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यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है: राजधर्म/गृहस्थ-व्यवस्था के बीच राम का वनगमन दिखाता है कि मुक्ति-मार्ग में ‘प्रिय’ (सुख, राज्य, लोक-प्रतिष्ठा) का त्याग नहीं, बल्कि ‘धर्म-निष्ठ’ समर्पण प्रधान है। अयोध्या काण्ड में करुण-रस के माध्यम से आसक्ति की जड़ें उजागर होती हैं और भक्त को शिक्षा मिलती है कि प्रेम (प्रेम-भक्ति) शोक में भी भगवान की ओर ले जाने वाली शक्ति है। यह चरण साधक को ‘लोक-बंधन’ से ‘ईश्वर-शरण’ की ओर मोड़ता है—जहाँ राम-चरित स्वयं साधना का अनुशासन बन जाता है।
अयोध्या काण्ड का प्रधान रस करुण है, पर यह करुणा ‘निराशा’ नहीं—यह वैराग्य का संस्कार है। प्रस्तुत अंश में राम का लोक-समुदाय को समझाना, गुरु-वंदना, और नगर-जन का बेकल प्रेम—तीनों मिलकर ‘धर्म बनाम आसक्ति’ की तीव्र नाटकीयता रचते हैं। तुलसी की धर्म-दृष्टि में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, साधक के भीतर ‘अहं-राज्य’ छोड़ने की दीक्षा है। नगर का अंधकार-रूपक (कालरात्रि, मसान, भूता) दिखाता है कि भगवान-वियोग में संसार का सौंदर्य क्षीण हो जाता है; वहीं गंगा-दर्शन और निषाद-मैत्री (गुह) भक्ति के सामाजिक-समावेशी स्वरूप को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार यह काण्ड मानस-रचना में मध्य-सेतु है: बालकाण्ड की ‘उत्पत्ति-भक्ति’ से आगे बढ़कर यह ‘त्याग-भक्ति’ और ‘शरणागति’ की सीढ़ी बनता है, जहाँ सगुण लीला के भीतर निर्गुण सत्य (त्याग, समता, करुणा) प्रकाशित होता है।
Verse 164 (चौपाई)
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।। कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।। गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।। जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।। दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।। सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।। बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।
बाहर निकलकर वशिष्ठ के द्वार पर खड़े हो गए; लोगों ने उन्हें देखा, उनके हृदय वियोग की अग्नि से जल रहे थे। प्रेमपूर्ण वचन बोलकर उन्होंने सबको समझाया और ब्राह्मणों के समूह तथा रघुवीर को बुलाया। उन्होंने अपने गुरु से कहा और उन्हें राजसिंहासन दिया; आदर, दान और विनती से उन्हें प्रसन्न किया। प्राप्तकर्ता दान और सम्मान से संतुष्ट हुआ; मित्र पवित्र प्रेम से प्रसन्न हुआ। उन्होंने दासियों और दासों को पुनः बुलाया और हाथ जोड़कर अपने गुरु से बोले। 'हे स्वामी, सबका ध्यान रखें; मेरी माता की देखभाल करें जैसे माता करती है।' बार-बार हाथ जोड़कर प्रणाम किया और राम ने सबसे कोमल वचन बोले। 'सब प्रकार से मेरे हित के लिए वही करें जिससे घर सुखी रहे।'
Verse 165 (दोहा/सोरठा)
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
माता, मेरे वियोग में सब पीड़ित हैं; कोई ऐसा नहीं जो शोक से ग्रस्त न हो। इसलिए ऐसा उपाय करें कि नगर के लोग परम कुशल हों।
Verse 166 (चौपाई)
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।। गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।। राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।। कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।। गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।। रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।। एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।। पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।
इस प्रकार राम ने सबको समझाया और प्रसन्नतापूर्वक अपने गुरु के कमल चरणों में सिर नवाया। गणपति, गौरी और गिरिश से विदा ली और आशीर्वाद पाकर रघुराई चल पड़े। राम के जाने पर बड़ा विषाद हुआ; नगर के आर्तनाद सुनाई नहीं देते। लंका और अयोध्या में कुशकुमार दिखे, बड़ा शोक हुआ; देवता विषाद और व्याकुलता से अभिभूत हुए। जब राजा मूर्छा से जागे, तो सुमंत्र को बुलाकर यों कहने लगे। 'राम वन गए, पर मेरा प्राण नहीं जाता; किस सुख के लिए यह शरीर मुझमें रहता है? इसलिए यह कैसा बलवान दुख है कि इतना दुख पाकर शरीर और प्राण त्याग देते हैं?' फिर नरनाथ ने धीरज धरकर कहा, 'रथ लेकर मित्र, आप उनके साथ जाइए।'
Verse 167 (दोहा/सोरठा)
सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।
दोनों सुकुमार कुमार और जनकपुत्री सुकुमारा, रथ पर चढ़कर वन देखेंगे और चार दिन बीतने पर लौट आएंगे।
Verse 168 (चौपाई)
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।। तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।। जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।। सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।। पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।। एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।। नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।। अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।
यदि दोनों भाई, सत्यसंध और दृढ़व्रत रघुराई न लौटें तो आप हाथ जोड़कर विनती करें, 'हे प्रभु, हे मिथिलेशकुमारी, लौटिए।' जब सीता वन देखकर भयभीत हों, तब अवसर पाकर उन्हें समझाइए। कहिए कि आपके सास-ससुर ने यह संदेश भेजा है, 'पुत्री, लौट आओ, वन में बड़ा कष्ट है।' कभी पिता के घर रहो, कभी ससुराल; जहाँ तुम्हारी रुचि हो वहाँ रहो। इस प्रकार उपाय करो; यदि वे लौटें तो मेरे प्राण को आश्रय मिलेगा। अन्यथा मेरी मृत्यु ही परिणाम होगी; मैं कुछ भी नहीं कर सका, विधि विपरीत हैं। ऐसा कहकर राजा धरती पर मूर्छित हो गए; राम, लक्ष्मण और सीता आकर उन्हें दिखाए दिए।
Verse 169 (दोहा/सोरठा)
पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।
आज्ञा पाकर उसने सिर नवाया और रथ बड़े वेग से चलाया; वह उस स्थान पर गया जहाँ सीता सहित दोनों भाई नगर के बाहर थे।
Verse 170 (चौपाई)
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।। चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।। चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।। कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।। लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।। घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।। घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।। बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।
तब सुमंत्र ने राजा के वचन सुनाए और विनती करके राम को रथ पर चढ़ाया। सीता सहित दोनों भाइयों को रथ पर बैठाकर वे चल पड़े, हृदय में अयोध्या को सिर नवाते हुए। राम को जाते देखकर अयोध्या के लोग अनाथ से व्याकुल होकर उनके साथ चलने लगे। करुणासिंधु ने बहुत समझाया, पर वे प्रेमवश लौटकर फिर आ गए। अयोध्या बड़ी भयावनी लगने लगी, मानो कालरात्रि का अंधकार छा गया हो। नगर के पुरुष और स्त्रियाँ भयभीत प्राणियों के समान थे, एक-दूसरे को देखकर काँपते थे। घर मशान जैसे, स्वजन भूत जैसे; पुत्र पिता के लिए यमदूत जैसे। बाग, वृक्ष और बेलें मुरझा गईं; नदियाँ और सरोवर पहचान में नहीं आते।
Verse 171 (दोहा/सोरठा)
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।
घोड़े, गाय, कोटियों के हिरण, नगर के पशु, चातक, मोर, पपीहे, रथ के पहिए, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर।
Verse 172 (चौपाई)
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।। नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।। बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।। सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।। सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।। जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।। चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।। राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।
राम के वियोग में सब व्याकुल होकर खड़े रहे, मानो चित्र बनाकर यहाँ-वहाँ रख दिए हों। नगर पक्षियों, हिरणों, पुरुषों और स्त्रियों से भरा था, वन घना और गहरा था। ब्रह्मा ने कैकेयी को शिकारिनी बनाया, जिसने असह्य विष दसों दिशाओं में फैला दिया। लोग रघुवर के वियोग का दुख सहन न कर सके; सब व्याकुल होकर भाग चले। सबने मन में विचार किया कि राम, लक्ष्मण और सीता के बिना सुख नहीं। जहाँ राम हैं, वहाँ सब समाज है; रघुवीर के बिना अयोध्या कुछ भी नहीं। वे इसी विचार से दृढ़ होकर साथ चले, देवताओं को भी दुर्लभ सुख के घर छोड़कर। जिन्हें राम के कमल चरण प्रिय हैं, वे विषय भोगों के वश में कैसे रह सकते हैं?
