन को निष्काम-भक्ति की ओर स्थिर करता है।
इस खंडांश का प्रधान रस ‘आनन्द/शान्त’ है, जिसमें ‘अद्भुत’ और ‘भक्ति’ का संयोग है। कैकेयी के लज्जा-प्रबोधन से लेकर राम के सिंहासनारोहण तक कथा बाह्य-राज्याभिषेक को भीतर के ‘चित्ताभिषेक’ में रूपान्तरित करती है—जटा-निर्मोचन, स्नान, दिव्य-वस्त्र, वेद-स्तुति, देव-नाद (दुन्दुभि) और मुनि-समुदाय की हर्षध्वनि साधक के मन में ‘सगुण-प्राकट्य’ का महोत्सव रचते हैं। तत्पश्चात वेद-स्तुति और शम्भु-स्तुति द्वारा निर्गुण-सगुण की एकता का सिद्धान्त-स्थापन होता है: राम ‘सगुन-निर्गुन रूप अनूप’ हैं। फिर फलश्रुति पाठक को बताती है कि यह कथा ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव-भय’ का दाहक औषध है। अंत में सखा-कपियों की विदाई और अंगद का विनय ‘दास्य-सख्य’ की पराकाष्ठा दिखाता है—राज्य-सिद्धि के बाद भी भक्ति का विनय, यही उत्तरकाण्ड का अन्तः-धर्म है।
चौपाई 10.1-4
प्रभु जानी कैकेई लजानी।प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा।पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
कृपासिंधु जब मंदिर गए।पुर नर नारि सुखी सब भए।।
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई।आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन।रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए।सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका।जग अभिराम राम अभिषेका।।
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे।महाराज कहँ तिलक करीजै।।
prabhu jānī kaikēī lajanī |prathama tāsu gṛha gae bhavānī ||
tāhi prabodhi bahuta sukha dīnhā |puni nija bhavana gavana hari kīnhā ||
kṛpāsiṁdhu jaba maṁdira gae |pura nara nāri sukhī saba bhae ||
gura basiṣṭha dvija liē bulāī |āju sugharī sudina samudāī ||
saba dvija dehu haraṣi anusāsana |rāmacandra baiṭhahiṁ siṁghāsana ||
muni basiṣṭha ke bacana suhāe |sunata sakala bipranha ati bhāe ||
kahahiṁ bacana mṛdu bipra anekā |jaga-abhirāma rāma abhiṣekā ||
aba munibara bilaṁba nahiṁ kīje |mahārāja kahaṁ tilaka karīje ||
प्रभु ने जाना कि कैकेई लज्जित है, इसलिए, हे भवानी, वे पहले उसके घर गए। उसे समझाकर उसे बहुत सुख दिया, फिर हरि अपने भवन को गए। जब कृपासिंधु मंदिर में गए, तब नगर के सब नर-नारी सुखी हो गए। गुरु वसिष्ठ ने ब्राह्मणों को बुलवाया और कहा कि आज का समय अत्यंत शुभ और दिन उत्तम है। हे ब्राह्मणों, तुम सब हर्षित होकर आज्ञा दो कि रामचंद्र सिंहासन पर बैठें। मुनि वसिष्ठ के सुंदर वचन सुनकर सब ब्राह्मणों को अत्यंत प्रिय लगे। अनेक ब्राह्मणों ने कोमल वचन कहे कि राम का अभिषेक जगत को अभिराम, अर्थात् प्रिय, है। अब हे मुनिश्रेष्ठ, विलंब न कीजिए, महाराज को तिलक लगाइए।
दोहा 10(क)-(ख)
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10(क)।।
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।।
taba muni kaheu sumaṁtra sana sunata caleu haraṣāi |ratha aneka bahu bāji gaja turata saṁvāre jāi ||10(ka)||
jahaṁ-tahaṁ dhāvana paṭhaī puni maṁgala drabya magāi |haraṣa sameta basiṣṭha pada puni siru nāyu āi ||10(kha)||
तब मुनि ने सुमंत्र से कहा, सुमंत्र सुनते ही हर्षित होकर चल दिए, और जाकर तुरंत अनेक रथ, बहुत से घोड़े और हाथी सँवारे। फिर इधर-उधर दौड़ने वाले दूत भेजकर मंगल के द्रव्य मँगवाए, और हर्ष के साथ वसिष्ठ के चरणों में फिर सिर नायकर आए।
चौपाई 11.1-4
अवधपुरी अति रुचिर बनाई।देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।
राम कहा सेवकन्ह बुलाई।प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।।
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए।सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।।
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे।निज कर राम जटा निरुआरे।।
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई।भगत बछल कृपाल रघुराई।।
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई।सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।
पुनि निज जटा राम बिबराए।गुर अनुसासन मागि नहाए।।
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे।अंग अनंग देखि सत लाजे।।
avadhapurī ati rucira banāī |devanha sumana bṛṣṭi jhari lāī ||
rāma kahā sevakanha bulāī |prathama sakhanha anhavāvahu jāī ||
sunata bacana jahaṁ-tahaṁ jana dhāe |sugrīvādi turata anhavāe ||
puni karunānidhi bharatu haṁkāre |nija kara rāma jaṭā nirūāre ||
anhavāe prabhu tīniu bhāī |bhagata bachala kṛpāla raghurāī ||
bharata bhāgya prabhu komalatāī |seṣa koṭi sata sakahiṁ na gāī ||
puni nija jaṭā rāma bibarāe |gura anusāsana māgi nahāe ||
karī majjana prabhu bhūṣana sāje |aṁga anaṁga dekhi sata lāje ||
