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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का बीज’—मन का प्रथम संस्कार। बालकाण्ड में कथा-रस के साथ साधक की दृष्टि निर्मल होती है: जगत-लीला (माया) का सूक्ष्म ज्ञान, गुरु/संत-वाणी का आश्रय, और राम-नाम की ओर अंतर्मुखता। इस खंड में नारद-प्रसंग दिखाता है कि अहं-आकांक्षा (रूप-लालसा) भी देव-लीला में साधन बनकर अंततः वैराग्य/शरणागति की सीढ़ी बनती है।
यह खंड-खण्डिका (दोहा 130–139) बालकाण्ड के भीतर ‘माया-विनोद’ और ‘अनुग्रह-प्रबोध’ का तीव्र रस-परिवर्तन रचती है। आरम्भ में शृंगार/अद्भुत-रस—नगर-वैभव, राजकुमारी का रूप, स्वयंवर की चहल-पहल। फिर हास्य-रस और व्यंग्य—नारद की रूप-आकांक्षा पर हरि की ‘कूट-करुणा’: कुरूपता देकर अहं का भेदन। तत्पश्चात रौद्र-रस—नारद का क्रोध, रुद्रगणों को श्राप; और अंततः शान्त/करुण-रस—हरि द्वारा माया-निवृत्ति, शिव-नाम-जप का उपदेश, तथा रुद्रगणों को मुक्ति का आश्वासन। धर्म-तत्त्व की दृष्टि से यह प्रसंग भक्ति-मार्ग की ‘अन्तःशुद्धि’ को केंद्र में रखता है: देवता-संत भी माया से विचलित हो सकते हैं, पर प्रभु की लीला अंततः साधक को नाम, विनय और शिव-राम-ऐक्य में स्थिर करती है।
Verse 278 (दोहा/सोरठा)
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।
ehi avasara cāhi'a parama sobhā rūpa bisāla | jo biloki rījhai kuaṁri taba melai jayāmāla ||131||
ऐसे अवसर पर परम तेज और राजसी गरिमा से युक्त एक अनुपम रूप होना चाहिए— जिसे देखकर राजकुमारी मुग्ध हो जाए और फिर वरमाला अर्पित कर दे।
Verse 279 (चौपाई)
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।। मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।। बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।। प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने।। अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।। आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।। जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।। निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।
hari sana māgaũ̃ sundaratāī. hoihi jāta gaharu ati bhāī.. moreṁ hita hari sama nahiṁ koū. ehi avasara sahāya soi hoū.. bahubidhi binaya kīnhi tehi kālā. pragaṭeu prabhu kautūkī kṛpālā.. prabhu biloki muni nayana juṛāne. hoihi kāju hiē̃ haraṣāne.. ati ārati kahi kathā sunāī. karahu kṛpā kari hohu sahāī.. āpana rūpa dehu prabhu mohī. āna bhā̃ti nahiṁ pāvaũ̃ ohī.. jehi bidhi nātha hoi hita morā. karahu so begi dāsa maiṁ torā.. nija māyā bala dekhi bisālā. hiē̃ hãsi बोले dīnadayālā..
