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मुख्य विषय: सुदृढ़ परिधि/रक्षित-स्थान, यथोचित हवि-समर्पण और बन्धन-मोचन के द्वारा गृह-समृद्धि तथा नक्षत्रीय/अदृश्य बाधाओं से रक्षा; साथ ही गण्डमाला/अपचित-प्रकार की ग्रन्थि-शोथ के लिए लक्षित चिकित्सा। उपविषय: (1) अग्नि के द्वारा रक्षोघ्न आवरण—निवास-स्थल की स्थापना और उपद्रव-निवारण। (2) कर्म की शुद्धता—इन्द्र के नियत भाग को सुनिश्चित करना और अनुष्ठान-दोषों का परिमार्जन। (3) पौष्टिक समृद्धि—दुग्ध, गौ और शुभ ‘भाग’ (भग) के माध्यम से पशु/गृह-ऐश्वर्य। (4) भैषज्य-प्रयोग—मूल-बल तथा शोषण/विभेदन-स्वभाव वाले उपायों और मन्त्रों से गण्डमाला/अपचित-शोथ का उपचार।
यह एक-ऋचा रक्षोघ्न सूक्त अग्नि को बस्ती के चारों ओर जीवित दुर्ग-प्राचीर के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जो समुदाय को अग्निमय प्रज्ञा और पराक्रम से परिक्रान्त करता है। प्रतिदिन प्रेरित (विप्र) अग्नि को परिधि-रक्षक के रूप में स्थापित करके यह मंत्र उस घिरे हुए क्षेत्र को संकट में डालने वाले आक्रमणकारियों—मानव हों या राक्षसी—को दूर भगाने, तोड़ने और संहार करने का लक्ष्य रखता है।
यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र यज्ञ की रक्षा करता है—यजमानों को “इन्द्र का भाग” देखने/पहचानने के लिए बुलाकर और यह सुनिश्चित करके कि वह उचित रूप में इन्द्र तक पहुँचे। यह तैयारी की त्रुटियों (अच्छी तरह पका बनाम अधपका हवि) को भी समेटता है और ऐसी सुधारक अर्पण-भावना का निर्देश देता है जिससे इन्द्र तृप्त हो। सूर्य के मध्याह्न-परिवर्तन के समय के अनुरूप यह स्तुति अंत में वज्रधारी इन्द्र को मध्याह्न-सवन के दधि-पान के लिए आमंत्रित करती है; और ऋत (सम्यक् क्रम) के साथ संरेखण द्वारा समृद्धि, गो-रक्षा तथा यज्ञ-सिद्धि सुनिश्चित करती है।
यह सूक्त एक पौष्टिक स्तुति है, जो दूध और गौ को ‘भग’ (शुभ भाग/समृद्धि) के वाहक के रूप में पवित्र ठहराती है और गृह-समृद्धि को सविता की विश्व-नियमितता तथा उषस् के दीप्तिमान अग्रगमन से जोड़ती है। तप्त घर्म और सुव्यवस्थित चरागाह की प्रतिमा के द्वारा यह प्रचुर दुग्ध-प्राप्ति, स्वस्थ पशुधन और समृद्ध गृह के शुभ ‘सिद्धि-चिह्नों’ की याचना करता है। इसकी शक्ति इस बात में है कि वह प्रतिदिन के पशुपालन और अर्पण-आचार को देवताओं द्वारा उद्घाटित ‘स्वर्ग-कोष’ के साथ समस्वर कर देता है, जिससे पोषण कर्मकाण्ड भी बनता है और पुनर्स्थापन (आरोग्य-स्थापन) भी।
अथर्ववेद 7.74 एक संक्षिप्त अथर्वणीय भैषज्य-मंत्र है, जिसका लक्ष्य ग्रंथियों की सूजन/गाँठ (गण्डमाला/अपचित) को तोड़कर विखंडित करना है। इस रोग को ऐसा माना गया है जिसे सशक्त मूल और मंत्र की भेदक वाणी ‘चीर’ सकती है। शारीरिक औषधि (मूल—विशेषतः ‘कृष्णा’ नामक वन-शक्ति) के साथ यह सूक्त ईर्ष्या और क्रोध जैसी शत्रुतापूर्ण भावनाओं को भी शांत/निष्प्रभावी करता है, जो रोग को बढ़ा सकती हैं। अंत में यह गृह्य अग्नि और संयमित व्रत-पालन में कल्याण को प्रतिष्ठित करता है।