अयोध्या नगरी अत्यन्त सुन्दर ढंग से सजाई गई, और देवताओं ने फूलों की वृष्टि कराई। राम ने सेवकों को बुलाकर कहा, "जाकर पहले मेरे मित्रों को स्नान कराओ।" उनके वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े, और शीघ्र ही सुग्रीव आदि को स्नान करा दिया। फिर करुणानिधि राम ने भरत को बुलाया, और अपने हाथों से उसकी जटाएँ खोलकर सवारीं। प्रभु ने अपने तीनों भाइयों को स्नान कराया, वे भक्तों पर कोमल और कृपालु रघुराई थे। भरत का भाग्य और प्रभु की कोमलता, जिसे सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। फिर राम ने अपनी जटाएँ खोलीं, और गुरु की आज्ञा लेकर स्नान किया। स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए, उनके अंग देखकर सौ कामदेव भी लज्जित हो गए।
दोहा 11(क)-(ग)
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।11(क)।।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि।।11(ख)।।
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।।11(ग)।।
sāsunha sādara jānakihi majjana turata karāi |dibya basana bara bhūṣana aṁga-aṁga saje banāi ||11(ka)||
rāma bāma disi sobhati ramā rūpa guna khāni |dekhi mātu saba haraṣīṁ janma suphala nija jāni ||11(kha)||
sunu khagesa tehi avasara brahmā siva muni bṛṁda |caṛhi bimāna āe saba sura dekhana sukhakaṁda ||11(ga)||
सासुओं ने सादर जानकी का तुरंत स्नान कराया, और दिव्य वस्त्रों तथा उत्तम भूषणों से उनके अंग-अंग सजाया। राम के वाम भाग में लक्ष्मी, रूप और गुणों की खानि, सुशोभित हो रही थीं। उन्हें देखकर सभी माताएँ हर्षित हुईं, अपना जन्म सफल जानकर। सुनो खगेश, उस समय ब्रह्मा, शिव, मुनियों का समूह और सभी देवता सुखकंद भगवान के दर्शन हेतु विमान पर चढ़कर आए।
चौपाई 12.1-4
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा।तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।
रबि सम तेज सो बरनि न जाई।बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।।
जनकसुता समेत रघुराई।पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।।
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे।नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा।पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।।
सुत बिलोकि हरषीं महतारी।बार बार आरती उतारी।।
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे।जाचक सकल अजाचक कीन्हे।।
सिंघासन पर त्रिभुअन साई।देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
prabhu biloki muni mana anurāgā |turata dibya siṅghāsana māgā ||
rabi sama teja so barani na jāī |baiṭhe rāma dvijanha siru nāī ||
janakasutā sameta raghurāī |pekhi praharaṣe muni samudāī ||
beda maṃtra taba dvijanha ucāre |nabha sura muni jaya jayati pukāre ||
prathama tilaka basiṣṭha muni kīnhā |puni saba bipranha āyasu dīnhā ||
suta biloki haraṣīṃ mahatārī |bāra bāra āratī utārī ||
bipranha dāna bibidha bidhi dīnhe |jācaka sakala ajācaka kīnhe ||
siṅghāsana para tribhuana sāī |dekhi suranha duṃdubhī bajāīṃ ||
प्रभु को देखकर मुनि के मन में अनुराग उमड़ आया और उसी क्षण उन्होंने एक दिव्य सिंहासन मँगवाया। उनका तेज सूर्य के समान था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। राम ने ब्राह्मणों के सम्मुख शीश झुकाया और उस पर विराजमान हुए। जनकसुता सीता के सहित रघुनाथ को देखकर समस्त मुनियों का समुदाय अत्यंत हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणों ने वेद-मंत्र पढ़े और आकाश में देवता और मुनियों ने 'जय, जय' का उद्घोष किया। सर्वप्रथम मुनि वशिष्ठ ने तिलक लगाया और तदनंतर सभी ब्राह्मणों को आज्ञा दी। माताओं ने पुत्र को देखकर हर्ष व्यक्त किया और बार-बार आरती उतारी। ब्राह्मणों को विविध प्रकार से दान दिया और समस्त याचकों को अयाचक अर्थात् याचनारहित कर दिया। त्रिभुवन के स्वामी को सिंहासन पर विराजमान देखकर देवताओं ने दुंदुभियाँ बजाईं।
छंद 12.1-2
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।।
भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते।।1।।
श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई।नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।।
मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे।अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।।2।।
nabha duṃdubhīṃ bājahiṃ bipula gaṃdharba kiṃnara gāvahīṃ |nācahiṃ apacharā bṛṃda paramānanda sura muni pāvahīṃ ||
bharatādi anuj bibhīṣana aṅgada hanumadādi sameta te |gahẽ chatra cāmara byajana dhanu asi carma sakti birājate ||1||
śrī sahita dinakara baṃsa būṣana kāma bahu chabi sohāī |nava aṃbudhara bara gāta aṃbara pīta sura mana mohāī ||
mukuṭāṅgadādi bicitra bhūṣana aṅga aṅganhi prati saje |aṃbhoja nayana bisāla ura bhuja dhanya nara nirakhaṃti je ||2||
आकाश में अनगिनत नगाड़े बजे, और गंधर्व तथा किन्नर गाने लगे। अप्सराओं के वृन्द नाचने लगे, और देवता तथा मुनि परमानंद को प्राप्त हुए। भरत और अन्य अनुज भाई, विभीषण, अंगद, हनुमान आदि सहित सब छत्र, चामर, व्यजन और धनुष, तलवार, ढाल, भाले धारण कर शोभा से विराजमान थे। सीता सहित सूर्यवंश का रत्न अनेक कामदेवों की छबि से शोभायमान था। नए जलद के समान श्याम शरीर, पीत वस्त्र धारण कर, देवताओं के मन को मोह रहा था। मुकुट, अंगद आदि विचित्र भूषण प्रत्येक अंग पर सुसज्जित थे। कमल-नयन, विशाल वक्षःस्थल और भुजाओं से युक्त, धन्य हैं वे नर जो उनके दर्शन करते हैं।