हरि से सुंदरता माँगूंगा, क्योंकि हे भाई, यह कार्य अत्यंत कठिन है। मेरे हित के लिए हरि के समान कोई नहीं; इस समय वही मेरे सहायक हों। उस समय उन्होंने बहुत प्रकार से विनती की; प्रभु ने कृपालु होकर अपनी लीला प्रकट की। प्रभु को देखकर मुनि के नेत्र शांत हुए और हृदय में हर्ष हुआ, कार्य सिद्ध होगा। अत्यंत व्याकुल होकर अपनी कथा सुनाई; कृपा करो और सहायक बनो। हे प्रभु, मुझे अपना रूप दो; अन्य प्रकार से मैं उसे नहीं पा सकता। हे नाथ, जिस प्रकार मेरा हित हो, वही शीघ्र करो, मैं आपका दास हूँ। अपनी माया के विशाल बल को देखकर दीनदयालु ने हृदय में मुस्कुराकर कहा।
Verse 280 (दोहा/सोरठा)
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।।
jehi bidhi hoihi param hita nārada sunahu tumhāra | soi hama karaba na āna kachu bacana na mṛṣā hamāra ||132||
“जिस प्रकार मेरा परम कल्याण सिद्ध हो—हे नारद, सुनिए। उसी उपाय को मैं अपनाऊँगा, और किसी को नहीं; मेरा वचन असत्य न होगा।”
Verse 281 (चौपाई)
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।। एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।। माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।। गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।। निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।। मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।। मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।। सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।।
kupatha māga ruja byākula rogī | baida na dei sunahu muni jogī || ehi bidhi hita tumhār maiṁ ṭhayaū̃ | kahi asa antara-hita prabhu bhayaū || māyā bibasa bhae muni mūṛhā | samujhī nahiṁ hari girā nigūṛhā || gavane turata tahāँ ṛṣi-rāī | jahāँ svayaṁbara bhūmi banāī || nija nija āsana baiṭhe rājā | bahu banāva kari sahita samājā || muni mana haraṣa rūpa ati moreṁ | mohi taji ānahi bārihi na bhoreṁ || muni hita kārana kṛpā-nidhānā | dīnh kurūpa na jāi bakhānā || so caritra lakhi kāhuँ na pāvā | nārada jāni sabahiṁ sira nāvā ||
रोगी व्याकुल होकर कुपथ पर चलता है; वैद्य यदि न रोके तो सुनो मुनि योगी। इस प्रकार मैंने तुम्हारे हित का निश्चय किया; ऐसा कहकर प्रभु अंतर्ध्यान हो गए। माया के वश में मुनि मूढ़ हो गए; हरि की गूढ़ वाणी को नहीं समझे। तुरंत ऋषिराज उस स्थान पर गए जहाँ स्वयंवर की भूमि बनी थी। राजा अपने-अपने आसन पर बैठे, बहुत सजधज कर, समाज सहित। मुनि के मन में हर्ष था: मुझे छोड़कर वे किसी और को वरेंगी नहीं। मुनि के हित के लिए कृपानिधान ने ऐसा कुरूप दिया जिसका वर्णन नहीं हो सकता। वह चरित्र देखकर किसी ने नहीं जाना; नारद ने जाना और सबने सिर नवाया।
Verse 282 (दोहा/सोरठा)
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।।
rahe tahā̃ dui rudra gana te jānahĩ saba bheu | biprabēṣa dēkhata firahĩ parama kautukī teu ||133||
रुद्रगण के दो सेवक वहाँ रह गए, वे सब भेद भलीभाँति जानते थे। पर ब्राह्मण-वेष देखकर वे भी अत्यंत कौतुक और हर्ष में इधर-उधर भटकते रहे।
Verse 283 (चौपाई)
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।। तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।। करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।। रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।। मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।। जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।। काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।। मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।