Verse 173 (दोहा/सोरठा)
बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।
बालक और वृद्ध अपने घर छोड़कर निकल पड़े, और सभी लोग मिलकर साथ चलने लगे। पहले दिन रघुनाथ ने तमसा नदी के तट पर अपना विश्राम स्थान बनाया।
Verse 174 (चौपाई)
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।। करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।। कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।। किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।। सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।। लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।। जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।। खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।
रघुपति ने देखा कि प्रजा प्रेम में लीन है, और उनके कोमल हृदय में विशेष दुख हुआ। करुणामय रघुनाथ गोस्वामी जल्दी ही दूसरों के कष्ट को अपना कष्ट समझ लेते हैं। प्रेमपूर्वक कोमल और सुंदर वचन बोलकर राम ने बहुत से तरीकों से लोगों को समझाया। उन्होंने धर्म का बहुत उपदेश दिया, परंतु प्रेम के वशीभूत लोग वापस नहीं लौटे। सील और स्नेह का त्याग नहीं हो सका, इस प्रकार रघुराई व्याकुल हो गए। लोग शोक और श्रम से अभिभूत हो गए, यह कुछ देवमाया का काम था। जब रात्रि व्यतीत हो गई, तब राम ने प्रेमपूर्वक अपने सचिव से कहा: "तलाश करके रथ को हाँको हे मित्र, इस विषय में दूसरा कोई उपाय नहीं है।"
Verse 175 (दोहा/सोरठा)
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ। सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
यह जानकर कि राम, लक्ष्मण और सुमंत्र रथ पर सवार होकर शंभु के चरणों में सिर झुकाकर निकल गए हैं, मंत्री ने तुरंत रथ को इधर-उधर तलाश करते हुए भटकाने के लिए चला दिया।
Verse 176 (चौपाई)
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।। रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।। मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।। एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।। निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।। जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।। एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।। बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।
सभी लोग जाग गए और भोर हो गई; जब रघुनाथ चले गए तो बड़ा हलचल मचा। उन्होंने रथ की तलाश की परंतु कहीं नहीं मिला; वे चारों दिशाओं में दौड़े, 'राम, राम!' पुकारते हुए। मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो; नगरवासियों का विशाल समाज व्याकुल हो गया। एक ने दूसरे से कहा, "हमने राम को त्याग दिया, अपने कष्ट को जानते हुए।" वे अपनी निंदा करते और मीना की प्रशंसा करते, चिल्लाते हुए, "रघुवीर से रहित इस जीवन पर धिक्कार है!" यदि ईश्वर ने प्रिय से यह वियोग नियत किया, तो उन्होंने हमें मृत्यु क्यों नहीं दिया? इस प्रकार वे विलाप करते रहे, और अयोध्या के लोग शोक से भरे हुए आए। वह भयंकर वियोग कहा नहीं जा सकता, फिर भी सभी उन्हें पुनः देखने की आश में जीवन धारण करते हैं।
Verse 177 (दोहा/सोरठा)
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।
राम के दर्शन के लिए पुरुष और स्त्रियाँ नियम और व्रत धारण करने लगीं, जैसे चकोर पक्षी जिन्होंने कमल खो दिया हो और चंद्रमा के बिना दुखी हों।
Verse 178 (चौपाई)