दोहा 12(क)-(ग)
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।12(क)।।
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम।।12(ख)।।
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।12(ग)।।
vaha sobhā samāja sukha kahata na banai khagesa |baranahiṃ sārad seṣa śruti so rasa jāna mahesa ||12(ka)||
bhinna bhinna astuti kari gae sura nija nija dhāma |baṃdī beṣa beda taba āe jahã śrīrāma ||12(kha)||
prabhu sarbagya kīnha ati ādara kṛpānidhāna |lakheu na kāhū̃ marama kachu lage karana guna gāna ||12(ga)||
हे खगेश, उस शोभा, समाज और सुख का वर्णन करना नहीं बनता। सारदा, शेष और श्रुतियाँ उसका वर्णन करते हैं, परन्तु उस आनन्द के रस को केवल महेश ही जानते हैं। देवता अलग-अलग प्रकार से स्तुति करके अपने-अपने धाम को चले गए। तब वेद बंदी का वेष धारण करके जहाँ श्रीराम थे, वहाँ आए। सर्वज्ञ प्रभु और कृपानिधान ने उनका बहुत आदर किया। किसी को कुछ भी मर्म नहीं लगा और वेद उनके गुण गाने लगे।
छंद 13.1-6
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
jaya saguna nirguna rūpa rūpa anūpa bhūpa siromane |dasakaṃdharādi pracaṃḍa nisicara prabala khala bhuja bala hane ||
avatāra nara saṃsāra bhāra bibhaṃji dāruna dukha dahe |jaya pranatapāla dayāla prabhu saṃjukta sakti namāmahe ||1||
tava biṣama māyā basa surāsura nāga nara aga jaga hare |bhava paṃtha bhramata amita divasa nisi kāla karma gunani bhare ||
je nātha kari karunā biloke tribidhi dukha te nirbahe |bhava kheda chedana daccha hama kahũ raccha rāma namāmahe ||2||
je gyāna māna bimattta tava bhava harani bhakti na ādarī |te pāi sura durlabha padādapi parata hama dekhata harī ||
bisvāsa kari saba āsa parihari dāsa tava je hoi rahe |japi nāma tava binu śrama tarahiṃ bhava nātha so samarāmahe ||3||
je carana siva aja pūjya raja subha parasi munipatinī tarī |nakha nirgata muni baṃditā treloka pāvani surasarī ||
dhvaja kulisa aṃkusa kaṃja juta bana phirata kaṃṭaka kina lahe |pada kaṃja dvaṃda mukuṃda rāma rameśa nitya bhajāmahe ||4||
abhyaktamūlamanādi taru tvaca cāri nigamāgama bhane |ṣaṭ kaṃdha sākhā paṃca bīsa aneka parna sumana ghane ||
phala jugala bidhi kaṭu madhura beli akeli jehi āśrita rahe |pallavata phūlata navala nita saṃsāra biṭapa namāmahe ||5||
je brahma ajamadvaītamanubhavagamya manapara dhyāvahīṃ |te kahahũ jānahũ nātha hama tava saguna jasa nita gāvahīṃ ||
karuṇāyatana prabhu sadguṇākara deva yaha bara māgahīṃ |mana bacana karma bikāra taji tava carana hama anurāgahīṃ ||6||
आप सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूप वाले, रूप में अनूप, राजाओं के शिरोमणि, दशकंधर आदि प्रचंड, बलवान और दुष्ट राक्षसों को अपनी भुजा के बल से मारने वाले, आपकी जय हो। मनुष्य अवतार धारण करके आपने संसार का भार तोड़ दिया और भयंकर दुःखों को जला दिया। हे प्रणतपालक, दयालु प्रभु, आपकी शक्ति सहित हम आपको प्रणाम करते हैं। हे हरि, देव, असुर, नाग, मनुष्य और चराचर जगत सब आपकी विषम माया के वश में हैं, और काल, कर्म और गुणों से भरे हुए अनगिनत दिन-रात भव के मार्ग पर भटकते रहते हैं। हे नाथ, जिन पर आप कृपा दृष्टि करते हैं वे त्रिविध दुःखों से मुक्त हो जाते हैं। हे राम, भव के क्लेश काटने में दक्ष, हमारी रक्षा कीजिए, हम आपको प्रणाम करते हैं। हे हरि, जो ज्ञान के अभिमान में मत्त होकर आपकी भव-हरण करने वाली भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवों को भी दुर्लभ पद प्राप्त करके भी हम देखते हैं कि गिर जाते हैं। जो विश्वास करके सब आशाएँ त्यागकर आपके दास बने रहते हैं, वे आपका नाम जपकर बिना परिश्रम के भव से तर जाते हैं। हे नाथ, हम उन्हीं को स्मरण करते हैं। जो चरण शिव और ब्रह्मा द्वारा पूज्य हैं, जिनके मंगलमय रज को स्पर्श करके मुनि की पत्नी तर गई, जिनके नख से निकली देवनदी ऋषियों द्वारा वंदित और तीनों लोकों को पवित्र करने वाली है। ध्वज, वज्र, अंकुश और कमल से युक्त, वन में विचरते हुए कांटों के कारण जिनमें जो चर्म उठ गए, आपके वे कमल-सम दो चरण, हे मुकुंद, राम, लक्ष्मीपति, हम नित्य भजते हैं। जिसका मूल अव्यक्त है, जो अनादि वृक्ष है, जिसकी छाल चार प्रकार की है जैसा वेद और आगम कहते हैं, जिसके छह कंद, पंचवीस शाखाएँ, अनेक पत्र और घने पुष्प हैं। जिसमें दो प्रकार के फल, कटु और मधुर, हैं, जिसमें एक बेली अकेली आश्रित रहती है, जो नित्य नए पल्लव और पुष्पों से फलता-फूलता है, उस संसार-वटवृक्ष को हम प्रणाम करते हैं। जो अज, अद्वैत, अनुभव से ही गम्य और मन से परे ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे जैसा चाहें कहें और जानें; हे नाथ, हम तो आपके सगुण रूप का यश नित्य गाते हैं। हे करुणा के धाम, सद्गुणों के खान, देव, हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म के विकार त्यागकर आपके चरणों में हम अनुराग रखें।
दोहा 13(क)-(ख)
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।।
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