jeṁhi samāja baiṁṭhe muni jāī | hṛdayaṁ rūpa ahamiti adhikāī || tahaṁ baiṭha mahesa gana doū | bipra-beṣa gati lakhai na koū || karahiṁ kūṭi nāradahi sunāī | nīkī dīnhi hari suṁdaratāī || rījhahi rājakuãri chabi dekhī | inhahi barihi hari jāni biseṣī || munihi moha mana hātha parāẽ | haṁsahiṁ saṁbhu gana ati sacu pāẽ || jadapi sunahiṁ muni aṭapaṭi bānī | samujhi na parai buddhi bhrama sānī || kāhuṁ na lakhā so carita biseṣā | so sarūpa nṛpakanyā̃ dekhā || markaṭa badana bhayaṁkara dehī | dekhata hṛdayaṁ krodha bhā tehī ||
जिस सभा में मुनि बैठे थे, उनके हृदय में अहंकार बढ़ रहा था। वहाँ महेश अपने दो गणों सहित बैठे थे; ब्राह्मण वेश में उनकी गति कोई नहीं पहचान सका। उन्होंने चतुराई से नारद को सुनाया और हरि ने उत्तम सुंदरता प्रदान की। राजकुमारी ने उस छबि को देखकर मोहित होकर सोचा: यह हरि हैं, इन्हें ही वरूंगी। मुनि को मोह ने ग्रस्त किया और मन नियंत्रण से बाहर हो गया; शिव और उनके गण हँसे, सच पाकर। यद्यपि मुनि ने वे अजीब बातें सुनीं, पर भ्रम से युक्त बुद्धि नहीं समझी। उस विशेष चरित्र को किसी ने नहीं देखा; राजकन्या ने वही रूप देखा। बंदर जैसा मुख, भयंकर शरीर; देखते ही उसके हृदय में क्रोध भर उठा।
Verse 284 (दोहा/सोरठा)
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।।
sakhīṁ saṅga lai kuãri taba cali janu rāja-marāla | dekhata phirai mahīpa saba kara saroja jayamāla ||134||
तब राजकुमारी सखियों सहित राजहंसिनी-सी गंभीर शोभा से आगे बढ़ी। सब राजा बार-बार मुड़कर निहारते रहे, और उनके कमल-करों में वरमालाएँ देखते-देखते काँप उठीं।
Verse 285 (चौपाई)
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।। पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं।। धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।। दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।। मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।। तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।। अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।। बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।
jehi disi baiṭhe nārada phūlī. so disi dehi na bilokī bhūlī.. puni puni muni ukasahiṁ akulāhīṁ. dekhi dasā hara-gaṇa musakāhīṁ.. dhari nṛpa-tanu tahaṁ gayau kṛpālā. kuaṁri haraṣi meleu jaya-mālā.. dulahini lai ge lacchini-vāsa. nṛpa-samāja saba bhayau nirāsā.. muni ati bikala moṁhaṁ mati nāṭhī. mani giri gaī chūṭi janu gāṁṭhī.. taba hara-gaṇa बोले musukāī. nija mukha mukura bilokahu jāī.. asa kahi dou bhāge bhayaṁ bhārī. badana dīkha muni bāri nihārī.. beṣu biloki krodha ati bāṛhā. tinhahi sarāpa dīnha ati gāṛhā..
जिस दिशा में नारद फूले हुए बैठे थे, उस दिशा की ओर देखना भी भूल गए। बार-बार मुनि उकसाने लगे, अकुलाहट बढ़ती गई; दशा देखकर हरि के गण मुस्कुराए। तब कृपालु ने राजा का रूप धरकर वहाँ जाकर कुमारी ने प्रसन्न होकर जयमाला पहनाई। दुलहिन को लक्ष्मीपति के पास ले गए और राजाओं का समूह निराश हो गया। मुनि अत्यंत व्याकुल हो गए; मेरी मति भाग गई, मानो मणि गाँठ से छूटकर गिर गई। तब हरि के गण मुस्कुराकर बोले: जाओ, अपना मुख दर्पण में देखो। ऐसा कहकर दोनों भय से भाग गए; मुनि ने बार-बार अपना मुख देखा। वेश देखकर अत्यंत क्रोध बढ़ा और उन्होंने उन्हें भारी श्राप दिया।
Verse 286 (दोहा/सोरठा)
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।
hohu nisācara jāi tumha kapaṭī pāpī dou | hamahi haँsehu so lehu phala bahuri haँsehu muni kou ||135||
“जाओ—तुम दोनों कपटी पापी निशाचर हो जाओ। जो तुमने मुझ पर हँसी की, उसी का फल भोगो; और आगे से किसी मुनि का उपहास फिर न हो।”
Verse 287 (चौपाई)
