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यह सोपान ‘धर्म-राज्य’ के द्वार पर ‘मोह-राज्य’ की परीक्षा है: जहाँ रामराज्य का उत्सव (सगुण-लीला) भीतर ही भीतर काम–क्रोध–कपट की आँधी से टकराता है। साधक के लिए यह चरण बताता है कि मुक्ति का मार्ग केवल बाह्य शुभ-घटना नहीं, बल्कि मन के ‘कोपभवन’ में उठती वासनाओं का विवेकपूर्वक निराकरण है।
अयोध्या काण्ड का रस-केन्द्र करुण और शान्त का संयोग है; पर इस खंड में करुण का बीज ‘भय’ और ‘कपट’ से सिंचित होता दिखता है। कैकेयी का अंतःकरण—जो पहले मातृभाव और राजधर्म का आश्रय हो सकता था—मंथरा की कुटिल वाणी से ‘कोपभवन’ बन जाता है। तुलसी यहाँ नीति-शास्त्र नहीं, मनोविज्ञान रचते हैं: दाहिने नेत्र का फड़कना, कुसपने, देह का काँपना—ये सब ‘अधर्म-प्रवृत्ति’ के सूक्ष्म संकेत हैं। दूसरी ओर दशरथ का सत्यव्रत (रघुकुल रीति) सगुण-लीला में धर्म की अपरिहार्यता है: राजा टूटता है पर वचन नहीं टूटता। यही संरचना मानस के निर्गुण-सगुण-संयोजन को गाढ़ा करती है—ईश्वर सर्वशक्तिमान होकर भी भक्त-धर्म और मर्यादा की लीला में स्वयं ‘बंधन’ स्वीकारते हैं। साधक के लिए संदेश: सत्य और मर्यादा का पालन ही सोपान की अगली सीढ़ी है, चाहे हृदय में करुणा का ज्वार उठे।
Verse 41 (चौपाई)
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।। तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।। कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।। फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।। सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।। दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।। काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
कैकेयी पुत्री के कठोर वचन सुनकर वह कुछ कह न सकी, पर सहमकर सूख गई। उसका शरीर केले के पेड़ की तरह काँपने लगा; उसके ओठ, दाँत और जीभ सूख गए। बार-बार वह करोड़ों छल की कहानियाँ कहती रही: रानी धीरज धरो, मैं आपको समझाऊँगी। मेरे कर्म उलट गए हैं प्रिय मित्र और अशुभ लगते हैं; फिर भी आप मुझे हंस मानकर सराहती हैं। सुनो मंथरा, यह बात छोड़ दो; मेरी दाहिनी आँख निरंतर फड़कती है। दिन-प्रतिदिन मैं रात में बुरे स्वप्न देखती हूँ; पर अपने मोह में आपको नहीं बताया। क्या करूँ सखि? मेरा स्वभाव निष्कपट है; मैं इस मामले में दाहिना-बामा नहीं जानता।
Verse 42 (दोहा/सोरठा)
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
आज तक मैंने अपने चलने से किसी का कोई अहित नहीं किया। फिर भी एक ही अपराध के लिए किसी ने मुझे दुसह दुख दिया है।
Verse 43 (चौपाई)
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।। अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।। दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।। अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।। जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।। जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।। पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।। भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।
मैं अपने मायके जाऊँगी और वहाँ जन्म भर रहूँगी; जीवित नहीं रहूँगी सवती की सेवा करने। शत्रुओं के हाथ पड़कर मर जाऊँ; ऐसे जीवन से मरण अच्छा है। रानी ने बहुत विनम्र शब्द कहे, पर कैकेयी ने उन शब्दों को केवल छल समझा। ऐसे-ऐसे क्यों कहती हो, जब तुम्हारा मन नहीं मानता? तुम्हारा सुख और सौभाग्य दिन-दिन दुगुना हो रहा है। जो तुम्हारे स्वामी को अति प्रिय था, वही इस फल को पाकर प्राप्त करेगा। जब से यह कुमति सुनी है, हे स्वामिनि, मुझे न भूख लगती है, न रात को नींद आती है, न विश्राम मिलता है। ज्योतिषियों से पूछा, रेखाएँ देखीं; वे कहते हैं भरत राजा होंगे, और यह सच है। हे रानी, यदि तुम ऐसा करोगी तो मैं एक उपाय बताऊँगा; क्योंकि तुम्हारे स्वामी तुम्हारी सेवा के वश में हैं।
Verse 44 (दोहा/सोरठा)
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।
तुम्हारे वचन पर कूएँ में कूद जाऊँ, पुत्र और पति को त्यागकर भी। मेरा बड़ा दुःख देखकर, तुम मेरे हित के लिए क्यों नहीं करती?