saba ke dekhata bedanha binatī kīnhi udāra |antardhāna bhae puni gae brahma āgāra ||13(ka)||
bainateya sunu saṃbhu taba āe jahã raghubīra |binaya karata gadagada girā pūrita pulaka sarīra ||13(kha)||
सबके देखते वेदों ने उदार विनती की। फिर वे अंतर्ध्यान हो ब्रह्मलोक को चले गए। हे वैनतेय, सुनो - तब शंभु वहाँ आए जहाँ रघुबीर थे। वे विनय करते हुए गद्गद वाणी से और पुलकित शरीर से प्रकट हुए।
छंद 14.1-10
जय राम रमारमनं समनं।भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
अवधेस सुरेस रमेस बिभो।सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
दससीस बिनासन बीस भुजा।कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
रजनीचर बृंद पतंग रहे।सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
महि मंडल मंडन चारुतरं।धृत सायक चाप निषंग बरं।।
मद मोह महा ममता रजनी।तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
मनजात किरात निपात किए।मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे।बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए।भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते।पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं।जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
नहिं राग न लोभ न मान मदा।। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
एहि ते तव सेवक होत मुदा।मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ।पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
सम मानि निरादर आदरही।सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे।रघुबीर महा रनधीर अजे।।
तव नाम जपामि नमामि हरी।भव रोग महागद मान अरी।।9।।
गुन सील कृपा परमायतनं।प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं।महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
jaya rāma ramā-ramaṇaṁ samanaṁ |bhava-tāpa bhayākula pāhi janaṁ ||
avadheśa sureśa rameśa vibho |śaraṇāgata māgata pāhi prabho ||1||
daśaśīsa bināsana bīsa bhujā |kṛta dūri mahā mahi bhūri rujā ||
rajanīcara bṛnda pataṅga rahe |sara pāvaka teja pracaṇḍa dahe ||2||
mahi-maṇḍala maṇḍana cārutaraṁ |dhṛta sāyaka cāpa niṣaṅga baraṁ ||
mada moha mahā mamatā rajanī |tama puñja divākara teja anī ||3||
manajāta kirāta nipāta kiye |mṛga-loka kubhoga sareṇa hiye ||
hati nātha anāthani pāhi hare |viṣayā bana pāṁvara bhūli pare ||4||
bahu roga biyoganha loka hae |bhavad-aṅghri nirādara ke phala e ||
bhava-sindhu agādha pare nara te |pada-paṅkaja prema na je karate ||5||
ati dīna malīna dukhī nitahīṁ |jinha ke pada-paṅkaja prīti nahīṁ ||
avalaṁba bhavaṁta kathā jinha ke |priya saṁta anaṁta sadā tinh keṁ ||6||
nahiṁ rāga na lobha na māna madā |tinh keṁ sama baibhava vā bipadā ||
ehi te tava sevaka hota mudā |muni tyāgata joga bharosa sadā ||7||
kari prema niraṁtara nema liyeṁ |pada-paṅkaja sevata suddha hiyeṁ ||
sama māni nirādara ādarahī |saba saṁta sukhī bicaranti mahī ||8||
muni mānasa paṅkaja bhṛṅga bhaje |raghubīra mahā raṇadhīra aje ||
tava nāma japāmi namāmi harī |bhava-roga mahāgada māna arī ||9||
guṇa śīla kṛpā paramāyatanaṁ |praṇamāmi niraṁtara śrī-ramaṇaṁ ||
raghu-naṁda nikaṁdaya dvaṁdva-ghanaṁ |mahipāla bilokaya dīna janaṁ ||10||
जय हो राम, लक्ष्मी के प्रिय, शांति देने वाले! संसार के ताप से भयभीत अपने दास की रक्षा करें। अयोध्या के स्वामी, देवों के स्वामी, लक्ष्मी के स्वामी, सर्वव्यापी प्रभो, मेरी रक्षा करें। मैं आपकी शरण में आया हूँ और याचना करता हूँ। दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का नाश करके, आपने पृथ्वी के भारी और बड़े दुःखों को दूर कर दिया। राक्षसों के समूह पतंगे के समान रहे, और आपके तीखे बाणों की प्रचंड अग्नि के तेज में जलकर भस्म हो गए। सारी पृथ्वी का सुंदरतम आभूषण, आपने बाण, धनुष और उत्तम तरकस धारण किए हुए हैं। अहंकार, मोह और बड़ी ममता रूपी रात के घने अंधकार के लिए आप किरणों के समूह वाले सूर्य के समान हैं। मन से उत्पन्न कामदेव नामक शिकारी ने लोगों को हिरणों की तरह गिरा दिया, उनके हृदय में बुरे भोगों के बाण मारकर। उसका वध करें, स्वामी, और अनाथों की रक्षा करें, हे हरि, जो विषयों के वन में भटककर गिर पड़े हैं। लोग अनेक रोगों और वियोगों से ग्रसित हो गए हैं; ये आपके चरणों का तिरस्कार करने के फल हैं। वे मनुष्य अगाध संसार सागर में गिर गए, जो आपके चरणारविंदों से प्रेम नहीं करते। अत्यंत दीन, मलिन और सदा दुःखी हैं वे, जिनके पास आपके चरणारविंदों में प्रीति नहीं है। जिनका आश्रय आपकी कथा है, उनके सदा प्रिय संत और अनंत भगवान हैं। उनमें न राग है, न लोभ, न मान और न अहंकार; उनके लिए समृद्धि और विपदा समान हैं। इसी से आपके सेवक हर्ष में रहते हैं; मुनि सदा योग का भरोसा त्याग देते हैं। प्रेम करके, निरंतर नियम धारण करके, वे शुद्ध हृदय से आपके चरणारविंदों की सेवा करते हैं। अनादर और आदर को समान मानकर, सभी संत पृथ्वी पर सुखी घूमते हैं। मुनियों के हृदय कमल के भृंग के समान आपकी मैं आराधना करता हूँ, हे रघुकुल के वीर, युद्ध में बड़े धैर्यवान और अजेय। मैं आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ, हे हरि, संसार रोग के महाऔषधि और अहंकार के शत्रु। गुण, क्षमा और कृपा के परम आश्रय, मैं निरंतर लक्ष्मीपति को प्रणाम करता हूँ। हे रघुनंदन, द्वंद्वों के समूह का नाश करें; हे पृथ्वी के पालक, इस दीन जन पर कृपादृष्टि डालें।
