Atharva Veda Anuvaka 3
Kanda 710 Suktas20 Mantras

Anuvaka 3

मुख्य विषय: ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को यज्ञ-क्षेत्र में प्रकाश, सार्वभौम सत्ता और विष्णु के लोक-स्थापन करने वाले त्रिविक्रम पदों द्वारा दृढ़ किया जाता है—जिससे रक्षा, समृद्धि और स्पष्ट दृष्टि प्राप्त होती है। उप-विषय: (1) आदित्य/ज्योति—नैतिक तथा बोधात्मक प्रकाश, (2) दु:स्वप्न, रात्रि-भय, दैवी/दैत्य-पीड़ा और शत्रु-वाणी के विरुद्ध रक्षा, (3) देवताओं द्वारा पहले से जीते गए लाभों का पौष्टिक ‘प्रदान’, (4) विष्णु–वरुण—प्रदेशों के स्थापनकर्ता और धर्म के प्रवर्तक, (5) इळा—शुद्ध करने वाली समृद्धि और व्रत-समर्थन, (6) उपकरणों, वेदी और अनुष्ठान-व्यवस्था के लिए शान्ति।

Suktas in Anuvaka 3

Sukta 21

यह एक-ऋचा सूक्त उस एक, सर्वव्यापी प्रभु की स्तुति करता है—जिसे सूर्य/आदित्य के रूप में, अथवा एकात्म ‘पति’ तत्त्व के रूप में पढ़ा जा सकता है—जिसके सम्मुख समस्त प्राणी ‘वाणी सहित’ एकत्र होकर स्वीकार करते हैं। यह आदिम सार्वभौम अधिपत्य की पुष्टि करता है, जो निरन्तर ‘नवागत’ को ग्रहण करता है और जगत् की गतियों को एक ही पथ पर चलाए रखता है; इससे पाठक/यजमान को ऋत-सदृश नियमित पुनरावृत्ति और समृद्धि के साथ संरेखित किया जाता है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (specific ṛṣi attribution varies by anukramaṇī; requires verification for AVŚ 7.21.1). | Devata: Āditya/Sūrya as 'the One, all-pervading Lord'; alternatively a monistic 'Pati' principle. | 1 Mantras

Sukta 22

यह संक्षिप्त दो-ऋचा का सूक्त ज्योतिस्/आदित्य—प्रकाश को एक ब्रह्माण्डीय, नैतिक और इन्द्रिय-प्रत्ययकारी शक्ति के रूप में—आह्वान करता है कि वह दृष्टि को निर्मल करे और आचरण को ऋत (व्यवस्थित धर्म-नियम) के अनुरूप स्थिर करे। ‘प्रकाश’ को धर्म की विधि में प्रतिष्ठित कर तथा उसे उषा-आदित्य के उदय-वेग से संयुक्त करके यह सूक्त रक्षात्मक-चिकित्सात्मक मन्त्र के रूप में कार्य करता है—अन्धकार, मोह/भ्रम और शत्रु प्रभावों का निवारण करता हुआ, तथा समयोचित समृद्धि (विशेषतः गौ-धन/सम्पत्ति) का पोषण करता है।

Rishi: Uncertain (requires anukramaṇī verification for AVŚ 7.22.1). | Devata: Jyotis/Āditya (Light as a deified power). | 2 Mantras

Sukta 23

अथर्ववेद 7.23 एक संक्षिप्त रक्षोघ्न मंत्र है, जो रात्रि में होने वाले और मन-देह से जुड़े कष्टों के पूरे समूह को लक्ष्य करता है—दुःस्वप्न, “कुजीवन/दुराचार”, दैत्य-पीड़ा (राक्षसी दमन), और शत्रुतापूर्ण वाणी। एक ही अनुष्टुभ-छंद की उक्ति में यह इन आपदाओं का नाम लेकर उनका निष्कासन करता है, ताकि सुरक्षित निद्रा, प्राणबल/जीवन-शक्ति, और सामाजिक-भाषिक कल्याण पुनः स्थापित हो।

Rishi: Uncertain (requires anukramaṇī verification for AVŚ 7.23.1). | Devata: Rakṣoghna-brahman (the mantra’s own power); implicitly Indra/Agni as destroyers of rakṣas in Atharvanic idiom. | 1 Mantras

Sukta 24

यह एक-ऋचा पौष्टिक सूक्त ‘दिव्य अनुमोदन’ (संकल्प-सिद्धि) की प्रार्थना के रूप में कार्य करता है: देवताओं ने यजमान के लिए जो लाभ पहले ही जीत लिए हैं या प्रकट कर दिए हैं, वे औपचारिक रूप से प्रदान किए जाएँ और स्थिर किए जाएँ—ऐसी याचना की जाती है। ऋत-व्यवस्था और प्रेरक स्वीकृति के अधिष्ठाता सवितृ से—प्रजापति और अनुमति के साथ—समृद्धि, सिद्धि और मंगल परिणामों को ‘दृढ़तापूर्वक स्थापित’ करने की प्रार्थना की गई है।

Rishi: Uncertain (requires anukramaṇī verification for AVŚ 7.24.1). | Devata: Savitṛ (primary); with Prajāpati and Anumati as co-invoked powers. | 1 Mantras

Sukta 25

यह संक्षिप्त दो-मंत्रों का सूक्त विष्णु के साथ वरुण का आह्वान करता है—दोनों को ऋत/धर्म के युग्म धारक, जो दिशाओं/प्रदेशों को दृढ़ करते हैं और बल तथा धर्म के द्वारा अविरोध्य शासन करते हैं। अथर्वण परंपरा में इसका प्रयोग अपोत्प्रायिक (रक्षात्मक) है: उनकी अप्रतिहत अधिसत्ता के साथ यज्ञ-स्थान और चतुर्दिक् का संरेखण करके यह पाठक के चारों ओर जगत को स्थिर करता है और अव्यवस्था, भय तथा शत्रु शक्तियों को दूर करता है।