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।। फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं।। देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई।। बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी।। बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।। सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।। पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।। मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।
puni jalu dīkha rūpa nija pāvā | tadapi hṛdayã santoṣa na āvā || pharakat adhara kopa mana māhī̃ | sapadī cale kamalāpati pāhī̃ || dehaũ śrāpa ki marihaũ jāī | jagata mora upahāsa karāī || bīcahĩ pantha mile danujārī | saṅga ramā soi rāja-kumārī || bole madhura bacana surasāī̃ | muni kahã cale bikala kī nāī̃ || sunata bacana upajā ati krodhā | māyā basa na rahā mana bodhā || para saṃpadā sakahu nahĩ dekhī | tumharẽ iriṣā kapaṭa biseṣī || mathata siṃdhu rudrahi baurāyahu | suranha prerī biṣa pāna karāyahu ||
पुनः जल में अपना रूप देखा, तब भी हृदय में संतोष नहीं आया। अधर काँपने लगे, मन में क्रोध उठा; तुरंत कमलापति की ओर चल पड़े। श्राप दूँ या मर जाऊँ? सारा संसार मेरा उपहास करेगा। मार्ग में दनुजारी से मिले; उनके साथ रमा और वह राजकुमारी थी। मधुर वचन बोले, पर मुनि व्याकुल होकर चलते रहे। वचन सुनकर अति क्रोध उठा; माया के वश में मन का बोध नहीं रहा। पराई संपदा देख नहीं सकते; तुम्हारे में ईर्ष्या और कपट विशेष है। समुद्र मथाते समय रुद्र को बौराया और देवताओं को प्रेरित कर विष पिलाया।
Verse 288 (दोहा/सोरठा)
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।
asura surā biṣa saṅkarahi āpu ramā mani cāru | swāratha sādhaka kuṭila tumha sadā kapaṭa byavahāru ||136||
राक्षस-स्वभाव, मदमत्त, ऐसा विष कि शंकर को भी जिससे जूझना पड़े—और अपनी ही दृष्टि में तुम लक्ष्मी-रत्न-सी सुंदरी बनती हो। स्वार्थ-सिद्धि में टेढ़ी चाल चलने वाली, छल-कपट ही तुम्हारे व्यवहार की रीति है।
Verse 289 (चौपाई)
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।। भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।। डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।। करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।। भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।। बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।। कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।
parama svatantra na sira para koī | bhāvai manahi karahu tumha soī || bhalehi manda mandehi bhala karahū | bisamaya haraṣa na hiyã kacha chu dharahū || dahaki-dahaki paricehu saba kāhū | ati asaṅka mana sadā uchāhū || karama subhāsubha tumhahi na bādhā | aba lagi tumhahi na kāhū̃ sādhā || bhale bhavana aba bāyana dīnhā | pāvahuge phala āpana kīnhā || bãcehu mohi javani dhari dehā | soī tanu dharahu śrāpa mama ehā || kapi ākṛti tumha kīnhi hamārī | karihahĩ kīsa sahāya tumhārī || mama apakāra kīnhī tumha bhārī | nārī birahã tumha hoba dukhārī ||
परम स्वतंत्र हो, आपके सिर पर कोई नहीं; मन जो चाहे वही करें। भले को भला या मंद को भी भला करें; हृदय में विस्मय या हर्ष कुछ न रखें। सबसे निडर होकर विचरण करें; मन सदा निर्भय और उत्साहित रखें। शुभ-अशुभ कर्म आपको बाँधते नहीं; आज तक किसी ने आपको नहीं साधा। भला, अब भिक्षा दी; आप अपने किए का फल पाएंगे। मुझसे बचने के लिए जो शरीर धारण किया, वही शरीर धारण करें, यह मेरा श्राप है। आपने मेरा बंदर रूप बनाया; बंदर आपके सहायक होंगे। आपने मेरा बड़ा अपकार किया; स्त्री वियोग में आप दुखी होंगे।
Verse 290 (दोहा/सोरठा)
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि। निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
śrāpa sīsa dharī haraṣi hiyã prabhu bahu binatī kīnhi. nija māyā kai prabalatā karaṣi kṛpānidhi līnhi..137..
