Atharva Veda Anuvaka 4
Kanda 79 Suktas17 Mantras

Anuvaka 4

मुख्य विषय: अथर्वणीय मंत्रों और अभिषेक/दीक्षा-प्रार्थनाओं द्वारा जीवन, समृद्धि और विशिष्ट अनुराग को सुनिश्चित करना। उप-विषय: (1) आयुष्य (दीर्घायु) का आह्वान, (2) पौष्टिक (पोषण, गौ-वृद्धि, वृद्धि) कर्म, (3) प्रतिद्वन्द्वियों का अपसारण तथा अधिकार/प्रभुत्व को स्थिर करने वाले अपोत्प्रेरक उपाय, (4) वशीकरण—लेप/अंजन, वस्त्र और बन्धन-शक्ति के द्वारा आकर्षण व धारण, (5) जल–वर्षा–औषधि का परस्पर-संबंध, जो पुनर्भरण/पुनर्जीवन की शक्ति है। व्यावहारिक प्रयोजन: दाम्पत्य/यौन-विशिष्टता बनाए रखना, प्रतिस्पर्धियों को हटाना, तथा जीवन-बल और समृद्धि को दृढ़ करना।

Suktas in Anuvaka 4

Sukta 32

यह एक-ऋचा का आयुष्य-स्तोत्र प्रिय, युवावस्था-युक्त उस शक्ति के निकट जाता है जो आहुतियों से बढ़ती है (आहुति-वृध), और पाठक को दीर्घायु प्रदान करने की याचना करता है। श्रद्धापूर्वक समीप जाने (उप…अगन्म) और नमस्कार धारण करने (बिभृतो नमः) के द्वारा यह मंत्र दीर्घायु को उस दान के रूप में प्रस्तुत करता है जो विधिपूर्वक पोषित पवित्र शक्ति से प्रकट होता है—गृह्य अग्नि के रूप में अग्नि ही इसका स्वाभाविक आश्रय है।

Rishi: Atharvanic tradition (edition-dependent Anukramaṇī attribution). | Devata: Agni (implied by āhuti-vṛdh and approach to the oblation-fed power), or a generalized life-bestower. | 1 Mantras

Sukta 33

यह एक-ऋचा का आयुष्य–पौष्टिक सूक्त संक्षिप्त अभिषेक-प्रार्थना है, जिसमें देवताओं से यजमान/लाभार्थी पर समन्वित प्राण-शक्ति और मंगलमय वृद्धि का “सिंचन” करने की याचना की गई है। मरुत् (तेज-बल), पूषन् (पोषण और सुरक्षित गमन), बृहस्पति (पवित्र वाणी और सिद्ध कर्म), तथा अग्नि (दीक्षादायक/अभिषेककारी अग्नि) का आह्वान करके यह संतान, धन और दीर्घायु—इन सबका पूर्ण संचार चाहता है।

Rishi: Atharvanic tradition (edition-dependent). | Devata: Maruts, Pūṣan, Bṛhaspati, Agni. | 1 Mantras

Sukta 34

अथर्ववेद 7.34 एक संक्षिप्त किन्तु प्रबल अपोत्प्रेरक (अपशकुन-निवारक) मन्त्र है, जिसमें जातवेदस् अग्नि को नियुक्त किया जाता है कि वे याचक के विरुद्ध स्थित प्रतिद्वन्द्वियों को—चाहे वे पहले से प्रतिष्ठित हों या नये-नये ‘सामने उठ खड़े’ हुए हों—दूर हटा दें। यह केवल निष्कासन नहीं, बल्कि शत्रुओं की प्रतिष्ठा/स्थिति को विधिपूर्वक नीचे गिराने (अधः-पद) की भी कामना करता है, और निर्दोष यजमान को अदिति की विस्तृत, बन्धन-रहित करने वाली रक्षामय छत्रछाया में स्थापित करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (edition-dependent). | Devata: Agni (Jātavedas); Aditi as protective horizon. | 1 Mantras

Sukta 35

यह तीन-ऋचा वाला अथर्वणिक सूक्त राज-समृद्धि (राष्ट्र-पौष्टिक) को अपोत्प्राय/रक्षोघ्न प्रभाव के साथ जोड़ता है। इसमें अग्नि जातवेदस् से प्रार्थना की जाती है कि वे प्रतिद्वन्द्वी दावेदारों को बाहर निकालें और विश्वे देवाः की सम्मति से राज्य को स्थिर करें। इसके बाद सूक्त ‘सील करने’ की विधि की ओर मुड़ता है—पत्थर को अपिधान (ढक्कन/रोक) बनाकर—हानिकारक निकासों को बंद करने के लिए; इसे या तो प्राण/वीर्यादि द्रवों की हानि रोकने के रूप में, या उर्वरता-नियंत्रण के रूप में पढ़ा जा सकता है। सूक्त की शक्ति इस बात में है कि सार्वजनिक व्यवस्था (शत्रुओं का निष्कासन) और देह/यौन-संयम (छिद्रों का बंद होना) को एक ही तर्क—बलपूर्वक बहिष्कार और सुरक्षित बंदी—से जोड़ देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (edition-dependent). | Devata: Agni (Jātavedas); Viśve Devāḥ as collective sanction. | 3 Mantras