दोहा 14(क)-(ख)
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।।
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।।14(ख)।।
bāra bāra bara māgaũ harakhi dehu śrīraṅga |pada-saroja anapāyanī bhagati sadā sat-saṅga ||14(ka)||
barani umāpati rāma guna harakhi gae kailāsa |taba prabhu kapinha divāe saba bidhi sukha-prada bāsa ||14(kha)||
बार-बार हर्ष के साथ यह वर माँगता हूँ - हे श्रीरंग! दीजिए मुझे आपके चरण-कमलों में अनपायनी भक्ति और सदा सत्संग। उमापति शिव ने श्री राम के गुणों का वर्णन करके हर्षित होकर कैलास को लौट गए। तब प्रभु ने कपियों को सब प्रकार से सुखदायक निवास दिलवाए।
चौपाई 15.1-5
सुनु खगपति यह कथा पावनी।त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।
महाराज कर सुभ अभिषेका।सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।सुख संपति नाना बिधि पावहिं।।
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं।अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई।लहहिं भगति गति संपति नई।।
खगपति राम कथा मैं बरनी।स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी।मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।।
नित नव मंगल कौसलपुरी।हरषित रहहिं लोग सब कुरी।।
नित नइ प्रीति राम पद पंकज।सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।।
मंगन बहु प्रकार पहिराए।द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।
sunu khagapati yaha kathā pāvanī |tribidha tāpa bhava bhaya dāvanī ||
mahārāja kara subha abhiṣekā |sunata lahahiṁ nara birati bibekā ||
je sakāma nara sunahiṁ je gāvahiṁ |sukha saṁpati nānā bidhi pāvahiṁ ||
sura durlabha sukha kari jaga māhīṁ |aṁta-kāla raghupati pura jāhīṁ ||
sunahiṁ bimukta birata aru biṣayī |lahahiṁ bhagati gati saṁpati naī ||
khagapati rāma kathā maiṁ baranī |svamati bilāsa trāsa dukha haranī ||
birati bibeka bhagati dṛḍha karanī |moha nadī kahaṁ suṁdara taranī ||
nita nava maṅgala kausalapurī |harasita rahahiṁ loga saba kurī ||
nita naī prīti rāma pada paṅkaja |sabakeṁ jinhahi namata siva muni aja ||
maṅgana bahu prakāra pahirāe |dvijanha dāna nānā bidhi pāe ||
सुनो खगपति, यह पावन कथा त्रिविध ताप और संसार के भय को नष्ट करने वाली है। महाराज के शुभ अभिषेक को सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक को प्राप्त होते हैं। जो सकाम मनुष्य इसे सुनते या गाते हैं, वे नाना प्रकार से सुख और संपत्ति पाते हैं। इस लोक में देवों को भी दुर्लभ सुख भोगकर अंतकाल में रघुपति के धाम को जाते हैं। जो मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे क्रमशः भक्ति, गति और नई संपत्ति पाते हैं। हे खगपति, मैंने अपनी मति के विलास से राम कथा कही है, जो भय और दुःख को हरने वाली है। यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली और मोह नदी को पार करने के लिए सुंदर नौका है। कौसल्यपुरी में नित्य नया मंगल होता और सब लोग हर्षित रहते थे। सबकी राम के चरण कमलों में नित्य नई प्रीति होती, जिन्हें शिव, मुनि और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं। याचक बहुत प्रकार के वस्त्र पहनाए जाते और ब्राह्मणों को नाना प्रकार का दान मिलता था।
दोहा 15
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।।15।।
brahmānanda magana kapi saba keṁ prabhu pada prīti |jāta na jāne divasa tinh gae māsa ṣaṭ bīti ||15||
सब कपि ब्रह्मानंद में मग्न थे, क्योंकि उन सबके प्रभु के चरणों में प्रीति थी। उन्हें दिन जाने का ज्ञान नहीं हुआ और छह मास बीत गए।
चौपाई 16.1-4
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं।जिमि परद्रोह संत मन माही।।
तब रघुपति सब सखा बोलाए।आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।
परम प्रीति समीप बैठारे।भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई।मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।।
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे।मम हित लागि भवन सुख त्यागे।।
अनुज राज संपति बैदेही।देह गेह परिवार सनेही।।
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना।मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।
सब के प्रिय सेवक यह नीती।मोरें अधिक दास पर प्रीती।।
bisare gṛha sapanehũ sudhi nāhīṁ |jimi paradroha santa mana māhī ||
taba raghupati saba sakhā bolāe |āi sabanhi sādara siru nāe ||
parama prīti samīpa baiṭhāre |bhagata sukhada mṛdu bacana ucāre ||
tumha ati kīnha mori sevakāī |mukha para kehi bidhi karauṁ baṛāī ||
tāte mohi tumha ati priya lāge |mama hita lāgi bhavana sukha tyāge ||
anuja rāja sampati baidehī |deha geha parivāra sanehī ||