शाप को शिरोधार्य कर प्रभु ने हृदय में प्रसन्न होकर बहुत दीन-विनय की। तब करुणानिधान ने अपनी ही माया के प्रबल प्रभाव को जानकर उसे स्वीकार कर लिया।
Verse 291 (चौपाई)
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।। मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।। मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।। जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।। कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।। जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।। अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।
jaba hari māyā dūri nivārī | nahiṁ tahaṁ ramā na rājakumārī || taba muni ati sabhīta hari caranā | gahe pāhi pranatārati haranā || mṛṣā hou mama śrāpa kṛpālā | mama icchā kaha dīnadayālā || maiṁ durbacana kahe bahutere | kaha muni pāpa miṭihiṁ kimi mere || japahu jāi śaṅkara sata nāmā | hoihi hṛdayaṁ turaṁta biśrāmā || kou nahiṁ siva samāna priya moreṁ | asi paratīti tajahu jani bhoreṁ || jehi para kṛpā na karahiṁ purārī | so na pāva muni bhagati hamārī || asa ura dhari mahi bicarahu jāī | aba na tumhahi māyā niarāī ||
जब हरि ने माया का आवरण दूर किया, तब वहाँ न लक्ष्मी रहीं और न कोई राजकुमारी। तब मुनि अत्यंत भयभीत होकर भगवान के चरणों को पकड़ा - 'मेरी रक्षा करो, हे शरणागतों के दुख हरने वाले।' 'मेरा श्राप व्यर्थ हो जाए, हे कृपालु; मेरी इच्छा पूर्ण करो, हे दीनों पर दया करने वाले।' मुनि ने कहा - 'मैंने बहुत से कठोर शब्द कहे हैं; मेरे पाप कैसे मिटेंगे?' भगवान ने कहा - 'जाओ और शंकर के सत्य नाम का जप करो; तुम्हारे हृदय में तुरंत शांति होगी। मुझे शिव के समान प्रिय कोई नहीं - यह विश्वास कभी न छोड़ो। जिस पर पुरारि अर्थात् शिव कृपा नहीं करते, वह मुनि मेरी भक्ति कभी नहीं पा सकता। यह बात हृदय में धारण करके पृथ्वी पर विचरण करो; अब माया तुम्हारे पास नहीं आएगी।'
Verse 292 (दोहा/सोरठा)
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
bahubidhi munihi prabodhi prabhu taba bhae antardhāna. satyaloka nārada cale karata rāma guna gāna. ||138||
बहु भाँति उपदेसि मुनि, प्रभु पुनि भए अदृस्य। तब नारद सतलोक चले, गावत राम गुन जस॥ (138)
Verse 293 (चौपाई)
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।। अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।। हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।। श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।। निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ। भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ। समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।। चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।
hara gana munihi jāta patha dekhī | bigata-moha mana haraṣa biseṣī || ati sabhīta nārada pahiṃ āe | gahi pada ārata bacana sunāe || hara gana hama na bipra munirāyā | baṛa aparādha kīnha phala pāyā || śrāpa anugraha karahu kṛpālā | बोले nārada dīna-dayālā || nisicara jāi hohu tumha doū | baibhava bipula teja bala hoū || bhuja-bala bisva jitaba tumha jahiā | dharihahiṃ biṣṇu manuja tanu tahiā || samara marana hari hātha tumhārā | hoiha hu mukuta na puni saṃsārā || cale jugala muni pada sira nāī | bhae nisācara kālahi pāī ||