Verse 45 (चौपाई)
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।। लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।। सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।। कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।। दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।। सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।। भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।। होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।
कैकेयी को झुकाकर, छल की छुरी ने उसके हृदय-पत्थर को भेद दिया। रानी समीप आए दुःख को नहीं देखती; वह बलि के पशु की तरह चर रही है। आरंभ में मृदु पर अंत में कठोर शब्द सुनकर, उसका मन मानो मधु पाया जो वास्तव में घोर विष था। दासी पूछती है कि क्या उसे चेतना आई है, कहती है, स्वामिनि, मुझे बताओ क्या इच्छा है। आज ही राजा से वे दो वरदान माँगो और उन्हें अपने वश में करो। भरत को राज्य मिले और राम वनवास को जाएँ; दो और लो, और सब सवतियाँ प्रसन्न हों। जब राजा राम की सौगंध खाए, तब वह माँगो जो टाला न जा सके। आज ही रात में यह कार्य पूरा करो; मेरे वचनों को प्रिय मानो, मेरे प्राण।
Verse 46 (दोहा/सोरठा)
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।
बड़ा अनर्थ करके, हे पापिन, तुम कहती हो, क्रोध-गृह में जाओ। जल्दी से कार्य सँवारो; अचानक अपमान में न पड़ो।
Verse 47 (चौपाई)
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।। तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।। जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।। बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।। बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।। पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।। कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।। राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।
रानी को प्राणों से भी प्रिय जानकर, कैकेयी ने बार-बार अपनी चतुर योजना बताई। सारे संसार में मेरा तुम्हारे जैसा हितैषी नहीं; तुम चली गईं, मुझे निराश्रय छोड़कर। यदि विधाता मेरी मनोकामना पूरी करे, तो मैं तुम्हें पुत्र की माता बनाऊँगा। बहुत प्रकार से दासी ने कैकेयी का आदर किया जब वह क्रोध-भवन गई। दासी ने विपत्ति का बीज बोया, ऋतु में वर्षा की तरह; कैकेयी की भूमि कुमति से तैयार हो गई। छल का जल पाकर अंकुर फूटा; दोनों वरदानों ने दुःख का फल दिया। उसने क्रोध का सारा साज-सामान किया; राजा अपनी कुमति से बरबाद हो गए। आपके नगर में कोलाहल था, पर कोई इस कुचाल को नहीं जानता था।
Verse 48 (दोहा/सोरठा)
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
नगर के पुरुष और स्त्रियाँ प्रसन्न थे; सब मंगल संस्कार की तैयारी कर रहे थे। कुछ प्रवेश कर रहे थे, कुछ निकल रहे थे; राजा के दरबार में भीड़ थी।
Verse 49 (चौपाई)
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।। प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।। फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।। को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा। जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।। सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।। अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।। को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।
समाचार सुनकर बाल्य के मित्र हृदय से प्रसन्न हुए; दस-पाँच के समूह में मिलकर राम के पास गए। प्रभु ने उनका स्नेह पहचानकर प्रेम से स्वागत किया और कोमल वचनों में उनका कुशल-क्षेम पूछा। वे प्रिय आज्ञा पाकर अपने घर लौटे, आपस में राम की बड़ाई करते हुए। संसार में रघुवीर के समान शील, स्नेह और निबाह में कौन है? जिस-जिस योनि में हम कर्मों के वश भटकें, वहाँ-वहाँ ईश्वर यह दे कि हम उनके सेवक रहें और वे हमारे स्वामी। यह नाता हमेशा बना रहे। नगर के सब लोगों के हृदय में ऐसी अभिलाषा थी, जबकि कैकेयी पुत्री के हृदय में अत्यंत जलन थी। कुसंगति पाकर कौन नहीं बिगड़ता? नीच मति में चतुराई नहीं रहती।
Verse 50 (दोहा/सोरठा)
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।
एक क्षण में राजा प्रसन्नतापूर्वक कैकेयी के घर गए। उनका जाना इतना तीव्र था कि मानो उन्होंने स्नेह का शरीर धारण कर निकटता को कठोर बना दिया।
Verse 51 (चौपाई)
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।। सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।। सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।। सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।। सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।। भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।। कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।। जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।
क्रोध-भवन सुनकर राजा लज्जित हुए; भय के वश में वे आगे कदम नहीं बढ़ा सके। देवराज उनकी शक्ति और पराक्रम में निवास करते हैं; सब नरपति उनके आदेश में रहते हैं। यह सुनकर स्त्री का क्रोध सूख गया; देखो काम की बड़ी शक्ति और महिमा। जो शूल, वज्र और तलवार चलाते हैं, वे कामदेव के पुष्प-बाणों से मारे जाते हैं। राजा भयभीत होकर अपनी प्रिया के पास गए; उनकी दशा देखकर भयंकर दुःख हुआ। वह भूमि पर पुराने मोटे वस्त्र पर पड़ी थी; उसने शरीर और अनेक आभूषण फेंक दिए थे। उसने अपने कुमति हृदय को कठोर प्रतिज्ञा से बाँधा था, मानो वह कठोर तप कर रही हो। राजा निकट जाकर कोमल वचन बोले: प्राणप्रिये, किस कारण से क्रोधित हो?