saba mama priya nahiṁ tumhahi samānā |mṛṣā na kahaũ mora yaha bānā ||
saba ke priya sevaka yaha nītī |moreṁ adhika dāsa para prītī ||
उन्होंने अपने घर भुला दिए, स्वप्न में भी उनकी सुधि नहीं आई, जैसे पर-द्रोह की बात संत के मन में नहीं आती। तब रघुपति ने सब मित्रों को बुलाया। सब आकर श्रद्धा से शीश झुकाया। अत्यन्त प्रेम से उन्हें समीप बैठाया और भक्तों को सुख देने वाले कोमल वचन कहे। तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मुख पर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ? इसलिए तुम मुझे अत्यन्त प्रिय लगे, क्योंकि मेरे हित के लिए तुमने घर के सुख को त्याग दिया। भाई, राज्य, संपत्ति, सीता, शरीर, घर और स्नेही परिवार - सब मुझे प्रिय हैं, पर तुम्हारे समान कोई नहीं। झूठ नहीं कहता, यह मेरी बानी है। सबको सेवक प्रिय होते हैं यह नीति है, पर मेरे दास पर प्रेम और भी अधिक है।
दोहा 16
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम।।16।।
aba gṛha jāhu sakhā saba bhajēhu mōhi dṛḍha nēma |sadā sarbagata sarbahita jāni karēhu ati prēma ||16||
अब घर जाओ, हे मित्रों, तुम सब मुझे दृढ़ नियम से भजो। मुझे सदा सर्वगत और सबका हितैषी जानकर अत्यन्त प्रेम करो।
चौपाई 17.1-4
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए।को हम कहाँ बिसरि तन गए।।
एकटक रहे जोरि कर आगे।सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।।
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा।कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।।
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं।पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।
तब प्रभु भूषन बसन मगाए।नाना रंग अनूप सुहाए।।
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए।बसन भरत निज हाथ बनाए।।
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए।लंकापति रघुपति मन भाए।।
अंगद बैठ रहा नहिं डोला।प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।
suni prabhu bacana magana saba bhae |ko hama kahā̃ bisari tana gae ||
ēkaṭaka rahē jōri kara āgē |sakahĩ na kachu kahi ati anurāgē ||
parama prēma tinh kara prabhu dēkhā |kahā bibidha bidhi gyāna biśēṣā ||
prabhu sanmukha kachu kahan na pārhĩ |puni puni carana sarōja nihārhĩ ||
taba prabhu bhūṣana basana magāē |nānā raṅga anūpa suhāē ||
sugrīvahi prathamahĩ pahirāē |basana bharata nija hātha banāē ||
prabhu prērita lachimana pahirāē |laṅkāpati raghupati mana bhāē ||
aṅgada baiṭha rahā nahĩ ḍōlā |prīti dēkhi prabhu tāhi na bōlā ||
प्रभु के वचन सुनकर सब मग्न हो गए। वे कौन हैं और कहाँ हैं, यह भूलकर अपना शरीर भी भूल गए। हाथ जोड़कर उनके आगे एकटक खड़े रहे, और अत्यधिक प्रेम से अभिभूत होकर कुछ कह न सके। प्रभु ने उनका परम प्रेम देखा, और नाना प्रकार से विशेष ज्ञान का उपदेश किया। प्रभु के सामने वे कुछ कह न पाए, परंतु बार-बार उनके चरण-कमल निहारते रहे। तब प्रभु ने भूषण और वस्त्र मँगवाए, अनेक रंगों के, अनूप और सुहावने। सुग्रीव को सबसे पहले पहनाया; भरत ने अपने हाथ से वस्त्र बनाए थे। प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मण ने लंकापति को पहनाया, जो रघुपति के मन को भाए। अंगद बैठा रहा और न हिला; उसका प्रेम देखकर प्रभु ने उसे नहीं बुलाया।
दोहा 17(क)-(ख)
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ।हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ।।17(क)।।
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि।।17(ख)।।
jāmbavanta nīlādi saba pahirāē raghunātha |hiyã dhari rāma rūpa saba calē nāi pada mātha ||17(ka)||
taba aṅgada uṭhi nāi siru sajal nayana kara jōri |ati binīta bōlēu bacana manahũ prēma-rasa bōri ||17(kha)||
रघुनाथ ने जामवंत, नील आदि सब को वस्त्र पहनाए। सब ने हृदय में राम रूप धारण कर उनके चरणों में शीश नवाकर प्रस्थान किया। तब अंगद उठकर शीश नवाए, नेत्रों में आँसू लिए और हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र भाव से ऐसे बचन बोले जैसे प्रेम रस में निमग्न हों।
चौपाई 18.1-4
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो।दीन दयाकर आरत बंधो।।
मरती बेर नाथ मोहि बाली।गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।।
असरन सरन बिरदु संभारी।मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता।जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा।प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना।राखहु सरन नाथ जन दीना।।
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ।पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही।अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।
sunu sarbagya kṛpā sukha sĩdhō |dīna dayākara ārata bãdhō ||
maratī bēra nātha mōhi bālī |gayau tumhārehi kō̃chē̃ ghālī ||
asaran saran biradu sãbhārī |mōhi jani tajahu bhagata hita-kārī ||
morē̃ tumha prabhu guru pitu mātā |jāũ kahā̃ taji pada jalajāta ||
tumhahi bicāri kahahu naranāhā |prabhu taji bhavana kāja mama kāhā ||