Rishi: Traditionally connected with Vaiṣṇava/Ṛgvedic material; Atharvanic redaction preserves it for protective use (specific r̥ṣi attribution varies by anukramaṇī tradition). | Devata: Viṣṇu (with Varuṇa in associative dual sovereignty) | 2 Mantras

Sukta 26

अथर्ववेद 7.26 प्रसिद्ध ऋग्वैदिक त्रिविक्रम-स्तोत्र को अथर्वणीय मंत्र-रूप में ढालता है—स्थान को स्थिर करने, निवास/बसावट को सुरक्षित करने और शत्रु शक्तियों को दूर ढकेलने के लिए। विष्णु के तीन विश्वव्यापी पगों का स्मरण करके—जिनसे लोक स्थिर रहते हैं—यह सूक्त यजमान के ‘पग’ स्थापित करता है: सीमाएँ दृढ़ होती हैं, निवास विस्तृत (उरु क्षय) बनता है, और यज्ञ तथा आजीविका में बाधा डालने वाले विघ्न-बल परे हटा दिए जाते हैं। इसकी पौष्टिक प्रवृत्ति (चारों दिशाओं से धन-समृद्धि का भरपूर आगमन) रक्षोघ्न संरक्षण से अविभाज्य है, क्योंकि समृद्धि को यहाँ स्थान-व्यवस्था की स्थिर, संरक्षित मर्यादा के रूप में देखा गया है।

Rishi: Traditionally connected with Viṣṇu-trivikrama tradition (RV 1.154 parallels); Atharvanic redaction preserves the formula. | Devata: Viṣṇu (Trivikrama) | 8 Mantras

Sukta 27

यह एक-ऋचा सूक्त वैś्वदेवी इḍā को शुद्धि और समृद्धि प्रदान करने वाली उस उपस्थिति के रूप में प्रतिष्ठित करता है जो यज्ञ के पास ‘खड़ी रहती’ है और व्रत (नियत अनुशासन/आचार) के द्वारा यजमान को अपने आवरण में ले लेती है। उसे घृत-पाद और सोम-आश्रित बताकर यह अनुष्ठान-स्थल को पवित्र करता है, उपासकों को मलिनता से शुद्ध करता है तथा उन अशुद्धियों और शत्रु शक्तियों को दूर करता है जो यज्ञ को विचलित कर सकती हैं।

Rishi: Not specified in the provided input (requires AVŚ anukramaṇī lookup for 7.27.1). | Devata: Iḍā (Vaiśvadevī / All-Gods-associated Iḍā). | 1 Mantras

Sukta 28

यह एक-मंत्र सूक्त संक्षिप्त शान्ति-प्रार्थना है, जो यज्ञ की तकनीकी साधन-सामग्री—वेद/ज्ञान, लकड़ी चीरने का उपकरण, कुल्हाड़ी तथा वेदि-स्थान—को पवित्र और सुरक्षित ठहराती है, ताकि तैयारी में कोई दोष या अनिष्ट न हो। उपकरणों और वेदि पर बार-बार “स्वस्ति” (मंगलमय सुरक्षा) की स्थापना करके यह कर्म को निरापद बनाता है और अंत में यज्ञ-प्रिय देवों से सीधी याचना करता है कि वे हवि को स्वीकार करें और उसका आस्वाद लें।

Rishi: Not specified in the provided input (requires AVŚ anukramaṇī lookup for 7.28.1). | Devata: Svasti (Auspiciousness) and the Devās (collective gods) as acceptors of yajña. | 1 Mantras

Sukta 29

यह संक्षिप्त दो-ऋचाओं वाला सूक्त युगल देवता अग्नि–विष्णु का आह्वान करता है कि वे घृत-आहुति को वहन करें और उसका आस्वादन करें, जिससे गृह्य अग्नि से देव-लोक तक अर्पण का सम्यक् संप्रेषण हो। ‘घृत के गुप्त नाम/मार्ग’ की स्तुति करते हुए और यह प्रार्थना करते हुए कि अग्नि की जिह्वा उसे ऊपर की ओर पहुँचा दे, यह सूक्त उस गृह में—जहाँ यह कर्म किया जाता है—‘सात निधियों’ के रूप में प्रतीकित पूर्ण घरेलू समृद्धि की सिद्धि का लक्ष्य रखता है।

Rishi: Not specified in the provided input (requires AVŚ anukramaṇī lookup for 7.29.1). | Devata: Agni-Viṣṇu (dual). | 2 Mantras

Sukta 30

यह एक-ऋचा का भैषज्य–रक्षा सूक्त अञ्जन (काजल/नेत्र-लेप) का अभिषेक करता है और उसे ‘सुव्यवस्थित/सुसंस्कृत’ (स्वाक्त) घोषित करता है—यह घोषणा ब्रह्माण्डीय तथा याज्ञिक शक्तियों की स्वीकृति से होती है। द्यावा–पृथिवी, मित्र, ब्रह्मणस्पति और सविता को इस औषधि के कर्ता रूप में आवाहन करके मंत्र का उद्देश्य इस तैयारी को निर्दोष, प्रभावकारी और नेत्रों पर पड़ने वाली हानियों से रक्षक बनाना है—विशेषतः दुष्प्रभाव और दुष्ट दृष्टि (evil glance) से।

Rishi: Bhṛgvaṅgirasaḥ (as given in input). | Devata: Dyāvā-Pṛthivī, Mitra, Brahmaṇaspati, Savitar (as given in input). | 1 Mantras

Read Atharva Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App