शिव के गणों ने मुनियों को अपने मार्ग पर जाते देखा; मोह दूर होने से उनके मन में अत्यंत हर्ष हुआ। वे अत्यंत भयभीत होकर नारद के पास आए; उनके चरणों को पकड़कर अपनी पीड़ा के शब्द सुनाए - 'हम शिव के गण हैं, ब्राह्मण मुनि नहीं। हमने बड़ा अपराध किया है और उसका फल पाया है। हे कृपालु, श्राप के साथ अनुग्रह करो।' दीनों पर दया करने वाले नारद ने कहा - 'जाओ, तुम दोनों रात में भ्रमण करने वाले राक्षस बनो; तुम्हें विपुल ऐश्वर्य, तेज और बल प्राप्त होगा। अपनी भुजाओं के बल से तुम संसार जीतोगे - जब तक विष्णु मनुष्य शरीर धारण न करें। युद्ध में तुम्हारी मृत्यु हरि के हाथ से होगी; तुम मुक्त हो जाओगे और पुनः संसार में नहीं आओगे।' दोनों ने मुनि के चरणों में सिर नवाकर चले गए; कालांतर में वे राक्षस बने।
Verse 294 (दोहा/सोरठा)
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार। सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।।
eku kalapa ehi hetu prabhu līnha manuja avatāra | sura rañjana sajjana sukhada hari bhañjana bhuvi bhāra ||139||
इसी हेतु हरि कल्प-कल्प, एक बार धरि नर देह। देवन्ह हर्ष, साधु सुख, हरि सम हरहिं धरा-भार बेग॥
Verse 295 (चौपाई)
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।। कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं।। तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।। बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।। हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।। रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।। यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।। प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।।सेवत सुलभ सकल दुख हारी।।
ehi bidhi janama karama hari kere | sundara sukhada bicitra ghanere || kalapa kalapa prati prabhu avatarahīṁ | cāru carita nānā-bidhi karahīṁ || taba taba kathā munīsanha gāī | parama punīta prabandha banāī || bibidha prasaṅga anūpa bakhāne | karahiṁ na suni ācaraju sayāne || hari anaṁta hari-kathā anaṁtā | kahahiṁ sunahiṁ bahu-bidhi saba saṁtā || rāmacandra ke carita suhāe | kalapa koṭi lagi jāhiṁ na gāe || yaha prasaṅga maiṁ kahā bhavānī | hari-māyāṁ mohahiṁ muni gyānī || prabhu kautukī pranata hitakārī | sevata sulabha sakala dukha hārī ||
इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म हैं - सुंदर, सुखदायक, विचित्र और बहुत। कल्प-कल्प में प्रभु अवतार लेते हैं और विविध प्रकार से अपने चारु चरित्र करते हैं। तब-तब मुनिश्रेष्ठ उस कथा को गाते हैं, परम पवित्र प्रबंध बनाते हैं। वे विविध अनूप प्रसंग कहते हैं - सुनकर भी सयाने आश्चर्य से नहीं थकते। हरि अनंत हैं और हरिकथा अनंत है; संत बहुविधि से कहते और सुनते हैं। रामचंद्र के सुहावने चरित्र ऐसे हैं कि करोड़ों कल्पों तक भी वे पूर्ण नहीं गाए जा सकते। हे भवानी, यह प्रसंग मैंने कहा - हरि की माया मुनि ज्ञानियों को भी मोहित कर सकती है। प्रभु कौतुकी हैं और शरणागतों के हितकारी; सेवने पर सुलभ हैं, सकल दुखों के हारी हैं।
Verse 296 (दोहा/सोरठा)
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।।
sura nara muni kou nāhiṁ jehi na moha māyā prabala || aśa bicāri mana māhiṁ bhaji-a mahāmāyā pati-hi ||140||
देव, मनुज, मुनि—कोउ नहीं, जासु न मोह माया प्रबल। इह निश्चय उर धरि भजै, महा-माया के स्वामी हरि सकल॥ (140)
Verse 297 (चौपाई)
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।। जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।। जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।। जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।। अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी।। लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।। भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।। लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।