bālaka gyāna buddhi bala hīnā |rākhahu saran nātha jana dīnā ||
nīci ṭahala gṛha kai saba karihū̃ |pada paṅkaja bilōki bhava tarihū̃ ||
asa kahi carana parēu prabhu pāhī |aba jani nātha kahahu gṛha jāhī ||
सुनो, हे सर्वज्ञ, कृपा और सुख के सिंधु, दीनों पर दया करने वाले, आर्तियों के बांधव। मरते समय, हे नाथ, बाली ने मुझे तुम्हारी गोद में रखकर जा दिया। शरणहीनों की शरण, यह व्रत धारण करो, और मुझे न त्यागो, हे भक्त हितकारी। मेरे लिए तुम्ही प्रभु, गुरु, पिता और माता हो। तुम्हारे चरण कमल छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? तुम्ही विचार कर कहो, हे नरनाथ। प्रभु को छोड़कर घर का क्या काम मेरा? बालक हूँ, ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन। शरण में रखो, हे नाथ, दीन दास को। घर की नीची सेवा सब करूँगा। चरण पंकज देखकर भव सागर तरूँगा। ऐसा कहकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। अब न कहो, हे नाथ, घर जाओ।
दोहा 18(क)-(ख)
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।।18(क)।।
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18(ख)।।
aṅgada bacana binīta suni raghupati karunā sī̃va |prabhu uṭhāi ura lāyu sajal nayana rājīva ||18(ka)||
nija ura māla basana mani bāli-tanaya pahirāi |bidā kīnhi bhagavāna taba bahu prakāra samujhāi ||18(kha)||
अंगद के विनीत वचन सुनकर रघुपति, जो करुणा की सीमा हैं, उसे उठाकर अपने वक्ष से लगा लिया, उनके कमल-नयन जल से भर गए। तब भगवान ने बालि-पुत्र को अपने वक्ष की माला, वस्त्र और मणि पहनाकर बहुत प्रकार से समझाते हुए विदा किया।
चौपाई 19.1-5
भरत अनुज सौमित्र समेता।पठवन चले भगत कृत चेता।।
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा।फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।
बार बार कर दंड प्रनामा।मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।
राम बिलोकनि बोलनि चलनी।सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी।चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।
अति आदर सब कपि पहुँचाए।भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।
तब सुग्रीव चरन गहि नाना।भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।
दिन दस करि रघुपति पद सेवा।पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा।सेवहु जाइ कृपा आगारा।।
अस कहि कपि सब चले तुरंता।अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।
bharata anuj saumitra sametā |paṭhavan cale bhagat kṛta cetā ||
aṅgada hṛdayã prema nahĩ thorā |phiri-phiri citava rāma kī̃ orā ||
bāra-bāra kara daṇḍa pranāmā |mana asa rahana kahahĩ mohi rāmā ||
rāma bilokani bolani calanī |sumiri-sumiri socata hãsi milanī ||
prabhu rukha dekhi binaya bahu bhāṣī |caleu hṛdayã pada paṅkaja rākhī ||
ati ādara saba kapi pahũcāe |bhāinh sahita bharata puni āe ||
taba sugrīva carana gahi nānā |bhā̃ti binaya kīnhe hanumānā ||
dina dasa kari raghupati pada sevā |puni tava carana dekhihaũ devā ||
punya puñja tumha pavanakumārā |sevahu jāi kṛpā āgārā ||
asa kahi kapi saba cale turaṃtā |aṅgada kahai sunahu hanumaṃtā ||
भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न और लक्ष्मण के साथ चले, वानरों की भक्ति से चित्त विचलित होकर उन्हें विदा करने। अंगद के हृदय में प्रेम थोड़ा न था; वह बार-बार राम की ओर मुड़कर देखता। बार-बार हाथ जोड़कर दंड प्रणाम करता, मन में यह सोचता रहा कि 'काश राम मुझे यहीं रुकने को कहें।' राम के देखने, बोलने, चलने, हँसने और गले लगने को बार-बार स्मरण करके वह शोक करता रहा। प्रभु के मुख से उनकी इच्छा समझकर उसने बहुत विनय-वचन कहे, और प्रभु के चरण-कमल हृदय में रखकर चला गया। अत्यधिक आदर के साथ भरत ने सब वानरों को विदा किया, और फिर अपने भाइयों सहित लौट आए। तब हनुमान ने सुग्रीव के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनय की। 'हे देव, रघुपति के चरणों की दस दिन सेवा करके फिर आपके चरण दर्शन करूँगा।' 'हे पवनकुमार, तुम पुण्यों के पुंज हो; जाकर उस कृपा के घर की सेवा करो।' ऐसा कहकर सब वानर तुरंत चले गए। अंगद बोले, 'सुनो हनुमान।'
दोहा 19(क)-(ग)
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि।।19(क)।।
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत।।19(ख)।।
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।।19(ग)।।
kahehu daṇḍavat prabhu saĩ tumhahi kahaũ kara jori |bāra-bāra raghunāyakahi surati karāehu mori ||19(ka)||
asa kahi caleu bāli-suta phiri āyu hanumaṃta |tāsu prīti prabhu sana kahi magana bhae bhagavaṃta ||19(kha)||
kulisahu cāhi kaṭhora ati komala kusumahu cāhi |citta khagesa rāma kara samujhi parai kahu kāhi ||19(ga)||
प्रभु को मेरा दंडवत प्रणाम कहिए; हाथ जोड़कर मैं आपसे यही कहता हूँ। बार-बार रघुनाथ को मेरी स्मृति कराइए। ऐसा कहकर बालि-पुत्र अपने मार्ग पर चला गया और हनुमान लौट आए। जब उन्होंने प्रभु के पास अंगद का प्रेम बताया, तब भगवंत मगन हो गए। वज्र से अति कठोर और कुसुम से कोमल: हे खगेश, राम के चित्त को कौन समझ सकता है, कहिए?