Verse 52 (छंद)
केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई।। दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।।
किस कारण से क्रोधित हो, हे रानी? तुम जो पति को हाथ सीने पर रखकर प्रणाम करती हो, मानो क्रोध में उन्हें भयंकर दृष्टि से देख रही हो, हे सुंदरी। तुम्हारी दोनों आँखें, ओंठ और दाँत तुम्हारे मन की गूढ़ अवस्था प्रकट करते हैं। तुलसीदास देखते हैं कि राजा काम के खेल के वश में हैं, अपनी प्रिया के मनोभाव के चिह्न पढ़ रहे हैं।
Verse 53 (दोहा/सोरठा)
बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।।25।।
बार-बार राजा ने उस सुंदर मुख वाली और कोयल की आवाज़ के समान सुंदर नेत्रों वाली स्त्री से कहा: हे हाथी के समान चाल वाली, मुझे अपने क्रोध का कारण बताओ और अपना वह गुस्सा मुझ पर प्रकट करो।
Verse 54 (चौपाई)
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।। कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।। सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।। जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।। प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।। जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।। बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।। घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।
किसी ने तुम्हारा अहित किया है, हे मेरी प्रिय? किसके दो सिर लूं, या किसका जीवन छीन लूं? बताओ, किसे भिखारी बनाऊं? बताओ, किसे राज्य से निकाल दूं? मैं तुम्हारे शत्रुओं को मार सकता हूं, चाहे वे अमर हों; ये नर-नारी कीट-पतंगों के समान हैं। तुम मेरे स्वभाव को जानती हो, हे सुंदरी; मेरा मन तुम्हारे चंद्रमा के समान मुख का चकोर पक्षी है। मेरी प्रिय, मेरा प्राण, मेरा पुत्र, मेरा सब कुछ तुम्हारा है; तुम्हारा परिवार और प्रजा सब तुम्हारे वश में हैं। यदि मैं तुमसे कुछ झूठ बोलूं, हे सुंदरी, तो राम मेरे साक्षी हों और सत्य मेरी प्रतिज्ञा हो। हँसकर जो कुछ भी तुम्हारे मन को भाता है वह माँगो; अपने सुंदर शरीर को आभूषणों से सजाओ। इस घर को अपने हृदय में दुर्भाग्यशाली स्थान समझो; जल्दी ही, हे मेरी प्रिय, इस क्रूर व्रत को त्याग दो।
Verse 55 (दोहा/सोरठा)
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।
यह सुनकर कुटिलता से भरी मंथरा ने बड़ी प्रतिज्ञा की और जोर से हँस पड़ी। मृग को आभूषणों से सजाए देखकर, ऐसा लगा मानो कोई शिकारिन अपना फंदा बिछा रही हो।
Verse 56 (चौपाई)
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।। भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।। रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।। दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।। ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।। लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।। जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।। कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।