यह संक्षिप्त दो-मंत्रों का सूक्त गौ-समृद्धि और रक्षा का तांत्रिक-रक्षात्मक प्रयोग है। यह चरागाह की ओर जाते मार्ग में और जल-स्थान पर गायों की कुशलता सुनिश्चित करता है तथा गोशाला और गृह-आसन को सुदृढ़ करता है। यहाँ रुद्र का आवाहन संहारक रूप में नहीं, बल्कि सतर्क रक्षक के रूप में है—जिसका “शर/अस्त्र” अपद्रव-निवारक परिधि बनाकर रक्षा करता है। साथ ही आपः (जल) और कल्याणी देवियाँ झुंड तथा स्वामी के क्षेत्र को शुद्ध करने, अभिषेक करने और बल देने के लिए प्रार्थित हैं।
अथर्ववेद 7.76 एक भैषज्य सूक्त है, जिसका उद्देश्य गण्डमाला-प्रकार की ग्रन्थि/सूजन (विशेषतः ग्रीवा या लसीका-प्रदेश की वृद्धि) को गलाकर, सुखाकर और नष्ट करना है। रोग को शत्रु मानकर उसे तोड़-फोड़ कर निर्बल और निष्प्रभावी करने का आह्वान किया गया है। सहायक शक्ति के रूप में लवण (नमक) को शोषक और शुद्धिकारक बल मानकर बुलाया जाता है; साथ ही यह मंत्र व्यापक अथर्वणिक चिकित्सा-तर्क पर आधारित है—आक्रामक पीड़ा-कारक एजेंटों को बाहर निकालना और देह की अखण्डता/सम्यक् स्थिति को पुनः स्थापित करना।
अथर्ववेद 7.77 मरुतों का एक संक्षिप्त सूक्त है, जो अपोत्प्रायिक तथा बन्ध-विमोचन मन्त्र के रूप में प्रयुक्त होता है। इसमें मरुतों से ‘दाहक/तपस्वी’ हवि स्वीकार करने, यजमान/आश्रित की रक्षा करने और शत्रुजन्य हानि को भस्म करने की प्रार्थना की जाती है। यह शत्रु द्वारा डाले गए बन्धन को उलटकर उसी आक्रान्ता पर लौटा देता है और रोगी या गृहस्थ से ‘एनस्’ (अपराध/अशौच/दूषण/पीड़ा) के पाश ढीले करने की याचना करता है। इस सूक्त की विशिष्ट शक्ति मरुत-तपस्—शुद्धिकारी तथा दण्डकारी उष्णता—और मरुतों की गण-रक्षा व त्वरित हस्तक्षेप के संयोग में निहित है।
यह संक्षिप्त अथर्वणिक सूक्त एक अनुष्ठानिक “बंधन-खोल” करता है: वाणी द्वारा उन रस्सियों, जुओं और गांठों को ढीला किया जाता है जो कैद, पीड़ा या शत्रुजन्य बाँधने के प्रतीक हैं। बंधन छूटते ही मुक्त अवस्था को स्थिर किया जाता है—दिव्य ब्रह्म के द्वारा अग्नि को “जोत” कर—ताकि लाभार्थी को क्षत्र-तुल्य रक्षात्मक बल, कल्याण, सौभाग्य और धन प्राप्त हो। दो चरणों—बंधनमुक्ति और पुनः-शक्तिप्रदान—में अग्नि को शुद्धिकर्ता भी और नई, अबंध स्थिति का प्रत्याभू भी बनाया गया है।
यह संक्षिप्त चन्द्र-स्तोत्र अमावस्या (नवचन्द्र-रात्रि) को एक जीवित देवी-शक्ति के रूप में पवित्र ठहराता है, जिसमें देवगण एकत्र होते हैं और जिससे गृहस्थ के लिए समृद्धि का ‘दोह’ किया जा सकता है। हविस अर्पित कर तथा रात्रि/अमावस्या को निधियों की संग्राहिका मानकर आवाहन करते हुए पाठकर्ता यज्ञ-सम्पूर्णता, पोषण (ऊर्ज), पुष्टिवर्धन (पुष्टि), धन-सम्पदा (रयि) और बलवान सन्तति (सुवीर) की कामना करता है। इसकी शक्ति इस बात में है कि यह सीमांत नवचन्द्र-रात्रि को पुण्य और दैवी उपस्थिति का सशक्त पात्र मानकर गृह्य-अनुष्ठान को भौतिक रूप से फलदायी बनाती है।
यह संक्षिप्त सूक्त पूर्णिमा (पौर्णमासी) को विजयी, सर्व-सम्पूर्ण करने वाली ब्रह्माण्डीय शक्ति के रूप में पवित्र ठहराता है, जिसमें देवगण निवास करते हैं और जिसके द्वारा मनुष्य यज्ञीय समृद्धि में आनन्दित हो सकते हैं। यह शुद्ध चान्द्र-व्रत तथा अर्पण को पूर्णता (पूर्णता), समृद्धि, अभिलाषाओं की सिद्धि, और उस पुण्य से जोड़ता है जो स्वर्ग-प्राप्ति की ओर ले जाता है।
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