(1) पश्चात्ताप का शुद्धीकरण: कैकेयी का लज्जा-बोध दिखाता है कि दोष-स्वीकार अनुग्रह का द्वार बन सकता है, यदि वह धैर्य और शरणागति में परिणत हो। (2) ‘चित्ताभिषेक’ का आदर्श: जटा-निर्मोचन, स्नान, दिव्य-वस्त्र—भक्त के भीतर नाम-स्मरण से मल-क्षालन और सद्गुण-आभूषण का संकेत। (3) स्तुति-मार्ग की पूर्णता: वेद-स्तुति (ज्ञान-प्रकाश) और शम्भु-स्तुति (भक्ति-रस) मिलकर बताते हैं कि राम सगुण-निर्गुण दोनों के अधिष्ठान हैं; भक्ति और तत्त्व-चिन्तन विरोधी नहीं। (4) फलश्रुति का साधना-आश्वासन: कथा/नाम ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव-भय’ का दाहक औषध है—निष्काम-भक्ति को स्थिर करने वाला भरोसा। (5) सिद्धि के बाद भी विनय: कपियों की विदाई और अंगद का नम्र भाव सिखाता है कि राज्य/सफलता के बाद भी दास्य-सख्य, सेवा, सत्संग और नाम-स्मरण ही राम-राज्य की वास्तविक व्यवस्था है।
इस खंडांश का प्रधान रस ‘आनन्द/शान्त’ है, जिसमें ‘अद्भुत’ और ‘भक्ति’ का संयोग है। कैकेयी के लज्जा-प्रबोधन से लेकर राम के सिंहासनारोहण तक कथा बाह्य-राज्याभिषेक को भीतर के ‘चित्ताभिषेक’ में रूपान्तरित करती है—जटा-निर्मोचन, स्नान, दिव्य-वस्त्र, वेद-स्तुति, देव-नाद (दुन्दुभि) और मुनि-समुदाय की हर्षध्वनि साधक के मन में ‘सगुण-प्राकट्य’ का महोत्सव रचते हैं। तत्पश्चात वेद-स्तुति और शम्भु-स्तुति द्वारा निर्गुण-सगुण की एकता का सिद्धान्त-स्थापन होता है: राम ‘सगुन-निर्गुन रूप अनूप’ हैं। फिर फलश्रुति पाठक को बताती है कि यह कथा ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव-भय’ का दाहक औषध है। अंत में सखा-कपियों की विदाई और अंगद का विनय ‘दास्य-सख्य’ की पराकाष्ठा दिखाता है—राज्य-सिद्धि के बाद भी भक्ति का विनय, यही उत्तरकाण्ड का अन्तः-धर्म है।
आरम्भ में ‘लज्जा/पश्चात्ताप’ (कैकेयी का आत्मग्लानि-बोध) से रस-प्रवाह उठता है, जिसे भवानी का ‘करुण-प्रबोधन’ शान्ति में रूपान्तरित करता है। इसके बाद ‘आनन्द-उत्सव’ (जटा-निर्मोचन, स्नान, दिव्य-वस्त्र, वेद-स्तुति, देव-दुन्दुभि, मुनि-हर्ष) का उत्कर्ष आता है—यह बाह्य राज्याभिषेक को अन्तःकरण के ‘चित्ताभिषेक’ में बदल देता है। मध्य में ‘अद्भुत+भक्ति’ का संयोग (देव-नाद, स्तुति-गान, सगुण-प्राकट्य का महोत्सव) है। फिर वेद-स्तुति और शम्भु-स्तुति से ‘तत्त्व-शान्त’ (निर्गुण-सगुण की एकता का निश्चय) स्थापित होता है। फलश्रुति में ‘आश्वासन-रस’ (त्रिविध ताप/भव-भय-नाश का भरोसा) पाठक-मन को स्थिर करता है। अंत में कपियों की विदाई और अंगद का विनय ‘विरह-मिश्रित शान्त’ में उतरता है—राज्य-सिद्धि के बाद भी दास्य-सख्य की नम्रता, यही समापन-स्वर है।
इसी अंश की फलश्रुति में कहा है कि ‘महाराज कर सुभ अभिषेका’ सुनने से नर को ‘बिरति-बिबेक’ मिलता है; सकाम जन ‘सुख-संपति’ पाते हैं और अंतकाल ‘रघुपति पुर’ जाते हैं; विरक्त-विषयी दोनों को ‘भक्ति-गति-संपति’ की नई उपलब्धि होती है तथा ‘त्रिविध ताप’ और ‘भव भय’ का दमन होता है।
परम्परागत पाठ-प्रयोग में इस प्रकार के अभिषेक/स्तुति-प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संपुट) या ‘राम राम’ जप-संपुट जोड़ा जाता है; रामानन्दी/मानस-परायण परम्परा में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ को भी कीर्तन-संपुट रूप में रखा जाता है।
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