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।। उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।। लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।। सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।। मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।। सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।
सीता और सचिव सहित दोनों भाई शृंगवेरपुर पहुँचे। राम उतरे और देवनदी को देखा; उन्होंने दंडवत प्रणाम किया और उनका हर्ष अत्यधिक हुआ। लक्ष्मण, सचिव और सीता ने प्रणाम किया; राम सभी के साथ प्रसन्न हुए। गंगा सम्पूर्ण आनंद और मंगल का मूल है, सभी सुखों की देने वाली और सभी संतापों को हरने वाली है। करोड़ों कथाएँ और प्रसंग सुनाते हुए राम गंगा की तरंगों को निहारते रहे। उन्होंने सचिव, अपने भाई और अपनी प्रिया को उस दिव्य नदी की अतुल गौरव गाथा सुनाई। उन्होंने स्नान किया और मार्ग का श्रम दूर हो गया; शुद्ध जल पीकर उनका मन प्रसन्न हो गया। जिसका स्मरण करने से श्रम का बोझ मिट जाता है, उस श्रम का यह लौकिक व्यवहार है।
Verse 179 (दोहा/सोरठा)
सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।
वे जो शुद्ध हैं, सच्चिदानंदमय हैं, भक्तों के प्रिय हैं, सूर्यवंश के ध्वज हैं, अपने चरित्र का आचरण करते हैं और मनुष्य उनका अनुसरण करते हैं; वे संसार सागर के पुल हैं।
Verse 180 (चौपाई)
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।। लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।। करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।। सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।। नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।। देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।। कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।। कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।
जब गुह निषाद को यह समाचार मिला, तो वे प्रसन्न हुए और अपने प्रिय बंधुओं को बुलाया। उन्होंने फल और मूल लिए, भेंट भरी, और मिलने के लिए निकले, उनके हृदय में अपार हर्ष था। दंडवत प्रणाम करके भेंट उनके सामने रखी, और गहरे प्रेम से प्रभु को निहारा। सहज स्नेह में लीन रघुराई ने उनका कुशल पूछा और पास बैठाया। "नाथ, आपके स्वस्थ चरण कमल देखकर मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूँ। देवता, धरती और सब आपका ही धाम है; मैं तो अपने परिवार सहित नीच हूँ। कृपा करके नगर में विराजिए, मुझे अपना सेवक नियुक्त कीजिए और सभी लोगों को प्रसन्न कीजिए।" मुझे सत्य बताइए हे सुजान मित्र, मेरे पिता ने मुझे क्या आज्ञा भेजी है।
Verse 181 (दोहा/सोरठा)
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
चौदह वर्ष तक आप वन में मुनियों के व्रत के वेष में, वन्य फल-मूल खाकर निवास करेंगे। ग्राम में निवास उचित नहीं है; यह सुनकर गुह पर दुख का बोझ लगा।
Verse 182 (चौपाई)
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।। तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।। लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।। पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।। गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।। सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।
राम, लक्ष्मण और सीता का सौंदर्य देखकर ग्राम के पुरुष और स्त्रियाँ प्रेम से बोलीं: "हे सखी, बताओ वे कैसे माता-पिता हैं जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेजा।" कुछ ने कहा, "राजा ने अच्छा किया; हमें नेत्रों का लाभ मिला, ऐसा हमारा भाग्य है।" तब निषादपति ने हृदय में विचार किया और एक सिंसुपा वृक्ष को मनोहर जाना। रघुनाथ को लेकर उस स्थान पर दिखाया; राम ने उसे सभी प्रकार से सुंदर पाया। नगरवासियों को प्रणाम करके वे घर आए; रघुवर संध्या उपासना करने गए। गुह ने एक सुंदर शय्या सजाई, कुशा घास और कोमल पत्तियों से बिछाई। शुद्ध फल और मूल को मीठा और कोमल जानकर, उन्होंने दोनों में जल भर-भरकर रखा।