apara hetu sunu saila-kumārī | kahuṁ bicitra kathā bistārī || jehi kārana aja aguna arūpā | brahma bhayu kosalapura bhūpā || jo prabhu bipina firata tumha dekhā | bandhu sameta dhareṁ muni-beṣā || jāsu carita avaloki bhavānī | satī sarīra rahihu baurānī || ajahum̐ na chāyā miṭati tumhārī | tāsu carita sunu bhrama ruja hārī || līlā kīnhi jo tehiṁ avatārā | so saba kahihauṁ mati anusārā || bharadvāja suni saṅkara bānī | sakuci sa-prema umā musakānī || lage bahuri barane bṛṣaketū | so avatāra bhayu jehi hetū ||
हे गिरिराज कुमारी, एक और कारण सुनो; मैं विचित्र कथा का विस्तार कहता हूँ। जिस कारण से अजन्मा, निर्गुण और निराकार ब्रह्म कोसलपुर के राजा बने। वही प्रभु जिसे तुमने मुनिवेश धारण कर भाइयों सहित वन में फिरते देखा था। जिनके चरित्र देखकर, हे भवानी, सती के शरीर में तुम व्याकुल रह गई थीं। आज भी तुम्हारी छाया नहीं मिटी; उनके चरित्र सुनो जो भ्रम के दुख को हरने वाले हैं। उस अवतार में जो लीला की, वह सब मैं अपनी समझ के अनुसार कहूँगा। भरद्वाज ने शंकर की वाणी सुनकर प्रेम से सकुचाते हुए उमा मुसकुराई। फिर वृषकेतु ने उस अवतार के कारण का वर्णन करना आरंभ किया।
1) माया-विनोद: प्रभु कभी-कभी ‘उलटी कृपा’ से अहं/आसक्ति का शोधन करते हैं—अपमान या विघ्न भी अनुग्रह बन सकता है। 2) अंतःशुद्धि: देवर्षि भी रूप-लालसा से विचलित हो सकते हैं; साधक के लिए चेतावनी—साधना में सूक्ष्म अहं सबसे बड़ा बंधन। 3) क्रोध से शान्ति: रौद्र-प्रतिक्रिया (श्राप/उग्रता) अंततः प्रभु-स्मरण और विनय से गलती है—भक्ति का लक्ष्य मन-निग्रह और करुणा है। 4) नाम-आश्रय: माया-निवृत्ति का उपाय ‘नाम-जप’—विशेषतः शिव-नाम/राम-नाम की एकता का संकेत, जिससे साधक द्वैत-भ्रम से ऊपर उठता है। 5) शरणागति: कथा का निष्कर्ष यही कि रूप-रस से हटकर नाम-रस में स्थिर होना ही ‘सोपान-प्रवेश’ का वास्तविक संस्कार है।
यह खंड-खण्डिका (दोहा 130–139) बालकाण्ड के भीतर ‘माया-विनोद’ और ‘अनुग्रह-प्रबोध’ का तीव्र रसा-परिवर्तन रचती है। आरम्भ में शृंगार/अद्भुत-रस: नगर-वैभव, राजकुमारी का रूप, स्वयंवर की चहल-पहल। फिर हास्य-रस और व्यंग्य: नारद की रूप-आकांक्षा पर हरि की ‘कूट-करुणा’—कुरूपता देकर अहं का भेदन। तत्पश्चात रौद्र-रस: नारद का क्रोध, रुद्रगणों को श्राप; और अंततः शान्त/करुण-रस: हरि द्वारा माया-निवृत्ति, शिव-नाम-जप का उपदेश, तथा रुद्रगणों को मुक्ति-आश्वासन। धर्म-तत्त्व की दृष्टि से यह प्रसंग भक्ति-मार्ग की ‘अन्तर-शुद्धि’ को केंद्र में रखता है: देवता-संत भी माया से विचलित हो सकते हैं, पर प्रभु की लीला अंततः साधक को नाम, विनय और शिव-राम-ऐक्य की ओर स्थिर करती है।
आरम्भ में शृंगार/अद्भुत-रस: नगर-वैभव, नर-नारी की कान्ति, स्वयंवर-उत्सव का चमत्कार और रूप-समृद्धि से मन का बहिर्मुख आकर्षण। फिर हास्य-रस (व्यंग्य-छाया सहित): नारद की रूप-लालसा और ‘हरि-कृपा’ का उलटा-सा विनोद—अहं को तोड़ने हेतु कुरूपता का दर्पण। तत्पश्चात रौद्र-रस: अपमान-बोध से नारद का क्रोध, रुद्रगणों/शिव-परिकर का उग्र होना, श्राप-वाणी का ताप। अंत में करुण/शान्त-रस: हरि द्वारा माया-निवृत्ति, भ्रम-भेदन, नाम-स्मरण का उपदेश, और रुद्रगणों को मुक्ति-आश्वासन—वैराग्य व शरणागति में परिणति।
परंपरागत मान्यता में यह प्रसंग ‘माया-निवारण’ और ‘अहं-शमन’ का पाठ माना जाता है: काम्य-इच्छा, ईर्ष्या, और क्रोध से उत्पन्न विक्षेप शांत होते हैं तथा शिव-नाम/राम-नाम में श्रद्धा दृढ़ होती है। विशेष फल: ‘विवेक’ (भेद-बुद्धि) और ‘शरणागति’ की वृत्ति का जागरण।
लोक-परंपरा में माया-शमन और शरणागति हेतु ‘श्रीराम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; और इसी अंश के उपदेशानुसार ‘शिव-पंचाक्षरी’/‘शंकर के सत नाम’ का जप-सम्पुट भी संगत माना जाता है (स्थानीय संप्रदायानुसार भेद संभव)।
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