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मुख्य विषय: देहधारी प्राण-शक्ति की रक्षा—दुर्भाग्य/अपवित्रता का शोधन, शत्रु शक्तियों का प्रतिषेध, तथा स्वास्थ्य और रक्षात्मक तेज का पुनर्स्थापन। उपविषय: (1) पौष्टिक विधान—गृह में जननशील जीवन-बल का पुनर्निर्देशन/नियंत्रण। (2) पापनाशन शुद्धि—द्यावापृथिवी और सप्त आपः (सात जल) के द्वारा। (3) अभिचार—चिह्नित शत्रु को निष्क्रिय करना और अपमानित/कलंकित करना। (4) तेजस्/वर्चस् का प्रबंधन—शत्रुओं से हरण कर अपने लिए दृढ़ीकरण। (5) पापी लक्ष्मी (दुष्ट सौभाग्य) तथा जन्म-संबद्ध दोष/अशुभ का निष्कासन।
यह एक-मंत्र सूक्त आत्मन् का आह्वान करता है—उस अंतर्निहित प्राण-शक्ति का, जिसे इन्द्र के सोम-धारक उदर से अभिन्न माना गया है—और जनन-शक्ति को उचित गृहस्थ-आश्रय में पुनः प्रवाहित करता है। इसका प्रभाव पौष्टिक तथा स्त्रीकर्माणि है: ‘यहीं’ वैध संतान की स्थापना, एकाग्रता और स्थैर्य करना, तथा जो भी उर्वरता या आसक्ति ‘अन्यत्र’ हो, उसे अन्यत्र ही रहने देना—जिससे प्रजनन-रस का विखराव न हो।
यह संक्षिप्त पापनाशन सूक्त द्यावापृथिवी (द्यौः–पृथिवी) तथा सप्त आपः (सात जलधाराओं) का आह्वान करता है—वे तेजस्वी शुद्धिकर्ता हैं जो अंहस् (पाप/संकुचन) की गाँठों को ढीला कर सकते हैं। इसमें विशेषतः शपथ-जन्य पाप, वरुण के दण्डात्मक अपराध-बोध, यम के बन्धन-रज्जु (पाश), और देवकृत प्रत्येक अपराध से मुक्ति की याचना की गई है; शुद्धि को यहाँ जल-प्रक्षालन (आपः) और पाश-छेदन/बंधन-मोचन—दोनों रूपों में प्रस्तुत किया गया है।
अथर्ववेद 7.113 एक संक्षिप्त अभिचारिक सूक्त है, जिसमें तृष्टीका को काटने‑असमर्थ करने वाली सजीव शक्ति के रूप में आवाहन किया गया है, ताकि वह निर्दिष्ट शत्रु को “छिन्न” कर दे और उसे अपमान व असहायता में धकेल दे। इसके दो मंत्रों में ‘छेदो/काटो’ (chindhi) की धार‑छवि और ‘विष’ (viṣa) की छवि एक साथ जुड़ती है, जिससे शत्रु एक साथ घायल, विषाक्त, पराजित/भगाया हुआ और वश में किया हुआ बनता है।
यह संक्षिप्त, दो-मंत्रों वाला सूक्त शत्रु के वर्चस्/तेजस् के आक्रामक हरण (तेजस्-हरण) को रोग, दमनकारी पीछा और शत्रुतापूर्ण वाणी के अपसारण-रूप अपोत्प्रेरक कर्म के साथ जोड़ता है। इसमें लक्ष्य के प्रमुख स्थानों—कंधों, हृदय और मुख—से उसकी दीप्ति को वाचिक रूप से “उठाकर” अपने पक्ष में ले लिया जाता है, और फिर अग्नि तथा सोम को दुष्ट शक्तियों के संहारक के रूप में आवाहन करके समस्त उपद्रवों को दूर हाँक कर इस प्राप्ति को स्थिर/सील किया जाता है।
यह संक्षिप्त आथर्वणिक सूक्त “पापी लक्ष्मी” की पहचान, छँटाई और निष्कासन हेतु अपोत्प्राय (अपशकुन-निवारक) मंत्र-रूप है। यहाँ “पापी लक्ष्मी” को जन्म से व्यक्ति से चिपकी हुई, प्रत्यक्ष/अनुभवगम्य कलंक-रूप दुष्ट-भाग्य के रूप में समझा गया है। सूक्त उस अमंगल अंश को सीमांत निर्जन/कूड़ा-स्थल की ओर हाँककर बाहर करता है और, अधिक तीक्ष्ण अभिचार-प्रयोग में, उसी दुर्भाग्य को किसी शत्रु प्रतिद्वन्द्वी पर बाँध देता है; साथ ही अग्नि जातवेदस् के द्वारा “पुण्याः लक्ष्मीः” (शुभ लक्ष्मियाँ) को स्थिर और सुरक्षित करता है।
यह संक्षिप्त भैषज्य-सूक्त ज्वर को एक व्यक्तित्वयुक्त शक्ति मानकर संबोधित करता है और उसके शमन की प्रार्थना करता है, विशेषतः शीत-ज्वर (कँपकँपी/ठंडा ज्वर) तथा आवर्तक/अंतरालिक रूपों के संदर्भ में। इसमें ‘नमो’ द्वारा आदरपूर्वक तुष्टि (appeasement) के साथ अथर्वणीय निष्कासन/स्थानांतरण की परंपरागत युक्ति जुड़ी है—बार-बार लौटने वाले ज्वर को रोगी से हटकर प्रस्थान करने और एक प्रतिपूरक पात्र (मेंढक) पर जा बसने का निर्देश दिया जाता है। इस प्रकार सूक्त की शक्ति द्विविध है: ज्वर के नामों का सम्मान कर उसे शांत करना, और उसकी गति को रोगी से हटाकर अन्यत्र मोड़कर उसे दूर करना।
यह एक-ऋचा रक्षोघ्न सूक्त इन्द्र का आवाहन करता है कि वे शीघ्रगामी युद्ध-रक्षक बनकर बन्धनों को भेद दें और शत्रु-बन्धक (पाशिनः) को निष्प्रभाव करें। इन्द्र से ‘बाधाओं के पार जाने’ और विरोधियों पर प्रहार करने की प्रार्थना द्वारा यह मन्त्र शत्रु-रोध, बन्धन-विद्या/जादू और घात के विरुद्ध संक्षिप्त प्रतिकार बनता है, जिससे सुरक्षित अग्रसरता और विजय प्राप्त होती है।
यह एक-ऋचा रक्षात्मक (रक्षा) सूक्त अनुष्ठानिक “वर्म-धारण” करता है, जिसमें असुरक्षित मर्माणि (जीवन-स्थल/महत्त्वपूर्ण बिंदु) रक्षाशक्ति से आच्छादित किए जाते हैं। सोम से प्रार्थना है कि वह यजमान/ग्रहिता को अमृत—अर्थात् मृत्यु-रहित संरक्षण—से वस्त्रवत् आच्छादित करे; वरुण से कि वह चारों ओर के क्षेत्र को विस्तृत और सुरक्षित करे; और विश्वे देवाः से कि वे साथ चलें तथा ग्रहिता की विजय में आनंद लें।
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