फिर राजा ने उसे हृदय से सुहृद जानकर, प्रेम से पुलकित होकर कोमल और मधुर वाणी में कहा। हे सुंदरी, तुम मेरे मन को भाने लगी हो; नगर के हर घर में आनंद बढ़ गया है। मैं कल राम को युवराज पद दूंगा; हे सुंदर नेत्रों वाली, शुभ आभूषणों से सजो। यह सुनकर मंथरा उठ खड़ी हुई, उसका हृदय कठोर हो गया, मानो किसी कच्चे घाव को छू लिया हो। ऐसी पीड़ा के साथ उसने उस गाय के सामने हँसकर कहा; जैसे कोई चोर स्त्री खुले में न रोए। राजा उसकी कपट चतुराई को नहीं देख सका; यद्यपि उसने करोड़ों कुटिल पुरुषों से शिक्षा पाई थी, फिर भी स्त्रियों के चरित्र में अनभिज्ञ रहा। यद्यपि राजा राजनीति में निपुण था, फिर भी स्त्रियों के स्वभाव के सागर में डूब गया। अपना ढोंगी प्रेम और बढ़ाकर, वह हँसकर बोली, अपनी आँखें नीची करके।
Verse 57 (दोहा/सोरठा)
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
माँगो, माँगो, हे प्रिय, और बोलो; कभी मत दो, कभी मत लो। यदि तुम कहोगे कि दो वरदान दूंगा, तो संदेह पैदा होता है।
Verse 58 (चौपाई)
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।। थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।। झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।। रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।। नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।। सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।। तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।। बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।
राजा हँसकर बोला: मैं तुम्हारा भेद जानता हूं; तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो, हे मेरी प्रिय। मैं किसी को हटकर नहीं माँगूंगा; मुझे अपना स्वाभाविक लाज भूल गया है। झूठ में भी मुझ पर दोष मत लगाओ; दो या चार वर माँगकर ले लो। रघुकुल की रीति सदा से चली आ रही है: प्राण चले जाएं, पर वचन न टूटे। असत्य के समान बड़ा पापों का पुंज नहीं; क्या तिल की करोड़ों गठरियां पहाड़ के बराबर हो सकती हैं? सब पुण्य कर्म सत्य में निहित हैं; वेद और पुराण इसे प्रसिद्ध करते हैं और हृदय इसका गान करता है। इसलिए राम ने प्रतिज्ञा करके आया; रघुनाथ का पुण्य और प्रेम असीम था। बात को दृढ़ करके कुमति वाली ने हँसकर कहा; उसने अपने दुष्ट मन का स्वभाव प्रकट कर दिया, जैसे किसी दुष्ट पक्षी का घोंसला खोल दिया हो।
Verse 59 (दोहा/सोरठा)
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।
राजा की इच्छा एक सुंदर वन थी, सुखी पक्षियों का समाज। परंतु कैकेयी ने एक शिकारिन की तरह उसके वचन को त्यागना चाहा, जो एक भयंकर शोर था।
Verse 60 (चौपाई)
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।। मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।। तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।। सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।। गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।। बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।। माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।। मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।। अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।
सुनो, हे प्राणप्रिय, मेरे हृदय में क्या है; एक वर भरत को टीका के रूप में दो। मैं दूसरा वर हाथ जोड़कर माँगती हूं; हे स्वामी, मेरी इच्छा पूरी करो। राम तपस्वी वेश में विशेष रूप से उदासीन होकर चौदह वर्ष वन में निवास करें। ये कोमल शब्द सुनकर राजा के हृदय में शोक हुआ, जैसे कोई कोकिल पक्षी चंद्रमा के स्पर्श से व्याकुल हो। वह सहमकर चला गया, कुछ बोल न सका, मानो वन में बिजली गिर गई हो। राजा पूरी तरह पीला पड़ गया, मानो किसी ऊंचे ताड़ वृक्ष पर वज्रपात हुआ हो। उसने माथे पर हाथ रखा, दोनों आँखें बंद कीं, और उसका शरीर शोक से भारी होकर एक चित्र के समान लगने लगा। मेरी इच्छा एक स्वर्गीय वृक्ष की तरह खिली थी, पर अब वह जड़ से उखड़ी हुई भटक रही है, जैसे कोई हाथी मारा गया हो। तुमने अयोध्या को उजाड़ दिया, हे कैकेयी, और मुझे विपत्ति के गर्त में धकेल दिया।