Verse 183 (दोहा/सोरठा)
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।
सीता, सुमंत्र और उनके भाई ने कंद, मूल और फल खाए; रघुकुल के श्रेष्ठ ने पृथ्वी पर शयन किया, अपने अंगों को भूमि पर टिकाकर।
(1) करुणा का आध्यात्मिक उपयोग: वियोग-शोक भक्त को तोड़ता नहीं, भीतर की आसक्ति पहचानकर भगवान की ओर मोड़ता है। (2) ‘प्रिय’ बनाम ‘धर्म’: राम दिखाते हैं कि त्याग का सार वस्तु-त्याग नहीं, धर्म-निष्ठ समर्पण है—लोक-प्रतिष्ठा/सुख के ऊपर मर्यादा। (3) गुरु-शरण और अनुशासन: वसिष्ठ-द्वार पर गुरु-वंदना बताती है कि भक्ति भावुकता नहीं; वह परंपरा, विनय और नियम से पुष्ट होती है। (4) लोक-प्रेम का शोधन: नगर-जन का बेकल प्रेम संकेत देता है कि सच्चा प्रेम रोता भी है, पर अंततः शरणागति में पकता है। (5) राम-चरित साधना बनता है: इस क्षण में ‘वनगमन’ साधक के भीतर अहंकार-राज्य छोड़ने और ईश्वर-शरण स्वीकारने का अभ्यास बन जाता है।
अयोध्या काण्ड का प्रधान रस करुण है, पर यह करुणा ‘निराशा’ नहीं—यह वैराग्य का संस्कार है। प्रस्तुत अंश में राम का लोक-समुदाय को समझाना, गुरु-वंदना, और नगर-जन का बेकल प्रेम—तीनों मिलकर ‘धर्म बनाम आसक्ति’ की तीव्र नाटकीयता रचते हैं। तुलसी की धर्म-दृष्टि में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, साधक के भीतर ‘अहं-राज्य’ छोड़ने की दीक्षा है। नगर का अंधकार-रूपक (कालरात्रि, मसान, भूता) दिखाता है कि भगवान-वियोग में संसार का सौंदर्य क्षीण हो जाता है; वहीं गंगा-दर्शन और निषाद-मैत्री (गुह) भक्ति के सामाजिक-समावेशी स्वरूप को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार यह काण्ड मानस-रचना में मध्य-सेतु है: बालकाण्ड की ‘उत्पत्ति-भक्ति’ से आगे बढ़कर यह ‘त्याग-भक्ति’ और ‘शरणागति’ की सीढ़ी बनता है, जहाँ सगुण लीला के भीतर निर्गुण सत्य (त्याग, समता, करुणा) प्रकाशित होता है।
करुण-रस की तीव्र चढ़ान से आरम्भ: (1) ‘विरह-दव’—नगर-जन राम-वियोग की आग में दग्ध, सामूहिक शोक का उफान। (2) ‘धर्म-स्थैर्य’—राम का संयमित, प्रिय-वचनयुक्त आश्वासन; करुणा निराशा नहीं, मर्यादा में ढली हुई। (3) ‘गुरु-गौरव/श्रद्धा’—वसिष्ठ-द्वार पर गुरु-वंदना का भाव; शोक के बीच भी अनुशासन और मर्यादा की धुरी। (4) ‘लोक-आसक्ति का अनावरण’—जन-समुदाय का रुकना/घेरना, प्रेम का आवेग; करुणा के भीतर मोह की जड़ें दिखती हैं। (5) ‘वैराग्य-प्रवेश’—राम का वनगमन-निश्चय अडिग; शोक धीरे-धीरे साधक-शिक्षा में रूपान्तरित: प्रिय का त्याग नहीं, धर्म में समर्पण। (6) ‘शरणागति की ओर मोड़’—वियोग-पीड़ा अंततः भगवान की ओर खींचने वाली शक्ति बनती है; करुणा से भक्ति का परिपाक।
परंपरागत मान्यता में वनगमन-प्रसंग का पाठ ‘वैराग्य-बुद्धि’ जगाता है, शोक/वियोग में धैर्य देता है, और शरणागति को दृढ़ करता है। विशेषतः गंगा-दर्शन व निषाद-मैत्री वाले अंश का पाठ ‘सत्संग-भाव’ और ‘समता’ बढ़ाकर मन को निर्मल करता है—भवसागर-सेतु (दोहा 87) की भावना के अनुरूप।
कई रामानंदी/मानस-पाठ परंपराओं में शरणागति-भाव दृढ़ करने हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का संकीर्तन-सम्पुट या ‘राम राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियाराममय सब जग जानी’ भी भाव-सम्पुट रूप में लिया जाता है (स्थानीय मर्यादा अनुसार).
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