Sukta 36

यह एक-ऋचा का आकर्षण-मंत्र अञ्जन (काजल/सुरमा) को मनो-एरोटिक शक्ति के रूप में देवत्व प्रदान करता है, जो नेत्रों और मुख-प्रभा के माध्यम से परस्पर अनुराग को सिद्ध करता है। काले लेप को लगाकर और मंत्रोच्चार करके साधक यह चाहता है कि वह प्रिय के हृदय में ‘काला’ हो जाए—अर्थात् प्रिय के मन में अमिट रूप से अंकित/स्थित रहे—ताकि दोनों के मन एकमत होकर संगति में चलें।

Rishi: Atharvanic tradition (as per Anukramaṇī for 7.36) | Devata: Añjana (personified charm-substance); Manas (mind) as target | 1 Mantras

Sukta 37

यह एक-पद का अथर्वणीय वशीकरण-मंत्र ‘वासाḥ’ (वस्त्र) को संकल्प का भौतिक वाहक बनाकर पुरुष के चित्त और अनुराग को केवल वक्ता/स्त्री की ओर बाँधने का प्रयत्न करता है। अपने वस्त्र को उस पुरुष पर रखकर/उसे पहनाकर यह स्तुति उसके मनस् और काम को प्रतिद्वन्द्वी स्त्रियों—यहाँ तक कि समाज में ‘प्रसिद्ध’ मानी जाने वाली—से हटाकर एकनिष्ठ आसक्ति स्थापित करने हेतु स्पर्श-आधारित (contact-magic) उपाय करती है।

Rishi: Atharvanic tradition (as per Anukramaṇī for 7.37) | Devata: Vāsaḥ (Garment) as charm-medium; Kāma/Manas implicitly | 1 Mantras

Sukta 38

अथर्ववेद 7.38 एक संक्षिप्त वशीकरण (बलपूर्वक आकर्षण) सूक्त है, जिसका प्रयोग स्त्री-कर्मों में पति/प्रेमी को पुनः प्राप्त करने या उसे अपने पक्ष में स्थिर करने तथा उसके स्नेह को केवल अपने प्रति एकनिष्ठ बनाने हेतु किया जाता है। इसमें ‘आसुरी’ को बन्धन-शक्ति के सजीव रूप के रूप में आवाहन किया गया है, जो इन्द्र तक को ‘नीचे उतार’ सकती है; और उसी दमनकारी बल को लक्ष्य-पुरुष के मन, वाणी और सामाजिक आचरण पर लागू कर उसे वश में करने का विधान किया गया है।

Rishi: Traditionally Atharvanic/Angirasa attribution for coercive charms (hymn-level tradition varies by anukramaṇī) | Devata: Āsurī (personified coercive power) / Vaśīkaraṇa-śakti | 5 Mantras

Sukta 39

यह एक-ऋचा सूक्त ‘आपः’ (जल) का आवाहन करता है—वर्षा से उत्पन्न पोषण को वहन करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में—जिसे स्वर्गीय, शुभ्र-पक्षों वाली सत्ता मानकर संसार को ताज़गी देने हेतु अवतरित होते देखा गया है। वर्षा, औषधियों/वनस्पतियों और गो-धन के परस्पर संबंध को जोड़ते हुए, यह जल-चक्र द्वारा पौधों और पशुधन के पोषण से समृद्धि को गृहस्थ-आवास में—विशेषतः गोशाला/गोठ में—ठोस रूप से ‘प्रतिष्ठित’ करने की कामना करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (hymn-level attribution varies by anukramaṇī) | Devata: Āpas (Waters) / Rain-nourishment as divine agency | 1 Mantras

Sukta 40

यह संक्षिप्त पौष्टिक सूक्त सरस्वन्त का आह्वान करता है, जो उस विश्व-व्यवस्था (व्रत) के अधीक्षक हैं जिसके अंतर्गत गौएँ, आपः (जल) और पोषण के स्वामी (पुष्टपति) परस्पर सामंजस्य से कार्य करते हैं। सरस्वन्त को ‘दाता की ओर उन्मुख’ कहकर यह स्तुति यजमान के गृह में समृद्धि, गो-धन की वृद्धि और ‘निधियों के आसन’ की स्थिरता, साथ ही कीर्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा को आकर्षित करने का प्रयत्न करती है।

Rishi: Traditionally Atharvanic/Angirasa attribution for this paustika complex (hymn-level ascription varies by Anukramaṇī) | Devata: Sarasvant (with the Waters and Puṣṭi/puṣṭapati as associated powers) | 2 Mantras

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