Verse 61 (दोहा/सोरठा)
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
किस अशुभ समय में यह घटना घटी? मैंने स्त्री पर विश्वास किया। यह उस समय के समान है जब योग, सिद्धि और फल नष्ट हो जाते हैं, और अविद्या तपस्वी का नाश कर देती है।
भक्ति-शिक्षा यह है कि साधना का निर्णायक युद्ध बाह्य घटनाओं में नहीं, मन के कोपभवन में होता है। अपशकुन/देह-लक्षण यहाँ ‘ईश-संकेत’ कम, ‘अंतःकरण की विकृति’ के दर्पण अधिक हैं—साधक को चाहिए कि भय, ईर्ष्या और अधिकार-लालसा के उठते ही विवेक-जागरण करे। साथ ही, रघुकुल-रीति का सत्यव्रत स्मरण कराता है कि धर्म का पालन भावनात्मक तूफान में भी नहीं टूटता; करुणा उठे तो भी मर्यादा न छूटे—यही भक्ति की परिपक्वता है। प्रभु की सगुण-लीला का रहस्य भी यहीं चमकता है: ईश्वर ‘बंधन’ स्वीकारकर दिखाते हैं कि भक्त-धर्म और वचन-पालन ही लोक-कल्याण का आधार है।
अयोध्या काण्ड का रस-केन्द्र करुण और शान्त का संयोग है; पर इस खंड में करुण का बीज ‘भय’ और ‘कपट’ से सिंचित होता दिखता है। कैकेयी का अंतःकरण—जो पहले मातृभाव और राजधर्म का आश्रय हो सकता था—मंथरा की कुटिल वाणी से ‘कोपभवन’ बन जाता है। तुलसी यहाँ नीति-शास्त्र नहीं, मनोविज्ञान रचते हैं: दाहिने नेत्र का फड़कना, कुसपने, देह का काँपना—ये सब ‘अधर्म-प्रवृत्ति’ के सूक्ष्म संकेत हैं। दूसरी ओर दशरथ का सत्यव्रत (रघुकुल रीति) सगुण-लीला में धर्म की अपरिहार्यता है: राजा टूटता है पर वचन नहीं टूटता। यही संरचना मानस के निरगुण-सगुण-संयोजन को गाढ़ा करती है—ईश्वर सर्वशक्तिमान होकर भी भक्त-धर्म और मर्यादा की लीला में स्वयं ‘बंधन’ स्वीकारते हैं। साधक के लिए संदेश: सत्य और मर्यादा का पालन ही सोपान की अगली सीढ़ी है, चाहे हृदय में करुणा का ज्वार उठे।
आरम्भ में ‘उत्सव-छाया’ के भीतर एकाएक ‘विषाद-आघात’ उतरता है: मंथरा की कटु वाणी सुनते ही कैकेयी का मातृ-भाव और राजधर्म-समर्थ मन ‘स्तम्भित’ हो जाता है। फिर भय-जन्य अस्थिरता (सहमना, देह का काँपना, अपशकुन-बोध) करुण-रस का बीज बनती है—क्योंकि पतन अभी घटा नहीं, पर घटने की छाया मन पर छा जाती है। इसके बाद रजोगुण-तमोगुण का उभार ‘क्रोध/अहं’ की ओर मोड़ता है: कोपभवन का मानस-निर्माण, जहाँ विवेक पीछे हटता और वासना/कपट आगे आते हैं। अंततः इस खंड का रस-स्वर शान्ति नहीं, ‘करुण-पूर्वपीठिका’ है—एक ऐसी करुणा जो अभी फूटती नहीं, भीतर-भीतर जमती है; और उसी के समानान्तर धर्म की कठोर रेखा उभरती है: रघुकुल-रीति का सत्यव्रत आगे चलकर राजा को तोड़ देगा, पर वचन को नहीं।
परंपरागत मान्यता में यह खंड ‘कुसंग-त्याग’ और ‘सत्यव्रत-स्थिरता’ का बोध कराता है; इसका पाठ मन के कोप/कपट को पहचानने की विवेक-शक्ति देता है और ‘वचन-पालन’ के संस्कार को दृढ़ करता है—जिससे गृहस्थ-धर्म और भक्ति दोनों में स्थैर्य आता है।
सामान्य राम-नाम-सम्पुट परंपरा: प्रत्येक दोहा/चौपाई के पूर्व या पश्चात ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘राम राम’ नाम-जप। (विशेष स्थानीय परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं।)
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